भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ ] सिद्धिस्थानम् २४५

जीवकर्षभसिद्धेन तं घृतेनानुवासयेत्। निरूहयेत् स्त्रंसयेद्वा ततः संपद्यते सुखी ।।१६।।

चिकित्सा—इसमें जीवक, ऋषभक, आदि ओषधियों से सिद्ध किये हुए घृत से अनुवासन कराना चाहिये। उसे निरूह बस्ति देवे तथा स्त्रंसन (विरेचन) कराये। इससे रोगी स्वस्थ हो जाता है ।।१६।।

क्षीरं यवान्नशाकानि जाङ्ग्लान्यामिषाणि च। भोजयेत् स्नेहयुक्तानि गुदरोगोद्भव्दे शिशुम् ।।१७।।

यदि बालक को गुदा के रोग हो जांय तो उसमें दूध, यवान्न (जौ का भात), शाक, स्नेह (घृत) युक्त जांगल पशु-पक्षियों के मांस का भोजन कराना चाहिये ।।१७।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति सिद्धिस्थाने) क्रियासिद्धि(र्नामपञ्चमोऽध्यायः ।।५।।)

(इति ताडपत्रपुस्तके १५१ तमं पत्रम्)


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति सिद्धिस्थाने) क्रियासिद्धि(र्नाम पञ्चमोऽध्यायः ।।५।।)


बस्तिकर्मीयासिद्धिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ।

(अथातो बस्तिकर्मीयां सिद्धि) व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम बस्तिकर्मीय सिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बस्ति के अयोग तथा अतियोग से उत्पन्न होने वाले लक्षण एवं उनकी चिकित्सा कही जायगी ।।१-२।।

....................... गुदे मलाभिभूते गुदे समुपस्थितानिले वोपस्थितपुरीषे वा संस्थितश्लेष्मणि वा नेत्रे वा जिह्वे शिथिलवत्यपीडिते न स्नेहः पक्वाशयमनुप्राप्नोति। तमयोगं विद्यात् ।।३।।

बस्ति का अयोग—.........जब गुद मल से युक्त हो अर्थात् गुदा में मल भरा हुआ हो, गुदा में वायु, पुरीष एवं श्लेष्मा विद्यमान हो, बस्तिनेत्र (Nozzle) टेढा हो, अथवा बस्तिपुटक शिथिल हो तथा दबाया न गया हो तो बस्तिकार्य में प्रयुक्त स्नेह पक्वाशय में नहीं पहुंचता। इसे अयोग कहते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है—वद्धे प्रणीते विषम च नेत्रे मार्गे तथाऽर्शःकफविड्विबन्धे। न याति बस्तिर्न सुखं निरेति दोषावृतोऽल्पो यदि वाल्पवीर्यः ।।३।।

यः ........ वातपित्तकफपुरीषमूत्राभिभतस्य ................ गच्छन्नूर्ध्वं वा प्रपद्यते, विरिक्त-स्रुतविशोषिततृषितबुभुक्षितश्रान्तचिन्तेर्ष्यायासशोकभयार्तस्य वा न प्रत्यागच्छति तमतियोगं विद्यात् ।

बस्ति का अतियोग—जो .......... स्नेह रोगी की गुदा के वात, पित्त, कफ, पुरीष तथा मूत्र से व्याप्त होने के कारण ....... ऊपर जाता हुआ पक्वाशय से भी ऊपर चला जाता है अथवा जो स्नेह विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है), स्रुत (जिसका स्राव हो रहा है), जिसका शोषण हुआ है, जो प्यासा, भूखा, थका हुआ, चिन्ता, ईर्ष्या, परिश्रम, शोक एवं भय से युक्त है-ऐसे व्यक्ति का, लौटकर वापिस नहीं आता है। उसे अतियोग जाने ।।