भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २५९

घृताक्षतं जातिपुष्पं मधु सिद्धार्थका वचा। गण्डधूप इतिख्यातः सर्वभूतरुजापहः ।।

घृत, चावल, चमेली के फूल, मधु, श्वेत सरसों, बच–यह गणधूप कहलाता है जो सब भूतों के रोगों को नष्ट करता है ।।

घृतं शाल्लकिधूपश्च पुष्पं जातिशिरीषयोः । नमेरुणा समायुक्तो धूपः स्वस्तिक उच्यते ।।

घृत, शाल्लकी (शालविशेष–सालई–Indian olibanum) चमेली तथा शिरीष के फूल, एवं नमेरु (सरल देवदारु) से युक्त स्वस्तिक धूप कहलाता है ।।

घृतं गुग्गुलुसंयुक्तं, देवदारु घृतान्वितम् । कालागुरु च सर्पिश्च, सर्षपांश्चापि सर्पिषा ।। तृणमूलस्य पत्राणि सारं पुष्पफलं त्वचम् । पञ्च धूपाः समाख्याताः सघृता ग्रहनाशनाः ।।

घृतयुक्त गूगल, घृतयुक्त देवदारु, कालागुरु (कृष्ण अगरु) और घृत, घृतयुक्त सरसों तथा पञ्चतृणमूल के पत्र, सार (Extract), पुष्प, फल और त्वचा । घृत के साथ ग्रहों को नष्ट करने वाले उपर्युक्त ५ धूप कहे गये हैं ।।

गुग्गुल्वादीनि चैतानि दशाङ्गं च समापयेत् । गृहधूप इति ख्यातो न क्वचित् प्रतिहन्यते ।।

उपर्युक्त गुग्गुल आदि तथा दशाङ्ग धूप को मिलाने से गृह धूप कहलाता है जो कभी नष्ट (खराब) नहीं होता ।।

सि^१द्धार्थाश्चेति धूपास्ते चत्वारिशदुदाहृताः । भिषक्सिद्धिकरा नृणां पुत्रदा रोगनाशनाः ।।

इस प्रकार ये अव्यर्थ फल वाले ४० धूप कहे गये हैं। ये चिकित्सा में सिद्धि को करते हैं तथा पुत्रों के देने वाले और रोगों को नष्ट करने वाले हैं ।।

एतैर्बालान् समापन्नानरिष्टागारमेव च । वस्त्रशय्यासनाद्यं च बालानां धूपयेद्भिषक् ।।

इन उपर्युक्त धूपों से बालकों को युक्त करके उसके रोगीगृह, वस्त्र, शय्या तथा आसन आदि का धूपन (Fumigation) करे ।।

पूर्वमेव भिषग्धूपं पुष्ययोगेन संहरेत् । उपोषितः शुचिः स्नातो मैत्राग्नेयोत्तरासु वा ।। वाचयित्वा बलि कृत्वा श्रुत्वा शब्दान्मनोऽनुगान् । चतस्रः शुचयः कन्याः कुट्टयेयुर (तन्द्रिताः) ।। ............ तं धूपं निदध्याद्भाजने नवे । गोपयेच्च सुपिहितं काले चैनं प्रयोजयेत् ।। तत्कालमपि चापन्नः संभृत्याशु प्रयोजयेत् । ननु तस्मिन् ध्रुवा सिद्धिर्यथापूर्वोपकल्पिते ।। आघ्रातपर धूपस्तु यदि न प्रतिधूप्यते । आशु तं रोगमाप्नोति तदर्थं धूप्यते पुनः ।।

सर्वप्रथम वैद्य को चाहिये कि वह अच्छे प्रकार उपवास कर स्नान से पवित्र होकर मैत्र, आग्नेय तथा उत्तर दिशा में से पुष्य नक्षत्र में धूप के द्रव्यों को उखाड़ कर लाये । तथा स्वस्तिवाचन, एवं बलिकर्म करके और मन के अनुकूल शब्दों को सुनकर पवित्र हुई चार कन्याएँ प्रमादरहित होकर ...... उस धूप को कूटकर नवीन पात्र में डालकर अच्छे प्रकार ढककर सुरक्षित स्थान पर रख दे तथा आवश्यकता होने पर इसका प्रयोग करें । यदि उसी समय उसका प्रयोग करना हो तो भी अच्छी तरह संभालकर उसका शीघ्र ही प्रयोग किया जा सकता है । इस पूर्वकल्पित (पहले से तैयार किये हुए) धूप से निश्चित रूप से सिद्धि होती है । यदि एक बार धूप देने के बाद उसका फिर प्रतिधूपन (पुनः धूपन) नहीं किया जाय तो उसे शीघ्र ही रोग हो जाते हैं अतः उसका पुनः धूपन करना चाहिये ।।


१. एते चत्वारिशद्धूपाः सिद्ध (अव्यर्थ) फला इत्यर्थः ।

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