भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 616
२५८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

घृत, स्थौणेयक (ग्रन्थिपर्ण-भटेउर), जटामांसी, तगर, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता), हीबेर (हाऊबेर), सौंफ, हरताल, मनःशिला, नागरमोथा, हरेणुबीज तथा छोटी इलायची इनको धूप के लिये प्रयुक्त करे । यह शिशुक नाम का धूप सब रोगों तथा ग्रहों को नष्ट करता है । हे भार्गव ! इसका धूप, अनुधूप तथा प्रतिधूप तथा प्रतिधूप के रूप में प्रयोग किया जाता है ।।

घृतं सिद्धार्थका लाजाः कुशाः सह .... । सर्वतुल्या भवेद् ब्राह्मी धूपोऽयं ब्राह्म उच्यते ।
ब्राह्मणक्षत्रवैश्येषु प्रयोज्यो भिषजा भवेत् । सर्वरोगेषु सततं क्षिप्रं रोगान्निरस्यति ।।

घृत, श्वेत सरसों, लाजा (खील), कुश, तथा सह (?) ...... और इन सबके समान ब्राह्मी लें । यह ब्राह्मधूप कहलाता है । वैद्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य में सब रोगों में इसका निरन्तर प्रयोग करना चाहिये । यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देता है ।।

घृतं श्वदंष्ट्रा वसुका हरिद्रे परिपेलवम् । वचा भार्गी च धूपोऽयं प्रतिधूपः सुखावहः ।।

घृत, गोखुरु, वसुक (बकपुष्प), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता) बच एवं भारङ्गी-यह धूप के रूप में सुखकर (स्वास्थ्यप्रद) माना गया है ।।

घृतं च पद्मकोशीरं बालकं केसरं रसम् । प्रतिधूप इति ख्यातः सर्वरोगेषु शस्यते ।।

घृत, पद्मक (नीलकमल), खस, बालक (नेत्रवाला), नागकेसर तथा रस (सर्जरस अथवा बोल)-यह प्रतिधूप सब रोगों में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं वानरलोमानि कुक्कुटाण्डं वचा यवाः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६७ तमं पत्रम् ।)
सिद्धार्थकाश्च धूपोऽयं प्रतिधूपमहोदयः ।।

घृत, बन्दर के बाल, कुक्कुटाण्ड (मुर्गी का अण्डा), बच, जौ तथा श्वेत सरसों-महान् उदय वाला यह धूप प्रतिधूप के रूप में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि मूलं पुष्पं फलं त्वचम् । अरिष्टो नाम धूपोऽयमरिष्टं कुरुते क्षणात् ।।

घृत तथा नीम के पत्र, मूल, पुष्प, फल एवं त्वचा (छाल) यह अरिष्ट नाम का धूप रोगी को क्षण भर में रोग रहित कर देता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि खरमूत्रं वचा जतु । सर्षपाश्चात्र धूपोऽयं प्रतिधूपश्च शस्यते ।।

घृत, नीम के पत्र, गदहे का मूत्र, बच, लाक्षा, तथा सरसों इसका धूप एवं प्रतिधूप के रूप में प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि जतुसर्जरसाक्षताः । भासोलूकशकृच्चेति धूपोऽपस्मारनाशनः ।।

घृत, नीम के पत्र, लाक्षा, सर्जरस, (राल), अक्षत (चावल), भास (गृध्र विशेष) तथा उल्लू की विष्ठा-यह धूप अपस्मार को नष्ट करता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि सुरसाश्वघ्नयोस्तथा । गोमेषबस्तबालाश्च धूपोऽय सर्वरोगहा ।।

घृत, नीम, तुलसी तथा कनेर के पत्ते, और गौ भेड़ तथा बकरी के बाल-यह धूप सब रोगों को नष्ट करता है ।।