भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 618
२६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

धूपश्चैवानुधूपश्च प्रतिधूपश्च जीवक ! । त्रिविधो धूप उद्दिष्टः कर्मभेदाच्चिकित्सकैः ।।

हे जीवक ! चिकित्सकों ने कर्म भेद से तीन प्रकार का धूप कहा है—१. धूप २. अनुधूप ३. प्रतिधूप ।।

कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात् । द्वियोनि ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः ।।

अन्य जो कौमार भृत्य के आचार्य हैं वे कश्यप के मतानुसार धूपों के जङ्गम और स्थावर भेद से दो उत्पत्ति कारण मानते हैं ।।

कुतो धूपाः समुत्पन्नाः किंदैवत्याः किमाश्रयाः । कैर्नामभिर्मतास्तेषु दह्यमानेषु कि जपेत् ।।
एवं महाजनगतश्चोच्यते 'भिषजा भिषक् । तस्मान्निर्णयमेतेषां प्रश्नानां शृणु तत्त्वतः ।।

धूप कहां से उत्पन्न हुए हैं ? इनका देवता कौन है ? इनका आश्रय क्या है ? इनके क्या नाम हैं ? उन्हें जलाने के बाद क्या जाप करना चाहिये ? इत्यादि प्रश्न एक वैद्य दूसरे वैद्य से करता है। इसलिये तू इन प्रश्नों का यथार्थ निर्णय (उत्तर) सुन ।।

जाता जाता ऋषिसुता ह्रियन्ते राक्षसैर्यदा । तदा महर्षयः सर्वे वह्निं शरणमन्वियुः ।।
होमजापतयोयुक्तास्तस्तुष्टोऽग्निरब्रवीत् । इमान् धूपान् प्रयच्छध्वं प्रयुङ्ग्ध्वं च मदर्पितान् ।।
रक्षोभूतपिशाचेभ्यो न भयं वो भविष्यति । जातेषु वर्धमाने च रोगे धात्र्यां च युङ्क ह ।।

जब उत्पन्न हुए ऋषियों के पुत्रों को राक्षसों ने सताना प्रारंभ किया तब होम, जाप एवं तप से युक्त हुए सब महर्षि अग्नि देवता के शरण में पहुंचे। इससे प्रसन्न होकर अग्नि ने कहा—मेरे द्वारा अर्पित किये गये इन धूपों का तुम ग्रहण करो तथा प्रयोग करो। इससे तुम्हें राक्षस, भूत, पिशाच, आदि किसी का भय नहीं रहेगा। उत्पन्न हुए बालकों में बढ़ते हुए रोगों में धात्री को इन धूपों का प्रयोग कराना चाहिये।

ततस्ते मुनयस्तुष्टाः कश्यपं लोकवर्धनम् । ऋषिलोकहितं ज्ञात्वा युयुजुस्तत्र कर्मणि ।।

तब प्रसन्न हुए उन मुनियों ने लोकों की वृद्धि करने वाले महर्षि कश्यप को ऋषियों का हित करने वाला समझकर उसे इस कार्य के लिये नियुक्त किया अर्थात् उपर्युक्त धूप को ग्रहण करने के लिये उसे अपना प्रतिनिधि बना दिया।

अग्नेः सकाशाद्धूपांस्स संलब्ध्वा चाधिकोऽभवत् ।
अधृष्याः सवभूतानां कुमारास्ते च रक्षिताः ।।

इस प्रकार अग्नि देवता से धूपों को प्राप्त कर के उसने इन्हें और बढ़ाया तथा सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) द्वारा अधृष्य (जो आक्रान्त न किये जा सकें) बालकों की रक्षा की।

एवं धूपाः समुत्पन्नाः प्रजानां हितकाम्यया । निर्दिष्टाश्चाग्निदैवत्या जङ्गमस्थावराश्रयाः ।।

इस प्रकार लोक कल्याण के लिये ये धूप उत्पन्न हुए। इनका देवता अग्नि माना जाता है तथा जङ्गम (चेतन) और स्थावर (जड़) ये दो इनके आश्रय हैं ।।

विधूरस्यनुवाकेन सर्वमेवाभिमन्त्र्य च । प्रयुञ्जीत शिशौ रक्षां दह्यमाने जपेत्त्विदम् ।।

विधूरसी इत्यादि अनुवाक का उच्चारण करके उसके द्वारा सम्पूर्ण धूपों को अभिमन्त्रित करके शिशुओं की रक्षा के लिये प्रयुक्त करना चाहिये। तथा धूप को जलाने के बाद निम्न जप करना चाहिये ।।

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