भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

२४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बस्तिकर्मिया सिद्धिः ६ ]

तयोस्तृष्णामूर्च्छाहृल्लासज्वरदाहहृद्रोगश्वयथुशूलार्शः पाण्डुका (म)ला..................तिस्तैमित्याद्या रोगा उत्पद्यन्ते । तत्रापि यथादोषं स्नेहस्वेदवमनविरेचनास्थापनफलवतिहितमिताशनादिभिः शममापद्यते ।।

उन दोनों अर्थात् अयोग एवं अतियोग से युक्त व्यक्तियों को तृष्णा, मूर्च्छा, हल्लास, ज्वर, दाह, हृद्रोग, श्वयथु, शूल, अर्श, पाण्डु, कामला, ...... स्तिमितता आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥

इनमें दोष के अनुसार स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, आस्थापन, फलवर्ति तथा हितकारी एवं परिमित आहार आदि के द्वारा शान्ति होती है ॥

तत्र श्लोकाः—

भृशमुत्पीडितो बस्तिर्बाहुल्याद्वातमूर्च्छितः । ........................................ ।।
.....पित्तकफसंमिश्रो मुखे निपतितेऽपि वा । विष्टम्भयति वा तीव्रं प्राणानुपरुणद्धि वा ।।

बहुत अधिक दबाई हुई बस्ति अधिकता के कारण वायु से मूर्च्छित हुई .... पित्त और कफ से मिलकर बस्ति के मुख को नीचे को झुका देती है । इससे वह तीव्र विष्टम्भ उत्पन्न कर देती है—अथवा प्राणों का रोध कर देती है अर्थात् रोगी की मृत्यु हो जाती है ॥

तृण्मूर्च्छास्वेदहृल्लासदाहगौरवविभ्रमाः । ऊर्ध्वमागच्छतस्तस्य रूपाण्येतानि लक्षयेत् ।।

बस्ति के ऊर्ध्वमार्ग में आने पर अर्थात् अधोमार्ग से बस्ति के वापिस न लौटने पर निम्न लक्षण होते हैं—रोगी को प्यास लगती है, मूर्च्छा हो जाती है, पसीना आता है तथा जी मचलाना, दाह, शरीर का भारीपन और विभ्रम हो जाते हैं ॥

एतानि रूपाण्युप(लभ्य) ............................ ।
.................. (विश्रा)म्य विश्राम्य पुनः पुनश्च ।।
निपीडयेज्जातबलं बलेन शीताभिरद्भिः परिषेचयेच्च ।
वित्रासयेद्भीषयेद्रोदयेच्च ब्रूयान्मृतान् वा स्वजनेष्टबन्धून् ।।
बद्धान् हतान् विप्रकृतांस्तथैव शीताम्बुसिक्तैर्व्यजनै .... ।
.................................................. ।।

रोगी में उपर्युक्त लक्षण दिखाई देने पर अर्थात् बस्ति का अतियोग हो जाने पर ..... उसे बार २ विश्राम दे तथा बल की वृद्धि होने पर उसका बलपूर्वक पीडन करे और शीतल जल के द्वारा परिषेचन करे । उसे डराये, धमकाये, रुलाये तथा उसके मृत, बद्ध, हत एवं विहत अवस्था में विद्यमान इष्ट, बन्धु आदि स्वजनों का समाचार सुनाये और शीतल जल से युक्त पंखों के द्वारा उसे हवा करे....... ॥

कुष्ठं सुपिष्टं कुमुदेन सार्धं गव्यंच पित्तं प्रपिबेज्जलेन ।
गोमूत्रयुक्तामभयां पिबेद्वायुक्तं त्रिवृत् सैन्धवसप्तलाद्यैः ।।

अब बस्ति के अयोग की चिकित्सा लिखते हैं—रोगी को कुमुद (नील कमल) के साथ अच्छी प्रकार पीसे हुए कुष्ठ अथवा गोपित्त को जल के साथ सेवन कराये । अथवा गोमूत्र से युक्त हरीतकी या सैन्धव, सातला आदि के साथ युक्तिपूर्वक त्रिवृत् का सेवन कराये ॥