भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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क्रिया सिद्धिः ५ ] सिद्धिस्थानम् २४३

जब तक व्यक्ति प्रकृतिस्थ न हो जाय तब तक- १. अजीर्ण २. मैथुन ३. यान (सवारी) ४. ऊंचा बोलना ५. दिन में सोना ६. अतिचङ्क्रमण (बहुत चलना) ७. बहुत बैठना ८. असात्म्य (अहित) भोजन-आदि भावों का उसे त्याग करना चाहिये। चरक सि. अ. १२ में भी कहा है—एतां प्रकृतिमप्राप्तः सर्ववर्ज्यानि वर्जयेत्। महादोषकराण्यष्टाविमानि तु विशेषतः।। उच्चैर्भाष्यं रथक्षोभमतिचङ्क्रमणासने। अजीर्णाहितभोज्ये च दिवास्वप्न च मैथुने ॥४॥

अजीर्णे वर्धते व्याधिः पुनः कार्श्यं च जायते ।
क्रियायां मैथुनाच्छाण्ढ्यं पाण्डुत्वं च निगच्छति ।।

पञ्चकर्म के समय अजीर्ण होने से व्याधि की पुनः वृद्धि हो जाती है तथा शरीर में कृशता हो जाती है। चरक सि. अ. १२ में कहा है—‘अजीर्णाध्यशनाभ्यां तु मुखशोषाध्मानशूलनिस्तोदपिपासागात्रसादच्छर्दीतीसारमूर्च्छाज्वरप्रवाहणामविषादयः स्युः’। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह कल्प स्थान में भी कहा है। वमन आदि क्रियाओं के समय मैथुन करने से नपुंसकता तथा पाण्डुता हो जाती है। चरक सि. अ. १२ में कहा है—व्यवायादाशुबलसादोरोसादबस्तिशिरोगुदमेढ्रवृषणवङ्क्षणोरु-जानुजङ्घापादशूलहृदयस्पन्दननेत्रपीडाङ्गशैथिल्यशुक्रमार्गशोणितागमनकासश्वासशोणितष्ठीवनस्वरासादकटोदौर्बल्यैकाङ्ग-सर्वाङ्गरोगमुष्कश्वयथुवातवर्चोमूत्रसङ्गशुक्रविसर्गजाड्यवेपथुबाधिर्यविषादायः स्युः, उत्पाट्यतइव गुदस्ताड्यत इव मेढ्रमवसीदतीव मनो वेपते हृदयं पीड्यन्ते सन्ध्यस्तमः प्रवेश्यत इव च। इसी प्रकार अष्टाङ्ग संग्रह कल्पस्थान में भी कहा है ॥५॥

योऽतीव नित्यं रमते यानाद्वातश्च कुप्यति । अग्निसादो दिवास्वप्नात् कफवृद्धिज्वरोऽरुचिः ।।६।।

जो यान (सवारी) के द्वारा नित्य खूब रमण (सैर) करता है उसका वायु प्रकुपित हो जाता है। चरक सि. अ. १२ में कहा है—‘रथक्षोभात् सन्धिपर्वशैथिल्यहनुनासाकर्णशिरःशूलतोदकुक्षिक्षोभाटोपान्त्रकूजनाध्मानहृदयेन्द्रियोपरोधस्फिक्पार्श्ववङ्क्षण-वृषणकटीपृष्ठवेदनासन्धिस्कन्धग्रीवादौर्बल्याङ्गाभितापपदाशोफप्रस्वापहर्षाणादयः’। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह कल्पस्थान में भी कहा है। दिन में सोने से अग्निमांद्य, कफ की वृद्धि, ज्वर तथा अरुचि हो जाते हैं। चरक सि. अ. १२ में कहा है—दिवास्वप्नाद्रोचकविपाकाग्निनाशस्तैमित्यपाण्डुकण्डूपामादाहच्छर्द्दिमर्द्दहृत्स्तम्भाड्यतन्द्रानिद्राप्रसङ्गग्रन्थिंजन्मदौर्बल्यरक्तमूत्राक्षितातालुलेपाः (पिपासा च) इसी प्रकार अष्टाङ्ग संग्रह के कल्पस्थान तथा सूत्रस्थान में भी कहा है ॥६॥

मन्यास्तम्भः शिरःशूलं वाक्पार्श्वहनुसंग्रहः । कण्ठोद्ध्वंसः श्रमो ग्लानिर्ज्वरश्चात्युच्चभाषणात् ।।७।।

बहुत ऊंचा बोलने से मन्यास्तम्भ, शिरःशूल, वाग्ग्रह, पार्श्वग्रह, हनुग्रह, कण्ठोद्ध्वंस, श्रम, ग्लानि तथा ज्वर हो जाते हैं। चरक सिद्धि अ. १२ में कहा है-‘तत्र उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां शिरस्तापकर्णशङ्खनिस्तोद-श्रोत्रोपरोधमुखतालुकण्ठशोषतैमिर्यपिपासाज्वरतमकहकनुमन्याग्रानिष्ठीवनोरःपार्श्वशूलस्वरभेदहिक्काश्वासादयः स्युः’ ॥७॥

कटीवङ्क्षणपादोरुजानुबस्त्यनिलामयः । शर्कराश्मरिखल्ल्याद्या अतिचङ्क्रमणोद्भवाः ॥८॥

अति चङ्क्रमण (बहुत अधिक चलने) से कटी, वङ्क्षण, पाद, ऊरु (जंघा), जानु, बस्ति तथा वातरोग, शर्करा (Sand), अश्मरी (Calculus grevels) तथा खल्ली (खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटिनी)—आदि रोग हो जाते हैं। चरक सि. अ. १२ में कहा है-अतिचङ्क्रमणात् पादजङ्घोरुजानुबङ्कक्षणश्रोणीपृष्ठशूलसक्थिसादनिस्तोदपिण्डि-कोद्वेष्टनाङ्गमर्दासाभितापसिराधमनीहर्षश्वासकासादयः स्युः। इसी प्रकार अष्टाङ्ग संग्रह क. अ. ७ में भी कहा है ॥८॥

सुप्तताऽधरकायस्य तन्द्रीजाड्यादिविभ्रमाः । वातशोणितहल्लासप्रे.................... ।।९।।

(बहुत अधिक बैठने से) शरीर के निचले भाग का सो जाना (सुख होना-Hemiplegia), तन्द्रा, जड़ता, विभ्रम, वातरक्त (Gont), हल्लास ...... तथा कफप्रसेक आदि रोग हो जाते हैं। चरक सि. अ. १२ में कहा है-‘अत्यासनात् रथक्षोभजाःस्फिक्पार्श्ववङ्क्षणवृषणकटीपृष्ठवेदनादयः स्युः ॥९॥