काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]
मारीचमृषिमासीनं सूर्यवैश्वानरद्युतिम् । विनयेनोपसङ्गम्य प्राह स्थविरजीवकः ।। ३ ।।
सूर्य एवं वैश्वानर की कान्ति वाले, बैठे हुए महर्षि कश्यप के पास जाकर नम्रतापूर्वक वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।
भगवन्नक्षिरोगेण परिक्लिष्टस्य चक्षुषः । कदा संशमनं देयं किञ्च संशमनं हितम् । कः प्रयोगश्च तत्रोक्तः किञ्च तत्र हिताहितम् । इति पृष्टः स कल्याणं भगवान् प्रश्नमब्रवीत् ।। ५ ।।
हे भगवन् ! अक्षिरोग से पीडित बालकों की आंखों में कब तथा कौनसा संशमन देना चाहिये ? कौनसा प्रयोग कराना चाहिये ? उसमें क्या हितकर है तथा क्या हितकर नहीं है ? इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर भगवान् कश्यप ने कल्याणकारक उत्तर दिया ।।४-५।।
अक्षिरोगेण बालेषु क्लिष्टं वाऽऽश्च्योतनादिभिः । रागश्वयथुशूलास्रनिवृत्तौ षडहात् परम् ।। ६ ।। अल्पशो वा निवृत्तेषु बाधमानेषु वाऽल्पशः । रागादिषु प्रयुञ्जीत काले संशमनं हितम् ।। ७ ।।
बालकों में अक्षिरोग से पीडित आंख में राग (लालिमा-Congestion), शोथ (Swelling), शूल (Pain) तथा अंश्रुओं (Lacrimation) के शान्त हो जाने पर ६ दिन के बाद आश्चोतन (नेत्रसेचन-आंख का स्नेह द्वारा पूरण) कराना चाहिये । अथवा लालिमा आदि के थोड़ा निवृत्त हो जाने पर या थोड़ा कष्ट शेष रहने पर उचित काल में हितकर संशमन का प्रयोग करना चाहिये ।
वक्तव्य-आश्चोतन का लक्षण—उन्मीलितेऽक्षिङ्मध्ये बिन्दु भिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् । क्वाथक्षौद्रासवस्नेहबिन्दूनां यत्तु पातनम् ।। तद्द्व्यङ्गुलोन्मिते नेत्रे प्रोक्तमाश्चोतनं हितम् ।। ६-७ ।।
दूषिका चोपलेपश्च दृष्टिव्याकुलताऽरतिः । वर्त्मशोथः शिरोरोगः स्त्रावशेषेऽक्षिपक्ष्मणि ।। ८ ।। एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कुर्यात् संशमनं विधिम् । स्तनपं सह धात्र्या च स्थापयेत् पथ्यभोजने ।। ९ ।।
दूषिका (नेत्रमल), उपलेप (मुखलिप्तता), दृष्टिव्याकुलता, अरति, वर्त्मशोथ (Swelling of Lids), शिरोरोग, आंखों की पलकों से स्त्राव का आना-इत्यादि लक्षण होने पर संशमन विधि का प्रयोग करना चाहिये । तथा स्तन-पान करनेवाले शिशु और धात्री दोनों को पथ्य भोजन का सेवन कराना चाहिये ।।८-९।।
चक्षुष्या पुष्पकं माता रोचनाऽथ रसाञ्जनम् । कतकस्य फलं षष्ठं तेषां कल्पान्निबोध मे ।। १० ।।
चक्षुरोगों में चक्षुष्या (चाक्षु बीज), पुष्पक (जस्ते के फूल), माता (हरड़), रोचना (गोरोचन), रसाञ्जन (रसौंत) तथा कतक (निर्मली बीज) का फल-इन ६ द्रव्यों के कल्प को तू मेरे से सुन ।।१०।।
जन्मतश्चतुरो मासान् पञ्च षड् वाऽद्धि:रोगिणाम् । विघृष्य नारीस्तन्येन चक्षुषी प्रतिपूरयेत् ।। ११ ।।
जन्म के बाद चार, पांच या छ मास तक उपर्युक्त ओषधियों को स्त्री के दूध में घिसकर अक्षिरोगियों की आंखों में डाले ।।११।।
कांस्ये हिरण्यशकलं सस्तन्यक्षौद्रनाभिकम् । घृष्ट्वाऽक्षिणी पूरयेद्वा सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।। १२ ।।
कांसी के बर्तन में दूध, मधु एवं शंखनाभि के साथ स्वर्ण को घिसकर उससे आंखों का पूरण करना चाहिये । इससे सम्पूर्ण अक्षिरोग नष्ट हो जाते हैं ।।१२।।