भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 600

२४२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्रिया सिद्धिः ५ ]

यवान्नं शालयो मुद्रधात्रीदाडिमसैन्धवम् । हितं नस्यविधौ भोज्यं तदा ह्यार्तस्य विभ्रमे ।।

नस्य कर्म में रोगी को विभ्रम हो जाने पर यवान्न (जौ का भात), शालिचावल, मूंग, हरड़, अनारदाना तथा सैन्धव का सेवन कराना चाहिये ।।

नस्यकर्मणि बालानां स्तनपानां विशेषतः । कटुतैल प्रयुञ्जीत घृतं वा सैन्धवान्वितम् ।। बिन्दुं बिन्दुमथो द्वौ द्वौ त्रींस्त्र न् वा रोगदर्शनात् । अङ्गुल्या नासयोर्दद्यादपिदध्यात् क्षणं ततः ।। तेनास्य पच्यते श्लेष्मा श्लेष्मणा न च बाध्यते ।

नस्य कर्म में विशेष कर दूध पीने वाले बालकों को कटुतैल अथवा सैन्धवयुक्त घृत का प्रयोग कराना चाहिये । इसके लिये जब तक रोग दिखाई देवे तब तक उंगलियों के द्वारा नासिका में दो २ तीन ३ कर के स्नेह की बूंदें डाले तथा थोड़ी देर के लिये नासिका को बन्द करदे । इसके द्वारा इसके श्लेष्मा का पाक हो जाता है । तथा वह श्लेष्मा उसे कोई कष्ट नहीं पहुंचाता ।।

स्नानादीन् परिहारांश्च यथोक्तानुपचारयेत् ।। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः । (इति सिद्धिस्थाने) नस्तःकर्मीयासिद्धि(र्नाम चतुर्थोऽध्याः ।।४।।)


इसके बाद स्नान आदि यथोक्त परिहारों का आचरण करे ।। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । (इति सिद्धिस्थाने) नस्तःकर्मीया सिद्धि(र्नाम चतुर्थोऽध्यायः ।।४।।)


क्रियासिद्धिर्नाम पञ्चमोऽध्यायः ।

अथातः क्रियासिद्धिं व्याख्यास्यामः ।।१।। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम क्रियासिद्धि का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । इस अध्याय में पञ्चकर्म के द्वारा किस प्रकार रोगसिद्धि होती है तथा उसमें किन २ भावों का त्याग करना चाहिये इत्यादि बातों का वर्णन होगा ।।१-२।।

क्रियाणां सिद्धिमन्विच्छन्नित्यं ब्रूयाद्द्विषडनरः । तैलपात्रमिवात्मानं ..... रोगदर्शनात् ।।३।।

वमन, विरेचन आदि क्रियाओं की सिद्धि को चाहता हुआ व्यक्ति अपने आपको रोग की उपस्थिति पर्यन्त (अर्थात् जब तक रोग विद्यमान है) तैल के पात्र के समान ..... समझे । अर्थात् जिस प्रकार तैल से भरे हुए पात्र में से सदा तैल के गिरने का डर रहता है उसी प्रकार वह व्यक्ति अपने आपको समझे । चरक सि. अ. १२ में कहा है—अथ खल्वातुर वैद्यः सशुद्ध वमनादिभिः । दुर्बलं कृशमल्पाग्निं मुक्तसन्धानबन्धनम् ।। निर्हृतानिलविण्मूत्रकफपित्तं कृशाशयम् । शून्यदेहं प्रतीकारासहिष्णुं परिपालयेत् ।। यथाण्डं तरुणं पूर्णं तैलपात्रं यथैव च । गोपाल इव दण्डी गाः सर्वस्मादपचारतः ।।३।।

अजीर्णं मैथनं यानमुच्चैर्भाष्यं दिवाशयम् । अतिचङ्क्रमणस्थानमसात्म्यादि च वर्जयेत् ।।४।।