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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
बस्तिकर्मीया सिद्धिः ६ ]सिद्धिस्थानम्२४७

विरेचनद्रव्यकषायसिद्धं सतैलमुष्णं लवणीकृतं च।
निवृत्तदोषस्य सपञ्चमूलमास्थापनेऽत्यन्तमुशन्ति(वृद्धाः) ।।
.................................. म्बुयुक्तेन रसेन चैनम्।
संभोजयेज्जाङ्गलकेन शालीन् स्नानादि सर्वं परिहारयेच्च ।।

जिसके दोष निवृत्त हो गये हैं ऐसे रोगी को वृद्ध वैद्य तैल एवं लवण मिले हुए तथा विरेचन द्रव्यों के कषाय से सिद्ध किये हुए पञ्चमूल के क्वाथ का गरम अवस्था में आस्थापन (निरूह बस्ति) देने का विधान बतलाते हैं .... तथा जल मिश्रित जांगल पशु-पक्षियों के मांसरस के साथ शालि चावलों का सेवन कराये। और स्नान आदि सम्पूर्ण भावों का त्याग करे ।।

ततोऽस्य सात्म्याग्निबलाद्यवेक्ष्य संबृंहयेद्बस्तिभिरेव बालम्।

इसके बाद बालक के सात्म्य, अग्नि, बल आदि को देखकर बस्तियों के द्वारा उसका बृंहण करे ।।

आनाहिनं शूलरुजापरीतं सुस्निग्धगात्रं फलवर्तियोगैः ।।
विस्रंसयेत् पथ्यभुजं यथोक्तं ........................।

आनाह तथा शूल रोग से युक्त रोगी के सम्पूर्ण शरीर का अच्छी प्रकार से स्नेहन करके फलवर्तियों (गुदवर्तियों— Suppositories) के द्वारा मल का स्रंसन कराये तथा-यथोक्त पथ्य का सेवन करे ।।

.............................. गैश्च सकिण्वसिद्धार्थकमाषचूर्णैः ।।
ससैन्धवैस्तैलगुडोपपन्नैर्यवोपमाः फलवर्त्तीविदध्यात्।

फलवर्ति का निर्माण विधि ...... किण्व (Yeast) सिद्धार्थक (श्वेत सरसों), उड़द, सैन्धव, तैल तथा गुड़ को मिला कर उससे यव (जौ) के समान (अर्थात् दोनों ओर से पतली तथा बीच से मोटी) फलवर्ति (गुदवर्ती) बनाये ।।

आनाहिनस्ताःप्रणयेदपाने षट सप्त पञ्चेति वयोऽनुरूपम्।
ताभिर्विरिक्ते लभते स शमे विरेचयेत्तदसिद्धौ तु तीक्ष्णैः ।।

आनाह रोग के रोगी की गुदा में अवस्था के अनुसार ६, ७ अथवा ५ गुदवर्तियां डाले। उनके द्वारा विरेचन हो जाने पर रोगी को शान्ति हो जाती है। यदि इन फलवर्तियों के द्वारा विरेचन न हो तो तीक्ष्ण ओषधियों द्वारा विरेचन कराये ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति सिद्धिस्थाने) बस्तिकर्मीयासिद्धि(र्नामषष्ठोऽध्यायः ।।६।।)


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति सिद्धिस्थाने) बस्तिकर्मीया सिद्धि(र्नाम षष्ठोऽध्यायः) ।।६।।

२४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ]

पञ्च कर्मीया सिद्धिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ।

अथातः पञ्चकर्मीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम पञ्चकर्मीय (पञ्चकर्म सम्बन्धी) सिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

अथ खलु भगवन् देहिनां व्याधयः के वमनसाध्याः; के न; के विरेचनसाध्याः ? के न; केऽनुवासनसाध्याः ? के न; के निरूह (साध्याः ? के न;) ................ (भ)गवान् कश्यपः- कफज्वरारुचिमुखवैरस्यकफप्रसेककफहृद्रोगविषूचिकाकासश्वासगलग्रहगलशुण्डिकागलगण्डमालारोहिणिका-विदारिकाधोरक्तपित्तहृल्लासप्रमेहहली (मक) ............ स्कन्दग्रहस्कन्दापस्मारस्कन्दपितृनैगमेषक्षीर-गौरवक्षीरवृद्धिक्षीरघनत्वाजीर्णपरिकर्तिकाहृल्लासशूलाटोपातिविरेच्यमानगरितविषपीताद्या वमनसाध्या इति ।।३।।

वृद्धजीवक ने प्रश्न किया—भगवन् ! प्राणियों की कौन सी व्याधियां (रोग) वमन साध्य हैं तथा कौनसी वमन साध्य नहीं हैं ? कौनसी व्याधियां विरेचन साध्य हैं तथा कौनसी विरेचन साध्य नहीं हैं ? कौनसी व्याधियां अनुवासन साध्य हैं तथा कौनसी नहीं ? कौनसी व्याधियां निरूहसाध्य हैं तथा कौनसी नहीं ? (कौनसी व्याधियां शिरोविरेचन साध्य हैं तथा कौनसी नहीं है?—यह अंश खण्डित है) ..... । इन प्रश्नों को सुनकर भगवान् कश्यप ने कहा—वमनसाध्य व्याधियां—कफज्वर, अरुचि, मुखवैरस्य, कफप्रसेक, कफज हृद्रोग, विषूचिका, कास, श्वास, गलग्रह, गलशुण्डिका, गलगण्ड, गण्डमाला, रोहिणिका (Diptheria), विदारिका (प्रमेहपीडिकाविशेषः-विदारीकन्दवत् वृत्ता कठिना च विदारिका), अधोरक्तपित्त, हृल्लास, प्रमेह, हलीमक, स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, स्कन्दपिता, नैगमेष, क्षीरगौरव (दूध का भारी होना), क्षीरवृद्धि, क्षीरघनत्व (दूध का घना-सान्द्र-Consentrated होना), अजीर्ण, परिकर्तिका, हृल्लास, शूल, आटोप, अतिविरेचन (जिसे विरेचन अधिक होता हो) जिसने गर (सयोगज विष) तथा विष का पान किया हो—इत्यादि रोग वमनसाध्य हैं—वमन के द्वारा अच्छे होनेवाले हैं। अर्थात् उपर्युक्त रोगों में वमन कराया जा सकता है। चरक सि. अ. २ में कहा है—पीनसकुष्ठनवज्वरराजयक्ष्माकासश्वासगलग्रहगलगण्डश्लीपदमेहमान्दाग्नि विरुद्धाजीर्णात्रिविसूचिकाल-सकविषगरपीतदृष्टदिग्वविद्धाधःशोणितपित्तप्रसेकहृल्लासारोचकाविपाकापच्यपस्मारोन्मादातिसारशोथपाण्डुरोगमुखपाकदुष्टस्तन्यादयः श्लेष्मव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोध्यायोक्ताश्च, तेषु हि वमनं प्रधानतममित्युक्तं, केदारसेतुभेदे शाल्याद्यशोषदोषविनाशवत् । इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है ।।३।।

अत्र श्लोकः—
कफाधिकाश्च ये रोगा ................ । ................................ ।।

जिन रोगों में कफ की अधिकता होती है ......... (उनमें वमन कराना चाहिये) अर्थात् श्लेष्मप्रधान रोगों में वमन श्रेष्ठ माना गया है। चरक सू. अ. २० में कहा है—वमनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः । तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति । तत्रावजिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते ।।

वृद्धजीवक ! पुष्पिण्यतुमृती गर्भिणी कुटीगताऽल्पक्षीरा लघुक्षीरा नष्टक्षीरा क्षीरच्छर्दनपुत्रा प्रच्छर्दिनी सुभगा पण्डितमानिनी जाठरी वातज्वरी स्थूलोऽक्षिरोगी तृष्णालुर्मूर्च्छावान्निरूढोऽनुवासितः क्षतः क्षीणःसोप-
(इति ताडपत्रपुस्तके १५२ तमं पत्रम्)

पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ] सिद्धिस्थानम् २४९

............ गैन्नोऽतिबालोऽतिवृद्धो गुल्मप्लीहोर्ध्वरक्तलोमव्यापत्कर्णरोगशिरःकम्पार्दिताधविभेदक-सूर्य्यावर्तरेवतीपौण्डरीकशकुनीपूतनामुखमण्डिकार्ताश्च न वाम्याः, अगर्भा गर्भकामा विवर्णक्षीरा स्रवत्क्षीरा मन्दाग्नयो ......... वैसर्पशोणिताशोंविषमाग्निकुष्ठश्वयथुश्वित्रोर्ध्वरक्तप्लीहगुल्ममधुमेहहलीमककामला-पाण्डुरोगहृद्रोगकृमिकोष्ठापस्मारोपस्तम्भोदावर्तकफोन्मादविद्रधिशलीपदयानि ........... द्या इति ।।

किन्हें वमन हीं कराना चाहिये—हे वृद्धजीवक ! पुष्पिणी (जिसे रजोदर्शन होता है), ऋतुमती, गर्भिणी, जो कुटी में स्थित है, जिसके स्तनों में दूध कम आता है, जिसका दूध हल्का होता है, जिसका दूध नष्ट हो गया है अर्थात् सूख गया है, जिसका पुत्र दूध का वमन कर देता है, जिसे पहले से ही वमन होता हो, जो सुभगा एवं अपने को पण्डित समझने वाली है, जिसे उदररोग हो, वातज्वरी, स्थूल, अक्षिरोग, तृष्णालु (जिसे प्यास बहुत लगती हो), जिसे मूर्च्छा हो जाती हो, जिसने निरूह तथा अनुवासन किया हुआ हो, जो क्षत तथा क्षीण हो, ..... जो अतिबाल हो अर्थात् जिसकी अवस्था बहुत छोटी हो, जो अतिवृद्ध हो तथा जो गुल्म, प्लीहा रोग, ऊर्ध्वरक्त (मुख से रक्त आना), लोमव्यापत् (बाल-केश सम्बन्धी रोग,) कर्णरोग, शिरःकम्प, अर्दित (Facial paralysis) अर्धावभेदक (आधा सीसी—Hemicrania) सूर्यावर्त और रेवती, पुण्डरीक, शकुनी, पूतना तथा मुखमण्डिका आदि ग्रहों से पीडित व्यक्तियों को वमन नहीं कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—अवाम्यास्तावत् क्षतक्षीणातिस्थूलकृशबालवृद्धदुर्बलश्रान्तपिपासितक्षुधितकर्म-भाराध्वहतोपवासमैथुनाध्ययनव्यायामचिन्ताप्रसक्तक्षामगर्भिणीसुकुमारसंवृतकोष्ठदुश्छर्दनोर्ध्वरक्तपित्तप्रसक्तच्छूर्दूध्वर्वातास्थापितानुवासित-हृद्रोगोदावर्तमूत्राघातप्लीहगु- ल्मोदराष्ठीलास्वरोपघाततिमिरशिरःशङ्खकर्णाक्षिपाश्र्वशूलार्ताः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है।

किन्हें विरेचन कराना चाहिये ?—जिसे गर्भ न ठहरता हो, जो गर्भ की कामना करती हो, जिसका दूध विवर्ण (वर्ण रहित अथवा विकृत वर्ण वाला) हो, जिसका दूध निरन्तर निकलता रहता हो, जिसकी अग्निमन्द हो, ....... विसर्प, रक्तार्श, विषमाग्नि कुष्ठ, श्वयथु (शोथ), श्वित्र (श्वेत कुष्ठ—Leuco derma), ऊर्ध्वरक्त, प्लीहावृद्धि, गुल्म, मधुमेह, हलीमक, कामला (gaunbice), पाण्डुरोग, हृद्रोग, कृमिकोष्ठ (जिसके पेट में कृमि हों), अपस्मार, उपस्तम्भ, उदावर्त, कफोन्माद, विद्रधि, श्लीपद तथा योनि ..... रोग आदिकों में विरेचन कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—कुष्ठज्वर मेहोर्ध्वरक्तपित्तभगन्दरोदराशोंब्रध्नप्लीहगुल्मार्बुदगलगन्धग्रन्थिविसूचिकालसकमूत्राघातकृमिकोष्ठ-वीसर्पपाण्डुरोगशिरःपार्श्वशूलोदावर्तनेत्रास्यदाहहृद्रोगव्यङ्गनीलिकानेत्रनासिकास्यश्रवणरोगगुदमेढ्रपाकहलीमकश्वास-कासकामलापच्यपस्मारोन्मादवातरक्तयोनिरतोदोषतैर्मिरैर्यौचकाविपाकच्छर्दिश्वयथुगरविस्फोटकादयः पित्तव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोक्ताश्च, एतेषु हि विरेचनं प्रधानतममित्युक्तमग्न्युपशमेऽग्निगृहवत्। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है॥

अत्र श्लोकः—

व्याकुलान् सन्निपातोत्थान् पैत्तिकान् कफपैत्तिकान् । संसृष्टान् कफमूलांश्च स्त्रंसनेनाभ्युपक्रमेत् ।।

सन्निपात से उत्पन्न हुए पैत्तिक, कफपैत्तिक, संसृष्ट (जिसमें दो दोष मिले हुए हों) तथा कफ की मूल (प्रधानता) वाले रोगों से युक्त रोगियों की विरेचन द्वारा चिकित्सा करे ।।

अनुपस्निग्धरिक्तकोष्ठकृशस्थूलदुष्पाफ(दुर्बल ?) ललितसुकुमारश्रीधननष्ट ......... पक्षतपक्षहत-तृष्णातालुशोषोरुस्तम्भार्दितहनुग्रहवातहृद्रोगरेवतीकेवलवातार्ताश्च न विरेच्याः ।।

किन्हें विरेचन नहीं करना चाहिये ?—जिसने स्नेहन नहीं किया है, जिसका कोष्ठ रिक्त (खाली) हो, कृश, स्थूल, दुष्पाफ (दुर्बल ?), ललित (जिसका अच्छी प्रकार लालनपोषण किया गया हो), सुकुमार (नाजुक—Delicate) जिसका

२५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ]

श्री (कान्ति) एवं धन नष्ट हो गया हो, .... जो क्षत, पक्षाघात तृष्णा, तालुशोष, ऊरुस्तम्भ, अर्दित, हनुग्रह, वातिक हृद्रोग, रेवती तथा शुद्ध वायु के प्रकोप से पीडित रोगियों में विरेचन नहीं देना चाहिये। चरक. सि. अ. २ में कहा है—अविरेच्यास्तु—सुभगक्षतगुदमुक्तनालाधोभागरक्तपित्तविलङ्घितदुर्बलेन्द्रियाल्पाग्निनिरूढकामादिव्यग्राजीर्णनवज्वरमदात्ययिताध्मात-शल्यादितताभिहतातिस्निग्धरूक्षा दारुणकोष्ठाः क्षतादयश्च गर्भिण्यन्ताः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है ।।

प्रतिश्यायकासश्वासशोषहिक्कामुखशोषापस्मारगलग्रहरोहिणिका ........ तिमुखार्बुदाधिमन्थना-सार्शालिज्युपजिह्विकागलगण्डगण्डमालागलशुण्डिकाक्ष्यभिष्यन्दाश्च नस्ततो विरेच्याः ।।

किन्हें शिरोविरेचन देना चाहिये ?-प्रतिश्याय, कास, श्वास, शोष, हिक्का, मुखशोष, अपस्मार, गलग्रह, रोहिणिका, ....... मुखार्बुद (मुख में रसौली-Tumour), अधिमन्थ, नाशार्श, अलजी, उपजिह्विका, गलगण्ड, गण्डमाला, गलशुण्डिका तथा आंखों के अभिष्यन्द रोगों में नस्य के द्वारा विरेचन कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—विशेषतस्तु शिरोदन्तमन्यास्तम्भहनुग्रहपीनसगलशुण्डिकाशालूकशुक्रतिमिरवर्त्मरोगव्यङ्गोपजिह्विकार्धावभेदकग्रीवास्कन्धा-स्यनासिकाकर्णाक्षिमूर्धकपालशिरोरोगार्दितापतन्त्रकापातानकगलगण्डदन्तशूलहर्षचालाक्षिराज्यर्बुदस्वरभेदवाग्ग्रहगद्गदक्रथनादय ऊर्ध्वजत्रुगता वातादिविकाराः परिपक्वाश्च, एतेषु शिरोविरेचनं प्रधानतममित्युक्तं तद्ध्यूत्तमाङ्गमनुप्रविश्य मुञ्जादिषीकामिकासक्तां केवलं विकारकरं दोषमपकर्षति ।।

दन्तचालहनुस्तम्भमन्यास्तम्भशिरोग्रहबाधिर्यकर्णशूलार्धावभेदकसूर्यावर्तापिता(नक) ................... स्वरभेदवाग्ग्रहौष्ठस्फुरणतिमिरमुखनासिकादौर्गन्ध्याकालपलितखालित्यानिलात्मकार्ताश्च नस्तत उपस्नेह्या इति ।।

किन्हें नस्य के द्वारा स्नेहन कराना चाहिये ?—दांतों का हिलना, हनुस्तम्भ, मन्यास्तम्भ, शिरोग्रह, बाधिर्य (बहरापन, Deafness), कर्णशूल, अर्धावभेदक, सूर्यावर्त, अपतानक, .....स्वरभेद, वाग्ग्रह, ओष्ठस्फुरण (होठों का हिलना), तिमिर, मुख, एवं नाक से दुर्गन्ध आना, असमय में बालों का सफेद होना तथा झड़ना (गंजापन-Baldness) तथा वायु के रोगों से पीडित रोगियों में नस्य के द्वारा स्नेहन कराना चाहिये अर्थात् तर्पण नस्य देना चाहिये ।।

अत्र श्लोकः—
स्नेहयेद्वातिकांस्त्वस्तः कफजांस्तु विरेचयेत् । ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगांस्तद्विद्वांस्तेषां परायणम् ।।

ऊर्ध्वजत्रुगत रोग यदि वातिक हों तो नस्य के द्वारा स्नेहन करे। तथा यदि श्लैष्मिक (कफज) हों तो नस्य के द्वारा विरेचन कराये। यही इनकी मुख्य चिकित्सा है ।।

.................... शोषमर्मवातप्लीहवातगुल्ममूत्रकृच्छ्रपक्वाशयशूलकुक्षिवातकुण्डलयानिशूलोदावर्त-सन्धिग्रहगात्रवेष्टगात्रभेदापतानकार्दिताल्पपुष्पानष्टपुष्यानष्टबीजाकर्मण्यबीजपरीता ........................... (अनुवास्या इति) ।।

किनका अनुवासन करना चाहिये ? ...... शोष, मर्मवात, (यदि मर्मस्थानों में वात का प्रकोप हो), प्लीहवात, गुल्म, मूत्रकृच्छ्र, पक्वाशयशूल, कुक्षिशूल, वातकुण्डल, योनिशूल, उदावर्त, सन्धिग्रह, गात्रवेष्टन, गात्रभेद, अपतानक, अर्दित, अल्पपुष्पा (आर्तव-मासिक स्राव का कम होना), नष्टपुष्पा (मासिकस्राव का बन्द हो जाना-Menopause), नष्टबीज (जिसका वीर्य नष्ट हो गया हो), जिसका वीर्य अकर्मण्य (कार्य में असमर्थ) हो गया है तथा जिसका वीर्य दूषित हो गया है ....... इत्यादिकों को अनुवासन करना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—य एवास्थाप्यास्त एवानुवास्याः, विशेषतस्तु रूक्षतीक्ष्णाग्नयः केवलवातरोगार्ताश्च, एतेषु ह्यनुवासनं प्रधानतममित्युक्तं वनस्पतिमूलच्छेदनवत्, मूले द्रुमाणां प्रसेकवच्चेति। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३६ में भी कहा है ।।

पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ] सिद्धिस्थानम् २४१

अत्र श्लोकः—

वातिका वातभूयिष्ठाः शोषणाः स्तम्भना गदाः । हुण्डना भञ्जनाश्चैव तेऽनुवास्या हितैषिणा ।।

हित को चाहने वाले वैद्य को चाहिये कि वातिक, वातप्रधान तथा जिनका शोषण एवं स्तम्भन करना है, जिनका हुण्डन (मस्तक आदि के अन्दर प्रवेश) करना हो एवं भञ्जन (विभक्त) करना हो उनका अनुवासन करना चाहिये ॥

हृदयग्रहपाण्डुत्वश्वयथूदरप्रमेहकुष्ठरोगाशोर्भगन्दरराजयक्ष्मवैसर्प ............. कफरोगार्तांश्च नानुवासयेत् ।।

किनका अनुवासन नहीं करना चाहिये ?—हृदयग्रह, पाण्डु, श्वयथु, उदररोग, प्रमेह, मधुमेह, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, राजयक्ष्मा, विसर्प ...... तथा कफज रोगों में अनुवासन नहीं करना चाहिये । सुश्रुत चि. अ. ३५ में कहा है—उदरी च प्रमेही च कुष्ठी स्थूलश्च मानवः । अवश्यं स्थापनीयास्ते नानुवास्याः कथञ्चन ॥

हृद्रोगोदावर्त्तवातगुल्मवातोदरविबन्धमूत्रग्रहबस्तिकुण्डलप्रमेहरक्तगुल्मयौनिजाड्योपरोधपार्श्वरूजामधुमेहकुष्ठ-श्वित्रभगन्दरापस्तम्भसंससृष्ट ............. हृदयद्रवकृशव्याधिपरिगतरक्तातीसारमूर्च्छाशोथमैथुनश्रमभय-चिन्तेर्ष्याप्रजागरहताश्च न निरूह्या इति ।।

किनका निरूह (आस्थापन) करना चाहिये ?—हृद्रोग, उदावर्त्त, वातगुल्म, वातोदर, विबन्ध, मूत्रग्रह, बस्तिकुण्डल, प्रमेह, रक्तगुल्म, योनि की जड़ता, योनि के मार्ग का रुकना, पार्श्वशूल, मधुमेह, कुष्ठ, श्वित्र, भगन्दर, अपस्तम्भ तथा संसृष्ट ..... रोगों में निरूह कराना चाहिये । चरक सि. अ. २ में कहा है—सर्वाङ्गैकाङ्गकुक्षिरोगवातवर्चोमूत्रशुक्रसङ्गबलवर्णमांसरेतःक्षयदोषाधमानाङ्गसुप्तिकृमिकोष्ठोदावर्त्तस्तब्धाङ्गातिसारसर्व्वाङ्गाभितापप्लीहगुल्महृद्रोगभगन्दरोन्मादज्वरब्रध्नशिरःकर्णशूलहृदय-पार्श्वपृष्ठकटीग्रहवेपनाक्षेपकगौरवातिलाघवज्वरःक्षयान्तार्त्तवविषमाग्निस्रिग्फ्ग्जानुजङ्घोरुगुल्फपाष्णिप्रपदयोनिबाह्वङ्गुलिस्तनान्त-दन्तनखपर्वास्थिशूलशोथस्तम्भान्त्रकूजनपरिकर्तिकाल्याल्पसशब्दोग्रगन्थोत्यानादयो वातव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोक्ताश्च, एतेष्वास्थापनं प्रधानतममित्युक्तं वनस्पतेर्मूलच्छेदेवत् ॥

...... किनका निरूह (आस्थापन) नहीं करना चाहिये ?—हृदयद्रव (Palpitation of Heart) कृश, व्याधि से युक्त, रक्तातीसार, मूर्च्छा, शोथ, मैथुन, श्रम, भय, चिन्ता, ईर्ष्या एवं रात्रिजागरण से पीडित व्यक्तियों को निरूह नहीं कराना चाहिये ।

चरक सि. अ. २ में कहा है—अनास्थाप्यास्तु—अजीर्ण्यतिस्निग्धपीतस्नेहोत्क्लिष्टदोषाल्याग्नियानक्लान्तात दुर्बलक्षुत्तृष्णाश्र-मार्त्तातिक्षुशभुक्तभक्तपीतोदकवभितविरिक्तकृतनस्तःकर्मक्रुद्धभीतमत्तमूर्च्छितप्रसक्तच्छर्दिनिष्ठीविकाश्वासकासहिक्काबद्धच्छिद्रद-कोदराध्मानालसकविसूचिकामप्रजातामातिसारमधुमेहकुष्ठार्ताः ॥

अत्र श्लोकाः—

स्नेहप्रमाणं यद्बस्तौ निरूहस्त्रिगुणस्ततः । एके तु सममेवाहुर्वयःकालादिदर्शनात् ।।

बस्ति में जितना स्नेह डाला जाता है निरूह में उससे तिगुना डालना चाहिये तथा कुछ आचार्य अवस्था तथा काल के अनुसार निरूह में भी बस्ति के समान (समप्रमाण) ही स्नेह डालने को कहते हैं ॥

निरूहं यदि वा बस्तिमल्पमल्पं महर्षयः । प्रशंसन्ति बहु त्वज्ञाः प्रभूतादत्ययो ध्रुवः ।।

महर्षि लोग निरूह तथा बस्ति के कार्य को थोड़ा २ करने को अच्छा मानते हैं क्योंकि अधिक करने से निश्चित रूप से रोग या उपद्रव हो जाते हैं ॥

२५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मङ्गलसिद्धिः ८ ]

य एते कफजा रोगा एते संतर्पणोद्भवाः । ते चापतर्पणीयाः स्युर्लङ्घनीयास्त एव च ।।

(इति ताडपत्रपुस्तके १५३ तमं पत्रम् ।)

जो कफज तथा सन्तर्पण से उत्पन्न होने वाले रोग हैं उनमें अपतर्पण तथा लङ्घन कराना चाहिये ।।

य एव वातिका रोगास्तेऽपतर्पणजाः स्मृताः ।
त एव बृंहणीयाः स्युः संसृष्टास्तु ततः परम् ।।

जो वातिक रोग होते हैं उन्हें अपतर्पणजन्य माना जाता है। उनका बृंहण करना चाहिये। उसके बाद संसृष्ट (मिश्रित दोष वाले) रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये ।।

स्नेहस्वेदोपपन्नानामूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् । सवसंसृष्टरोगाणां स्नेहनं न तु बस्तिभिः ।।

इन सम्पूर्ण संसृष्ट रोगों में स्नेहन एवं स्वेदन कराके ऊर्ध्व तथा अधः शोधन (वमन तथा विरेचन) करना चाहिये ।। इनमें बस्तियों के द्वारा स्नेहन नहीं कराना चाहिए ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति सिद्धिस्थाने) पञ्चकर्मीयासिद्धि(र्नामसप्तमोऽध्यायः ।।७।।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति सिद्धिस्थाने) पञ्चकर्मीयासिद्धि(र्नामसप्तमोऽध्यायः ।।७।।)


मङ्गलसिद्धिर्नामाष्टमोऽध्यायः ।

अथातो मङ्गलसिद्धि व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम मङ्गलसिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

मङ्गलान्येव सततं प्रजानामभिवर्धयेत् । सर्वे गृहस्थाः सेवेरन् दानानि च तपांसि च ।।३।।

बालकों के मङ्गलकारी भावों की ही निरन्तर वृद्धि करे। प्रत्येक गृहस्थ को दान, तप आदि का सेवन करना चाहिये ।।

मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च नियतात्मनाम् । ददतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ।।४।।

मङ्गल (शुभ) आचरण करने वाले, नित्य संयम से रहने वाले (जितेन्द्रिय), दान एवं हवन करने वाले व्यक्तियों को रोग आदि आपत्तियां नहीं आतीं ।।४।।

आमः पक्वोऽपि वा स्नेहो बस्ति ............. । ............. नित्ये च तच्चोक्तमनुवासनम् ।।

बालक को आम अथवा पक्व स्नेह की बस्ति तथा ..... नित्य अनुवासन देना चाहिये ।।

कषायैर्विविधैर्मिश्रः स्नेहः स्नेहैश्च मूर्च्छितः । सक्षौद्रमूत्रलवणो निरूहो दोषवाहनात् ।।

नाना प्रकार के कषायों से मिश्रित तथा स्नेहों के द्वारा मूर्च्छित किये हुए स्नेह का-जिसमें मधु, गोमूत्र तथा सैन्धव डाला गया है-निरूह (आस्थापन) दोषों को निकाल देता है ।।

मङ्गलसिद्धिः ८ ] सिद्धिस्थानम् २५३

त्रिफलाश्वगन्धाभूतीकदशमूलपुनर्नवाः । बलागोक्षुरकोशीर ...................... ।।
........................... लीनानि कुट्टयेत् । अष्टभागावशेषं तं जलद्रोणे विपाचयेत् ।।
ततस्तेन कषायेण द्वौ प्रस्थौ तैलसर्पिषोः । पचेच्चतुर्गुणे क्षीरे कल्कं चेमं समावपेत् ।।
सैन्धवं मधुकं द्राक्षां शतपुष्पां महासहाम् । बीजानि चात्मगु(प्ताया) मोर्वारुकस्य च ।।
विडङ्गकुञ्चिकवचावृषकं शिरिवारिका । जीवनीयानि सर्वाणि दद्यात् खरबुषामपि ।।
शैशुको नाम स स्नेहो बस्तिकर्मणि शस्यते । बालानां सर्वरोगघ्नो निर्दिष्टः पुण्यकर्मणा ।।

त्रिफला, अश्वगन्धा, भूतीक, दशमूल, पुनर्नवा, बला, गोखरू, खस, ..... इत्यादि को कूटकर एक द्रोण जल में पकाकर आठवां भाग शेष रखे। उस कषाय में दो प्रस्थ तैल तथा घृत के तथा कषाय से चतुर्गुण दूध डाले। इसमें सैन्धव, मुलहठी, द्राक्षा, सौंफ, महासहा (माषपर्णी), कौंच के बीज, ककड़ी के बीज, विडङ्ग, स्याह जीरा, बचा, बांसा, शिरिवारिका (चांगेरी), सम्पूर्ण जीवनीय गण तथा खरबुष (मरुवा-मरुबक) इत्यादि का कल्क डालकर पकाये। इसका नाम शिशु स्नेह है। यह बस्ति कर्म में उत्तम कहा गया है। पुण्यकर्मा महर्षि कश्यप ने इसे बालकों के सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला कहा है ।।

वमनं स्त्रंसनीयानि दशमूलं च शोधयेत् । तत्कषायं परिस्त्राव्य गोमूत्रलवणान्वितम् ।।
घृततैलार्धयुक्तोष्णं निरूहमुपकल्पयेत् । तेनास्य विलयं दोषा यान्ति वह्निश्च दीप्यते ।।

वमन, स्त्रंसन (विरेचन) तथा ओषधियों और दशमूल का शोधन करके उसका कषाय बनाये। इसे छानकर उसमें गोमूत्र, लवण तथा कषाय से आधे परिमाण में घी और तेल डाले। इस स्नेह से उष्ण अवस्था में ही निरूह (आस्थापन बस्ति) देवे। इससे रोगी के दोष विलीन हो जाते हैं और अग्नि प्रदीप्त होती है ।।

श्रेष्ठांमदनबीजानामाढकं निस्तुषीकृतम् । विपाचयेदपां द्रोणे चतुर्भागावशेषितम् ।।
उपकुञ्चीखरबुषापिप्पल्यः सैन्धवं वचा । त्रपुसो ........ निः शतपुष्या यवान्यपि ।।
स कषायः समायुक्तः क्षीरगोमूत्रकाञ्जिकैः ।।
सर्वानिलामयहरः स निरूहोऽर्धतैलिकः ।

श्रेष्ठा (त्रिफला अथवा स्थलपद्मिनी) तथा मदन फल के बीजों को निस्तुष (छिलके रहित) एक आढक लेकर एक द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे। इसमें उपकुञ्ची (स्याह जीरा), खरबुष (मरुवा-मरुबक), पिप्पली, सैन्धव, बच, खीरे के बीज, ..... सौंफ तथा अजवायन, दूध, गोमूत्र, कांजी, तथा कषाय से आधा भाग तिल तैल डालकर पुनः पकाये, यह कषाय सम्पूर्ण वातरोगों को नष्ट करता है।

त्रिफला सारिवा श्यामा बृहत्यौ वत्सकत्वचम् ।।
त्रायमाणाबलारास्नागुडूचीनिम्बकूलकम् । ................ (क)ल्पयेत् ।।
महासहा शक्रयवाः शतपुष्पाऽथ वत्सकः । मधूकांशुमतीद्राक्षाः समुद्रान्ताऽथ बालकम् ।।
क्षीरक्षौद्रघृतोपेतो निरूहः पित्तनाशनः ।

त्रिफला, सारिवा (अनन्तमूल), श्यामा (त्रिवृत्), दोनों बृहती, कुटज की छाल, त्रायमाणा, बला, रास्ना, गिलोय, नीम, कूलक (पटोलपत्र) ...... महासहा (माषपर्णी), इन्द्रजौ, सौंफ, कुटज, महुआ, अंशुमती (शालपर्णी), द्राक्षा, समुद्रान्ता (अपराजिता), नेत्रबाला इत्यादि के कषाय में दूध, मधु तथा घृत डालकर दिया गया निरूह पैत्तिक रोगों को नष्ट करता है ।।

२५४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मङ्गलसिद्धिः ८ ]

त्रिफलादारुभूतीककरञ्जद्वयचित्रकान् ।।
एकाष्ठीलां विषाणीं च ........... । (कणा)मूलं त्रिवृद्दन्त्यौ पूर्वकल्पेन शोधयेत् ।।
ऊर्ध्वाधःशोधनैः कल्कैर्युक्तो लवणतैल्योः । ईषदूष्णः सगोमूत्रो निरूहः कफनाशनः ।।

त्रिफला, देवदारु, भूतीक, करञ्ज, पूतिकरञ्ज, चित्रक, एकाष्ठीला (बक अथवा पाठा), विषाणी (क्षीरकाकोली) ......., पिप्पलीमूल, त्रिवृत्, दन्तीमूल, द्रवन्ती, इन ऊर्ध्व एव अधः शोधक ओषधियों के कल्क में लवण, तैल एवं गोमूत्र मिला कर बनाया हुआ उष्ण निरूह कफ रोगों को नष्ट करता है ।।

अयं तु सर्वदोषघ्नो निरूहः कत्तृणादिकः ।

निम्नलिखित कत्तृण आदि का निरूह सब दोषों (त्रिदोष) को नष्ट करने वाला है ।।

कत्तृणोशीरभूतीकत्रिफला .............
रास्नाश्वगन्धाश्वदंष्ट्राशिग्रुश्यामाः शतावरी । एलापुनर्नवाभार्ग्यः सपतोला गुडूच्यपि ।।
त्रिपलीनां जलद्रोणे पचेत् पादावशेषिते । ततस्तेन कषायेण पेष्याणीमानि योजयेत् ।।
वचाजमोदे मदनपिप्पली ......... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १५४ तमं पत्रम्)

(अस्याग्रे द्वादशपत्रात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके)

...................
...................
(सिद्धिस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ॥)

※※※

कत्तृण, खस, भूतीक, त्रिफला, ....... रास्ना, अश्वगन्धा, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), सहिजना, त्रिवृत् शतावरी, छोटी इलायची, पुनर्नवा, भारंगी, पटोलपत्र तथा गिलोय, इत्यादि ओषधियों के ३ पल लेकर एक द्रोण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे । इस कषाय में बच, अजमोद, मैनफल तथा पिप्पली (आदि ओषधियों का कल्क पीसकर डाले । यह निरूह सर्व दोषघ्न माना गया है) ।।

(सिद्धिस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ॥)

कल्पस्थानम्।


धूपकल्पाध्यायः।

................................................ । ................................................ ।।
..........(कु)ष्ठं पूतिकमम्बरं वचा ।।
सर्षपा बस्तलोमानि धूपः स्याद्धिङ्गुसंयुतः ।

.......कुष्ठ, पूतिक (करञ्ज), अम्बर (कपास), बच, सरसों बकरे के बाल तथा हींग-इनका धूप देना चाहिये ।।

घृतं मेषविषाणं च वाजिकुञ्जरयोः खुरौ ।।
कपिशल्यकबभ्रूणां लोमभिर्धूप उत्तमः ।

घी, भेड़ के सींग, घोड़े तथा हाथी के खुर, बन्दर, शल्यक (गोधाकार मृग विशेष) तथा बभ्रु (नेवला)-के लोमों का धूप उत्तम माना जाता है ।।

घृतं सर्जरसः कृष्णो भल्लातकशिलेयके ।।
द्वे हरिद्रे जतूशीरसर्षपाः पुष्पमार्जकम् । विडङ्गं तगरं पत्रं वचा हिङ्गु सबालकम् ।।
कौमारो नाम धूपोऽयं युक्तो वर्धयति प्रजाः ।

घी, राल, कृष्ण (सौवीराञ्जन), भिलावा, शिलेयक (सिलारस), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, लाक्षा, खस, सरसों, अर्जक (तुलसी) का फूल, विडङ्ग, तगर, तेजपत्र, वचा, हींग तथा नेत्रबाला, यह कुमार नामक धूप है। इसका सम्यक् प्रयोग करने से बालकों की वृद्धि होती है ।।

घृतं सर्पस्य निर्मोको गृध्रकौशिकयोश्च विट् ।।
वचा हिङ्गु च धूपः स्यादपस्मारग्रहापहः ।

घी, सांप की केंचुली, गिद्ध तथा उल्लू की विष्ठा, बच तथा हींग-इनका धूप अपस्मार तथा ग्रहरोगों को दूर करता है।

घृतं गुग्गुलु बिल्वं च देवदारु नमेरु च ।।
एष माहेश्वरो धूपो यवयुक्तो ग्रहापहः ।

घी, गूगल, बिल्व, देवदारु, नमेरु (सरल देवदारु) तथा जौ—यह माहेश्वर धूप कहलाता है। यह ग्रहरोगों को नष्ट करता है ।।

३९ का.सं.

२५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् धूपकल्पः ? ]

आग्नेयस्तु स्मृतो धूपो गोबाला घृतसंयुताः ।।
ब्राह्मणानां विशेषेण सर्वरोगेषु शस्यते ।

गौ के बाल घी में मिलाकर जलाने से आग्नेय धूप कहलाता है। ब्राह्मणों के बाल विशेष रूप से सब रोगों में प्रशस्त माने गये हैं ।।

घृतं हयखरोष्ट्राणां बालाः केशाश्च मातृकाः ।।
नखाश्चतुष्पदां लाभाद्धूपो भद्रङ्करः स्मृतः । पिशाचयक्षगन्धर्वभूतस्कन्दकफार्दिते ।।
धूपमेतं प्रयुञ्जीत यमिच्छेद्गदं क्षणात् ।

घी, घोड़े गदहे तथा ऊंट के बाल एवं रोम, मातृका (ऋषभक) तथा चतुष्पादों (चौपाये-पशुओं) के जिन २ के मिल सके उनके नख-इनका धूप कल्याणकारक माना गया है। पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, भूत, स्कन्द तथा कफ रोगों से पीड़ित व्यक्तियों में इस धूप का प्रयोग करने से रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है।

घृतं सिद्धार्थको हिङ्गु देवनिर्माल्यमक्षताः ।।
सर्पत्वग्भिक्षुसंघाटी धूपो रक्षोघ्न उच्यते ।

घी, श्वेत सरसों, हींग, देवनिर्माल्य, अक्षत (चावल), सांप की त्वचा (केंचुली) तथा भिक्षुसंघाटी (बौद्ध भिक्षुक का प्राचीन वस्त्र)-इनका धूप रक्षोघ्न कहलाता है ।।

घृतं सिद्धार्थकाः क्षौद्रं मेषशृङ्गमजापयः ।।
खरस्य मूत्रं बालांश्च सोमं चैवात्र योजयेत् । एष धूपोत्तमो नाम्ना परः प्रेतनिवारणः ।।
परः प्रेताभिभूतेषु पूतनायां च शस्यते ।

घी, श्वेत सरसों, मधु, भेड़ के सींग, बकरी का दूध, गदहे के मूत्र तथा बाल और सोम (कर्पूर अथवा रक्तचन्दन) यह उत्तम धूप है जो कि प्रेतों को दूर करता है। प्रेतों तथा पूतना नामक ग्रह द्वारा आक्रान्त रोगियों में इसका प्रयोग करना चाहिये ।।

घृतं सिद्धार्थकाः श्वेताः कुष्ठं भल्लातकं वचा ।।
बस्तलोमानि तगरं भूर्जावर्तं सगुग्गुलु । दशाङ्गो नाम धूपोऽयं प्र योज्यः सर्वरोगिषु ।।
अपस्मारे विशेषेण ग्रहेषूपग्रहेषु च ।

घी, श्वेत सरसों, कूठ, भिलावा, बच, बकरे के लोम, तगर, भोजपत्र तथा गूगल—यह दशाङ्ग नामक धूप सब रोगों में-विशेषकर अपस्मार, ग्रह तथा उपग्रह रोगों में प्रयुक्त करना चाहिये ।।

घृतं सिद्धार्थकाः श्वेताश्चोरकं सपलङ्कषम् ।।
शूकरी जटिला चेति धूपो मोह इति स्मृतः ।

घी, श्वेत सरसों, चोरक (ग्रन्थिपर्णभेद-भटेउर), गूगल, शूकरी (वराहीकन्द) तथा जटिला (जटामांसी)—यह धूप मोहित करनेवाला कहलाता है ।।

स्मृतं श्रीवेष्टका ........ रलाक्षापद्मकचन्दनम् ।।
सदेवदारुसुरसं शालजं चेति योजयेत् । धूपोऽयं वारुणो नाम ग्रीष्मकाले प्रशस्यते ।।
शकुन्यां पौण्डरीके च रेवत्यां च कफाधिके ।

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २५७

श्रीवेष्टक (सरल निर्यास), ...... लाक्षा, पद्मक, चन्दन, देवदारु, तुलसी तथा शाल–इस वारुण नामक धूप का 'शकुनी, पुण्डरीक, रेवती एवं श्लैष्मिक रोगों में ग्रीष्मकाल में प्रयोग करना चाहिये ॥

घृतं मज्जा वसा लाक्षा धूपोऽयं चतुरङ्गिकः ।।
अल्पदोषे कृशे बाले प्रयोज्यो ग्रहवैकृते ।

घृत, मज्जा, वसा तथा लाक्षा–इस चतुरङ्गिक (चार अङ्गों-घटकों वाले) धूप का अल्प दोष वाले व्यक्ति, कृश, बालक तथा ग्रहों के विकारों में प्रयोग करना चाहिये ॥

घृतं वचा तरक्षोश्च विष्ठा लोमानि चर्म च ।।
प्रसहानां पुरीषं च धूपो नन्दक उच्यते ।

घी, बच, भालू (रीछ) की विष्ठा, लोम एवं चर्म तथा प्रसह (चील आदि झपट्टा मारने वाले) पक्षियों का पुरीष नन्दक धूप कहलाता है।

वक्तव्य—अपने भक्ष्य को जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले प्राणियों को प्रसह कहते हैं। कहा भी है–प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसहास्तेन संज्ञिताः ॥

घृतं कणा व्रीहितुषाः कपिलोमत्वचं वचा ।।
सर्षपाः कुष्ठमेला च कणधूपो ग्रहापहः ।

घी, पिप्पली, चावलों के छिलके, बन्दर के बाल तथा त्वचा, बच, सरसों, कुष्ठ तथा एला–इसे कणधूप कहते हैं। यह ग्रहरोगों को नष्ट करता है ॥

घृतं सर्पत्वचं बिल्वं सरः सिद्धार्थका जतु ।।
श्रीधूप इति निर्दिष्टः श्रीकामेषूपयोजयेत् ।

घी, सांप की त्वचा (केंचुली), बिल्व, सर (महापिण्डी), श्वेत सरसों तथा लाक्षा–यह श्री धूप कहलाता है। ऐश्वर्य को चाहने वालों में इसका प्रयोग करे ॥

श्वविण्मूत्रं मयूराणां लोमान्यथ वचा घृतम् ।।
सर्षपाश्चेति धूपोऽयं ग्रहघ्न इति विश्रुतः ।

कुत्ते की विष्ठा तथा मूत्र, मोर के बाल, बच, घृत तथा सरसों–यह ग्रहघ्न (ग्रहों को नष्ट करने वाला) धूप है ॥

घृतं कुञ्जरदन्तं च तनुजान्यजमेषयोः ।।
गोशृङ्गमिति धूपोऽयं पुण्यः पुण्यजनावहः ।

घृत, हाथी दांत, बकरी तथा भेड़ के बाल तथा गौ के सींग–यह पुण्यकारक धूप पुण्यजनों के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥

घृतं स्थौणेयकं मांसी तगरं परिपेलवम् ।।
ह्रीबेरं शतपुष्पां च हरितालं मनःशिलाम् । मुस्तं हरेणुकामेलां धूपार्थमुपकल्पयेत् ।।
शिशुको नाम धूपोऽयं सर्वरोगग्रहापहः । धूपने चानुधूपे च प्रतिधूपे च भार्गव ! ।।

२५८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

घृत, स्थौणेयक (ग्रन्थिपर्ण-भटेउर), जटामांसी, तगर, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता), हीबेर (हाऊबेर), सौंफ, हरताल, मनःशिला, नागरमोथा, हरेणुबीज तथा छोटी इलायची इनको धूप के लिये प्रयुक्त करे । यह शिशुक नाम का धूप सब रोगों तथा ग्रहों को नष्ट करता है । हे भार्गव ! इसका धूप, अनुधूप तथा प्रतिधूप तथा प्रतिधूप के रूप में प्रयोग किया जाता है ।।

घृतं सिद्धार्थका लाजाः कुशाः सह .... । सर्वतुल्या भवेद् ब्राह्मी धूपोऽयं ब्राह्म उच्यते ।
ब्राह्मणक्षत्रवैश्येषु प्रयोज्यो भिषजा भवेत् । सर्वरोगेषु सततं क्षिप्रं रोगान्निरस्यति ।।

घृत, श्वेत सरसों, लाजा (खील), कुश, तथा सह (?) ...... और इन सबके समान ब्राह्मी लें । यह ब्राह्मधूप कहलाता है । वैद्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य में सब रोगों में इसका निरन्तर प्रयोग करना चाहिये । यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देता है ।।

घृतं श्वदंष्ट्रा वसुका हरिद्रे परिपेलवम् । वचा भार्गी च धूपोऽयं प्रतिधूपः सुखावहः ।।

घृत, गोखुरु, वसुक (बकपुष्प), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता) बच एवं भारङ्गी-यह धूप के रूप में सुखकर (स्वास्थ्यप्रद) माना गया है ।।

घृतं च पद्मकोशीरं बालकं केसरं रसम् । प्रतिधूप इति ख्यातः सर्वरोगेषु शस्यते ।।

घृत, पद्मक (नीलकमल), खस, बालक (नेत्रवाला), नागकेसर तथा रस (सर्जरस अथवा बोल)-यह प्रतिधूप सब रोगों में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं वानरलोमानि कुक्कुटाण्डं वचा यवाः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६७ तमं पत्रम् ।)
सिद्धार्थकाश्च धूपोऽयं प्रतिधूपमहोदयः ।।

घृत, बन्दर के बाल, कुक्कुटाण्ड (मुर्गी का अण्डा), बच, जौ तथा श्वेत सरसों-महान् उदय वाला यह धूप प्रतिधूप के रूप में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि मूलं पुष्पं फलं त्वचम् । अरिष्टो नाम धूपोऽयमरिष्टं कुरुते क्षणात् ।।

घृत तथा नीम के पत्र, मूल, पुष्प, फल एवं त्वचा (छाल) यह अरिष्ट नाम का धूप रोगी को क्षण भर में रोग रहित कर देता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि खरमूत्रं वचा जतु । सर्षपाश्चात्र धूपोऽयं प्रतिधूपश्च शस्यते ।।

घृत, नीम के पत्र, गदहे का मूत्र, बच, लाक्षा, तथा सरसों इसका धूप एवं प्रतिधूप के रूप में प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि जतुसर्जरसाक्षताः । भासोलूकशकृच्चेति धूपोऽपस्मारनाशनः ।।

घृत, नीम के पत्र, लाक्षा, सर्जरस, (राल), अक्षत (चावल), भास (गृध्र विशेष) तथा उल्लू की विष्ठा-यह धूप अपस्मार को नष्ट करता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि सुरसाश्वघ्नयोस्तथा । गोमेषबस्तबालाश्च धूपोऽय सर्वरोगहा ।।

घृत, नीम, तुलसी तथा कनेर के पत्ते, और गौ भेड़ तथा बकरी के बाल-यह धूप सब रोगों को नष्ट करता है ।।

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २५९

घृताक्षतं जातिपुष्पं मधु सिद्धार्थका वचा। गण्डधूप इतिख्यातः सर्वभूतरुजापहः ।।

घृत, चावल, चमेली के फूल, मधु, श्वेत सरसों, बच–यह गणधूप कहलाता है जो सब भूतों के रोगों को नष्ट करता है ।।

घृतं शाल्लकिधूपश्च पुष्पं जातिशिरीषयोः । नमेरुणा समायुक्तो धूपः स्वस्तिक उच्यते ।।

घृत, शाल्लकी (शालविशेष–सालई–Indian olibanum) चमेली तथा शिरीष के फूल, एवं नमेरु (सरल देवदारु) से युक्त स्वस्तिक धूप कहलाता है ।।

घृतं गुग्गुलुसंयुक्तं, देवदारु घृतान्वितम् । कालागुरु च सर्पिश्च, सर्षपांश्चापि सर्पिषा ।। तृणमूलस्य पत्राणि सारं पुष्पफलं त्वचम् । पञ्च धूपाः समाख्याताः सघृता ग्रहनाशनाः ।।

घृतयुक्त गूगल, घृतयुक्त देवदारु, कालागुरु (कृष्ण अगरु) और घृत, घृतयुक्त सरसों तथा पञ्चतृणमूल के पत्र, सार (Extract), पुष्प, फल और त्वचा । घृत के साथ ग्रहों को नष्ट करने वाले उपर्युक्त ५ धूप कहे गये हैं ।।

गुग्गुल्वादीनि चैतानि दशाङ्गं च समापयेत् । गृहधूप इति ख्यातो न क्वचित् प्रतिहन्यते ।।

उपर्युक्त गुग्गुल आदि तथा दशाङ्ग धूप को मिलाने से गृह धूप कहलाता है जो कभी नष्ट (खराब) नहीं होता ।।

सि^१द्धार्थाश्चेति धूपास्ते चत्वारिशदुदाहृताः । भिषक्सिद्धिकरा नृणां पुत्रदा रोगनाशनाः ।।

इस प्रकार ये अव्यर्थ फल वाले ४० धूप कहे गये हैं। ये चिकित्सा में सिद्धि को करते हैं तथा पुत्रों के देने वाले और रोगों को नष्ट करने वाले हैं ।।

एतैर्बालान् समापन्नानरिष्टागारमेव च । वस्त्रशय्यासनाद्यं च बालानां धूपयेद्भिषक् ।।

इन उपर्युक्त धूपों से बालकों को युक्त करके उसके रोगीगृह, वस्त्र, शय्या तथा आसन आदि का धूपन (Fumigation) करे ।।

पूर्वमेव भिषग्धूपं पुष्ययोगेन संहरेत् । उपोषितः शुचिः स्नातो मैत्राग्नेयोत्तरासु वा ।। वाचयित्वा बलि कृत्वा श्रुत्वा शब्दान्मनोऽनुगान् । चतस्रः शुचयः कन्याः कुट्टयेयुर (तन्द्रिताः) ।। ............ तं धूपं निदध्याद्भाजने नवे । गोपयेच्च सुपिहितं काले चैनं प्रयोजयेत् ।। तत्कालमपि चापन्नः संभृत्याशु प्रयोजयेत् । ननु तस्मिन् ध्रुवा सिद्धिर्यथापूर्वोपकल्पिते ।। आघ्रातपर धूपस्तु यदि न प्रतिधूप्यते । आशु तं रोगमाप्नोति तदर्थं धूप्यते पुनः ।।

सर्वप्रथम वैद्य को चाहिये कि वह अच्छे प्रकार उपवास कर स्नान से पवित्र होकर मैत्र, आग्नेय तथा उत्तर दिशा में से पुष्य नक्षत्र में धूप के द्रव्यों को उखाड़ कर लाये । तथा स्वस्तिवाचन, एवं बलिकर्म करके और मन के अनुकूल शब्दों को सुनकर पवित्र हुई चार कन्याएँ प्रमादरहित होकर ...... उस धूप को कूटकर नवीन पात्र में डालकर अच्छे प्रकार ढककर सुरक्षित स्थान पर रख दे तथा आवश्यकता होने पर इसका प्रयोग करें । यदि उसी समय उसका प्रयोग करना हो तो भी अच्छी तरह संभालकर उसका शीघ्र ही प्रयोग किया जा सकता है । इस पूर्वकल्पित (पहले से तैयार किये हुए) धूप से निश्चित रूप से सिद्धि होती है । यदि एक बार धूप देने के बाद उसका फिर प्रतिधूपन (पुनः धूपन) नहीं किया जाय तो उसे शीघ्र ही रोग हो जाते हैं अतः उसका पुनः धूपन करना चाहिये ।।


१. एते चत्वारिशद्धूपाः सिद्ध (अव्यर्थ) फला इत्यर्थः ।

२६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

धूपश्चैवानुधूपश्च प्रतिधूपश्च जीवक ! । त्रिविधो धूप उद्दिष्टः कर्मभेदाच्चिकित्सकैः ।।

हे जीवक ! चिकित्सकों ने कर्म भेद से तीन प्रकार का धूप कहा है—१. धूप २. अनुधूप ३. प्रतिधूप ।।

कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात् । द्वियोनि ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः ।।

अन्य जो कौमार भृत्य के आचार्य हैं वे कश्यप के मतानुसार धूपों के जङ्गम और स्थावर भेद से दो उत्पत्ति कारण मानते हैं ।।

कुतो धूपाः समुत्पन्नाः किंदैवत्याः किमाश्रयाः । कैर्नामभिर्मतास्तेषु दह्यमानेषु कि जपेत् ।।
एवं महाजनगतश्चोच्यते 'भिषजा भिषक् । तस्मान्निर्णयमेतेषां प्रश्नानां शृणु तत्त्वतः ।।

धूप कहां से उत्पन्न हुए हैं ? इनका देवता कौन है ? इनका आश्रय क्या है ? इनके क्या नाम हैं ? उन्हें जलाने के बाद क्या जाप करना चाहिये ? इत्यादि प्रश्न एक वैद्य दूसरे वैद्य से करता है। इसलिये तू इन प्रश्नों का यथार्थ निर्णय (उत्तर) सुन ।।

जाता जाता ऋषिसुता ह्रियन्ते राक्षसैर्यदा । तदा महर्षयः सर्वे वह्निं शरणमन्वियुः ।।
होमजापतयोयुक्तास्तस्तुष्टोऽग्निरब्रवीत् । इमान् धूपान् प्रयच्छध्वं प्रयुङ्ग्ध्वं च मदर्पितान् ।।
रक्षोभूतपिशाचेभ्यो न भयं वो भविष्यति । जातेषु वर्धमाने च रोगे धात्र्यां च युङ्क ह ।।

जब उत्पन्न हुए ऋषियों के पुत्रों को राक्षसों ने सताना प्रारंभ किया तब होम, जाप एवं तप से युक्त हुए सब महर्षि अग्नि देवता के शरण में पहुंचे। इससे प्रसन्न होकर अग्नि ने कहा—मेरे द्वारा अर्पित किये गये इन धूपों का तुम ग्रहण करो तथा प्रयोग करो। इससे तुम्हें राक्षस, भूत, पिशाच, आदि किसी का भय नहीं रहेगा। उत्पन्न हुए बालकों में बढ़ते हुए रोगों में धात्री को इन धूपों का प्रयोग कराना चाहिये।

ततस्ते मुनयस्तुष्टाः कश्यपं लोकवर्धनम् । ऋषिलोकहितं ज्ञात्वा युयुजुस्तत्र कर्मणि ।।

तब प्रसन्न हुए उन मुनियों ने लोकों की वृद्धि करने वाले महर्षि कश्यप को ऋषियों का हित करने वाला समझकर उसे इस कार्य के लिये नियुक्त किया अर्थात् उपर्युक्त धूप को ग्रहण करने के लिये उसे अपना प्रतिनिधि बना दिया।

अग्नेः सकाशाद्धूपांस्स संलब्ध्वा चाधिकोऽभवत् ।
अधृष्याः सवभूतानां कुमारास्ते च रक्षिताः ।।

इस प्रकार अग्नि देवता से धूपों को प्राप्त कर के उसने इन्हें और बढ़ाया तथा सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) द्वारा अधृष्य (जो आक्रान्त न किये जा सकें) बालकों की रक्षा की।

एवं धूपाः समुत्पन्नाः प्रजानां हितकाम्यया । निर्दिष्टाश्चाग्निदैवत्या जङ्गमस्थावराश्रयाः ।।

इस प्रकार लोक कल्याण के लिये ये धूप उत्पन्न हुए। इनका देवता अग्नि माना जाता है तथा जङ्गम (चेतन) और स्थावर (जड़) ये दो इनके आश्रय हैं ।।

विधूरस्यनुवाकेन सर्वमेवाभिमन्त्र्य च । प्रयुञ्जीत शिशौ रक्षां दह्यमाने जपेत्त्विदम् ।।

विधूरसी इत्यादि अनुवाक का उच्चारण करके उसके द्वारा सम्पूर्ण धूपों को अभिमन्त्रित करके शिशुओं की रक्षा के लिये प्रयुक्त करना चाहिये। तथा धूप को जलाने के बाद निम्न जप करना चाहिये ।।

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २६१

अग्निस्त्वा धूपयतु, ब्रह्मा त्वा धूपयतु, शिवस्त्वा धूपयतु, वसवस्त्वा धूपयन्तु, रुद्रम्त्वा धूपयतु, आदित्यस्त्वा धूपयतु, मरुतस्त्वा धूपयन्तु, साध्यस्त्वा धूपयतु, देवा ऋभवस्त्वा धूपयन्तु, विश्वे त्वा देवा धूपयन्तु, सर्वे

(इति ताडपत्रपुस्तके १६८ तमं पत्रम्।)

त्वा देवा धूपयन्तु, छन्दांसि त्वा धूपयन्तु, पृथिवी त्वा धूपयतु, अन्तरिक्षं त्वा धूपयतु, द्यौस्त्वा धूपयतु, दिशस्त्वा धूपयन्तु, दिशां त्वा पतयो धूपयन्तु, देवीरापस्त्वा धूपयन्तु, शिवस्त्वा पवमानो धूपयतु, मित्रस्त्वा सविता सूर्यो धूपयतु, चन्द्रस्त्वा सोमो धूपयतु, नक्षत्राणि त्वा सुप्रजात्वाय धूपयन्तु, नक्षत्राणां त्वा देवताः सुमनसे धूपयन्तु, अहोरात्राणि त्वा शान्तये धूपयन्तु, ऋभवस्त्वा पुण्याय कर्मणे धूपयन्तु, संवत्सरास्त्वाऽऽयुषे ब्रह्मवर्चसे बलाय धूपयन्तु, प्रजापतिस्त्वा सुप्रजात्वाय धूपयतु, अश्विनौ त्वाऽऽरोग्याय दीर्घायुष्ट्वाय सहसे शेव(श्रेय)से धूपयंताम्, मातरस्त्वा स्नेहा धूपयन्तु, पितरस्त्वा तनोरच्छेदाय स्वधायै धूपयन्तु, कुमारस्त्वा कौमाराय वसवे धूपयतु, शाखस्त्वा यौवनाय धूपयतु, विशाखस्त्वा मध्याय वयसे धूपयतु, नैगमेषस्त्वा जरसे धूपयतु, सर्वे त्वा देवा दिव्यं धाम्ने धूपय तु, सर्वे त्वा ऋषयो ब्रह्मवर्चसाय धूपयन्तु, सर्वास्त्वा नद्यः सुपीताय धूपयन्तु, सर्वे त्वा पर्वताः स्थैर्याय धूपयन्तु, सर्वास्त्या ओषधोऽन्नाद्याय धूपयन्तु, सर्वे त्वा वनस्पतयः सुव्रतानां श्रेष्ठ्याय धूपयन्तु, सर्वे त्वा पशवः शक्त्यै शान्त्यै धूपयन्तु, सत्येन त्वा धूपयाम्यमृतेन त्वा धूपयाम्यृतसत्याभ्यां त्वा धूपयामि, नमो देवेभ्य इति जपेत्। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति कल्पस्थाने) धूपनकल्पः ।।


अग्नि तेरा धूपन करे, ब्रह्मा तेरा धूपन करे, शिव तेरा धूपन करे, वसु तेरा धूपन करें, रुद्र तेरा धूपन करे, आदित्य तेरा धूपन करे, मरुत् तेरा धूपन करें, साध्यदेवता तेरा धूपन करे, ऋभु देवता तेरा धूपन करें, विश्वे (ब्रह्माण्ड के) देवता तेरा धूपन करें, सर्वे (संकुचित क्षेत्र शरीर आदि के) देवता तेरा धूपन करें, छन्द (वेदमन्त्र) तेरा धूपन करें, पृथिवी देवता तेरा धूपन करे, अन्तरिक्ष तेरा धूपन करे, द्यौ तेरा धूपन करे, दिशाएं तेरा धूपन करें, दिशाओं के पति (अधिपति) तेरा धूपन करे, जलदेवता तेरा धूपन करे, पवित्र करने वाला शिव तेरा धूपन करे, मित्र, सविता तथा सूर्य नामक आदित्य तेरा धूपन करे, सोमनामक चन्द्रमा तेरा धूपन करे, नक्षत्र उत्तम सन्तान के लिये तेरा धूपन करें, नक्षत्रों के देवता उत्तम मन के लिये तेरा धूपन करें, दिन तथा रात्रि शान्ति के लिये तेरा धूपन करें, ऋभुदेवता पुण्यकर्म के लिये तेरा धूपन करें, संवत्सर (वर्ष) आयु, ब्रह्मतेज तथा बल के लिये तेरा धूपन करें, प्रजापति उत्तम सन्तान के लिये तेरा धूपन करें, अश्विदेवता आरोग्य, दीर्घायुष्य, बल तथा श्रेयस (सुख) के लिये तेरा धूपन करें, मातृदेवता स्नेह के लिये तेरा धूपन करें, पितर देवता शरीर के अक्षत रहने तथा स्वधा (अन्न) के लिये तेरा धूपन करें, कुमार (कार्तिकेय) कुमारावस्था तथा वसु (सम्पत्ति) के लिये तेरा धूपन करे, शाख देवता यौवन के लिये तेरा धूपन करे, विशाख मध्य आयु के लिये तेरा धूपन करे, नैगमेष जरा (चिरञ्जीविता) के लिये तेरा धूपन करे, सम्पूर्ण देवता दिव्य धाम (तेज) के लिये तेरा धूपन करें, सम्पूर्ण ऋषि ब्रह्मवर्चस् के लिये तेरा धूपन करें, संपूर्ण नदियां उत्तम पान के लिये तेरा धूपन करें, संपूर्ण पर्वत स्थैर्य (स्थिरता) के लिए तेरा धूपन करें, संपूर्ण ओषधियां अन्न के लिये तेरा धूपन करें, सम्पूर्ण वनस्पतियां उत्तम व्रतों की श्रेष्ठता के लिये तेरा

२६२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

धूपन करें, सम्पूर्ण पशु शक्ति एवं शान्ति के लिये तेरा धूपन करें। तथा सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, ऋत के द्वारा तेरा धूपन करता हूँ, ऋत और सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, तथा देवताओं को नमस्कार करता हूँ। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥

(इति कल्पस्थाने) धूपनकल्पः ॥


लशुनकल्पाध्यायः ।

अथातो लशुनकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम लशुन कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

हुताग्निहोत्रमासीनं गङ्गाद्वारे प्रजापतिम् । पप्रच्छ स्थविरः काले प्रजानां हितकाम्यया ।।३।।
जिसने अग्निहोत्र में आहुति दी है ऐसे तथा गङ्गाद्वार पर स्थित (अर्थात् गङ्गा के आसपास के प्रदेश में रहने वाले) प्रजापति कश्यप से ज्ञानी वृद्धजीवक ने लोककल्याण की दृष्टि से उचित काल में निम्न प्रश्न किया ।।३।।

भगवँल्लशुनोत्पत्तिं प्रयोगं चोपयोजने । श्रोतुमिच्छामिकालं च रोगान्, येषु न येषु च ।।४।।
व्यापदश्चास्य काः सन्ति, किं च तासां चिकित्सितम् ।
अन्नपानं च किं तत्र, परिहारः फलं च किम् ।।५।।
हे भगवन् ! मैं लशुन की उत्पत्ति, प्रयोग, उपयोग और काल को जानना चाहता हूँ। तथा इसका किन रोगों में प्रयोग करना चाहिये तथा किन में नहीं ? इसके प्रयोग से कौन से उपद्रव हो जाते हैं ? उनकी चिकित्सा क्या है ? लशुन के प्रयोग काल में किस अन्नपान का सेवन करना चाहिये ? उस काल में परहेज (त्याज्य) क्या हैं तथा इसके फल क्या हैं ? ।।४-५।।

इति पृष्टः स शिष्येण मुनिराह प्रजाहितम् । शृणु सौम्य ! यथोत्पन्नं लशुनं सपरायणम् ।।६।।
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर महर्षि कश्यप ने लोक कल्याण की दृष्टि से उत्तर दिया-हे सौम्य ! लशुन की उत्पत्ति को तू ध्यानपूर्वक सुन ।।६।।

न लेभे गर्भमिन्द्राणी यदा वर्षशतादपि । तदैनां खादयामास शक्रोऽमृतमिति श्रुतिः ।।७।।
सव्येन परिरभ्यैनां बाहुनां चारुणा स्निहा । व्रीडन्तीं सान्त्वयन् देवीं पतिर्भार्यामपाययम् ।।८।।
तस्यास्तु सौकुमार्येण ह्रिया च पतिसन्निधौ । अमृतस्य च सारत्वादुद्गार उदयद्यदा ।।९।।
यदृच्छया च गामागादमेध्ये निपपात च । ततोऽब्रवीच्छचीमिन्द्रो बहुपुत्रा भविष्यसि ।।१०।।
एतच्चाप्यमृतं भूमौ भविष्यति रसायनम् । स्थानदोषात्तु दुर्गन्धं भविष्यत्यद्विजोपगम् ।।११।।
लशुनं नामतस्तच्च भविष्यत्यमृतं भुवि । एवमेतत् समुत्पन्नं, शृणु तस्य क्रियाविधिम् ।।१२।।

ऐसा सुनने में आता है कि जब सौ वर्ष तक भी इन्द्राणी को गर्भ की प्राप्ति नहीं हुई तब इन्द्र ने उसे अमृत का पान कराया। पति (इन्द्र) ने शरमाती हुई पत्नी-देवी शची को अपनी सुन्दर बांई भुजा से स्नेह पूर्वक पकड़कर सान्त्वना देते हुए अमृत पिलाया। इन्द्राणी को सुकुमार होने के कारण तथा पति की उपस्थिति में शर्म (लज्जा) के कारण तथा

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६३

अमृत का सार होने के कारण जब डकार आई तब उस डकार के द्वारा वह अमृत सहसा भूमि पर अपवित्र स्थान में गिर पड़ा। तब इन्द्र ने इन्द्राणी से कहा तू बहुत पुत्रोंवाली होगी तथा यह अमृत भी भूमि पर रसायन के रूप में उत्पन्न होगा। परन्तु स्थान के दोष के कारण वह दुर्गन्धियुक्त होगा तथा उसे द्विज (ब्राह्मण) सेवन नहीं करेंगे। तथा वह अमृत भूमि पर लशुन नाम से प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार लशुन उत्पन्न हुआ।

वक्तव्य—इसी प्रकार हमारे अन्य प्राचीन शास्त्रों में भी लशुन की उत्पत्ति भिन्न २ प्रकार से लिखी है। गदनिग्रह में कहा है—राहोरच्युतचक्रेण लूनार्धे पतिता गलात्। अमृतस्य कणा भूमौ ते रसोनत्वमागताः॥ द्विजा नाश्नन्ति तमतो दैत्यदेहसमुद्भवम्। साक्षात्वमृतसंभूतं ग्रामीणकरसायनम्॥ अर्थात् अमृत पीते हुए राहु के गले को भगवान् विष्णु द्वारा काटे जाने पर जमीन पर गिरी हुई अमृत की बूंदों से लहसुन की उत्पत्ति हुई। नावनीतक में कहा है—पुराऽमृतं प्रमथितमसुरेन्द्रैः स्वयं पपौ। तस्य चिच्छेद भगवानुत्तमाङ्गं जनार्दनः॥ कण्ठनाडीसमासन्न विच्छित्रे तस्य मूर्धनि। बिन्दवः पतिता भूमावाद्यं तस्येह जन्म तु॥ न भक्षयन्त्येनमतश्च विप्राः, शरीरसम्पर्कविनिस्सृतत्वात्। गन्धोग्रताभावत एव चास्य वदन्ति शास्त्राधिगमप्रवीणाः॥ इसी प्रकार भावप्रकाश में भी कहा है ॥७-११॥

रसोऽस्य बीजे कटुको नाले लवणतिक्तकौ।
पत्राण्यस्य कषायाणि, विपाके मधुरं च तत्॥१२॥

अब तू उसकी क्रिया (कर्म) की विधि को सुन ॥१२॥
इसके बीजों में कटु रस, पुष्प नाल में लवण एवं तिक्त रस तथा पत्तों में कषाय रस होता है। और इसका विपाक मधुर होता है।

वक्तव्य—भावप्रकाश का मत इससे भिन्न है। उसके अनुसार कन्द (मूल) में कटुरस, पत्तों में तिक्तरस, पुष्पनाल में कषायरस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीजों में मधुर रस होता है। कहा भी है—कटुश्चापीह मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥१३॥

स्वादुस्तिक्तः कटुश्चात्र यथापरपरोत्कटाः । स्वादुत्वाद्गुरु सस्नेहं बृंहणं लशुनं परम् ॥१४॥

इसमें स्वादु, तिक्त एवं कटु रस क्रमशः बलवान् होते हैं। स्वादु होने से गुरु तथा स्नेह युक्त होने से लशुन अत्यन्त बृंहण होता है। नावनीतक के लेखक ने इसे गुरु नहीं अपितु लघु माना है, कहा भी है—रसे च पाके च कटुः प्रदिष्टः पाके तथा स्वादुरुदाहृतोऽन्यः। लघुश्च गन्धेन स दुर्जरश्च वीर्येण चोष्णः प्रथितश्च वृष्यः ॥१४॥

रससाधारणत्वाच्च साधारणरुजापहम्। आयुष्यं दीपनं वृष्यं धन्यमारोग्यमग्रिमम् ॥१५॥
स्मृतिमेधाबलवयोवर्णचक्षुःप्रसादनम्। मुखसौगन्ध्यजननं स्रोतसां च विशोधनम् ॥१६॥
शुक्रशोणितगर्भाणां जननं ह्रीनिषेधयोः । सौकुमार्यकरं केश्य वयसः स्थापनं परम् ॥१७॥

तथा अन्य साधारण रसों के कारण वह साधारण रोगों को नष्ट करता है। यह आयु को बढ़ाने वाला, दीपन, वृष्य, धन्य, एवं आरोग्य का देने वाला है। स्मृति, मेधा, बल, अवस्था एवं वर्ण को बढ़ाने वाला तथा चक्षुओं के लिये हितकर है। यह मुख की दुर्गन्धि को नष्ट कर के उसे सुगन्धित करता है, स्रोतों का शोधन करता है, शुक्र शोणित (रक्त) एवं गर्भ को बढ़ाता है। लज्जा एवं निषेध का उत्पादक है। यह सुकुमारता उत्पन्न करता है, बालों के लिये हितकर है तथा आयु को स्थिर करता है ॥१५-१७॥

अमृतोद्भूतममृतं लशुनानां रसायनम्। दन्तमांसनखश्मश्रुकेशवर्णवयोबलम् ॥१८॥
न जातु भ्रश्यते जातं नृणां लशुनखादिनाम् । न पतन्ति स्तनाः स्त्रीणां नित्यं लशुनसेवनात् ॥१९॥

२६४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

न रूपं भ्रश्यते चासां न प्रजा न बलायुषी।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६९ तमं पत्रम्।)
सौभाग्यं वर्धते चासां दृढं भवति यौवनम् ॥२०॥

अमृत से उत्पन्न हुआ यह लशुन रूप अमृत-रसायन है। लशुन का सेवन करने वाले व्यक्तियों के उत्पन्न हुए दांत, मांस, नख, श्मश्रु, केश, वर्ण, अवस्था, एवं बल कभी क्षीण नहीं होते। तथा लशुन का सेवन करने वाली स्त्रियों के स्तन कभी ढीले होकर नीचे नहीं लटकते। स्त्रियों के रूप, सन्तान, बल एवं आयु क्षीण नहीं होते। उनके सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा यौवन दृढ़ होता है ॥१८-२०॥

प्रमदाऽतिविधायापि लशुनैः प्राप्नुते मृजाम्। न चैनां संप्रबाधन्ते ग्राम्यधर्मोद्भवा गदाः ॥२१॥

स्त्रियां लशुन का अत्यन्त सेवन करके भी शुद्ध रहती हैं तथा उन्हें ग्राम्यधर्म (मैथुन) से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं ॥२१॥

कटीश्रोण्यङ्गमूलानां न जातु वशगा भवेत्। न जातु बन्ध्या भवति न जात्वप्रियदर्शना ॥२२॥

लशुन का सेवन करने से स्त्रियां कटि, श्रोणि तथा अन्य अङ्गों के रोगों के वशवर्ती नहीं होती हैं अर्थात् उन्हें कटि, श्रोणि एवं अन्य अङ्गों के रोग नहीं होते हैं। स्त्री कभी बन्ध्या (बांझ) तथा अप्रियदर्शना (जिसका दर्शन प्रिय न हो) नहीं होती है ॥२२॥

दृढमेधाविदीर्घायुर्दर्शनीयप्रजा भवेत्। अश्रान्तो ग्राम्यधर्मेषु शुक्रधाश्च भवेन्नरः ॥२३॥

लशुन के सेवन से पुरुष भी दृढ़, मेधावी, दीर्घायु, एवं दर्शनीय, (सुन्दर) सन्तानयुक्त होता है, मैथुन में थकता नहीं, तथा शुक्र को धारण करने वाला होता है अर्थात् इसके प्रयोग से शुक्र की भी वृद्धि होती है ॥२३॥

यावतीभिश्च समियात्तावत्यो गर्भमाप्नुयुः। नीलोत्पलसुगन्धिश्च पद्मवर्णश्च जायते ॥२४॥

जितनी भी स्त्रियों से वह मैथुन करता है सबको गर्भस्थिति हो जाती है। तथा गर्भ भी नील कमल की सुगन्धि वाला तथा पद्म के वर्ण का होता है ॥२४॥

गात्रमार्दवमाप्नोति कण्ठमाधुर्यमेव च। ग्रहणीदोषशमनं परं कायाग्निदीपनम् ॥२५॥

इस के सेवन से शरीर मृदु एवं कण्ठ मधुर हो जाता है, ग्रहणी के दोषों की शान्ति होती है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है ॥२५॥

च्युतभग्नास्थिरोगेषु सर्वेष्वनिलरोगिषु। पुष्परेतोभ्रमे कासे कुष्ठरोगेषु सर्वशः ॥२६॥
कृमिगुल्मकिलासेषु कण्ड्वां विस्फोटकेषु च। वैवर्ण्यतिमिरश्वासनक्तान्ध्याल्पभोजने ॥२७॥
जीर्णज्वरे विदाहे च तृतीयकचतुर्थके। स्रोतसामुपघातेषु गात्रजाड्योपशोषयोः ॥२८॥
अश्मरीमूत्रकृच्छ्रेषु कुण्डलेऽथ भगन्दरे। प्रदर प्लीहशेषेषु पाङ्गुल्ये वातशोणिते ॥२९॥
लशुनान्युपयुञ्जीत मेधामिबलवृद्धये। मुच्यते व्याधिभिः क्षिप्रं वपुश्चाधिकमाप्नुते ॥३०॥

किन रोगों में लशुन का प्रयोग करना चाहिये—अस्थिच्युत (Dislocation), अस्थिभग्न (Fracture) एवं अन्य अस्थिरोग, सम्पूर्ण वातरोग, पुष्प (आर्तव संबन्धी) रोग, वीर्य संबन्धी रोग, भ्रम, कास, कुष्ठरोग, कृमि, गुल्म, किलास, कण्डू, विस्फोटक, विवर्णता, तिमिर (नेत्ररोग), श्वास, नक्तान्ध्य (Night Blindness), अल्प भोजन (कम भोजन

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६५

करना), जीर्ण ज्वर, विदाह, तृतीयक एवं चातुर्थिक सन्तत ज्वर (Tertian and Ouarten malarial fever), स्रोतों का बन्द हो जाना, शरीर की जडता, उपशोष, अश्मरी, मूत्रकृच्छ, कुण्डल (बस्तिकुण्डल), भगन्दर, प्रदर, प्लीहारोग, शोष, पङ्गुता (चल न सकना), वातरक्त (Gout)—इत्यादि रोगों में मेधा, अग्नि एवं बल की वृद्धि के लिये लशुन का उपयोग करना चाहिये। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उस के शरीर की वृद्धि होती है ॥२६-३०॥

नान्यत्तच्छ्लैष्मिके व्याधौ पैत्तिके वा प्रयोजयेत् ।
ह्रसिष्ठः स्थविरोऽनग्निः सूतिका गर्भिणी शिशुः ॥३१॥
आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलायां तथाऽर्शसि । ऊरुस्तम्भविबन्धेषु गलवक्त्ररुजासु च ॥३२॥
सद्योवान्ते विरिक्ते च कृतनस्ये विशोषिते । तृष्णाच्छर्द्दिपरीतेषु हिक्काश्वासातिवृद्धिषु ॥३३॥
अधृतिष्वसहायेषु दरिद्रेषु दुरात्मसु । दत्तबस्तिनिरूहेषु लशुनं न प्रयोजयेत् ॥३४॥

किन रोगों में लशुन का प्रयोग नहीं करना चाहिये—श्लैष्मिक एवं पैत्तिक रोग, शरीर का ह्रास, स्थविर (वृद्धावस्था), अग्निमान्द्य, सूतिका, गर्भिणी, शिशु, आमरोग, ज्वर, अतिसार (अथवा ज्वरातिसार), कामला (Jaundice) अर्श, उरुस्तम्भ, विबन्ध, गले एवं मुख के रोग, सद्योवान्त (जिसने अभी वमन किया हो), विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया हो), जिसने नस्य (शिरोविरेचन) लिया है, शोष, तृष्णा, छर्दि, हिक्का एवं श्वास की अधिक वृद्धि, धैर्यरहित असहाय, दरिद्र एवं दुरात्मा रोगी तथा जिसे बस्ति एवं निरूह (आस्थापन) दिया गया है—इनमें लशुन का प्रयोग न करे ॥३१-३४॥

अक्षीणाग्निबलानां तु सर्वरोगेषु शस्यते । पौषे, माघेऽथवा मासे लशुनान्युपयोजयेत् ॥३५॥

जिनकी जाठराग्नि एवं बल क्षीण नहीं हुए हैं उनके सब रोगों में लशुन का प्रयोग किया जा सकता है। पौष एवं माघ के महीने में आयु को स्थिर करने वाले, हृदय को अच्छे लगने वाले तथा छिलके रहित लशुन का प्रयोग करना चाहिये। नावनीतक में चैत्र एवं वैशाख में लशुन के प्रयोग का विधान दिया है। कहा है—अब बहुविधमद्यमाससर्पिर्यवगोधूमभुजा सुखात्मकानाम्। अयमिह लशुनोत्सवः प्रयोज्यो हिमकाले च मधौ च माधवे च ॥३५॥

वयस्थानि सुहृद्यानि निस्तुषाण्यविशोधितम् ।
कायाग्निकालसात्म्येन मात्रा स्यान्नियमोऽपि च ॥३६॥

इसकी मात्रा तथा सेवन का नियम जाठराग्नि, काल एवं सात्म्य के अनुसार होता है ॥३६॥

चतुष्पली भवेन्मात्रा लशुनानां कनीयसी ।
षट्पली मध्यमा, श्रेष्ठा पलाष्टौ च दशाथ वा ॥३७॥

लशुन की लघु (निकृष्ट) मात्रा चार पल, मध्यम मात्रा छः पल तथा श्रेष्ठ (उत्तम) मात्रा आठ या दस पल होती है॥

शतं षष्टिः शतार्धं च मात्राः स्युर्गणितेष्वपि । शुष्केषु बद्धबीजेषु, पलवद्धरितेषु तु ॥३८॥
अथवा यावदुत्साहं भक्षयेदपि मूर्च्छितः ।

अथवा शुष्क एवं बद्धबीज (जिन के बीज अन्दर स्थिर हो गये हैं) लशुनों की गणित (संख्या) के अनुसार श्रेष्ठ, मध्यम तथा निकृष्ट मात्रा क्रमशः १००, ६० तथा ५० होती है। परन्तु हरे लशुनों की मात्राएँ पलों के अनुसार ही होती हैं। अथवा जबतक खाने का उत्साह (रुचि) हो तथा खाते २ रोगी मूर्च्छित न हो जाय तबतक खा सकता है ॥३८॥

२६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]

पुण्येऽहनि नरो (धीरो) लशुनाननुपचारयेत् ।।३९।। बह्वग्निके निरुद्वेगं निवातशरणः सुखी । मार्गकौशेयकार्पासकोवया(?)जिनकम्बलैः ।।४०।। वासोभिर्निर्मलैर्युक्तो भृशं चागुरुधूपितैः । धूपैश्चूर्णैश्च युक्तः स्यान्नित्यं (विधुत) पादुकः ।।४१।। लशुनान्यानयेदन्यस्त्वथान्य उपकल्पयेत् । पत्राणि वर्जयेदेषां बीजं नालं च कल्पयेत् ।।४२।। सूक्ष्मच्छिन्नानि कृत्वा च सर्पिषा प्लावयेद्भूशम् । हैयङ्गवीनं तु घृतं तैलं बालोचितं नवम् ।।४३।। प्लावनं यावदुत्साहं तिष्ठेयुश्चाप्लतान्यपि । द्वित्रिपञ्चदशाष्टाहं प्रशस्तस्नेहभावितम् ।।४४।। आत्मचिन्तामनुस्वापं दन्तकाष्ठं विवर्ज्य च । जीर्णाहारः सुखोत्थायी ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्य च ।।४५।। आसित्वा भक्षयेत्तानि सेव्यमुष्णोदकं सदा । उपदंशेऽपि दातव्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् ।।४६।। केसरं मातुलुङ्गानामथ वा जीवदाडिमम् । मूलकं वर्जयित्वा च दद्याद्धरितकान्यपि ।।४७।।

लशुन सेवन विधि-पुण्य दिन में बहुत अग्नि से युक्त हो कर धीर मनुष्य को लशुन का सेवन करना चाहिये । उस समय रोगी को उद्वेग रहित (शान्त मन वाला) होना, निवात स्थान में सुखपूर्वक रहना, मृगचर्म, रेशम, कपास (सूत), कोवय (?) तथा अजिन के कम्बलों अथवा निर्मलवस्त्रों से युक्त होना, अगुरु के द्वारा धूपित, धूप एवं चूर्णों से युक्त होना तथा नित्य पादुकाओं (खड़ाऊं) का धारण करना चाहिये । लशुन लाने का काम एक व्यक्ति करे तथा खाने के लिये तैयार करने का काम दूसरा ही व्यक्ति करे । इसके पत्तों को पृथक् छोड़ दे तथा उसके बीज एवं नाल के छोटे २ टुकड़े करके घी में अच्छी प्रकार भून ले । इसके लिये रुग्ण बालक के अनुसार मक्खन का घी अथवा नवीन तैल को उपयोग में लाना चाहिये । घी अथवा तेल में उन्हें तबतक भूनना चाहिये जबतक कि वे तैरना बन्द करके नीचे न बैठ जांय । तब शरीर का अच्छी प्रकार स्नेहन करके आवश्यकतानुसार दो, तीन, पांच, दस अथवा आठ दिन तक आत्मचिन्ता सेवन के बाद दिन में सोना तथा दन्त धावन आदि के त्यागपूर्वक पूर्व आहार के जीर्ण हो जाने पर सुखपूर्वक शयन के बाद उठकर, ब्राह्मणों का स्वस्तिवाचन करके तथा बैठकर इनका सेवन करना चाहिये । और सदा गरम जल का सेवन करना चाहिये । अचार आदि में भी आर्द्रक, सोंठ, बिजौरे के केसर (पराग), जीवनीय गण के पदार्थ तथा अनार दाने के साथ इसको देना चाहिये । तथा मूली को छोड़कर हरित वर्ग के सब पदार्थ उसे खाने को दिये जा सकते हैं ।।३९-४७।।

अङ्गानामपि भृष्टानां चूर्ण स्यादवचूर्णनम् । त्वक्पत्रशुण्ठीमरिचसूक्ष्मैलाजातिमिश्रितम् ।।४८।। लवणान्यपि सर्वाणि लाभतस्तत्र चूर्णयेत् ।

भूने हुए लशुन में भी दालचीनी, तेजपत्र, सोंठ, मरिच, छोटी इलायची, जायफल तथा लवण आदि में से जो २ मिलसकें उनका चूर्ण डालकर प्रयोग करे ।।४८।।

सुजातं मद्यमप्यस्य युक्तितःच समुदानयेत् ।।४९।।

तथा अच्छी प्रकार से तैयार हुए मद्य का भी युक्तिपूर्वक सेवन कराना चाहिये ।।४९।।

लशुनान्यन्तरा खादेत् पिबेन्मद्यं तथाऽन्तरा । सुखमग्निमुपासीनो भक्षयेत्तृप्तये शनैः ।।५०।।

सुखपूर्वक अग्नि के पास बैठकर लशुन तथा मद्य का बारी २ से एक दूसरे के बीच में सेवन करे । अर्थात् एक बार लशुन खाये तथा पुनः मद्य इत्यादि क्रम से सेवन करे । इस प्रकार धीरे २ तृप्तिपर्यन्त इनका सेवन करे ।।५०।।