काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| नस्तः कर्मीया सिद्धिः ४ ] | सिद्धस्थानम् | २४१ |
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भोजन, स्वेदन, लङ्घन, कवलधारण (सुखं संचार्यते या तु मात्रा सा कवलग्रहः), अवपीड तथा ष्ठीवन (थूकना) और धूप (Fumigation) एवं धूम्रपान देना चाहिये ऐसी विद्वानों की राय है।
कफप्रसेके त्रिफलाचूर्णं ससैन्धवं सक्षौद्रं वा लिह्यात्। चक्षुषोरुक्तं सैन्धवमरीचरसाञ्जनमनःशिला वाऽजाक्षीरपिष्टा वर्त्यः कण्डूतिमिरोपदेहदूषिकाशमन्यो भवन्ति। रसक्रिया वा स ............ शिरोविरेचन-धूमपानावपीडवमनविरेचननिरूहपथ्यभोजनानि शस्यन्ते। देवदारुतालीसमांसीमुस्तशिग्रुगन्धर्वाह्ववा-सकपुनर्नवाकल्कैः सक्षौद्रैस्तैलं पक्वमभीक्ष्णमुपचार्यमाणमस्य योऽतिनस्या ............. र्य तृष्णालोः शीततो वेपमानस्य तीक्ष्णं शिरोविरेचनमनिलशङ्खहनुस्तम्भदिवाकरावर्तात मोहोऽनुषजनयति ज्वरं वा सोपद्रवं; तेषु कुमारतैलं यष्टीमधुकतैलं पुनर्नवातैलं घृतं वातघ्नत्संसकृतं वा ......... त्रकं प्रशस्यते, जाङ्गलश्च संस्कृतो रसः। निद्रानाशे मत्स्यमांसदधियवगोधूमशालिषष्टिकान्नगुडसंस्कृतानि स्नेहलवणवेषणो-पदंशयुक्तान्यानयन्ति निद्राम्। रजस्वलायाः स्नाताया गर्भिण्याश्च पुष्पाध्याययू (षाध्याय) .................-.............. येभ्योऽध्यायेभ्यो भेषजं विदद्ध्यात्। क्षीरं वा जीवनीयोपसिद्धमिति परिषत् ।।
जीर्ण ....... कफप्रसेक में त्रिफला चूर्ण में नमक अथवा मधु मिलाकर देना चाहिये। आंखों के रोगों में सैन्धव, मरिच, रसौत तथा मनःशिला को बकरी के दूध में पीसकर बनाई हुई वर्तियां आंखों की कण्डू (खुजली), तिमिर तथा उपदेह आदि दोषों को शान्त करने वाली कही गई हैं। अथवा इन्हीं की रसक्रिया का प्रयोग किया जाता है। ..... तथा उसके बाद शिरोविरेचन, धूम्रपान, अवपीडनस्य, वमन, विरेचन, निरूह (आस्थापन बस्ति) एवं पथ्यभोजन आदि का प्रयोग प्रशस्त माना गया है। नस्य के अधिक प्रयोग करने से उत्पन्न हुए उपद्रवों में देवदारु, तालीशपत्र, जटामांसी, नागरमोथा, सहिजना, गन्धर्व (श्वेत एरण्ड), बांसा, पुनर्नवा तथा मधु के साथ तैल को पकाकर उसका निरन्तर सेवन करना चाहिये।
...... प्यासे तथा ठण्ड से कांपते हुए रोगी में तीक्ष्ण शिरोविरेचन देने से वायु के कारण शङ्ख तथा हनुप्रदेश में स्तम्भ, सूर्यावर्त, अतिमोह तथा उपद्रव युक्त ज्वर हो जाता है। इनमें कुमार तैल, यष्टीमधु तैल, पुनर्नवा तैल अथवा उन्हीं के द्वारा संस्कृत घी तथा ...... संस्कार युक्त जांगल पशु-पक्षियों का मांस्वरस प्रशस्त माना गया है। निद्रानाश में संस्कारयुक्त एवं स्नेह, लवण, त्रिकटु तथा उपदंश (आचार-मसाले आदि) से युक्त मछली का मांस, दही, जौ, गेहूं, शालि, षष्टिक अन्न एवं गुड आदि के प्रयोग से निद्रा उत्पन्न हो जाती है। रजस्वला, स्नान द्वारा शुद्ध हुई तथा गर्भिणी स्त्री की पुष्पाध्याय, यूषाध्याय ....... आदि अध्यायों में कही हुई ओषधियों द्वारा चिकित्सा करे। अथवा जीवनीय ओषधियों से सिद्ध दूध का सेवन कराये—ऐसी विद्वानों की सम्मति है।।
तत्र श्लोकाः—
कुमारतैलमेतेषां व्याधीनां शमनं परम्। नस्ये पाने तथाऽभ्यङ्गे पुराणं घृतमेव च।।
लङ्घनं धूमधूपौ च स्वेदोष्णापरिषेचनम्। उपनाहोऽवपीडश्च श.................. ।।
उपर्युक्त व्याधियों में नस्य पान तथा अभ्यङ्ग के द्वारा कुमार तैल अथवा पुराण घृत (पुराने घृत) के प्रयोग से ये रोग शान्त हो जाते हैं। अथवा लङ्घन, धूम्रपान, धूप (Fumigation), स्वेदन, उष्णपरिषेचन, (Hot fomentation), उपनाह (पुलटिस) तथा अवपीड का प्रयोग करना चाहिये।
**वक्तव्य—**पुराण घृत के विषय में प्राचीन आचार्यों में मतभेद दिखाई देता है। कुछ आचार्य एक वर्ष पुराने घृत को, कुछ १० वर्ष पुराने तथा कुछ १५ वर्ष पुराने घृत को 'पुराण घृत' कहते हैं। इसका विस्तृत विवेचन हमने इस ग्रन्थ में अन्यत्र किया है। पाठक इसे वहीं देखें ।।