भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 602

२४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्रिया सिद्धिः ५ ]

वैवर्ण्यमरुचिर्ग्लानिः कण्डूपाण्डुज्वरभ्रमाः । कामलाकुष्ठवैसर्पपामाद्याश्चाप्यसात्म्यजाः ॥१०॥

असात्म्य अथवा अहितकर भोजन से विवर्णता, अरुचि, ग्लानि, कण्डू, पाण्डु, ज्वर, भ्रम, कामला, कुष्ठ, विसर्प, पामा (Eczema) आदि रोग हो जाते हैं। चरक सि. अ. १२ में कहा है—विषमाहिताशनाभ्यामनन्नाभिलाषदौर्बल्यवैवर्ण्यकण्डू-पामागात्रावसादा वातादिप्रकोपजाश्च ग्रहण्यर्शोविकारादयः। अष्टाङ्गसंग्रह क. अ. ७ में भी कहा है—‘अहितान्नाद्यथादोषं रोगाः स्युः’ ॥१०॥

तेषां चिकित्सितं स्वं स्वमविरुद्धं विधापयेत् । कृशान् संबृंहयेच्चापि कर्शयेत् परिबृंहितान् ॥११॥

उनकी परस्पर अविरुद्ध चिकित्सा करनी चाहिये। एतदर्थ कृश (दुर्बल) व्यक्तियों का बृंहण तथा बृंहित (पुष्ट) व्यक्तियों का कर्षण करना चाहिये। चरक सि. अ. १२ में इन उपर्युक्त आठ त्याज्य भावों के सेवन से उत्पन्न होने वाले रोगों की पृथक् २ चिकित्सा का विधान दिया गया है। कहा है—तेषां सिद्धिः–उच्चैर्भाष्यातिभाष्याजानामभ्यङ्गस्वेदोपनाहधूम्रनस्योपरिभक्तस्नेहपानरसक्षीरादिभिर्वातहरः सर्वो विधिर्मौनं च। रथक्षोभातिचङ्क्रमणात्यासनानां स्नेहस्वेदादि वातहरं कर्म सर्वं निदानवर्जन च। अजीर्णाध्यशनानां निरवशेषतश्छर्दनं रूक्षः स्वेदोलङ्घनीयपाचनीयदीपनीयौषधावचारणं च। विषमाहिताशनानां यथास्वं दोषहराः क्रियाः। दिवास्वप्नजानां धूमपानलङ्घनवमनशिरोविरेचनव्यायामरूक्षाशनारिष्टदीपनीयौषधोपयोगः प्रधर्षणोन्मर्दनपरिषेचनादिश्च श्लेष्महरः सर्वो विधिः। मैथुनजानां जीवनीयरसिद्धयोः क्षीरसर्पिषोरुपयोगस्तथा वातहराः स्वेदाभ्यङ्गोपनाहा वृष्याश्चाहाराः स्नेहाः स्नेहविधयो यापनाबस्तयोऽनुवासनं च, मूत्रवैकृतबस्तिशूलेषु चोत्तरबस्तिः विदारीगन्धादिगणजीवनीयगणक्षीरसंसिद्धं तैलं स्यात् ॥११॥

अतिदीर्घमतिस्थूलं जर्जरं स्फुटितं तनु । कुटि(लं) ........... च वर्जयेत् ॥१२॥

बस्तिनेत्र के दोष– १. अतिदीर्घ २. अतिस्थूल ३. जर्जर (जीर्ण) ४. स्फुटित (फटा हुआ) ५. तनु (बहुत पतला) ६. कुटिल (वक्र-टेढा होना) .... इन दोषों से युक्त बस्तिनेत्र (Nozzle) का त्याग करना चाहिये। चरक सि. अ. ५ में कहा है—ह्रस्वं दीर्घं तनु स्थूलं जीर्णं शिथिलबन्धनम्। पार्श्वच्छिद्र तथा वक्रमष्टौ नेत्राणि वर्जयेत्॥ अर्थात् यहां ये उपर्युक्त आठ दोष गिनाये हैं। सुश्रुत चि. अ. ३५ में ११ नेत्रदोष बताये हैं—अतिस्थूलं कर्कशमवनतमणु भिन्नं सन्निकृष्टविप्रकृष्टकर्णिकं सूक्ष्मातिच्छिद्रमतिदीर्घमतिह्रस्वमस्त्रिमदित्येकादश नत्रदोषाः ॥१२॥

अतिह्रस्वः खरः स्थूलस्तनुदीर्घचिरस्थिताः । छिद्री महानुपहतो वर्जिता बस्तयो नव ॥१३॥

बस्ति के दोष– १. अतिह्रस्व २. खर ३. स्थूल ४. तनु (पतला) ५. दीर्घ ६. बहुत देर का होना ७. छिद्रयुक्त होना ८. महान् ९. उपहत (खराब हुआ होना) इन ९. दोषों से युक्त बस्तियों का त्याग कर देना चाहिये। चरक सि. अ. ५ में बस्तिपुटक के ८ दोष गिनाये हैं—मांसलस्निग्धयविषमस्थूलजालिकबातलाः। छिन्नः क्लिन्नश्च तानष्टो बस्तीन् कर्मसु वर्जयेत्॥ अर्थात् १. मांसल होना २. स्निग्ध होना ३. विषम होना ४. स्थूल होना ५. शिराजाल से व्याप्त होना ६. वातल होना ७. कटा होना तथा ८. क्लिन्न होना–ये ८ दोष हैं। सुश्रुत चि. अ. ३५ में बस्ति के ५ दोष गिनाये हैं—बहुलतालपता सच्छिद्रता प्रस्तीर्णता दुर्बद्धतेति पञ्च बस्तिदोषाः ॥१३॥

अप्राप्तमतीनीतं च विन्यस्तमतिपीडितम् । स्रुतं विलग्नं शिथिलं रुद्धवातं चिराचिरम् ॥१४॥ प्रज्ञापराधजा दोषाः प्रणेतुर्बस्तिकर्मणि । .................... भगन्दरम् ॥१५॥

बस्तिकर्म में बस्ति के बनाने वाले के प्रज्ञापराध (अज्ञान) से निम्न दोष होते हैं— १. बस्ति का पूरा न पहुंचना, २. बस्ति का अधिक पहुँच जाना ३. बस्ति का विन्यस्त (उलटा हो जाना) ४. अत्यन्त पीडा पहुँचाना ५. स्राव होना ६. अन्दर ही लगा रहना ७. शिथिल ८. बस्ति के द्वारा वायु का रुक जाना ९. चिर (बस्ति में बहुत देर होना) तथा १०. अचिर (शीघ्रता-बस्ति कर्म का बहुत शीघ्र हो जाना) इनसे ....... भगन्दर आदि रोग हो जाते हैं ॥१४-१५॥