काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 605, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ ] | सिद्धिस्थानम् | २४७ |
|---|
विरेचनद्रव्यकषायसिद्धं सतैलमुष्णं लवणीकृतं च।
निवृत्तदोषस्य सपञ्चमूलमास्थापनेऽत्यन्तमुशन्ति(वृद्धाः) ।।
.................................. म्बुयुक्तेन रसेन चैनम्।
संभोजयेज्जाङ्गलकेन शालीन् स्नानादि सर्वं परिहारयेच्च ।।
जिसके दोष निवृत्त हो गये हैं ऐसे रोगी को वृद्ध वैद्य तैल एवं लवण मिले हुए तथा विरेचन द्रव्यों के कषाय से सिद्ध किये हुए पञ्चमूल के क्वाथ का गरम अवस्था में आस्थापन (निरूह बस्ति) देने का विधान बतलाते हैं .... तथा जल मिश्रित जांगल पशु-पक्षियों के मांसरस के साथ शालि चावलों का सेवन कराये। और स्नान आदि सम्पूर्ण भावों का त्याग करे ।।
ततोऽस्य सात्म्याग्निबलाद्यवेक्ष्य संबृंहयेद्बस्तिभिरेव बालम्।
इसके बाद बालक के सात्म्य, अग्नि, बल आदि को देखकर बस्तियों के द्वारा उसका बृंहण करे ।।
आनाहिनं शूलरुजापरीतं सुस्निग्धगात्रं फलवर्तियोगैः ।।
विस्रंसयेत् पथ्यभुजं यथोक्तं ........................।
आनाह तथा शूल रोग से युक्त रोगी के सम्पूर्ण शरीर का अच्छी प्रकार से स्नेहन करके फलवर्तियों (गुदवर्तियों— Suppositories) के द्वारा मल का स्रंसन कराये तथा-यथोक्त पथ्य का सेवन करे ।।
.............................. गैश्च सकिण्वसिद्धार्थकमाषचूर्णैः ।।
ससैन्धवैस्तैलगुडोपपन्नैर्यवोपमाः फलवर्त्तीविदध्यात्।
फलवर्ति का निर्माण विधि ...... किण्व (Yeast) सिद्धार्थक (श्वेत सरसों), उड़द, सैन्धव, तैल तथा गुड़ को मिला कर उससे यव (जौ) के समान (अर्थात् दोनों ओर से पतली तथा बीच से मोटी) फलवर्ति (गुदवर्ती) बनाये ।।
आनाहिनस्ताःप्रणयेदपाने षट सप्त पञ्चेति वयोऽनुरूपम्।
ताभिर्विरिक्ते लभते स शमे विरेचयेत्तदसिद्धौ तु तीक्ष्णैः ।।
आनाह रोग के रोगी की गुदा में अवस्था के अनुसार ६, ७ अथवा ५ गुदवर्तियां डाले। उनके द्वारा विरेचन हो जाने पर रोगी को शान्ति हो जाती है। यदि इन फलवर्तियों के द्वारा विरेचन न हो तो तीक्ष्ण ओषधियों द्वारा विरेचन कराये ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति सिद्धिस्थाने) बस्तिकर्मीयासिद्धि(र्नामषष्ठोऽध्यायः ।।६।।)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति सिद्धिस्थाने) बस्तिकर्मीया सिद्धि(र्नाम षष्ठोऽध्यायः) ।।६।।