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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
२५८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

घृत, स्थौणेयक (ग्रन्थिपर्ण-भटेउर), जटामांसी, तगर, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता), हीबेर (हाऊबेर), सौंफ, हरताल, मनःशिला, नागरमोथा, हरेणुबीज तथा छोटी इलायची इनको धूप के लिये प्रयुक्त करे । यह शिशुक नाम का धूप सब रोगों तथा ग्रहों को नष्ट करता है । हे भार्गव ! इसका धूप, अनुधूप तथा प्रतिधूप तथा प्रतिधूप के रूप में प्रयोग किया जाता है ।।

घृतं सिद्धार्थका लाजाः कुशाः सह .... । सर्वतुल्या भवेद् ब्राह्मी धूपोऽयं ब्राह्म उच्यते ।
ब्राह्मणक्षत्रवैश्येषु प्रयोज्यो भिषजा भवेत् । सर्वरोगेषु सततं क्षिप्रं रोगान्निरस्यति ।।

घृत, श्वेत सरसों, लाजा (खील), कुश, तथा सह (?) ...... और इन सबके समान ब्राह्मी लें । यह ब्राह्मधूप कहलाता है । वैद्य को ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य में सब रोगों में इसका निरन्तर प्रयोग करना चाहिये । यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देता है ।।

घृतं श्वदंष्ट्रा वसुका हरिद्रे परिपेलवम् । वचा भार्गी च धूपोऽयं प्रतिधूपः सुखावहः ।।

घृत, गोखुरु, वसुक (बकपुष्प), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, परिपेलव (कुटन्नट-जलमुस्ता) बच एवं भारङ्गी-यह धूप के रूप में सुखकर (स्वास्थ्यप्रद) माना गया है ।।

घृतं च पद्मकोशीरं बालकं केसरं रसम् । प्रतिधूप इति ख्यातः सर्वरोगेषु शस्यते ।।

घृत, पद्मक (नीलकमल), खस, बालक (नेत्रवाला), नागकेसर तथा रस (सर्जरस अथवा बोल)-यह प्रतिधूप सब रोगों में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं वानरलोमानि कुक्कुटाण्डं वचा यवाः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६७ तमं पत्रम् ।)
सिद्धार्थकाश्च धूपोऽयं प्रतिधूपमहोदयः ।।

घृत, बन्दर के बाल, कुक्कुटाण्ड (मुर्गी का अण्डा), बच, जौ तथा श्वेत सरसों-महान् उदय वाला यह धूप प्रतिधूप के रूप में प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि मूलं पुष्पं फलं त्वचम् । अरिष्टो नाम धूपोऽयमरिष्टं कुरुते क्षणात् ।।

घृत तथा नीम के पत्र, मूल, पुष्प, फल एवं त्वचा (छाल) यह अरिष्ट नाम का धूप रोगी को क्षण भर में रोग रहित कर देता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि खरमूत्रं वचा जतु । सर्षपाश्चात्र धूपोऽयं प्रतिधूपश्च शस्यते ।।

घृत, नीम के पत्र, गदहे का मूत्र, बच, लाक्षा, तथा सरसों इसका धूप एवं प्रतिधूप के रूप में प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि जतुसर्जरसाक्षताः । भासोलूकशकृच्चेति धूपोऽपस्मारनाशनः ।।

घृत, नीम के पत्र, लाक्षा, सर्जरस, (राल), अक्षत (चावल), भास (गृध्र विशेष) तथा उल्लू की विष्ठा-यह धूप अपस्मार को नष्ट करता है ।।

घृतं निम्बस्य पत्राणि सुरसाश्वघ्नयोस्तथा । गोमेषबस्तबालाश्च धूपोऽय सर्वरोगहा ।।

घृत, नीम, तुलसी तथा कनेर के पत्ते, और गौ भेड़ तथा बकरी के बाल-यह धूप सब रोगों को नष्ट करता है ।।

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २५९

घृताक्षतं जातिपुष्पं मधु सिद्धार्थका वचा। गण्डधूप इतिख्यातः सर्वभूतरुजापहः ।।

घृत, चावल, चमेली के फूल, मधु, श्वेत सरसों, बच–यह गणधूप कहलाता है जो सब भूतों के रोगों को नष्ट करता है ।।

घृतं शाल्लकिधूपश्च पुष्पं जातिशिरीषयोः । नमेरुणा समायुक्तो धूपः स्वस्तिक उच्यते ।।

घृत, शाल्लकी (शालविशेष–सालई–Indian olibanum) चमेली तथा शिरीष के फूल, एवं नमेरु (सरल देवदारु) से युक्त स्वस्तिक धूप कहलाता है ।।

घृतं गुग्गुलुसंयुक्तं, देवदारु घृतान्वितम् । कालागुरु च सर्पिश्च, सर्षपांश्चापि सर्पिषा ।। तृणमूलस्य पत्राणि सारं पुष्पफलं त्वचम् । पञ्च धूपाः समाख्याताः सघृता ग्रहनाशनाः ।।

घृतयुक्त गूगल, घृतयुक्त देवदारु, कालागुरु (कृष्ण अगरु) और घृत, घृतयुक्त सरसों तथा पञ्चतृणमूल के पत्र, सार (Extract), पुष्प, फल और त्वचा । घृत के साथ ग्रहों को नष्ट करने वाले उपर्युक्त ५ धूप कहे गये हैं ।।

गुग्गुल्वादीनि चैतानि दशाङ्गं च समापयेत् । गृहधूप इति ख्यातो न क्वचित् प्रतिहन्यते ।।

उपर्युक्त गुग्गुल आदि तथा दशाङ्ग धूप को मिलाने से गृह धूप कहलाता है जो कभी नष्ट (खराब) नहीं होता ।।

सि^१द्धार्थाश्चेति धूपास्ते चत्वारिशदुदाहृताः । भिषक्सिद्धिकरा नृणां पुत्रदा रोगनाशनाः ।।

इस प्रकार ये अव्यर्थ फल वाले ४० धूप कहे गये हैं। ये चिकित्सा में सिद्धि को करते हैं तथा पुत्रों के देने वाले और रोगों को नष्ट करने वाले हैं ।।

एतैर्बालान् समापन्नानरिष्टागारमेव च । वस्त्रशय्यासनाद्यं च बालानां धूपयेद्भिषक् ।।

इन उपर्युक्त धूपों से बालकों को युक्त करके उसके रोगीगृह, वस्त्र, शय्या तथा आसन आदि का धूपन (Fumigation) करे ।।

पूर्वमेव भिषग्धूपं पुष्ययोगेन संहरेत् । उपोषितः शुचिः स्नातो मैत्राग्नेयोत्तरासु वा ।। वाचयित्वा बलि कृत्वा श्रुत्वा शब्दान्मनोऽनुगान् । चतस्रः शुचयः कन्याः कुट्टयेयुर (तन्द्रिताः) ।। ............ तं धूपं निदध्याद्भाजने नवे । गोपयेच्च सुपिहितं काले चैनं प्रयोजयेत् ।। तत्कालमपि चापन्नः संभृत्याशु प्रयोजयेत् । ननु तस्मिन् ध्रुवा सिद्धिर्यथापूर्वोपकल्पिते ।। आघ्रातपर धूपस्तु यदि न प्रतिधूप्यते । आशु तं रोगमाप्नोति तदर्थं धूप्यते पुनः ।।

सर्वप्रथम वैद्य को चाहिये कि वह अच्छे प्रकार उपवास कर स्नान से पवित्र होकर मैत्र, आग्नेय तथा उत्तर दिशा में से पुष्य नक्षत्र में धूप के द्रव्यों को उखाड़ कर लाये । तथा स्वस्तिवाचन, एवं बलिकर्म करके और मन के अनुकूल शब्दों को सुनकर पवित्र हुई चार कन्याएँ प्रमादरहित होकर ...... उस धूप को कूटकर नवीन पात्र में डालकर अच्छे प्रकार ढककर सुरक्षित स्थान पर रख दे तथा आवश्यकता होने पर इसका प्रयोग करें । यदि उसी समय उसका प्रयोग करना हो तो भी अच्छी तरह संभालकर उसका शीघ्र ही प्रयोग किया जा सकता है । इस पूर्वकल्पित (पहले से तैयार किये हुए) धूप से निश्चित रूप से सिद्धि होती है । यदि एक बार धूप देने के बाद उसका फिर प्रतिधूपन (पुनः धूपन) नहीं किया जाय तो उसे शीघ्र ही रोग हो जाते हैं अतः उसका पुनः धूपन करना चाहिये ।।


१. एते चत्वारिशद्धूपाः सिद्ध (अव्यर्थ) फला इत्यर्थः ।

२६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्धूपकल्पः ? ]

धूपश्चैवानुधूपश्च प्रतिधूपश्च जीवक ! । त्रिविधो धूप उद्दिष्टः कर्मभेदाच्चिकित्सकैः ।।

हे जीवक ! चिकित्सकों ने कर्म भेद से तीन प्रकार का धूप कहा है—१. धूप २. अनुधूप ३. प्रतिधूप ।।

कौमारभृत्यास्त्वपरे जङ्गमस्थावराश्रयात् । द्वियोनि ब्रुवते धूपं कश्यपस्य मते स्थिताः ।।

अन्य जो कौमार भृत्य के आचार्य हैं वे कश्यप के मतानुसार धूपों के जङ्गम और स्थावर भेद से दो उत्पत्ति कारण मानते हैं ।।

कुतो धूपाः समुत्पन्नाः किंदैवत्याः किमाश्रयाः । कैर्नामभिर्मतास्तेषु दह्यमानेषु कि जपेत् ।।
एवं महाजनगतश्चोच्यते 'भिषजा भिषक् । तस्मान्निर्णयमेतेषां प्रश्नानां शृणु तत्त्वतः ।।

धूप कहां से उत्पन्न हुए हैं ? इनका देवता कौन है ? इनका आश्रय क्या है ? इनके क्या नाम हैं ? उन्हें जलाने के बाद क्या जाप करना चाहिये ? इत्यादि प्रश्न एक वैद्य दूसरे वैद्य से करता है। इसलिये तू इन प्रश्नों का यथार्थ निर्णय (उत्तर) सुन ।।

जाता जाता ऋषिसुता ह्रियन्ते राक्षसैर्यदा । तदा महर्षयः सर्वे वह्निं शरणमन्वियुः ।।
होमजापतयोयुक्तास्तस्तुष्टोऽग्निरब्रवीत् । इमान् धूपान् प्रयच्छध्वं प्रयुङ्ग्ध्वं च मदर्पितान् ।।
रक्षोभूतपिशाचेभ्यो न भयं वो भविष्यति । जातेषु वर्धमाने च रोगे धात्र्यां च युङ्क ह ।।

जब उत्पन्न हुए ऋषियों के पुत्रों को राक्षसों ने सताना प्रारंभ किया तब होम, जाप एवं तप से युक्त हुए सब महर्षि अग्नि देवता के शरण में पहुंचे। इससे प्रसन्न होकर अग्नि ने कहा—मेरे द्वारा अर्पित किये गये इन धूपों का तुम ग्रहण करो तथा प्रयोग करो। इससे तुम्हें राक्षस, भूत, पिशाच, आदि किसी का भय नहीं रहेगा। उत्पन्न हुए बालकों में बढ़ते हुए रोगों में धात्री को इन धूपों का प्रयोग कराना चाहिये।

ततस्ते मुनयस्तुष्टाः कश्यपं लोकवर्धनम् । ऋषिलोकहितं ज्ञात्वा युयुजुस्तत्र कर्मणि ।।

तब प्रसन्न हुए उन मुनियों ने लोकों की वृद्धि करने वाले महर्षि कश्यप को ऋषियों का हित करने वाला समझकर उसे इस कार्य के लिये नियुक्त किया अर्थात् उपर्युक्त धूप को ग्रहण करने के लिये उसे अपना प्रतिनिधि बना दिया।

अग्नेः सकाशाद्धूपांस्स संलब्ध्वा चाधिकोऽभवत् ।
अधृष्याः सवभूतानां कुमारास्ते च रक्षिताः ।।

इस प्रकार अग्नि देवता से धूपों को प्राप्त कर के उसने इन्हें और बढ़ाया तथा सम्पूर्ण भूतों (प्राणियों) द्वारा अधृष्य (जो आक्रान्त न किये जा सकें) बालकों की रक्षा की।

एवं धूपाः समुत्पन्नाः प्रजानां हितकाम्यया । निर्दिष्टाश्चाग्निदैवत्या जङ्गमस्थावराश्रयाः ।।

इस प्रकार लोक कल्याण के लिये ये धूप उत्पन्न हुए। इनका देवता अग्नि माना जाता है तथा जङ्गम (चेतन) और स्थावर (जड़) ये दो इनके आश्रय हैं ।।

विधूरस्यनुवाकेन सर्वमेवाभिमन्त्र्य च । प्रयुञ्जीत शिशौ रक्षां दह्यमाने जपेत्त्विदम् ।।

विधूरसी इत्यादि अनुवाक का उच्चारण करके उसके द्वारा सम्पूर्ण धूपों को अभिमन्त्रित करके शिशुओं की रक्षा के लिये प्रयुक्त करना चाहिये। तथा धूप को जलाने के बाद निम्न जप करना चाहिये ।।

धूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २६१

अग्निस्त्वा धूपयतु, ब्रह्मा त्वा धूपयतु, शिवस्त्वा धूपयतु, वसवस्त्वा धूपयन्तु, रुद्रम्त्वा धूपयतु, आदित्यस्त्वा धूपयतु, मरुतस्त्वा धूपयन्तु, साध्यस्त्वा धूपयतु, देवा ऋभवस्त्वा धूपयन्तु, विश्वे त्वा देवा धूपयन्तु, सर्वे

(इति ताडपत्रपुस्तके १६८ तमं पत्रम्।)

त्वा देवा धूपयन्तु, छन्दांसि त्वा धूपयन्तु, पृथिवी त्वा धूपयतु, अन्तरिक्षं त्वा धूपयतु, द्यौस्त्वा धूपयतु, दिशस्त्वा धूपयन्तु, दिशां त्वा पतयो धूपयन्तु, देवीरापस्त्वा धूपयन्तु, शिवस्त्वा पवमानो धूपयतु, मित्रस्त्वा सविता सूर्यो धूपयतु, चन्द्रस्त्वा सोमो धूपयतु, नक्षत्राणि त्वा सुप्रजात्वाय धूपयन्तु, नक्षत्राणां त्वा देवताः सुमनसे धूपयन्तु, अहोरात्राणि त्वा शान्तये धूपयन्तु, ऋभवस्त्वा पुण्याय कर्मणे धूपयन्तु, संवत्सरास्त्वाऽऽयुषे ब्रह्मवर्चसे बलाय धूपयन्तु, प्रजापतिस्त्वा सुप्रजात्वाय धूपयतु, अश्विनौ त्वाऽऽरोग्याय दीर्घायुष्ट्वाय सहसे शेव(श्रेय)से धूपयंताम्, मातरस्त्वा स्नेहा धूपयन्तु, पितरस्त्वा तनोरच्छेदाय स्वधायै धूपयन्तु, कुमारस्त्वा कौमाराय वसवे धूपयतु, शाखस्त्वा यौवनाय धूपयतु, विशाखस्त्वा मध्याय वयसे धूपयतु, नैगमेषस्त्वा जरसे धूपयतु, सर्वे त्वा देवा दिव्यं धाम्ने धूपय तु, सर्वे त्वा ऋषयो ब्रह्मवर्चसाय धूपयन्तु, सर्वास्त्वा नद्यः सुपीताय धूपयन्तु, सर्वे त्वा पर्वताः स्थैर्याय धूपयन्तु, सर्वास्त्या ओषधोऽन्नाद्याय धूपयन्तु, सर्वे त्वा वनस्पतयः सुव्रतानां श्रेष्ठ्याय धूपयन्तु, सर्वे त्वा पशवः शक्त्यै शान्त्यै धूपयन्तु, सत्येन त्वा धूपयाम्यमृतेन त्वा धूपयाम्यृतसत्याभ्यां त्वा धूपयामि, नमो देवेभ्य इति जपेत्। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति कल्पस्थाने) धूपनकल्पः ।।


अग्नि तेरा धूपन करे, ब्रह्मा तेरा धूपन करे, शिव तेरा धूपन करे, वसु तेरा धूपन करें, रुद्र तेरा धूपन करे, आदित्य तेरा धूपन करे, मरुत् तेरा धूपन करें, साध्यदेवता तेरा धूपन करे, ऋभु देवता तेरा धूपन करें, विश्वे (ब्रह्माण्ड के) देवता तेरा धूपन करें, सर्वे (संकुचित क्षेत्र शरीर आदि के) देवता तेरा धूपन करें, छन्द (वेदमन्त्र) तेरा धूपन करें, पृथिवी देवता तेरा धूपन करे, अन्तरिक्ष तेरा धूपन करे, द्यौ तेरा धूपन करे, दिशाएं तेरा धूपन करें, दिशाओं के पति (अधिपति) तेरा धूपन करे, जलदेवता तेरा धूपन करे, पवित्र करने वाला शिव तेरा धूपन करे, मित्र, सविता तथा सूर्य नामक आदित्य तेरा धूपन करे, सोमनामक चन्द्रमा तेरा धूपन करे, नक्षत्र उत्तम सन्तान के लिये तेरा धूपन करें, नक्षत्रों के देवता उत्तम मन के लिये तेरा धूपन करें, दिन तथा रात्रि शान्ति के लिये तेरा धूपन करें, ऋभुदेवता पुण्यकर्म के लिये तेरा धूपन करें, संवत्सर (वर्ष) आयु, ब्रह्मतेज तथा बल के लिये तेरा धूपन करें, प्रजापति उत्तम सन्तान के लिये तेरा धूपन करें, अश्विदेवता आरोग्य, दीर्घायुष्य, बल तथा श्रेयस (सुख) के लिये तेरा धूपन करें, मातृदेवता स्नेह के लिये तेरा धूपन करें, पितर देवता शरीर के अक्षत रहने तथा स्वधा (अन्न) के लिये तेरा धूपन करें, कुमार (कार्तिकेय) कुमारावस्था तथा वसु (सम्पत्ति) के लिये तेरा धूपन करे, शाख देवता यौवन के लिये तेरा धूपन करे, विशाख मध्य आयु के लिये तेरा धूपन करे, नैगमेष जरा (चिरञ्जीविता) के लिये तेरा धूपन करे, सम्पूर्ण देवता दिव्य धाम (तेज) के लिये तेरा धूपन करें, सम्पूर्ण ऋषि ब्रह्मवर्चस् के लिये तेरा धूपन करें, संपूर्ण नदियां उत्तम पान के लिये तेरा धूपन करें, संपूर्ण पर्वत स्थैर्य (स्थिरता) के लिए तेरा धूपन करें, संपूर्ण ओषधियां अन्न के लिये तेरा धूपन करें, सम्पूर्ण वनस्पतियां उत्तम व्रतों की श्रेष्ठता के लिये तेरा

२६२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

धूपन करें, सम्पूर्ण पशु शक्ति एवं शान्ति के लिये तेरा धूपन करें। तथा सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, ऋत के द्वारा तेरा धूपन करता हूँ, ऋत और सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, तथा देवताओं को नमस्कार करता हूँ। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥

(इति कल्पस्थाने) धूपनकल्पः ॥


लशुनकल्पाध्यायः ।

अथातो लशुनकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम लशुन कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

हुताग्निहोत्रमासीनं गङ्गाद्वारे प्रजापतिम् । पप्रच्छ स्थविरः काले प्रजानां हितकाम्यया ।।३।।
जिसने अग्निहोत्र में आहुति दी है ऐसे तथा गङ्गाद्वार पर स्थित (अर्थात् गङ्गा के आसपास के प्रदेश में रहने वाले) प्रजापति कश्यप से ज्ञानी वृद्धजीवक ने लोककल्याण की दृष्टि से उचित काल में निम्न प्रश्न किया ।।३।।

भगवँल्लशुनोत्पत्तिं प्रयोगं चोपयोजने । श्रोतुमिच्छामिकालं च रोगान्, येषु न येषु च ।।४।।
व्यापदश्चास्य काः सन्ति, किं च तासां चिकित्सितम् ।
अन्नपानं च किं तत्र, परिहारः फलं च किम् ।।५।।
हे भगवन् ! मैं लशुन की उत्पत्ति, प्रयोग, उपयोग और काल को जानना चाहता हूँ। तथा इसका किन रोगों में प्रयोग करना चाहिये तथा किन में नहीं ? इसके प्रयोग से कौन से उपद्रव हो जाते हैं ? उनकी चिकित्सा क्या है ? लशुन के प्रयोग काल में किस अन्नपान का सेवन करना चाहिये ? उस काल में परहेज (त्याज्य) क्या हैं तथा इसके फल क्या हैं ? ।।४-५।।

इति पृष्टः स शिष्येण मुनिराह प्रजाहितम् । शृणु सौम्य ! यथोत्पन्नं लशुनं सपरायणम् ।।६।।
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर महर्षि कश्यप ने लोक कल्याण की दृष्टि से उत्तर दिया-हे सौम्य ! लशुन की उत्पत्ति को तू ध्यानपूर्वक सुन ।।६।।

न लेभे गर्भमिन्द्राणी यदा वर्षशतादपि । तदैनां खादयामास शक्रोऽमृतमिति श्रुतिः ।।७।।
सव्येन परिरभ्यैनां बाहुनां चारुणा स्निहा । व्रीडन्तीं सान्त्वयन् देवीं पतिर्भार्यामपाययम् ।।८।।
तस्यास्तु सौकुमार्येण ह्रिया च पतिसन्निधौ । अमृतस्य च सारत्वादुद्गार उदयद्यदा ।।९।।
यदृच्छया च गामागादमेध्ये निपपात च । ततोऽब्रवीच्छचीमिन्द्रो बहुपुत्रा भविष्यसि ।।१०।।
एतच्चाप्यमृतं भूमौ भविष्यति रसायनम् । स्थानदोषात्तु दुर्गन्धं भविष्यत्यद्विजोपगम् ।।११।।
लशुनं नामतस्तच्च भविष्यत्यमृतं भुवि । एवमेतत् समुत्पन्नं, शृणु तस्य क्रियाविधिम् ।।१२।।

ऐसा सुनने में आता है कि जब सौ वर्ष तक भी इन्द्राणी को गर्भ की प्राप्ति नहीं हुई तब इन्द्र ने उसे अमृत का पान कराया। पति (इन्द्र) ने शरमाती हुई पत्नी-देवी शची को अपनी सुन्दर बांई भुजा से स्नेह पूर्वक पकड़कर सान्त्वना देते हुए अमृत पिलाया। इन्द्राणी को सुकुमार होने के कारण तथा पति की उपस्थिति में शर्म (लज्जा) के कारण तथा

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६३

अमृत का सार होने के कारण जब डकार आई तब उस डकार के द्वारा वह अमृत सहसा भूमि पर अपवित्र स्थान में गिर पड़ा। तब इन्द्र ने इन्द्राणी से कहा तू बहुत पुत्रोंवाली होगी तथा यह अमृत भी भूमि पर रसायन के रूप में उत्पन्न होगा। परन्तु स्थान के दोष के कारण वह दुर्गन्धियुक्त होगा तथा उसे द्विज (ब्राह्मण) सेवन नहीं करेंगे। तथा वह अमृत भूमि पर लशुन नाम से प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार लशुन उत्पन्न हुआ।

वक्तव्य—इसी प्रकार हमारे अन्य प्राचीन शास्त्रों में भी लशुन की उत्पत्ति भिन्न २ प्रकार से लिखी है। गदनिग्रह में कहा है—राहोरच्युतचक्रेण लूनार्धे पतिता गलात्। अमृतस्य कणा भूमौ ते रसोनत्वमागताः॥ द्विजा नाश्नन्ति तमतो दैत्यदेहसमुद्भवम्। साक्षात्वमृतसंभूतं ग्रामीणकरसायनम्॥ अर्थात् अमृत पीते हुए राहु के गले को भगवान् विष्णु द्वारा काटे जाने पर जमीन पर गिरी हुई अमृत की बूंदों से लहसुन की उत्पत्ति हुई। नावनीतक में कहा है—पुराऽमृतं प्रमथितमसुरेन्द्रैः स्वयं पपौ। तस्य चिच्छेद भगवानुत्तमाङ्गं जनार्दनः॥ कण्ठनाडीसमासन्न विच्छित्रे तस्य मूर्धनि। बिन्दवः पतिता भूमावाद्यं तस्येह जन्म तु॥ न भक्षयन्त्येनमतश्च विप्राः, शरीरसम्पर्कविनिस्सृतत्वात्। गन्धोग्रताभावत एव चास्य वदन्ति शास्त्राधिगमप्रवीणाः॥ इसी प्रकार भावप्रकाश में भी कहा है ॥७-११॥

रसोऽस्य बीजे कटुको नाले लवणतिक्तकौ।
पत्राण्यस्य कषायाणि, विपाके मधुरं च तत्॥१२॥

अब तू उसकी क्रिया (कर्म) की विधि को सुन ॥१२॥
इसके बीजों में कटु रस, पुष्प नाल में लवण एवं तिक्त रस तथा पत्तों में कषाय रस होता है। और इसका विपाक मधुर होता है।

वक्तव्य—भावप्रकाश का मत इससे भिन्न है। उसके अनुसार कन्द (मूल) में कटुरस, पत्तों में तिक्तरस, पुष्पनाल में कषायरस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीजों में मधुर रस होता है। कहा भी है—कटुश्चापीह मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥१३॥

स्वादुस्तिक्तः कटुश्चात्र यथापरपरोत्कटाः । स्वादुत्वाद्गुरु सस्नेहं बृंहणं लशुनं परम् ॥१४॥

इसमें स्वादु, तिक्त एवं कटु रस क्रमशः बलवान् होते हैं। स्वादु होने से गुरु तथा स्नेह युक्त होने से लशुन अत्यन्त बृंहण होता है। नावनीतक के लेखक ने इसे गुरु नहीं अपितु लघु माना है, कहा भी है—रसे च पाके च कटुः प्रदिष्टः पाके तथा स्वादुरुदाहृतोऽन्यः। लघुश्च गन्धेन स दुर्जरश्च वीर्येण चोष्णः प्रथितश्च वृष्यः ॥१४॥

रससाधारणत्वाच्च साधारणरुजापहम्। आयुष्यं दीपनं वृष्यं धन्यमारोग्यमग्रिमम् ॥१५॥
स्मृतिमेधाबलवयोवर्णचक्षुःप्रसादनम्। मुखसौगन्ध्यजननं स्रोतसां च विशोधनम् ॥१६॥
शुक्रशोणितगर्भाणां जननं ह्रीनिषेधयोः । सौकुमार्यकरं केश्य वयसः स्थापनं परम् ॥१७॥

तथा अन्य साधारण रसों के कारण वह साधारण रोगों को नष्ट करता है। यह आयु को बढ़ाने वाला, दीपन, वृष्य, धन्य, एवं आरोग्य का देने वाला है। स्मृति, मेधा, बल, अवस्था एवं वर्ण को बढ़ाने वाला तथा चक्षुओं के लिये हितकर है। यह मुख की दुर्गन्धि को नष्ट कर के उसे सुगन्धित करता है, स्रोतों का शोधन करता है, शुक्र शोणित (रक्त) एवं गर्भ को बढ़ाता है। लज्जा एवं निषेध का उत्पादक है। यह सुकुमारता उत्पन्न करता है, बालों के लिये हितकर है तथा आयु को स्थिर करता है ॥१५-१७॥

अमृतोद्भूतममृतं लशुनानां रसायनम्। दन्तमांसनखश्मश्रुकेशवर्णवयोबलम् ॥१८॥
न जातु भ्रश्यते जातं नृणां लशुनखादिनाम् । न पतन्ति स्तनाः स्त्रीणां नित्यं लशुनसेवनात् ॥१९॥

२६४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

न रूपं भ्रश्यते चासां न प्रजा न बलायुषी।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६९ तमं पत्रम्।)
सौभाग्यं वर्धते चासां दृढं भवति यौवनम् ॥२०॥

अमृत से उत्पन्न हुआ यह लशुन रूप अमृत-रसायन है। लशुन का सेवन करने वाले व्यक्तियों के उत्पन्न हुए दांत, मांस, नख, श्मश्रु, केश, वर्ण, अवस्था, एवं बल कभी क्षीण नहीं होते। तथा लशुन का सेवन करने वाली स्त्रियों के स्तन कभी ढीले होकर नीचे नहीं लटकते। स्त्रियों के रूप, सन्तान, बल एवं आयु क्षीण नहीं होते। उनके सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा यौवन दृढ़ होता है ॥१८-२०॥

प्रमदाऽतिविधायापि लशुनैः प्राप्नुते मृजाम्। न चैनां संप्रबाधन्ते ग्राम्यधर्मोद्भवा गदाः ॥२१॥

स्त्रियां लशुन का अत्यन्त सेवन करके भी शुद्ध रहती हैं तथा उन्हें ग्राम्यधर्म (मैथुन) से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं ॥२१॥

कटीश्रोण्यङ्गमूलानां न जातु वशगा भवेत्। न जातु बन्ध्या भवति न जात्वप्रियदर्शना ॥२२॥

लशुन का सेवन करने से स्त्रियां कटि, श्रोणि तथा अन्य अङ्गों के रोगों के वशवर्ती नहीं होती हैं अर्थात् उन्हें कटि, श्रोणि एवं अन्य अङ्गों के रोग नहीं होते हैं। स्त्री कभी बन्ध्या (बांझ) तथा अप्रियदर्शना (जिसका दर्शन प्रिय न हो) नहीं होती है ॥२२॥

दृढमेधाविदीर्घायुर्दर्शनीयप्रजा भवेत्। अश्रान्तो ग्राम्यधर्मेषु शुक्रधाश्च भवेन्नरः ॥२३॥

लशुन के सेवन से पुरुष भी दृढ़, मेधावी, दीर्घायु, एवं दर्शनीय, (सुन्दर) सन्तानयुक्त होता है, मैथुन में थकता नहीं, तथा शुक्र को धारण करने वाला होता है अर्थात् इसके प्रयोग से शुक्र की भी वृद्धि होती है ॥२३॥

यावतीभिश्च समियात्तावत्यो गर्भमाप्नुयुः। नीलोत्पलसुगन्धिश्च पद्मवर्णश्च जायते ॥२४॥

जितनी भी स्त्रियों से वह मैथुन करता है सबको गर्भस्थिति हो जाती है। तथा गर्भ भी नील कमल की सुगन्धि वाला तथा पद्म के वर्ण का होता है ॥२४॥

गात्रमार्दवमाप्नोति कण्ठमाधुर्यमेव च। ग्रहणीदोषशमनं परं कायाग्निदीपनम् ॥२५॥

इस के सेवन से शरीर मृदु एवं कण्ठ मधुर हो जाता है, ग्रहणी के दोषों की शान्ति होती है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है ॥२५॥

च्युतभग्नास्थिरोगेषु सर्वेष्वनिलरोगिषु। पुष्परेतोभ्रमे कासे कुष्ठरोगेषु सर्वशः ॥२६॥
कृमिगुल्मकिलासेषु कण्ड्वां विस्फोटकेषु च। वैवर्ण्यतिमिरश्वासनक्तान्ध्याल्पभोजने ॥२७॥
जीर्णज्वरे विदाहे च तृतीयकचतुर्थके। स्रोतसामुपघातेषु गात्रजाड्योपशोषयोः ॥२८॥
अश्मरीमूत्रकृच्छ्रेषु कुण्डलेऽथ भगन्दरे। प्रदर प्लीहशेषेषु पाङ्गुल्ये वातशोणिते ॥२९॥
लशुनान्युपयुञ्जीत मेधामिबलवृद्धये। मुच्यते व्याधिभिः क्षिप्रं वपुश्चाधिकमाप्नुते ॥३०॥

किन रोगों में लशुन का प्रयोग करना चाहिये—अस्थिच्युत (Dislocation), अस्थिभग्न (Fracture) एवं अन्य अस्थिरोग, सम्पूर्ण वातरोग, पुष्प (आर्तव संबन्धी) रोग, वीर्य संबन्धी रोग, भ्रम, कास, कुष्ठरोग, कृमि, गुल्म, किलास, कण्डू, विस्फोटक, विवर्णता, तिमिर (नेत्ररोग), श्वास, नक्तान्ध्य (Night Blindness), अल्प भोजन (कम भोजन

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६५

करना), जीर्ण ज्वर, विदाह, तृतीयक एवं चातुर्थिक सन्तत ज्वर (Tertian and Ouarten malarial fever), स्रोतों का बन्द हो जाना, शरीर की जडता, उपशोष, अश्मरी, मूत्रकृच्छ, कुण्डल (बस्तिकुण्डल), भगन्दर, प्रदर, प्लीहारोग, शोष, पङ्गुता (चल न सकना), वातरक्त (Gout)—इत्यादि रोगों में मेधा, अग्नि एवं बल की वृद्धि के लिये लशुन का उपयोग करना चाहिये। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उस के शरीर की वृद्धि होती है ॥२६-३०॥

नान्यत्तच्छ्लैष्मिके व्याधौ पैत्तिके वा प्रयोजयेत् ।
ह्रसिष्ठः स्थविरोऽनग्निः सूतिका गर्भिणी शिशुः ॥३१॥
आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलायां तथाऽर्शसि । ऊरुस्तम्भविबन्धेषु गलवक्त्ररुजासु च ॥३२॥
सद्योवान्ते विरिक्ते च कृतनस्ये विशोषिते । तृष्णाच्छर्द्दिपरीतेषु हिक्काश्वासातिवृद्धिषु ॥३३॥
अधृतिष्वसहायेषु दरिद्रेषु दुरात्मसु । दत्तबस्तिनिरूहेषु लशुनं न प्रयोजयेत् ॥३४॥

किन रोगों में लशुन का प्रयोग नहीं करना चाहिये—श्लैष्मिक एवं पैत्तिक रोग, शरीर का ह्रास, स्थविर (वृद्धावस्था), अग्निमान्द्य, सूतिका, गर्भिणी, शिशु, आमरोग, ज्वर, अतिसार (अथवा ज्वरातिसार), कामला (Jaundice) अर्श, उरुस्तम्भ, विबन्ध, गले एवं मुख के रोग, सद्योवान्त (जिसने अभी वमन किया हो), विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया हो), जिसने नस्य (शिरोविरेचन) लिया है, शोष, तृष्णा, छर्दि, हिक्का एवं श्वास की अधिक वृद्धि, धैर्यरहित असहाय, दरिद्र एवं दुरात्मा रोगी तथा जिसे बस्ति एवं निरूह (आस्थापन) दिया गया है—इनमें लशुन का प्रयोग न करे ॥३१-३४॥

अक्षीणाग्निबलानां तु सर्वरोगेषु शस्यते । पौषे, माघेऽथवा मासे लशुनान्युपयोजयेत् ॥३५॥

जिनकी जाठराग्नि एवं बल क्षीण नहीं हुए हैं उनके सब रोगों में लशुन का प्रयोग किया जा सकता है। पौष एवं माघ के महीने में आयु को स्थिर करने वाले, हृदय को अच्छे लगने वाले तथा छिलके रहित लशुन का प्रयोग करना चाहिये। नावनीतक में चैत्र एवं वैशाख में लशुन के प्रयोग का विधान दिया है। कहा है—अब बहुविधमद्यमाससर्पिर्यवगोधूमभुजा सुखात्मकानाम्। अयमिह लशुनोत्सवः प्रयोज्यो हिमकाले च मधौ च माधवे च ॥३५॥

वयस्थानि सुहृद्यानि निस्तुषाण्यविशोधितम् ।
कायाग्निकालसात्म्येन मात्रा स्यान्नियमोऽपि च ॥३६॥

इसकी मात्रा तथा सेवन का नियम जाठराग्नि, काल एवं सात्म्य के अनुसार होता है ॥३६॥

चतुष्पली भवेन्मात्रा लशुनानां कनीयसी ।
षट्पली मध्यमा, श्रेष्ठा पलाष्टौ च दशाथ वा ॥३७॥

लशुन की लघु (निकृष्ट) मात्रा चार पल, मध्यम मात्रा छः पल तथा श्रेष्ठ (उत्तम) मात्रा आठ या दस पल होती है॥

शतं षष्टिः शतार्धं च मात्राः स्युर्गणितेष्वपि । शुष्केषु बद्धबीजेषु, पलवद्धरितेषु तु ॥३८॥
अथवा यावदुत्साहं भक्षयेदपि मूर्च्छितः ।

अथवा शुष्क एवं बद्धबीज (जिन के बीज अन्दर स्थिर हो गये हैं) लशुनों की गणित (संख्या) के अनुसार श्रेष्ठ, मध्यम तथा निकृष्ट मात्रा क्रमशः १००, ६० तथा ५० होती है। परन्तु हरे लशुनों की मात्राएँ पलों के अनुसार ही होती हैं। अथवा जबतक खाने का उत्साह (रुचि) हो तथा खाते २ रोगी मूर्च्छित न हो जाय तबतक खा सकता है ॥३८॥

२६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]

पुण्येऽहनि नरो (धीरो) लशुनाननुपचारयेत् ।।३९।। बह्वग्निके निरुद्वेगं निवातशरणः सुखी । मार्गकौशेयकार्पासकोवया(?)जिनकम्बलैः ।।४०।। वासोभिर्निर्मलैर्युक्तो भृशं चागुरुधूपितैः । धूपैश्चूर्णैश्च युक्तः स्यान्नित्यं (विधुत) पादुकः ।।४१।। लशुनान्यानयेदन्यस्त्वथान्य उपकल्पयेत् । पत्राणि वर्जयेदेषां बीजं नालं च कल्पयेत् ।।४२।। सूक्ष्मच्छिन्नानि कृत्वा च सर्पिषा प्लावयेद्भूशम् । हैयङ्गवीनं तु घृतं तैलं बालोचितं नवम् ।।४३।। प्लावनं यावदुत्साहं तिष्ठेयुश्चाप्लतान्यपि । द्वित्रिपञ्चदशाष्टाहं प्रशस्तस्नेहभावितम् ।।४४।। आत्मचिन्तामनुस्वापं दन्तकाष्ठं विवर्ज्य च । जीर्णाहारः सुखोत्थायी ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्य च ।।४५।। आसित्वा भक्षयेत्तानि सेव्यमुष्णोदकं सदा । उपदंशेऽपि दातव्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् ।।४६।। केसरं मातुलुङ्गानामथ वा जीवदाडिमम् । मूलकं वर्जयित्वा च दद्याद्धरितकान्यपि ।।४७।।

लशुन सेवन विधि-पुण्य दिन में बहुत अग्नि से युक्त हो कर धीर मनुष्य को लशुन का सेवन करना चाहिये । उस समय रोगी को उद्वेग रहित (शान्त मन वाला) होना, निवात स्थान में सुखपूर्वक रहना, मृगचर्म, रेशम, कपास (सूत), कोवय (?) तथा अजिन के कम्बलों अथवा निर्मलवस्त्रों से युक्त होना, अगुरु के द्वारा धूपित, धूप एवं चूर्णों से युक्त होना तथा नित्य पादुकाओं (खड़ाऊं) का धारण करना चाहिये । लशुन लाने का काम एक व्यक्ति करे तथा खाने के लिये तैयार करने का काम दूसरा ही व्यक्ति करे । इसके पत्तों को पृथक् छोड़ दे तथा उसके बीज एवं नाल के छोटे २ टुकड़े करके घी में अच्छी प्रकार भून ले । इसके लिये रुग्ण बालक के अनुसार मक्खन का घी अथवा नवीन तैल को उपयोग में लाना चाहिये । घी अथवा तेल में उन्हें तबतक भूनना चाहिये जबतक कि वे तैरना बन्द करके नीचे न बैठ जांय । तब शरीर का अच्छी प्रकार स्नेहन करके आवश्यकतानुसार दो, तीन, पांच, दस अथवा आठ दिन तक आत्मचिन्ता सेवन के बाद दिन में सोना तथा दन्त धावन आदि के त्यागपूर्वक पूर्व आहार के जीर्ण हो जाने पर सुखपूर्वक शयन के बाद उठकर, ब्राह्मणों का स्वस्तिवाचन करके तथा बैठकर इनका सेवन करना चाहिये । और सदा गरम जल का सेवन करना चाहिये । अचार आदि में भी आर्द्रक, सोंठ, बिजौरे के केसर (पराग), जीवनीय गण के पदार्थ तथा अनार दाने के साथ इसको देना चाहिये । तथा मूली को छोड़कर हरित वर्ग के सब पदार्थ उसे खाने को दिये जा सकते हैं ।।३९-४७।।

अङ्गानामपि भृष्टानां चूर्ण स्यादवचूर्णनम् । त्वक्पत्रशुण्ठीमरिचसूक्ष्मैलाजातिमिश्रितम् ।।४८।। लवणान्यपि सर्वाणि लाभतस्तत्र चूर्णयेत् ।

भूने हुए लशुन में भी दालचीनी, तेजपत्र, सोंठ, मरिच, छोटी इलायची, जायफल तथा लवण आदि में से जो २ मिलसकें उनका चूर्ण डालकर प्रयोग करे ।।४८।।

सुजातं मद्यमप्यस्य युक्तितःच समुदानयेत् ।।४९।।

तथा अच्छी प्रकार से तैयार हुए मद्य का भी युक्तिपूर्वक सेवन कराना चाहिये ।।४९।।

लशुनान्यन्तरा खादेत् पिबेन्मद्यं तथाऽन्तरा । सुखमग्निमुपासीनो भक्षयेत्तृप्तये शनैः ।।५०।।

सुखपूर्वक अग्नि के पास बैठकर लशुन तथा मद्य का बारी २ से एक दूसरे के बीच में सेवन करे । अर्थात् एक बार लशुन खाये तथा पुनः मद्य इत्यादि क्रम से सेवन करे । इस प्रकार धीरे २ तृप्तिपर्यन्त इनका सेवन करे ।।५०।।

लशुनकल्प ? ]कल्पस्थानम्२६७

उष्णोदकं वा मद्यं वा शृतं वाऽनुपिबेत् पयः । हेत्वग्निरोगसात्म्यज्ञो द्वितीयं च भक्षयेत् ।।५१।।

इस के बाद उष्णजल, मद्य अथवा पकाया हुआ दूध पिये। तथा रोगों के हेतु, जाठराग्नि, रोग तथा सात्म्य को जाननेवाले व्यक्ति को किसी दूसरी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिये ।।५१।।

ततः कलायचूर्णेन हस्तमुष्णोदकेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७० तमं पत्रम्) ।

प्रक्षाल्य मुखमोष्ठौ च गुरुप्रावरणोऽग्निमान् ।।५२।।
ताम्बूलपत्रं सस्वाकं(?) सजातीकटुकाफलम् । लवङ्गपुष्पकर्पूरकक्कोलफलान्वितम् ।।५३।।
निष्ठीवन् धारयेदास्ये न च निद्रां दिवा भजेत् ।
तेनास्य विलयं श्लेष्मा याति मूर्च्छा च शाम्यति ।।५४।।
सौगन्ध्यं जायते चास्य दौर्गन्ध्यं च विनश्यति । तृषितस्तु पिबेदुष्णं दीपनीयशृतं जलम् ।।५५।।
अत्यन्तपैत्तिको वाऽपि कदुष्णं पातुमर्हति । शृतं मुस्तकशुण्ठीभ्यां सशुण्ठीबालकेन वा ।।५६।।
शुण्ठ्या वा केवलं कोष्णं निशि पीत्वा सुखं स्वपेत् ।
एतेन विधिना खादेत् पक्षं मासमृतुं तथा ।।५७।।
त्रिमासं हैमनं वाऽपि चतुरो वा जितेन्द्रियः । द्रव्यमासाद्य रोगं च यथाकालं प्रयोजयेत् ।।५८।।
रूक्षाणि तु न भक्ष्याणि तानि पित्तभयाद्बुधैः । अन्नमप्यल्पशो देयं शृणु यादृशकं हितम् ।।५६।।

उसके बाद मटर के आटे तथा उष्ण जल के साथ हाथ, मुख तथा ओष्ठ का प्रक्षालन करे, भारी वस्त्र पहने, अग्नि का सेवन करे, सस्वाक (?), जायफल, कटुकी, लौंग, कर्पूर तथा शीतलचीनी आदि मसालों से युक्त पान को मुख में धारण करे तथा पहला पीक बाहर थूक दे। दिन में नींद न ले। इससे उसकी श्लेष्मा विलीन हो जाती है तथा मूर्च्छा शान्त हो जाती है। मुख में दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्ध हो जाती है। प्यास लगने पर दीपनीय औषधियों से पकाया हुआ उष्ण जल पीये। यदि अत्यधिक पित्त का प्रकोप हो तो भी ईषदुष्ण जल पिया जा सकता है। अथवा नागरमोथा और सोंठ से या सोंठ और नेत्रवाला से अथवा केवल सोंठ के द्वारा पकाया हुआ ईषदुष्ण जल रात्रि को पीकर सुख से सोये। इस विधि से एक पक्ष, मास अथवा सम्पूर्ण ऋतु में इसका सेवन करना चाहिये। अथवा हेमन्त ऋतु के तीन या चार मास तक जितेन्द्रिय होकर रोग तथा काल के अनुसार इस द्रव्य का प्रयोग करे। बुद्धिमान् व्यक्ति पित्त के प्रकुपित होने के भय के कारण रूक्ष पदार्थों का सेवन न करें तथा हितकर अन्न भी थोड़ा २ कर के जिस प्रकार देना चाहिये-वह अब तू मेरे से सुन ।।५२-५९।।

कपालभृष्टपक्वाः स्युर्यवगोधूममण्डकाः । रूक्षाः सुगन्धयो हृद्याः पूपटा लवणैर्युताः ।।६०।।
शालीनां पोलिकाश्चोष्णा मुद्गकुल्माषसंस्कृतिः । सक्तुपिण्ड्यः सुलवणाः कुस्नेहाः पञ्चपट्टिताः ।।६१।।
लावैणतित्तिरिशशकपिञ्जलचकोरकाः । मांसार्थं जाङ्गलाश्चान्ये विधेया मृगपक्षिणः ।।६२।।
अभ्युषणाः संस्कृतानम्ललवणस्नेहवेषणैः । मांसं शस्तं फलाम्लं वा कोलामलकदाडिमैः ।।६३।।
वास्तुकं दाडिमे सिद्धंश्चाङ्गेर्यामलकेन वा । बुर्बु(?)वृक्षस्य वा पुष्पमथवा बालमूलकम् ।।६४।।

सुगन्धित, हृदय को अच्छी लगने वाली, नमकीन व्यञ्जनों के साथ, मिट्टी के घड़े के कपाल में सेककर पकाई हुई जौ तथा गेहूं की रूक्ष (बिना चुपड़ी हुई) रोटियां, शालिचावलों की बनाई हुई उष्ण पोलिका (रोटी), मूंग तथा कुल्माष

२६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

के बने हुए पदार्थ, अच्छी तरह नमक पड़े हुए परन्तु कम स्नेह (तैल या घृत) वाली तथा पांच पट्टियों वाली अर्थात् पांच रेखाओं से चिह्नित सत्तुओं की पिन्नियां देनी चाहिये तथा लाव (बटेर), एण (मृगविशेष), तीतर, खरगोश, कपिञ्जल (सफेद तीतर), चकोर तथा अन्य भी जांगल पशु-पक्षियों का मांस देना चाहिये। तथा वह मांस उष्ण एवं अम्लरहित, लवण, स्नेह एवं वेषण (मसालों) से तथा कोल, आंवला और अनारदाने से संस्कृत होना चाहिये। तथा दाडिम, चांगरी और आंवले से सिद्ध बथुए का शाक, बुर्बु (?) या बांसे के फूल अथवा कच्ची मूली का प्रयोग करना चाहिये ॥६०-६४॥

यः स्नेहं बहु भुञ्जीत रूक्षान्नं तस्य शस्यते। अल्पस्नेहाशिनो भोज्यं सुस्निग्धं तु निधापयेत् ।।६५।।

जो स्नेह का बहुत प्रयोग करता हो उसे रूक्ष अन्न देना चाहिये तथा जो अल्प स्नेह का व्यवहार करते हों उन्हें अच्छी तरह स्निग्ध किया हुआ भोजन देना चाहिये ॥६५॥

कुष्ठी श्वासी तमी कासी प्रमेही वातकुण्डली। ध्यायी प्लीहार्शसो गुल्मी भक्षयेयुविनाऽम्भसा ।।६६।।

कुष्ठ, श्वास, तमक श्वास (Asthma), कास, प्रमेह वातकुण्डल, प्लीहा, अर्श तथा गुल्मरोग से पीडित व्यक्तियों को लशुन खाने के साथ पानी नहीं पीना चाहिये। लशुन खाने के बाद कुछ दिनों तक इन्हें यूष का सेवन करना चाहिये ॥६६॥

भक्षितान्ते ततो यूषं विदध्यात् पानभोजने। लशुनानां पलं पिष्टं द्विपलं दाडिमस्य च ।।६७।। द्विपलं द्विपलं दद्यान्मांसस्य घृततैल्योः। सुवेषणं सुलवणं सोष्णं क्षुधितमाशयेत् ।।६८।।

भूख लगने पर लशुन एक पल तथा अनारदाना, मांस, घृत तथा तैल—प्रत्येक दो २ पल—इन्हें पीसकर इसमें अच्छी तरह कसौंदी तथा नमक डालकर गरम २ सेवन कराये ॥

शालिषष्टिकगौराणां भक्तं तेनाल्पशो भजेत्। त्र्यहं सदधितक्रं तु यूषमस्योपपादयेत् ।।६९।। ततस्त्र्यहे सशूक्तं तु मुद्द्रमण्डाद्यतः परम्। न पर्युषितमश्रीयाद्यूथं नित्यं तु साधयेत् ।।७०।।

शालि तथा सांठी के सफेद चावलों का भात थोड़ा २ तीन दिन तक दही तथा तक्र (मठे) के साथ खाये तथा उसके बाद यूष का सेवन करे। इसके बाद तीन दिन तक शुक्त और तदनन्तर मुद्ग मण्ड आदि का सेवन करें। पर्युषित (बासी) पदार्थों का सेवन न करे तथा यूष भी नित्य नवीन तैयार करे ॥६९-७०॥

विरुद्धानि विदाहीनि वर्जयेच्छाकगोरसान्। अभिष्यन्दीनि चान्नानि मांसं भक्ष्यैक्षवाणि च ।।७१।। अध्वानं मैथुनं चिन्तां शोकव्यायामशोषणम्। अहितं वर्जयेत् सर्वं निवातशयनासनः ।।७२।।

लशुन सेवन के बाद अपथ्य—विरुद्ध तथा विदाह उत्पन्न करनेवाले शाक तथा गोरस (दूध अथवा दूध से बने पक्वान्न आदि), अभिष्यन्दी अन्न, मांस तथा इक्षुविकार (गन्ने से बने पदार्थ) खाने को न दे। अध्व (मार्गगमन) मैथुन, चिन्ता, शोक, व्यायाम, शरीर का शोषण करने वाले तथा अन्य भी सम्पूर्ण अहितकर भावों का त्याग करे। और निवात स्थान में शयन करे तथा बैठे ॥७१-७२॥

त्यजञ्छीतोपचारांश्च लशुनान्युपयोजयेत्। शीतोपचारात् स्नेहाच्च जलोदरमवाप्नुयात् ।।७३।।

लशुन के सेवन काल में होनेवाले उपद्रव—लशुन का सेवन करते हुए शीतल उपचारों का त्याग करना चाहिये। शीत उपचार तथा स्नेह के सेवन से रोगी को जलोदर हो जाता है ॥७३॥

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६९

स्नेहादण्डोपचाराच्च पाण्डुशोफरुजाभयम्। स्नेहाद् गुर्वन्नपानाच्च ग्रहणीदोषकामले ।।७४।।

स्नेह तथा अण्डे के सेवन से रोगी को पाण्डु तथा शोफ रोग हो जाते हैं। तथा स्नेह एवं गुरु अन्नपान के सेवन से रोगी को ग्रहणी विकार तथा कामला हो जाता है ॥७४॥

कुमद्यमत्स्यगव्यैस्तु ज्वरकुष्ठक्षयाहतिः । रूक्षेभ्यश्चोष्णकाले च सर्वपित्तरुजाभयम् ।।७५।।
शूलातिसारसाध्मानहृल्लासच्छर्द्यरोचकाः । हिक्का विसूचिका श्वासनिद्रेऽन्येऽत्राप्युपद्रवाः ।।७६।।

दूषित मद्य, मछली एवं गौ के दूध आदि के सेवन से ज्वर, कुष्ठ तथा क्षय रोग हो जाते हैं। रूक्ष व्यक्तियों तथा उष्ण काल में लशुन के सेवन से सम्पूर्ण पैत्तिक रोग हो जाते हैं। तथा अन्य भी शूल, अतिसार, आध्मान, हृल्लास, छर्दि, अरोचक, हिक्का, विसूचिका, श्वास निद्रा आदि उपद्रव हो जाते हैं ॥७५-७६॥

उपद्रवप्रतीकारः कार्यः स्वैः स्वैश्चिकित्सितैः । छर्द्यजीर्णविदाहेषु गौरवे कफसंभवे ।।७७।।
लङ्घयित्वा यथायोगं पथ्याशी पुनराचरेत् । विरेकं वमनं नस्यं कुर्याच्च कवलग्रहान् ।।७८।।
देहव्याधिबलापेक्षी तीक्ष्णांस्त्वस्य विवर्जयेत् । श्रद्दधानो भवेद्धीमान्न त्वरेतोद्विजेत वा ।।७९।।

अपनी २ चिकित्सा के अनुसार इन उपद्रवों का प्रतीकार करना चाहिये। छर्दि, अजीर्ण, विदाह तथा कफ के कारण शरीर के भारी होने पर आवश्यकतानुसार लङ्घन (उपवास) करके पथ्य के सेवनपूर्वक देह और व्याधि के बल के अनुसार विरेचन, वमन, नस्य और कवलग्रह का प्रयोग करे तथा तीक्ष्ण वस्तुओं का परित्याग करे। शरीर के स्वस्थ हो जाने का विश्वास रखे तथा शीघ्रता और उद्वेग से दूर रहे ॥७७-७९॥

अथ पथ्याशने वृत्ते सप्ताहात् सर्वभोजनम् । निरुपद्रवमाश्वस्तं बलिनं लशुनादिनम् ।।८०।।
पाययेत्त्रिफलायुक्तं सर्पिः सलवणं त्र्यहम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७१ तमं पत्रम्।)
न विहन्याद्यथाऽऽहारः पक्वमन्नं च भोजयेत् ।।८१।।

इसके बाद पथ्य सेवनपूर्वक सप्ताह भर में सम्पूर्ण भोजन का सेवन करने वाले, उपद्रवशून्य बलवान् तथा लशुन का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को आश्वासन देकर त्रिफला युक्त घृत में लवण डालकर तीन दिन तक पिलाये। इसकी मात्रा इतनी होनी चाहिये कि भूख न मारी जाये तथा भोजन में कमी न आये। उसके बाद पकाया हुआ अन्न खिलायें ॥

काये दोषोऽस्य यो लीनः स तेनाशु प्रशाम्यति । न च स्नेहकृतो दोषः पश्चात् संप्रबाधते ।।८२।।

रोगी के शरीर में जो लीन (छिपे) हुए दोष शेष होते हैं वे इस से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं तथा स्नेह से उत्पन्न होने वाले दोष इसे पीछे से कष्ट नहीं पहुंचाते ॥८२॥

पामा विस्फोटकाः कण्डूर्बाधैर्यं जाड्यसुप्तते । एते ह्येतं प्रबाधन्ते यद्यसौ न विरिच्यते ।।८३।।

यदि रोगी को विरेचन न दिया जाये तो उसे पामा, विस्फोटक, कण्डू, बाधिर्य (बधिरता-Deafness), जडता एवं सुप्ति (अङ्गों का सो जाना) रोग हो जाते हैं ॥८३॥

तस्मान्मृदुविरेकः स्यात्त्रिवृत्त्रिफलया घृतम् । विदध्यात् सोष्णलवणमनु चोष्णोदकं पिबेत् ।।८४।।

इसलिये त्रिवृत् तथा त्रिफलायुक्त घृत में लवण मिलाकर गरम करके उसके द्वारा मृदुविरेचन देना चाहिये। तथा उसके बाद अनुपानरूप में उष्ण जल पीना चाहिये ॥८४॥

२७०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

गुरुदेवाग्निपूजाश्च भक्षयन् वर्जयेद्बुधः । स्नात्वा सुगन्धिर्हृष्टात्मा पूजयेद् गुरुदेवताः ।।८५।।

लशुन का सेवन करते हुए बुद्धिमान् व्यक्ति गुरु, देव तथा अग्नि की पूजा न करे। स्नान करने के बाद सुगन्धयुक्त तथा प्रसन्न आत्मा वाला होकर गुरु तथा देवता आदि की पूजा करे।

वक्तव्य-शोढल तथा नावनीतक में भी पूरा लशुन का कल्प दिया हुआ है। नावनीतक में लिखा है—अथ शुद्धतनुः शुचिर्विविक्तः सुरविप्रानग्नितिपूज्य पावकं च। लशुनात्स्वरसं पटान्तपूतं प्रपिबेदह्नि शुभग्रर्हक्षयुक्ते ।। कुडवं कुडवादथापि चार्धं कुडवं सार्धमतोऽपि वातिमात्रम् । नियता न हि काचिदत्र मात्रा प्रपिबेद्दोषबलामयानि दृष्ट्वा ।। सतालवृन्तव्यजनानिलैः शुभैः पिबन्तमेनं समभिस्पृशेच्छनैः । भवेत्तु मूर्च्छा पिबतोऽपि वा यदि स्पृशोत्ततः शीतजलैः सचन्दनैः ।। सुरात्तृतीयांशविमूर्च्छितस्य गण्डूषमेकं प्रपिबेद्रसस्य । पूर्वं गलवब्रीडिविधानहेतोः स्थित्वा मुहूर्त्तञ्च पिबेत्सरशेषम् ।। शोढल ने इसका एक मास तक सेवन करने को लिखा है। आवश्यकतानुसार कम अथवा अधिक अवधि भी की जा सकती है। कहा है—मासः परोऽस्य रसकल्कनिषेवणाय स्वच्छन्दमप्युपदिशन्ति चिकित्सकास्तु ।। षण्मासमन्नविधिना तमु शास्त्रमाहुः पक्ष प्रयोगमपि हीनतरं रसोने ।।८५।।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि लशुने शेषकर्म यत् । बीजाढकं जलद्रोणे जर्जरीकृतमावपेत् ।।८६।। जलानित्येऽग्नि .....(?)वा गोपयेत् षष्टिकेसु वा । अव्याधिरमरप्रख्यो जीवेद्वर्षशतं नरः ।।८७।। यावद्वर्षस्थितं खादेत्तावद्वर्षशतान्यपि । जहाति च त्वचं जीर्णां त्वचमिवोरगः ।।८८।।

इसके बाद मैं लशुन कें शेष कर्मों को कहूंगा—एक द्रोण जल में एक आढक लशुन के बीजों को कूटकर डाल दे तथा उसे अग्नि पर पकाले। तब उसे सांठी के चावलों (धान्यराशि) में रखदें। इसके सेवन से मनुष्य व्याधिरहित एवं अमर होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। जितने वर्ष तक मनुष्य इसका सेवन करता है उतने सौ वर्षों तक वह रोग रहित होकर अमर के समान जीवित रहता है। जिस प्रकार सांप अपनी पुरानी त्वचा (केंचुली) को छोड़कर नवीन त्वचा प्राप्त करलेता है उसी प्रकार वह जितने वर्ष पुराने इस घृत का प्रयोग करता है उतने ही सौ वर्षों तक वह अपनी पुरानी त्वचा उतारता जाता है तथा नवीन प्राप्त करता जाता है ।।८६-८८।।

लशुनानां पलं नित्यं पले द्वे वा घृतस्य तु । मधुनः किञ्चिदव स्यात्तल्लीढ्वाऽनु पिबेत् पयः ।।८९।। संवत्सरमजीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् । सोऽपि सर्वरुजाहीनः शतवर्षाणि जीवति ।।९०।।

लशुन—१. पल। घृत—२. पल। इसमें थोड़ा मधु मिलाकर अवलेह बनाकर नित्य सेवन करे तथा उसके बाद दूध पिये। एक वर्ष तक इसका भोजन के जीर्ण हो जाने पर सेवन करे और दूध तथा चावल का भोजन करे। इससे वह व्यक्ति सम्पूर्ण रोगों से रहित होकर १०० वर्षों तक जीवित रहता है ।।८९-९०।।

आमानि यो न शक्नोति तस्य भृष्टानि सर्पिषि । प^१त्रपूपलिकावच्च संस्कृतान्युपयोजयेत् ।।९१।।

जो व्यक्ति कच्चे लशुन का प्रयोग न कर सके उसको घी में भूनकर तथा शाक के पत्तों की बनी पकौड़ियों की तरह संस्कृत करके प्रयोग कराये ।।९१।।

सिद्धानि सह मांसैर्वा यवाग्वा दाधिकेन वा । निम^२न्दकाश्च शस्यन्ते नानाद्रव्योपसंस्कृताः ।।९२।।


१. शाकपत्रकृतपोलिका (पकौड़ी) वदित्यर्थः । २. मन्दजातं (अव्यक्तरसेषद्नीभूतक्षीररूपं) दधि मन्दकं, तद्रूपा इत्यर्थः ।

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २७१

अथवा मांस, यवागू और दधि के साथ सिद्ध करके तथा नाना द्रव्यों से संस्कृत करके बनाये हुए निमन्दक (पूर्णरूप से न जमा हुआ दही) का प्रयोग कराना चाहिये ॥९२॥

लशुनानां पलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । क्वाथयेद्द्रोणशेषं तं पचेद्भूयो घृताढके ॥९३॥ आढकं पयसो दद्याद्गर्भं चेमं समावपेत् । लशुनानां पलशतं बीजानां श्लक्ष्णसंस्कृतम् ॥९४॥ दीपनं जीवनं वृष्यं यत्किञ्चित् सर्वमावपेत् । अक्षवद्दशमूलं च तत् सिद्धमवतारयेत् ॥९५॥ एतत् पाने च भोज्ये च हितं समधुशर्करम् ।

१०० पल लशुन ५ द्रोण जल में डालकर पकाये। एक द्रोण शेष रहने पर उसमें एक आढक घृत डालकर पुनः पाक करे। इसमें एक आढक दूध तथा १०० पल चिकने एवं संस्कृत लशुन के बीज तथा अन्य जो भी दीपनीय, जीवनीय एवं वृष्य ओषधियां मिल सकें, तथा एक अक्ष (कर्ष) दशमूल डालकर पकाये। सिद्ध होने पर इसे उतारलें। इसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पान तथा भोजन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥९३-९५॥

तेनैव विधिना तैलं बस्तिकर्मणि शस्यते ॥९६॥

उपर्युक्त विधि से ही इनका तैल बनाकर उसकी बस्ति देनी चाहिये ॥९६॥

क्लीबबन्ध्यातिवृद्धानामपि वीर्यप्रजाप्रदम् । विरेकवमनद्रव्यैः संस्कृते कुष्ठम्रक्षणम् ॥९७॥

यह नपुंसक, बन्ध्या तथा अत्यन्त वृद्ध व्यक्तियों को भी वीर्य एवं सन्तान का देने वाला है। तथा विरेचन एवं वमन द्रव्यों से संस्कृत करने पर यह कुष्ठ पर रगड़ने के लिये हितकर है ॥९७॥

श्वित्रनाडीक्रिमीणां च पानभोजनम्रक्षणे । प्रयुक्तमारोग्यकर गन्धसर्पिरनुत्तमम् ॥९८॥

श्वित्र, नाडीव्रण एवं कृमिरोगों में पान, भोजन एवं म्रक्षण (रगड़ना-स्थानिक प्रयोग) के लिये गन्धसर्पि का प्रयोग श्रेष्ठ माना जाता है ॥९८॥

अथ गन्धमहन्नाम धनिनामुपदिश्यते । यं दृष्ट्वा भज्यते शीघ्रं साक्षादपि सदागतिः ॥९९॥ रोगानीकेन सहितः सहितश्च मरुद्गणैः ।

अब धनियों के लिये गन्धमहत् (महान् गन्ध उपचार) का वर्णन किया जाता है जिसे देखकर रोगसमूह—तथा मरुत गण के साथ साक्षात् वायु भी शीघ्र ही भाग जाता है ॥९९॥

लशुनं न्यायतः खादेन्मुकुटं रचयेदपि ॥१००॥ कुर्याल्लशुनमालां च शिरसः कर्णयोरपि । बहिः प्रावरणस्यापि कुर्याल्लशुनकम्बलम् ॥१०१॥ हस्तयोः पादयोः कण्ठे बध्नीयाद्गुच्छितान्यपि । अधस्ताद्वाससश्चापि विदद्ध्याच्छयनाशने ॥१०२॥ दद्याल्लशुनचीराणि गृहद्वारेषु सर्वशः । भार्याणां भ्रातृपुत्राणां दासीनामुपचारिणाम् ॥१०३॥ सर्वेषामात्मवत् कुर्यात् कृते गन्धवरे बुधः । अन्नपानानि सर्वाणि कुर्याल्लशुनवन्ति च ॥१०४॥ वादयन्तु च वादित्रं गान्तु गीतानि चेच्छया । नटा भल्लाश्च मल्लाश्च दर्शयन्त्वात्मशिक्षितम् ॥१०५॥ गन्धमाल्यान्नपानानि यथार्हमुपकल्पयेत् । दृष्ट्वा गन्धमहं वातो द्वारादेव निवर्तते ॥१०६॥

लशुन का विधिपूर्वक सेवन करे, लशुन का मुकुट बनाकर धारण करे, सिर तथा कानों में लशुन की माला पहने, ऊपर ओढने के उत्तरीय वस्त्र एवं कम्बल में भी लशुन सिये हुए हों, हाथों पैरों कण्ठ में लशुन के गुच्छे बांधे। शयन

४० का.सं.

२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]

तथा आसन के अधोवस्त्र भी लशुन युक्त बनाये। घर के द्वारों पर लशुन युक्त वस्त्र टांगे। तथा इस गन्धवर (महागन्ध) कल्प में पत्नी, भ्राता, पुत्र, दासी, तथा अन्य उपचारक आदि सबको भी अपने ही समान (लशुनवान्) कर दे अर्थात् उनके भी सम्पूर्ण अन्न-पान आदि लशुन युक्त कर दे। मन बहलाव के लिये वहां बाजे बजने चाहिये, गीतों का गान होना चाहिये, तथा वहां नट, भील एवं मल्ल अपनी २ विद्या का प्रदर्शन कर रहे हों। गन्धद्रव्य, माला एवं अन्नपान भी यथाशक्ति लशुन युक्त कर देने चाहिये। इस प्रकार गन्धमह को देखकर वायु द्वार पर से ही वापिस लौट जाता है अर्थात् उसे वातरोग बिलकुल नहीं हो सकते हैं ।।१००-१०६।।

देवदारुवने भैक्षं चरता छन्नरूपिणा। अवज्ञातेन रुद्रेण मुनिभार्या निरीक्षिताः ।।१०७।।
ततस्तासां प्रजा नासीत्ततस्ताः शरणं ययुः। भद्रकालीमुमां देवः स च तुष्टोऽब्रवीद्वचः ।।१०८।।
अयं गन्धमहो नाम तं कुरुध्वमृषिस्त्रियः। सर्वरोगविनाशाय बलरूपप्रजाकरम् ।।१०९।।
उन्मादविषशापघ्नं वातानीकविशातनम्। अश्मनीव ध्रुवा लेखा प्रजाऽवश्यं भविष्यति ।।११०।।
ततस्ता ब्रह्मवादिन्यश्चक्रुर्गन्धमहं तदा। लेभिरे चेप्सितान् कामाञ्छास्त्रं चेदं प्रचक्रिरे ।।१११।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७२ तमं पत्रम्।)

देवदारु के वन में प्रच्छन्न रूप वाले तथा अज्ञात अवस्था में भिक्षा के लिये विचरण करते हुए (महादेव) ने मुनियों की स्त्रियों को देखा। उन स्त्रियों के सन्तान न होने से वे देव (महादेव) की शरण में पहुँचीं। महादेव ने प्रसन्न होकर भद्रकाली उमा से कहा कि तुम इन ऋषियों की पत्नियों को सम्पूर्ण रोगों के नाश के लिये बल, रूप एवं सन्तान को देने वाले महान् गन्ध का प्रयोग कराओ। यह उन्माद, विष, शाप तथा वातरोगों को नष्ट करता है। तथा पत्थर की लकीर के समान निश्चित रूप से इसके प्रयोग से इन्हें अवश्य सन्तान उत्पन्न होगी। तब भगवान् का नाम लेनेवाली उन ऋषिपत्नियों ने महान् गन्ध का प्रयोग करके अभीप्सित मनोरथों को प्राप्त किया तथा इस शास्त्र का प्रारंभ किया ।।१०७-१११।।

आख्यातं गुरुपुत्राय रहस्यं ह्येतदुत्तमम्। भिषजा न प्रमादेन वक्तव्यं यत्रकुत्रचित् ।।११२।।

आचार्य द्वारा गुरुपुत्र के लिये यह उत्तम रहस्य प्रकट किया गया है इसलिये वैद्य को प्रमादवश इसको सब जगह नहीं कहना चाहिये अर्थात् प्रकाशित नहीं करना चाहिये ।।११२।।

सम्यक् सुभूषितश्चाहं त्वयेदं प्राप्नुवन्मुने ! । यं पठित्वा भिषग्लोके न क्रियास्ववसीदति ।।११३।।

हे भगवन् ! अच्छे प्रकार भूषित हुए मैंने आपके द्वारा यह प्रयोग प्राप्त किया है जिसे जानकर वैद्य चिकित्सा में अवसन्न (मूढ) नहीं होता ।।११३।।

गिरिजं क्षेत्रजं चैव द्विविधं लशुनं स्मृतम्। अमृतेन समं पूर्वं तदलाभे परं हितम् ।।११४।।

लशुन दो प्रकार का होता है—१. गिरिज (पहाड़ी) २. क्षेत्रज (देशी)। इनमें प्रथम अमृत के समान लाभदायक है तथा उसके अभाव में दूसरे (क्षेत्रज) का प्रयोग करना चाहिये ।।११४।।

देववैद्यद्विजपरैरुपयोज्यं च सिद्धये। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।११५।।

(इति कल्पेषु लशुनकल्पः ।।)

कटुतैलकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७३

देवता, वैद्य एवं ब्राह्मणों द्वारा सिद्धि (कार्यसाधन) के निमित्त इसका प्रयोग करना चाहिये। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था॥१९५॥

(इति) कल्पेषु लशुनकल्पः ॥


कटुतैलकल्पाध्यायः ।

अथातः कटुतैलकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम कटुतैल के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। कटुतैल से अभिप्राय कड़वे तेल अर्थात् सरसों के तेल से है ॥१-२॥

कटुतैलोपदेशं तु वक्ष्यामि प्लीहनाशनम्। न ह्यतः परं किञ्चिदौषधं प्लीहशान्तये ॥३॥

प्लीहा (Spleen) को नष्ट करने वाले कटु तैल का मैं उपदेश करूंगा। प्लीहा (Enlargement of Spleen) की शान्ति के लिये इससे बढ़कर कोई ओषधि नहीं है ॥३॥

'प्लीहोदरिणमादौ तु बलिनं निरुपद्रवम्। कल्याणकेन वा स्निग्धं सर्पिषा षट्पलेन वा ॥४॥
मात्रया पाययेत्तैलं पथ्यचेष्टाशनस्थितिम्। पञ्चप्रयोगास्तस्योक्ता मात्रासात्म्यभोजनैः ॥५॥

सर्वप्रथम बलवान् एवं उपद्रव रहित प्लीहोदरी का कल्याण घृत अथवा षट्पल घृत के द्वारा स्नेहन करके मात्रा के अनुसार तैल का पान कराये। तथा उसके बाद चेष्टा, आहार एवं निवास में पथ्य का सेवन करे। मात्रा सात्म्य एवं भोजन के अनुसार इसके पांच प्रयोग कहे हैं ॥४-५॥

पलानि द्वादश ज्येष्ठा, मध्यमा षट्पला स्मृता।
मात्रा चतुष्पली ह्रस्वा, यावद्धाऽग्निबलं भवेत् ॥६॥

इसकी ज्येष्ठ मात्रा (Maximum dose) १२ पल, मध्यम मात्रा ६ पल, तथा ह्रस्व मात्रा ४ पल होती है। अथवा अग्नि एवं बल के अनुसार मात्रा का निश्चय करना चाहिये ॥६॥

स्नेहपीतोपचारं च विदध्यादखिलं भिषक्। प्रजागरनिवाताग्निस्यातन्त्र्याम्बरसेविनाम् ॥७॥

इसके बाद वैद्य रोगी को स्नेहपान के बाद का सम्पूर्ण उपचार अर्थात् जागरण, निवातस्थान, अग्नि तथा स्वतन्त्रतापूर्वक आकाश का सेवन इत्यादि कराये ॥७॥

पीतमात्रे क्रमं विद्याद् व्यथा तन्द्री च जीर्यति। उद्गारशुद्धिर्वैशद्यलाघवानि जरां गते ॥८॥

स्नेह का पान करने पर व्यथा होती है। स्नेह के जीर्ण होते हुए तन्द्रा तथा उसके जीर्ण हो जाने पर शुद्ध डकार विशदता एवं लघुता हो जाती है ॥८॥

कृशं चातिविरिक्तं च मण्डादिभिरुपक्रमेत्। बली मन्दविरिक्तश्च भुञ्जीत मृदुमोदनम् ॥९॥

कृश तथा अत्यन्त विरिक्त (जिसे बहुत विरेचन हुए हों) व्यक्ति का मण्ड आदि के द्वारा उपचार करे तथा बलवान् एवं मन्द विरिक्त (जिसे कम विरेचन हुआ हो) व्यक्ति को मृदु ओदन का सेवन कराये ॥९॥

२७४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्कटुतैलकल्पः ? ]

ईषत्स्नेहाम्लयूषेण संस्कृतेन यथाबलम्। रोहितमोचयोर्वश्यं कुर्यात् काम्ब¹लिकं सदा ।।१०।।

बल के अनुसार ईषत् स्नेह एवं अम्लयुक्त यूष द्वारा संस्कृत तैल से रोहीतक (रोहेड़ा) एवं मोचरस को वश में करे तथा काम्बलिक (दधिमस्तु एवं अम्ल से सिद्ध यूष) का सेवन कराये।

वक्तव्य—काम्बलिक का लक्षण सुश्रुत सू. अ. ४६ में निम्न कहा है—दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः। तथा अन्यत्र कहा है—तक्रं कपित्थचाङ्गेरी-मरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वं खडयूषोऽयमयं काम्बलिकोऽपरः ।।१०।।

फलाम्लदीपनोपेतं कटुतैलोपसंस्कृतम्। तेनैनं भोजयेन्नित्यं यावत्प्राणो यथा भवेत् ।।११।।

इसे प्राणों के यथास्थिर होने तक नित्य फलाम्ल एवं दीपनीय द्रव्यों से युक्त तथा कटुतैल से संस्कृत भोजन कराये॥

लब्धप्राणं ततश्चैनं मात्रया पाययेत् सदा। कटुतैलं यथाशक्ति संस्कृतं नवमेव वा ।।१२।।

इसके बाद प्राणों के सम्यक् स्थित हो जाने पर इसे उचित मात्रा में यथाशक्ति संस्कृत अथवा नवीन कटुतैल का पान कराये॥१२॥

द्राक्षाकाश्मर्यमधूकबालकोशीरचन्दनैः। कटुतैलं पचेत् क्षीरे प्लीह्नि दाहोत्तरे नृणाम् ।।१३।।

द्राक्षा, गम्भारी, मुलहठी, नेत्रबाला, खस तथा चन्दन के साथ कटुतैल का क्षीर पाक करे तथा इसका प्लीहा और दाह से पीडित रोगियों को सेवन कराये॥१३॥

जीर्णेऽपराह्ने चोद्वर्त्य लघुरूष्णोदकाप्लुतः। अभयां कटुतैलेन भृष्टां दधनि साधिताम् ।।१४।। शाल्योदनेन भञ्जीत तथा काम्बलिकेन च। तच्चेद्विदाहं जनयेत् कल्याणकं ततः ।।१५।।

स्नेह के जीर्ण हो जाने पर अपराह्न काल में उद्वर्तन कर के लघु तथा उष्ण जल पीकर कटु तैल में भूनी हुई तथा दही के साथ सिद्ध की हुई हरड़ को शाली चावलों तथा काम्बलिक के साथ खिलाये। यदि इससे विदाह उत्पन्न हो तो कल्याण घृत पिलाना चाहिये॥१४-१५॥

मत्स्याः कटुकतैलं च दधि माषान् घृतं पयः। क्षारेण पारिजातस्य तत् पक्वमवचारयेत् ।।१६।। एतत्तैलघृतं प्रोक्तं प्लीहगुल्मनिवारणम्। दीपनं स्नेहनं बल्यं ग्रहणीणश्वरोगनुत् ।।१७।।

मछली, कटुतैल, दही, उड़द, घृत तथा दूध को पारिजात (रोहीतक-रोहेड़ा) के क्षार के साथ पकाकर प्रयोग करे। यह तैल तथा घृत प्लीहा और गुल्म का नाशक, दीपन, स्नेहन, बल्य तथा ग्रहणी और पार्श्व के रोगों को नष्ट करते हैं॥१६-१७॥

कर्णिकारत्वचतुलां चतुर्द्रोणे पचेदपाम्। पादशेषे समक्षीरे कषाये तत्र पाचयेत् ।।१८।। प्रस्थं कटुकतैलस्य द्वौ प्रस्थौ दधिमाषयोः। दशमूलोपसंसिद्धरोहीतरसमावपेत् ।।१९।। क्षारजीवनवर्गं च सैन्धवं दीपनं च यत्। एतत् सिद्धं प्रयोगेण कर्णिकारीयमृत्तमम् ।।२०।।

कनेर की छाल १ तुला (१०० पल), ४ द्रोण जल में डालकर पकाये। चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें समान दूध, कटुतैल १ प्रस्थ, दधि तथा माष (उड़द) २ प्रस्थ, दशमूल से सिद्ध रोहित मछली का मांसरस, क्षार, जीवनीय वर्ग, सैन्धव तथा अन्य दीपन द्रव्य डालकर पाक करें। सिद्ध हो जाने पर इस उत्तम कर्णिकार तैल का प्रयोग करे॥१८-२०॥


१. 'दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः' इति सुश्रुतः।

षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७५

उद्वर्त्तनं ब्रह्मचर्यं कटुतैलोपसेवनम् । सुखाः शय्यासनस्वप्नाश्चिन्तेर्ष्याभयवर्जनम् ।। २१ ।। कटुतैल के सेवनकाल में उद्वर्त्तन (उबटन), ब्रह्मचर्य, सुखकारी शय्या तथा आसन, स्वप्न, चिन्ता, ईर्ष्या तथा भय का त्याग करना चाहिये ॥२१॥

वामपार्श्वोपशयनं दधिमत्स्योपसेवनम् । लघ्वल्पस्निग्धसेवा च शमयन्ति प्लीहोदरम् ।। २२ ।। वाम पार्श्व (बांई करवट) से शयन, दधि एवं मत्स्य का सेवन तथा लघु अल्प एवं स्निग्ध पदार्थों के सेवन से प्लीहोदर शान्त हो जाता है ॥२२॥

कर्णिकारस्य वा कल्कश्चूर्णितः स्वरसोऽपि वा । कटुतैलेन तक्रेर्वा सेवितः प्लीहनाशनः ।। २३ ।। कनेर के कल्क, चूर्ण अथवा स्वरस का कटुतैल अथवा तक्र के साथ सेवन करने से प्लीहा नष्ट हो जाती है ॥२३॥

रागसर्षपतैलं वा पूर्ववत् प्लीहनाशनम् । सेवितं मात्रया नित्यं दधिमाषौदकाशिनाम् ।। २४ ।। नित्य मात्रा के अनुसार दही, उड़द तथा भात का सेवन करने वाले व्यक्तियों में पीली सरसों का तैल पूर्वोक्तानुसार सेवन करने से प्लीहा को नष्ट करता है ॥२४॥

रागसर्षपमुष्टिं तु पिष्टं काञ्जिकयोजितम् । पिबेत् सलवणक्षारं भोज्यं काम्बलिकेन च ।। २५ ।। सप्ताहादतिवृद्धोऽपि प्लीहा प्रशममृच्छति । दाहश्चेदतिबाधेत रसक्षीरं च भोजयेत् ।। २६ ।। एक मुष्टि (मुट्ठीभर) पीली सरसों कांजी के साथ पीसकर उसमें लवण तथा क्षार मिलाकर पीना चाहिये तथा काम्बलिक के साथ भोजन करना चाहिये । इसके एक सप्ताह के प्रयोग से अत्यन्त बढ़ा हुआ (Enlarged) प्लीहा भी शान्त हो जाता है । यदि इसके प्रयोग से बहुत दाह हो तो रोगी को मांसरस तथा दूध पिलाना चाहिये ॥२५-२६॥

इत्याह भगवान् वृद्धो जीवको लोकपूजितः । बालानां महतां चैव प्लीहोदरनिवर्त्तनम् ।। २७ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १७३ तमं पत्रम् ।)


इस प्रकार बालकों तथा बड़े व्यक्तियों के प्लीहोदर की शान्ति के लिये लोकपूजित भगवान् वृद्धजीवक ने प्रवचन किया । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥२७॥
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥


षट्कल्पाध्यायः ।

अथातः षट्कल्पं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम षट्कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । इसमें ६ ओषधियों के कल्प का विधान दिया गया है इसलिये इसका नाम षट्कल्पाध्याय है ॥१-२॥

२७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]

मारीचमृषिमासीनं सूर्यवैश्वानरद्युतिम् । विनयेनोपसङ्गम्य प्राह स्थविरजीवकः ।। ३ ।।

सूर्य एवं वैश्वानर की कान्ति वाले, बैठे हुए महर्षि कश्यप के पास जाकर नम्रतापूर्वक वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।

भगवन्नक्षिरोगेण परिक्लिष्टस्य चक्षुषः । कदा संशमनं देयं किञ्च संशमनं हितम् । कः प्रयोगश्च तत्रोक्तः किञ्च तत्र हिताहितम् । इति पृष्टः स कल्याणं भगवान् प्रश्नमब्रवीत् ।। ५ ।।

हे भगवन् ! अक्षिरोग से पीडित बालकों की आंखों में कब तथा कौनसा संशमन देना चाहिये ? कौनसा प्रयोग कराना चाहिये ? उसमें क्या हितकर है तथा क्या हितकर नहीं है ? इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर भगवान् कश्यप ने कल्याणकारक उत्तर दिया ।।४-५।।

अक्षिरोगेण बालेषु क्लिष्टं वाऽऽश्च्योतनादिभिः । रागश्वयथुशूलास्रनिवृत्तौ षडहात् परम् ।। ६ ।। अल्पशो वा निवृत्तेषु बाधमानेषु वाऽल्पशः । रागादिषु प्रयुञ्जीत काले संशमनं हितम् ।। ७ ।।

बालकों में अक्षिरोग से पीडित आंख में राग (लालिमा-Congestion), शोथ (Swelling), शूल (Pain) तथा अंश्रुओं (Lacrimation) के शान्त हो जाने पर ६ दिन के बाद आश्चोतन (नेत्रसेचन-आंख का स्नेह द्वारा पूरण) कराना चाहिये । अथवा लालिमा आदि के थोड़ा निवृत्त हो जाने पर या थोड़ा कष्ट शेष रहने पर उचित काल में हितकर संशमन का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य-आश्चोतन का लक्षण—उन्मीलितेऽक्षिङ्मध्ये बिन्दु भिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् । क्वाथक्षौद्रासवस्नेहबिन्दूनां यत्तु पातनम् ।। तद्द्व्यङ्गुलोन्मिते नेत्रे प्रोक्तमाश्चोतनं हितम् ।। ६-७ ।।

दूषिका चोपलेपश्च दृष्टिव्याकुलताऽरतिः । वर्त्मशोथः शिरोरोगः स्त्रावशेषेऽक्षिपक्ष्मणि ।। ८ ।। एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कुर्यात् संशमनं विधिम् । स्तनपं सह धात्र्या च स्थापयेत् पथ्यभोजने ।। ९ ।।

दूषिका (नेत्रमल), उपलेप (मुखलिप्तता), दृष्टिव्याकुलता, अरति, वर्त्मशोथ (Swelling of Lids), शिरोरोग, आंखों की पलकों से स्त्राव का आना-इत्यादि लक्षण होने पर संशमन विधि का प्रयोग करना चाहिये । तथा स्तन-पान करनेवाले शिशु और धात्री दोनों को पथ्य भोजन का सेवन कराना चाहिये ।।८-९।।

चक्षुष्या पुष्पकं माता रोचनाऽथ रसाञ्जनम् । कतकस्य फलं षष्ठं तेषां कल्पान्निबोध मे ।। १० ।।

चक्षुरोगों में चक्षुष्या (चाक्षु बीज), पुष्पक (जस्ते के फूल), माता (हरड़), रोचना (गोरोचन), रसाञ्जन (रसौंत) तथा कतक (निर्मली बीज) का फल-इन ६ द्रव्यों के कल्प को तू मेरे से सुन ।।१०।।

जन्मतश्चतुरो मासान् पञ्च षड् वाऽद्धि:रोगिणाम् । विघृष्य नारीस्तन्येन चक्षुषी प्रतिपूरयेत् ।। ११ ।।

जन्म के बाद चार, पांच या छ मास तक उपर्युक्त ओषधियों को स्त्री के दूध में घिसकर अक्षिरोगियों की आंखों में डाले ।।११।।

कांस्ये हिरण्यशकलं सस्तन्यक्षौद्रनाभिकम् । घृष्ट्वाऽक्षिणी पूरयेद्वा सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।। १२ ।।

कांसी के बर्तन में दूध, मधु एवं शंखनाभि के साथ स्वर्ण को घिसकर उससे आंखों का पूरण करना चाहिये । इससे सम्पूर्ण अक्षिरोग नष्ट हो जाते हैं ।।१२।।

षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७७

एतैः कल्याणकैर्गावृषिभिः संप्रकीर्तितौ । नाभ्यञ्जनकृतौ मुख्यौ कश्यपेन महर्षिणा ।।१३।।

इन उपर्युक्त कल्याण कारक ओषधियों में से महर्षि कश्यप ने नाभि एवं अञ्जन के दो मुख्य प्रयोग बतलाये हैं ॥१३॥

शरद्धेमन्तयोः पक्वां चक्षुष्यां ग्राहयेद्भिषक । नवे कमण्डलौ चैनामनुगुप्तां निधापयेत् ।।१४।। ततः फलान्युपत्रिंशद्यवांश्च दश साधयेत् । शरावे पूतिकां बद्ध्वा गोमयालोडितां प्लुताम् ।।१५।। यवसिद्धौ भवेत्सिद्धा तत्तस्तां निस्तुषीकृताम् । स्तन्यपिष्टां प्रयुञ्जीत विशेषश्रोपदेक्ष्यते ।।१६।।

शरद् तथा हेमन्त ऋतु में वैद्य पकी हुई चक्षुष्या (कुलथी) का ग्रहण करे इसे नवीन कमण्डलु (बर्तन) में सावधानीपूर्वक रख दे। इसके बाद शराव में वस्त्र बांधकर गोबर से आलोडित करके उसमें चक्षुष्या के ३० फलों तथा १० यवों (जौ) को सिद्ध करे। जौ के सिद्ध हो जाने पर इन्हें भी सिद्ध हुआ जानकर छिलके उतार कर दूध में घिसकर उसका लेप करना चाहिये। इसका विशेष प्रयोग आगे कहा जायेगा ॥१४-१६॥

सरागे रोचनोपेता सस्त्रावे च ससैन्धवा । दूषिकामलशोथेषु प्रयोज्या सरसक्रिया ।।१७।। सपुष्पकां सगोमूत्रां ससैन्धवरसक्रियाम् । पिल्लिमाशोथजाड्येषु चक्षुष्यां संप्रयोजयेत् ।।१८।।

लालिमायुक्त आंखों में रोचना (गोरोचन) से युक्त, स्रावयुक्त में सैन्धव सहित तथा दूषिका, मल एवं शोथ में चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये। तथा पिल्लिमा (पिल्लरोग), शोथ एवं जडता में पुष्पक (जस्ते के फूल), गोमूत्र तथा सैन्धव से युक्त चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये ॥१७-१८॥

अम्ले ताम्रं च कांस्यं च विघृष्य मरिचं तथा । चक्षुष्यया समायुक्तं शमयत्यक्षिभूनिनाम् ।।१९।।

उपर्युक्त अक्षिरोगों में किसी अम्ल में चक्षुष्या के साथ ताम्र, कांसी तथा मरिच को घिसकर प्रयोग करने से आंखों के रोग अच्छे हो जाते हैं ॥१९॥

चक्षुष्यां रोचनां स्तन्यं पुष्पकं च समानयेत् । सर्वाक्षिरोगशमनो योगोऽयं संप्रकीर्तितः ।।२०।।

चक्षुष्या, रोचना, दूध तथा पुष्पक—इनको एकत्रित कर के योग बनाया जाता है। यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों का शामक कहा गया है ॥२०॥

एकाऽपि स्तन्यसंयुक्ता चक्षुष्या संप्रशस्यते । चक्षुष्याकल्प इत्येष, पुष्पकल्पं निबोध मे ।।२१।।

दूध में मिलाकर अकेली चक्षुष्या का प्रयोग भी आंखों के लिये हितकर माना गया है। इस प्रकार यह चक्षुष्या का फल कहा गया है। अब तू मेरे से पुष्पक कल्प को सुन ॥२१॥

निवाते पुंष्पकं पूतमपराह्ने प्रयोजयेत् । निशि वा शुष्कचूर्णस्य पूरयित्वाऽक्षिणी स्वपेत् ।।२२।।

निवात स्थान में अपराह्न काल में पवित्र होकर पुष्पक का प्रयोग करे। अथवा रात्रि में इसका शुष्क चूर्ण (Powder) आंखों में डालकर सो जाय ॥२२॥

रसाञ्जनेन वा सार्धं पुष्पकं मधुनाऽपि वा । स्तन्येन वा समायुक्तं सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।।२३।।

पुष्पक का रसाञ्जन, मधु अथवा दूध के साथ मिलाकर प्रयोग करने से यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों को नष्ट करता है ॥२३॥

एत एव त्रयो योगाः स्तन्यक्षौद्ररसाञ्जनैः । रोचनायाः प्रशस्यन्ते सर्वाक्षिगदशान्तये ।।२४।।