काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७७
एतैः कल्याणकैर्गावृषिभिः संप्रकीर्तितौ । नाभ्यञ्जनकृतौ मुख्यौ कश्यपेन महर्षिणा ।।१३।।
इन उपर्युक्त कल्याण कारक ओषधियों में से महर्षि कश्यप ने नाभि एवं अञ्जन के दो मुख्य प्रयोग बतलाये हैं ॥१३॥
शरद्धेमन्तयोः पक्वां चक्षुष्यां ग्राहयेद्भिषक । नवे कमण्डलौ चैनामनुगुप्तां निधापयेत् ।।१४।। ततः फलान्युपत्रिंशद्यवांश्च दश साधयेत् । शरावे पूतिकां बद्ध्वा गोमयालोडितां प्लुताम् ।।१५।। यवसिद्धौ भवेत्सिद्धा तत्तस्तां निस्तुषीकृताम् । स्तन्यपिष्टां प्रयुञ्जीत विशेषश्रोपदेक्ष्यते ।।१६।।
शरद् तथा हेमन्त ऋतु में वैद्य पकी हुई चक्षुष्या (कुलथी) का ग्रहण करे इसे नवीन कमण्डलु (बर्तन) में सावधानीपूर्वक रख दे। इसके बाद शराव में वस्त्र बांधकर गोबर से आलोडित करके उसमें चक्षुष्या के ३० फलों तथा १० यवों (जौ) को सिद्ध करे। जौ के सिद्ध हो जाने पर इन्हें भी सिद्ध हुआ जानकर छिलके उतार कर दूध में घिसकर उसका लेप करना चाहिये। इसका विशेष प्रयोग आगे कहा जायेगा ॥१४-१६॥
सरागे रोचनोपेता सस्त्रावे च ससैन्धवा । दूषिकामलशोथेषु प्रयोज्या सरसक्रिया ।।१७।। सपुष्पकां सगोमूत्रां ससैन्धवरसक्रियाम् । पिल्लिमाशोथजाड्येषु चक्षुष्यां संप्रयोजयेत् ।।१८।।
लालिमायुक्त आंखों में रोचना (गोरोचन) से युक्त, स्रावयुक्त में सैन्धव सहित तथा दूषिका, मल एवं शोथ में चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये। तथा पिल्लिमा (पिल्लरोग), शोथ एवं जडता में पुष्पक (जस्ते के फूल), गोमूत्र तथा सैन्धव से युक्त चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये ॥१७-१८॥
अम्ले ताम्रं च कांस्यं च विघृष्य मरिचं तथा । चक्षुष्यया समायुक्तं शमयत्यक्षिभूनिनाम् ।।१९।।
उपर्युक्त अक्षिरोगों में किसी अम्ल में चक्षुष्या के साथ ताम्र, कांसी तथा मरिच को घिसकर प्रयोग करने से आंखों के रोग अच्छे हो जाते हैं ॥१९॥
चक्षुष्यां रोचनां स्तन्यं पुष्पकं च समानयेत् । सर्वाक्षिरोगशमनो योगोऽयं संप्रकीर्तितः ।।२०।।
चक्षुष्या, रोचना, दूध तथा पुष्पक—इनको एकत्रित कर के योग बनाया जाता है। यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों का शामक कहा गया है ॥२०॥
एकाऽपि स्तन्यसंयुक्ता चक्षुष्या संप्रशस्यते । चक्षुष्याकल्प इत्येष, पुष्पकल्पं निबोध मे ।।२१।।
दूध में मिलाकर अकेली चक्षुष्या का प्रयोग भी आंखों के लिये हितकर माना गया है। इस प्रकार यह चक्षुष्या का फल कहा गया है। अब तू मेरे से पुष्पक कल्प को सुन ॥२१॥
निवाते पुंष्पकं पूतमपराह्ने प्रयोजयेत् । निशि वा शुष्कचूर्णस्य पूरयित्वाऽक्षिणी स्वपेत् ।।२२।।
निवात स्थान में अपराह्न काल में पवित्र होकर पुष्पक का प्रयोग करे। अथवा रात्रि में इसका शुष्क चूर्ण (Powder) आंखों में डालकर सो जाय ॥२२॥
रसाञ्जनेन वा सार्धं पुष्पकं मधुनाऽपि वा । स्तन्येन वा समायुक्तं सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।।२३।।
पुष्पक का रसाञ्जन, मधु अथवा दूध के साथ मिलाकर प्रयोग करने से यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों को नष्ट करता है ॥२३॥
एत एव त्रयो योगाः स्तन्यक्षौद्ररसाञ्जनैः । रोचनायाः प्रशस्यन्ते सर्वाक्षिगदशान्तये ।।२४।।