भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 633

षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७५

उद्वर्त्तनं ब्रह्मचर्यं कटुतैलोपसेवनम् । सुखाः शय्यासनस्वप्नाश्चिन्तेर्ष्याभयवर्जनम् ।। २१ ।। कटुतैल के सेवनकाल में उद्वर्त्तन (उबटन), ब्रह्मचर्य, सुखकारी शय्या तथा आसन, स्वप्न, चिन्ता, ईर्ष्या तथा भय का त्याग करना चाहिये ॥२१॥

वामपार्श्वोपशयनं दधिमत्स्योपसेवनम् । लघ्वल्पस्निग्धसेवा च शमयन्ति प्लीहोदरम् ।। २२ ।। वाम पार्श्व (बांई करवट) से शयन, दधि एवं मत्स्य का सेवन तथा लघु अल्प एवं स्निग्ध पदार्थों के सेवन से प्लीहोदर शान्त हो जाता है ॥२२॥

कर्णिकारस्य वा कल्कश्चूर्णितः स्वरसोऽपि वा । कटुतैलेन तक्रेर्वा सेवितः प्लीहनाशनः ।। २३ ।। कनेर के कल्क, चूर्ण अथवा स्वरस का कटुतैल अथवा तक्र के साथ सेवन करने से प्लीहा नष्ट हो जाती है ॥२३॥

रागसर्षपतैलं वा पूर्ववत् प्लीहनाशनम् । सेवितं मात्रया नित्यं दधिमाषौदकाशिनाम् ।। २४ ।। नित्य मात्रा के अनुसार दही, उड़द तथा भात का सेवन करने वाले व्यक्तियों में पीली सरसों का तैल पूर्वोक्तानुसार सेवन करने से प्लीहा को नष्ट करता है ॥२४॥

रागसर्षपमुष्टिं तु पिष्टं काञ्जिकयोजितम् । पिबेत् सलवणक्षारं भोज्यं काम्बलिकेन च ।। २५ ।। सप्ताहादतिवृद्धोऽपि प्लीहा प्रशममृच्छति । दाहश्चेदतिबाधेत रसक्षीरं च भोजयेत् ।। २६ ।। एक मुष्टि (मुट्ठीभर) पीली सरसों कांजी के साथ पीसकर उसमें लवण तथा क्षार मिलाकर पीना चाहिये तथा काम्बलिक के साथ भोजन करना चाहिये । इसके एक सप्ताह के प्रयोग से अत्यन्त बढ़ा हुआ (Enlarged) प्लीहा भी शान्त हो जाता है । यदि इसके प्रयोग से बहुत दाह हो तो रोगी को मांसरस तथा दूध पिलाना चाहिये ॥२५-२६॥

इत्याह भगवान् वृद्धो जीवको लोकपूजितः । बालानां महतां चैव प्लीहोदरनिवर्त्तनम् ।। २७ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १७३ तमं पत्रम् ।)


इस प्रकार बालकों तथा बड़े व्यक्तियों के प्लीहोदर की शान्ति के लिये लोकपूजित भगवान् वृद्धजीवक ने प्रवचन किया । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥२७॥
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥


षट्कल्पाध्यायः ।

अथातः षट्कल्पं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम षट्कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । इसमें ६ ओषधियों के कल्प का विधान दिया गया है इसलिये इसका नाम षट्कल्पाध्याय है ॥१-२॥