काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 636, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]
सम्पूर्ण आंखों के रोगों को शान्त करने के लिये रोचना के भी दूध, मधु और रसाञ्जन के साथ ये ही तीन योग प्रशस्त माने गये हैं ॥२४॥
रसाञ्जनस्य चाप्येते त्रयो योगाः सहाम्भसा । कतकस्य फलस्यापि योगाश्चत्वार एव ते ॥२५॥
रसाञ्जन के भी ये ही तीन योग माने गये हैं तथा निर्मलीबीज के उपर्युक्त अनुपानो के साथ जल को मिलाकर चार योग होते हैं अर्थात् निर्मलीबीज का दूध, मधु, रसाञ्जन तथा जल के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥२५॥
अक्षिरोगप्रशमनाश्चक्षुश्च प्रसादनाः । उक्तसूत्रानुसारेण बालानां हितकाम्यया ।।२६।।
उक्त सूत्रों के अनुसार बालकों के हित की दृष्टि से चक्षुरोगों को शान्त करने वाले तथा नेत्रों के प्रसादक योग कहे गये हैं ॥२६॥
स्वादुर्विकासिनी शीता त्रिदोषशमनी शिवा । कषाया स्तम्भिनी स्निग्धा चक्षुष्या चक्षुषे हिता ।।२७।।
हरीतकी—स्वादु, विकासिनी (शरीर का विकास करने वाली), शीत, त्रिदोषशामक, कषाय, स्तम्भक तथा स्निग्ध होती है । तथा चक्षुष्या आंखों के लिये हितकर होती है ॥२७॥
रूक्षोष्णात्तिक्तलवणाऽनलघ्नी पिच्छिला घना । (इति ताडपत्रपुस्तके १७४ तमं पत्रम् ।) मङ्गल्या पापनाशनी रोचना पक्ष्मवर्धनी ।।२८।।
रोचना—रूक्ष, उष्ण, तिक्त, लवण, वातनाशक, पिच्छिल, घन, मङ्गलकारक, पापनाशक एवं पक्ष्म (पलक- Eyelashes) को बढ़ाने वाली है ॥२८॥
तीक्ष्णमुष्णं मलहरं रक्तपित्तकफापहम् । दृष्टिप्रसादनं चाशु पुष्पकं शीतमन्ततः ।।२९।।
पुष्पक—तीक्ष्ण, उष्ण एवं मलनाशक है । यह रक्तपित्त और कफ को नष्ट करता है । दृष्टि का शीघ्र ही प्रसादन करता है तथा इसका आन्तरिक गुण शीत है ॥२९॥
त्रिदोषशमनं रूक्षं षड्रसं चानुसारि च । शोधनं पक्ष्मजननं चक्षुष्यं च रसाञ्जनम् ।।३०।।
रसाञ्जन—यह त्रिदोषनाशक तथा रूक्ष है । यह छहों रसों का अनुसरण करता है । यह पक्ष्म (पलकों) का शोधक एवं जनक (उत्पन्न करने वाला) है तथा आंखों के लिये हितकर होता है ।
कषायमधुरं शीतमाशुदृष्टिप्रसादनम् । विकासि ह्लादनं स्निग्धं चक्षुष्यं कतकं विदुः ।।३१।।
निर्मलीबीज—कषाय, मधुर एवं शीत होता है । शीघ्र ही दृष्टि का प्रसादन करता है । यह विकासी, ह्लादन (प्रसन्नता को उत्पन्न करने वाला), स्निग्ध एवं चक्षुष्य माना गया है ॥३१॥
इदं तैलं तु वक्ष्यामि नाम्नोक्तं पाञ्चभौतिकम् । प्रोक्तं तीर्थकरैः सर्वैः पञ्चेन्द्रियविवर्धनम् ।।३२।।
अब मैं पाञ्चभौतिक नामक तैल का वणन करता हूँ । सब आचार्यों ने इसे पांचों इन्द्रियों की शक्ति की वृद्धि करने वाला कहा है ॥३२॥
जीवकऋषभकौ द्राक्षा मधुकं पिप्पली बला । प्रपौण्डरीकं बृहती मञ्जिष्ठा त्वक् पुनर्नवा ।।३३।।