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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

२७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]

सम्पूर्ण आंखों के रोगों को शान्त करने के लिये रोचना के भी दूध, मधु और रसाञ्जन के साथ ये ही तीन योग प्रशस्त माने गये हैं ॥२४॥

रसाञ्जनस्य चाप्येते त्रयो योगाः सहाम्भसा । कतकस्य फलस्यापि योगाश्चत्वार एव ते ॥२५॥

रसाञ्जन के भी ये ही तीन योग माने गये हैं तथा निर्मलीबीज के उपर्युक्त अनुपानो के साथ जल को मिलाकर चार योग होते हैं अर्थात् निर्मलीबीज का दूध, मधु, रसाञ्जन तथा जल के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥२५॥

अक्षिरोगप्रशमनाश्चक्षुश्च प्रसादनाः । उक्तसूत्रानुसारेण बालानां हितकाम्यया ।।२६।।

उक्त सूत्रों के अनुसार बालकों के हित की दृष्टि से चक्षुरोगों को शान्त करने वाले तथा नेत्रों के प्रसादक योग कहे गये हैं ॥२६॥

स्वादुर्विकासिनी शीता त्रिदोषशमनी शिवा । कषाया स्तम्भिनी स्निग्धा चक्षुष्या चक्षुषे हिता ।।२७।।

हरीतकी—स्वादु, विकासिनी (शरीर का विकास करने वाली), शीत, त्रिदोषशामक, कषाय, स्तम्भक तथा स्निग्ध होती है । तथा चक्षुष्या आंखों के लिये हितकर होती है ॥२७॥

रूक्षोष्णात्तिक्तलवणाऽनलघ्नी पिच्छिला घना । (इति ताडपत्रपुस्तके १७४ तमं पत्रम् ।) मङ्गल्या पापनाशनी रोचना पक्ष्मवर्धनी ।।२८।।

रोचना—रूक्ष, उष्ण, तिक्त, लवण, वातनाशक, पिच्छिल, घन, मङ्गलकारक, पापनाशक एवं पक्ष्म (पलक- Eyelashes) को बढ़ाने वाली है ॥२८॥

तीक्ष्णमुष्णं मलहरं रक्तपित्तकफापहम् । दृष्टिप्रसादनं चाशु पुष्पकं शीतमन्ततः ।।२९।।

पुष्पक—तीक्ष्ण, उष्ण एवं मलनाशक है । यह रक्तपित्त और कफ को नष्ट करता है । दृष्टि का शीघ्र ही प्रसादन करता है तथा इसका आन्तरिक गुण शीत है ॥२९॥

त्रिदोषशमनं रूक्षं षड्रसं चानुसारि च । शोधनं पक्ष्मजननं चक्षुष्यं च रसाञ्जनम् ।।३०।।

रसाञ्जन—यह त्रिदोषनाशक तथा रूक्ष है । यह छहों रसों का अनुसरण करता है । यह पक्ष्म (पलकों) का शोधक एवं जनक (उत्पन्न करने वाला) है तथा आंखों के लिये हितकर होता है ।

कषायमधुरं शीतमाशुदृष्टिप्रसादनम् । विकासि ह्लादनं स्निग्धं चक्षुष्यं कतकं विदुः ।।३१।।

निर्मलीबीज—कषाय, मधुर एवं शीत होता है । शीघ्र ही दृष्टि का प्रसादन करता है । यह विकासी, ह्लादन (प्रसन्नता को उत्पन्न करने वाला), स्निग्ध एवं चक्षुष्य माना गया है ॥३१॥

इदं तैलं तु वक्ष्यामि नाम्नोक्तं पाञ्चभौतिकम् । प्रोक्तं तीर्थकरैः सर्वैः पञ्चेन्द्रियविवर्धनम् ।।३२।।

अब मैं पाञ्चभौतिक नामक तैल का वणन करता हूँ । सब आचार्यों ने इसे पांचों इन्द्रियों की शक्ति की वृद्धि करने वाला कहा है ॥३२॥

जीवकऋषभकौ द्राक्षा मधुकं पिप्पली बला । प्रपौण्डरीकं बृहती मञ्जिष्ठा त्वक् पुनर्नवा ।।३३।।

षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७९

शर्करांऽशुमती मेदा विडङ्गं नीलमुत्पलम् । श्वदंष्ट्रा सैन्धवं रास्ना भवेदपि निदिग्धिका ॥३४॥ समभागैः पचेदेतैस्तैलं वा यदि वा घृतम् । चतुर्गुणेन पयसा सम्यक्सिद्धं निधापयेत् ॥३५॥

जीवक, ऋषभक, द्राक्षा, मुलहठी, पिप्पली, बला, पुण्डरीक (कमल), बृहती (बर्हण्टा), मंजीठ, दालचीनी, पुनर्नवा, शर्करा, अंशुमती (शालपर्णी), मेदा, विडङ्ग, नीलकमल, गोखरू, सेंधानमक, रास्ना, निदिग्धिका (कटेरी) इनके समभाग लेकर चतुर्गुण दुग्ध से घी या तैल को अच्छी प्रकार सिद्ध करके रखें ॥३३-२५॥

नस्यमेतत् प्रयुञ्जीत यथा सिद्धौ निदर्शनम् । अक्षिरोगैश्चिरोत्पन्नैर्नस्येनानेन मुच्यते ॥३६॥

इस घृत या तैल का नस्य के रूप में प्रयोग करे। इस नस्य के प्रयोग से अत्यन्त प्राचीन अक्षिरोग भी अच्छे हो जाते हैं ॥३६॥

तिमिर पटलं काचं पिल्लमन्ध्याकुलाक्षिताम् । दूषिकां स्रावरागौ च शोथं शूलं च नाशयेत् ॥३७॥ खालित्यं पलितेन्द्राख्यौ शिरोरोगमथार्दितम् । दन्तचालं हनुव्याधि पूतित्वं स्रोतसामपि ॥३८॥ प्रजागरं प्रलापं च वाग्ध्वंसं मूकतां जडम् । बाधिर्यं हनुसंदंशं स्मृतिलोपं च नाशयेत् ॥३९॥ इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति स्मृतिर्मेधा वपुर्बलम् । स्नेहेनानेन वर्धन्ते मङ्गल्यं पाञ्चभौतिकम् ॥४०॥ इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।

इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥


इसके प्रयोग से तिमिर रोग (लिङ्ग नाश नामकनेत्र रोगनजला), पटल, काच, पिल्ल (क्लिन्न नेत्ररोग), अन्धेपन से युक्त दृष्टि, दूषिका, स्राव, राग, शोथ, शूल इत्यादि अक्षिरोग, खालित्य (गंजापन-Baldness), पलित (बालों का सफेद होना), इन्द्रलुप्त (बालों का झड़ना), शिरोरोग, अर्दित (Facial parelysis), दांतों का हिलना, हनु के रोग, स्रोतों का दुर्गन्धित होना, जागरण (निद्रानाश), प्रलाप, वाग्ध्वंस (वाक्शक्ति-वाणी का नाश), गूंगापन (Dumbness), जड़ता, बहरापन, हनुसन्दंश तथा स्मृतिनाश इत्यादि रोग नष्ट होते हैं। इस स्नेह के प्रयोग से इन्द्रियां प्रसन्न (निर्मल) होती हैं, स्मृति, मेधा, शरीर एवं बल की वृद्धि होती है तथा यह पाञ्चभौतिक स्नेह मङ्गलकारक है।

वक्तव्य—तिमिर का लक्षण—तिमिराख्यः स वै दोषश्चतुर्थपटलं गतः । रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशमतः परम् ॥ अस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे । चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरीक्षे च विद्युतम् ॥ निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णून्यथ पश्यति । शिरानुसारिणि मले प्रथमं पटलं श्रिते ॥ अव्यक्तमीक्षते रूपं व्यक्तमप्यनिमित्ततः । प्राप्ते द्वितीयं पटलमभूतमपि पश्यति ॥ भूतन्तु यत्नादासन्नं दूरे सूक्ष्मं च नेक्षते । दूरान्तिकस्थं रूपञ्च विपर्यासेन मन्यते ॥ दोषे मण्डलसंस्थाने मण्डलानीव पश्यति । द्विवैकदृष्टिमध्यस्थे बहुधा बहुधास्थिथे ॥ दृष्टेरभन्तरगते ह्रस्ववृद्धविपर्ययम् । नान्तिकस्थमधःसंस्थे दूरगं नोपरिस्थितम् ॥ पार्श्वे पश्येत्र पार्श्वस्थे तिमिराख्योऽयमामयः ॥ पटल रोग का लक्षण—अधस्तादुपरिष्टाद्वा पटलं यस्य जायते । रुणद्धि नयने सद्यः ॥ काचरोग का लक्षण—तृतीय पटलगत नेत्र रोग (Affection of optic Nerue) को काच रोग कहते हैं। वाग्भट उत्तर. अ. १२ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—प्राप्नोति काचतां दोषे तृतीयपटलाश्रिते । तेनोर्ध्वमीक्षते नाधस्तनुचैलावतोपमम् ॥ यथावर्णं च रज्येत दृष्टिर्र्हीयेत च क्रमात् । इसी के चतुर्थपटल में पहुंचने पर लिङ्गनाश अथवा पूर्वोक्त तिमिररोग कहलाता है ॥३७-४०॥


CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ]

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥


शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ।

अथातः शतपुष्पा(शता)वरीकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शतपुष्पा (सौंफ) तथा शतावरी के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

शतपुष्पाशतावर्त्यौ रसवीर्यविपाकतः । प्रयोगतश्च भगवंश्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥

भगवान् ! मैं शतपुष्पा तथा शतावरी के रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव को पूर्णरूप से जानना चाहता हूँ ॥३॥

इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । शतपुष्पाशतावर्त्यौ प्रोवाच गुणकर्मतः ॥४॥

इस प्रकार ज्ञानवृद्ध (ज्ञानी) शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर प्रजापति कश्यप ने शतपुष्पा तथा शतावरी के गुण एवं कर्मों का वर्णन किया ॥४॥

मधुरा बृंहणी बल्या पुष्टिवर्णाग्निवर्धनी । ऋतुप्रवर्तनी धन्या योनिशुक्रविशोधनी ॥५॥
उष्णा वातप्रशमनी मङ्गल्या पापनाशनी । पुत्रप्रदा वीर्यकरी शतपुष्पा निदर्शिता ॥६॥

शतपुष्पा के गुण—यह रस में मधुर, बृंहण तथा बलदायक है। पुष्टि, वर्ण और जाठराग्नि को बढ़ाती है। आर्तव को प्रवृत्त करती है। धन्य है। योनि और शुक्र का शोधन करती है। यह उष्ण, वातशामक, मङ्गलकारक, पापनाशक, पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा वीर्यवर्धक है ॥५-६॥

शीता कषायमधुरा स्निग्धा वृष्या रसायनी । वातपित्तविबन्धघ्नी वर्णोजोबलवर्धनी ॥७॥
स्मृतिमेधामतिकरी पथ्या पुष्पप्रजाकरी । भूतकल्मषशापघ्नी शतवीर्या शतावरी ॥८॥

यह वीर्य में शीत, रस में कषाय एवं मधुर तथा स्निग्ध घृष्य और रसायन है। वात, पित्त तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। वर्ण, ओज एवं बल की वृद्धि करती है। स्मृति, मेधा एवं मति को बढ़ाती है। पथ्यकारक है। पुष्प (मासिक स्त्राव) तथा पुत्र को उत्पन्न करती है। भूत, पाप तथा शाप को नष्ट करती है तथा यह सैकड़ों वीर्यों वाली है ॥

तयोः प्रयोगं ब्रुवते कृत्वा दोषविशोधनम् । प्रावृटशरद्वसन्तेषु धृतिपथ्यान्नसेविनाम् ॥९॥

दोषों का शोधन करके, प्रावृट्, शरद् तथा वसन्त ऋतु में धृति (धैर्य-धारणशक्ति) एवं पथ्यभोजन के सेवन पूर्वक इनका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥

आर्तवं या न पश्यन्ति पश्यन्ति विफलं च याः । अतिप्रभूतमत्यल्पमतिक्रान्तमनागतम् ॥१०॥
अकर्मण्यमविस्त्रांसि किञ्जातमृतयश्च याः । दुर्बलाऽदृढपुत्राश्च कृशाश्च वपुषाऽथ याः ॥११॥
प्रस्कन्दना विवर्णाश्च याश्च प्रचुरमूर्तयः । स्पर्शं च या न विन्दन्ति याश्च स्युः शुष्कयोनयः ॥१२॥
शतपुष्पाशतावर्त्यौ स्यातां तत्रामृतं यथा । पुमानप्युपयुञ्जानो यथोक्तानाप्नुते गुणान् ॥१३॥

शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८१

जिन स्त्रियों को आर्तव (मासिक ऋतुस्राव) नहीं होता है, अथवा जिनका मासिक स्राव विफल होता है (अर्थात् जो फल शून्य हो—जिसका गर्भप्राप्ति रूप कोई फल न हो), जिन्हें बहुत अधिक या बहुत कम मासिक स्राव आता हो, जिनका मासिक स्राव समाप्त हो गया हो (Menapanse), जिनको अभी मासिक स्राव प्रारंभ न हुआ हो, जिनका मासिक स्राव अकर्मण्य (कर्मशून्य-Inactive) तथा स्रावरहित हो, जिन्हें अनेक प्रकार का स्राव होता हो, जो दुर्बल हों, जिनकी सन्तान कमजोर हो, जो शारीरिक दृष्टि से कृश (Physically weak) हों, जिन्हें अतिसार रोग हो रहा हो अथवा जो विवर्ण तथा प्रचुरमूर्तिवाली हो, जो स्पर्श का अनुभव न करती हो तथा जिनकी योनि शुष्क हो—उन स्त्रियों में शतपुष्पा तथा शतावरी अमृत के समान गुणकारी होता है। पुरुष भी इनका सेवन करने पर उपर्युक्त गुणों को प्राप्त करता है॥१०-१३॥

चूर्णितायाः पलशतं नवे भाण्डे निधापयेत्। तच्चूर्णं शतपुष्पायाः प्रातरुत्थाय जीर्णवान् ॥१४॥ पलाधार्धं पलार्धं वा पलं वा सर्पिषा लिहेत्। शक्त्या वा तस्य जीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् ॥१५॥ विस्रंसितोपचारं च विदध्यादत्र पण्डितः। उपयुक्ते पलशते यथेष्टांल्लभते सुतान् ॥१६॥

१०० पल चूर्ण की हुई शतपुष्पा को एक नवीन पात्र में रखें। प्रातःकाल उठकर पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर इस चूर्ण का डेढ़, एक अथवा आधा पल की मात्रा में अथवा शक्ति के अनुसार घृत के साथ लेहन करे तथा उसके जीर्ण हो जाने पर दूध और चावल का भोजन करे। विद्वान् व्यक्ति यहां विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है) मनुष्य के समान उपचार करे। इस प्रकार १०० पल का सेवन करने पर यथेष्ट पुत्रों की प्राप्ति होती है॥१४-१६॥

अपि बन्ध्या च षण्ढा च सूयेते शतपुष्पया। युवा भवति वृद्धोऽपि बलवर्णौ लभेत च ॥१७॥ तेजसा चौजसा बुद्ध्या दीर्घायुष्केण मेधया। युज्यते प्रजया धृत्या वलीपलितवर्जितः ॥१८॥

शतपुष्पा के प्रयोग से बांझ एवं नपुंसक स्त्री को भी पुत्रोत्पत्ति हो जाती है। वृद्ध व्यक्ति भी बल और वर्ण को प्राप्त करके युवा हो जाता है। वह झुर्रियों तथा सफेद बालों से रहित होकर तेज, ओज, बुद्धि, दीर्घायुष्य, मेधा, सन्तान एवं धृति (धारण शक्ति) से युक्त हो जाता है॥१७-१८॥

अतो बिडालपदकं लिह्यान्मधुघृताप्लुतम्। मेधावी शतपुष्पाया मासाच्छ्रुतधरो भवेत् ॥१९॥ (इति ताडपत्रपुस्तके १७५ तमं पत्रम्।)

बुद्धिमान् मनुष्य एक मास पर्यन्त एक कर्ष (२ तो.) मात्रा में शतपुष्पा के चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ मिलाकर सेवन करने से श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला धृतिमान्) हो जाता है॥१९॥

अग्निकामस्तु मधुना, रूपार्थी क्षीरसर्पिषा। बलकामस्तु तैलेन, प्लीहकी कटुतैलयुक् ॥२०॥ कामलापाण्डुशोथेषु महिषीक्षीरमूत्रवत्। गुल्मी चैरण्डतैलेन, कुष्ठी खदिरवारिणा ॥२१॥ शुष्कविण्मत्स्यवसया पिबेन्मांसरसेन वा।। जीर्णमांसरसेनाद्यान्मुद्गमण्डेन कुष्ठिकः ।।२२।।

जाठराग्नि की वृद्धि के लिये मधु के साथ, रूप (सौन्दर्य) की वृद्धि के लिये दूध तथा घी के साथ, बलवृद्धि के लिए तिलतैल के साथ, प्लीहोदरी (प्लीहा रोगी) को कटुतैल (सरसों के तेल) के साथ, कामला, पाण्डु तथा शोथरोगी को भैंस के दूध तथा मूत्र के साथ, गुल्म रोगी को एरण्ड तैल के साथ, कुष्ठरोगी को खदिर के स्वरस अथवा क्वाथ, शुष्कमल, मछली की वसा (चर्बी), मांस रस, जीर्ण मांसवस अथवा मुद्गमण्ड के साथ शतपुष्पा का सेवन करना चाहिये॥२०-२२॥

२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ]

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥


शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ।

अथातः शतपुष्पा(शता)वरीकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शतपुष्पा (सौंफ) तथा शतावरी के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

शतपुष्पाशतावर्यौ रसवीर्यविपाकतः । प्रयोगतश्च भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥

भगवन् ! मैं शतपुष्पा तथा शतावरी के रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव को पूर्णरूप से जानना चाहता हूँ ॥३॥

इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । शतपुष्पाशतावर्यौ प्रोवाच गुणकर्मतः ॥४॥

इस प्रकार ज्ञानवृद्ध (ज्ञानी) शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर प्रजापति कश्यप ने शतपुष्पा तथा शतावरी के गुण एवं कर्मों का वर्णन किया ॥४॥

मधुरा बृंहणी बल्या पुष्टिवर्णाग्निवर्धनी । ऋतुप्रवर्तनी धन्या योनिशुक्रविशोधनी ॥५॥
उष्णा वातप्रशमनी मङ्गल्या पापनाशनी । पुत्रप्रदा वीर्यकरी शतपुष्पा निदर्शिता ॥६॥

शतपुष्पा के गुण—यह रस में मधुर, बृंहण तथा बलदायक है। पुष्टि, वर्ण और जाठराग्नि को बढ़ाती है। आर्तव को प्रवृत्त करती है। धन्य है। योनि और शुक्र का शोधन करती है। यह उष्ण, वातशामक, मङ्गलकारक, पापनाशक, पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा वीर्यवर्धक है ॥५-६॥

शीता कषायमधुरा स्निग्धा वृष्या रसायनी । वातपित्तविबन्धघ्नी वर्णौजॉबलवर्धनी ॥७॥
स्मृतिमेधामतिकरी पथ्या पुष्पप्रजाकरी । भूतकल्मषशापघ्नी शतवीर्या शतावरी ॥८॥

यह वीर्य में शीत, रस में कषाय एवं मधुर तथा स्निग्ध घृष्य और रसायन है। वात, पित्त तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। वर्ण, ओज एवं बल की वृद्धि करती है। स्मृति, मेधा एवं मति को बढ़ाती है। पथ्यकारक है। पुष्प (मासिक स्त्राव) तथा पुत्र को उत्पन्न करती है। भूत, पाप तथा शाप को नष्ट करती है तथा यह सैकड़ों वीर्यों वाली है ॥

तयोः प्रयोगं ब्रुवते कृत्वा दोषविशोधनम् । प्रावृट्शरद्वसन्तेषु धृतिपथ्यान्नसेविनाम् ॥९॥

दोषों का शोधन करके, प्रावृट्, शरद् तथा वसन्त ऋतु में धृति (धैर्य-धारणशक्ति) एवं पथ्यभोजन के सेवन पूर्वक इनका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥

आर्तवं या न पश्यन्ति पश्यन्ति विफलं च याः । अतिप्रभूतमत्यल्पमतिक्रान्तमनागतम् ॥१०॥
अकर्मण्यमविस्रंसि किञ्चानमृतयश्च याः । दुर्बलाऽदृढपुत्राश्च कृशाश्च वपुषाऽथ याः ॥११॥
प्रस्कन्दना विवर्णाश्च याश्च प्रचुरमूर्तयः । स्पर्शं च या न विन्दन्ति याश्च स्युः शुष्कयोनयः ॥१२॥
शतपुष्पाशतावर्यौ स्यातां तत्रामृतं यथा । पुमानप्युपयुञ्जानो यथोक्तानाप्नुते गुणान् ॥१३॥

शतपुष्पाशातावरीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८१

जिन स्त्रियों को आर्तव (मासिक ऋतुस्राव) नहीं होता है, अथवा जिनका मासिक स्राव विफल होता है (अर्थात् जो फल शून्य हो—जिसका गर्भप्राप्ति रूप कोई फल न हो), जिन्हें बहुत अधिक या बहुत कम मासिक स्राव आता हो, जिनका मासिक स्राव समाप्त हो गया हो (Menapanse), जिनको अभी मासिक स्राव प्रारंभ न हुआ हो, जिनका मासिक स्राव अकर्मण्य (कर्मशून्य-Inactive) तथा स्रावरहित हो, जिन्हें अनेक प्रकार का स्राव होता हो, जो दुर्बल हों, जिनकी सन्तान कमजोर हो, जो शारीरिक दृष्टि से कृश (Physically weak) हों, जिन्हें अतिसार रोग हो रहा हो अथवा जो विवर्ण तथा प्रचुरमूर्तिवाली हो, जो स्पर्श का अनुभव न करती हो तथा जिनकी योनि शुष्क हो—उन स्त्रियों में शतपुष्पा तथा शतावरी अमृत के समान गुणकारी होता है । पुरुष भी इनका सेवन करने पर उपर्युक्त गुणों को प्राप्त करता है ॥११०-१३॥

चूर्णितायाः पलशतं नवे भाण्डे निधापयेत् । तच्चूर्णं शतपुष्पायाः प्रातरुत्थाय जीर्णवान् ।।१४।। पलार्धार्थं पलार्धं वा पलं वा सर्पिषा लिहेत् । शक्त्या वा तस्य जीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् ।।१५।। विस्रंसितोपचारं च विदध्यादत्र पण्डितः । उपयुक्ते पलशते यथेष्टांल्लभते सुतान् ।।१६।।

१०० पल चूर्ण की हुई शतपुष्पा को एक नवीन पात्र में रखें । प्रातःकाल उठकर पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर इस चूर्ण का डेढ़, एक अथवा आधा पल की मात्रा में अथवा शक्ति के अनुसार घृत के साथ लेहन करे तथा उसके जीर्ण हो जाने पर दूध और चावल का भोजन करे । विद्वान् व्यक्ति यहां विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है) मनुष्य के समान उपचार करे । इस प्रकार १०० पल का सेवन करने पर यथेष्ट पुत्रों की प्राप्ति होती है ॥१४-१६॥

अपि बन्ध्या च षण्ढा च सूयेते शतपुष्पया । युवा भवति वृद्धोऽपि बलवर्णौ लभेत च ।।१७।। तेजसा चौजसा बुद्ध्या दीर्घायुष्केण मेधया । युज्यते प्रजया धृत्या वलीपलिंतवर्जितः ।।१८।।

शतपुष्पा के प्रयोग से बांझ एवं नपुंसक स्त्री को भी पुत्रोत्पत्ति हो जाती है । वृद्ध व्यक्ति भी बल और वर्ण को प्राप्त करके युवा हो जाता है । वह झुर्रियों तथा सफेद बालों से रहित होकर तेज, ओज, बुद्धि, दीर्घायुष्य, मेधा, सन्तान एवं धृति (धारण शक्ति) से युक्त हो जाता है ॥१७-१८॥

अतो बिडालपदकं लिह्यान्मधुघृताप्लुतम् । मेधावी शतपुष्पाया मासाच्छ्रुतधरो भवेत् ।।१९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७५ तमं पत्रम् ।)

बुद्धिमान् मनुष्य एक मास पर्यन्त एक कर्ष (२ तो.) मात्रा में शतपुष्पा के चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ मिलाकर सेवन करने से श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला धृतिमान्) हो जाता है ॥१९॥

अग्निकामस्तु मधुना, रूपार्थी क्षीरसर्पिषा । बलकामस्तु तैलेन, प्लीहकी कटुतैलयुक् ।।२०।।
कामलापाण्डुशोथेषु महिषीक्षीरमूत्रवत् । गुल्मी चैरण्डतैलेन, कुष्ठी खदिरवारिणा ।।२१।।
शुष्कविण्मत्स्यवसाया पिबेन्मांसरसेन वा ।। जीर्णमांसरसेनाद्यान्मुद्गमण्डेन कुष्ठिकः ।।२२।।

जाठराग्नि की वृद्धि के लिये मधु के साथ, रूप (सौन्दर्य) की वृद्धि के लिये दूध तथा घी के साथ, बलवृद्धि के लिए तिलतैल के साथ, प्लीहोदरी (प्लीहा रोगी) को कटुतैल (सरसों के तेल) के साथ, कामला, पाण्डु तथा शोथरोगी को भैंस के दूध तथा मूत्र के साथ, गुल्म रोगी को एरण्ड तैल के साथ, कुष्ठरोगी को खदिर के स्वरस अथवा क्वाथ, शुष्कमल, मछली की वसा (चर्बी), मांस रस, जीर्ण मांxrस अथवा मुद्गमण्ड के साथ शतपुष्पा का सेवन करना चाहिये ॥२०-२२॥

२८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

शतपुष्पापलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । पादावशेषं निष्क्वाथ्य पूतं भूयो विपाचयेत् ।।२३।।
धात्रीचिकित्सिते वर्गः सामान्यो य उदाहृतः । तैलाढकं पचेत्तेन शनैः क्षीरे चतुर्गुणे ।।२४।।
तत् पक्वं नस्यपानाद्यस्नेहम्रक्षणबस्तिषु । प्रशस्तमृषिणा नित्यं यथोक्तगुणलब्धये ।।२५।।

१०० पल शतपुष्पा को ५ द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें । उसे छान कर धात्री चिकित्सा में कहे सामान्य वर्ग के साथ उसे पुनः पकाये । फिर उसमें एक आढक तैल चतुर्गुण दूध के साथ डालकर पाक करे । सिद्ध हो जाने पर यथोक्त गुणों की प्राप्ति के लिये उसे नित्य नस्य, पान, स्नेहन, मालिश एवं बस्ति आदि के द्वारा प्रयोग करने के लिये महर्षि कश्यप ने श्रेष्ठ माना है ॥२३-२५॥

य एवं शतपुष्पाया विधिर्द्दष्टोऽत्र सर्वशः । स एवोक्तः शतावर्या घृतं पाके तु शस्यते ।।२६।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।


जो शतपुष्पा से सेवन की विधि बताई गई है, वही सम्पूर्ण विधि शतावरी के घृत पाक आदि की भी समझनी चाहिये ॥२६॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।


रेवतीकल्पाध्यायः ।

अथातो रेवतीकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

प्रजापतिर्वै खलु ह स्मैक एवेदं सर्वमासीत् । स कालमेवाग्रेऽसृजत । ततो देवाँश्चासुराँश्च पितॄँश्च मनुष्याँश्च सप्त च ग्राम्यान् पशूनारण्यानोषधींश्च वनस्पतींश्च । अथो स प्रजापतिरैक्षत, ततः क्षुदजायत, सा क्षुत् प्रजापतिमेवाविवेश, सोऽग्लासीत्, तस्मात् क्षुधितो ग्लायतीति । स ओषधीः क्षुत्प्रतीघातमपश्यत् । स ओषधीरादत् । स ओषधीरुपह्वित्वा क्षुधो व्यत्यमुच्यत । तस्मात् प्राणिन ओषधीरशित्वा क्षुधो व्यतिमुच्यन्ते । कर्मसु च युज्यन्ते ।।३।।

प्रारंभ में प्रजापति (ब्रह्मा) ही अकेला सब कुछ था । उसने सर्वप्रथम काल को उत्पन्न किया । उसके बाद देव, असुर, पितर, मनुष्य, सात ग्रामीण एवं जंगली पशु तथा ओषधियों एवं वनस्पतियों की रचना की । तब प्रजापति ने इच्छा की जिससे क्षुधा (भूख) की उत्पत्ति हो गई । वह क्षुधा प्रजापति में ही प्रविष्ट हो गई जिससे उसे ग्लानि (खिन्नता) हो गई इसीलिये क्षुधित (भूखे) व्यक्ति को ग्लानि होती है । उसने क्षुधा के प्रतीकार के लिये ओषधियों को देखा । तब उसने ओषधि का सेवन किया । वह ओषधि का सेवन करके क्षुधा से मुक्त हो गया । इसीलिये सब प्राणी ओषधियों को खाकर क्षुधा से मुक्त हो जाते हैं तथा अपने २ कार्यों में लगे रहते हैं ।

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८३

वक्तव्य—(i) इससे काल की महिमा बतलाई गई है। अथर्ववेद के १९वें काण्ड में भी काल की विशेष महिमा का वर्णन किया गया है। वहां ५३ तथा ५४ पूरे सूक्त काल के विषय में दिये हैं। वहां काल का घोड़े के रूप में वर्णन किया गया है। वे सूक्त निम्न प्रकार हैं—कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा।। सप्तचक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभिरमृतं न्वक्षः। स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत्कालः स ईयते प्रथमो नु देवः।। पूर्णः कुम्भोऽधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। य इमः विश्वा भुवनानि प्रत्यङ्कालं तमाहुः परमे व्योमन्।। स एवं स भुवनान्यभरत्स एव सं भुवनानि पर्यैत्। पिता सन्नभवत्पुत्र एषां तस्माद्वै नान्यत्परमस्ति तेजः।। कालोऽमू दिवमजनयत्काल इमाः पृथिवीरुत। काले ह भूतं भव्यं चेष्टितं ह वितिष्ठते।। कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्विपश्यति।। काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्। कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः।। काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्। कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत्प्रजापतेः। तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन्प्रतिष्ठितम्। कालो ह ब्रह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्।। कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयंभूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत।। अथर्व. कां. १९ सूक्त ५३—कालादापः समभवन्कालाद्ब्रह्म तपो दिशः। कालेनॊदेति सूर्यः काले निविशते पुनः।। कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही। द्यौर्मही काल आहिता।। कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत्पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत।। कालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः।। कालेऽयमङ्गिरा देवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः। इमं च लोकं परमञ्च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतींश्च पुण्याः। सर्वाँल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः।। (ii) सप्त पशून्—वेदों में भी प्रारंभ में पशुओं को उत्पन्न करने का वर्णन मिलता है। परन्तु वहाँ सात के स्थान पर ५ पशुओं का वर्णन मिलता है। रुद्र (पशुपति) का वर्णन करते हुए अथर्ववेद में कहा है—पशुपते नमस्ते। तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।। (iii) ओषधि—ओषधि का अभिप्राय गेहूँ, चावल, जौ, तिल तथा मूंग आदि अन्न से है जो फल के पक जाने पर नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—‘फलपाकनिष्ठा ओषधय’ इति। इसी प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है—‘ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः’ ।।३।।

स प्रजापतिरग्रीयमेव रसमासां यस्मादग्रहीत्, तस्मात् स तृप्त एव स्यात्। ऋ^१जीषं प्राणिन ओषधीनां रसमश्नन्ति। तस्मादहरहः क्षुध्यन्ति प्रजाः ।।४।।

उस प्रजापति ने क्योंकि प्रारंभ में ही इन ओषधियों के अन्न का आदान (ग्रहण) कर लिया था इससे वह तृप्त हो गया। अन्य प्राणी ओषधियों के नीरस (रस-साररहित) चूर्ण (कल्क) को ही खाते हैं इसलिये प्राणियों को निरन्तर क्षुधा (भूख) सताती (लगती) रहती है ।।४।।

प्रजापतिर्ह्यासां सारमघसत्, स प्रजापतिस्तृप्तस्तां क्षुधं काले न्यदधात्। ततः स कालः क्षुधितो देवाँश्चासुराँश्च प्राभक्षयत् ।।५।।

प्रजापति ने इसके सार का भक्षण कर लिया इससे तृप्त होकर उसने क्षुधा (भूख) का काल में आधान कर दिया। इससे वह काल क्षुधित (भूखा) हुआ देवता तथा असुरों का भक्षण करने लगा ।।५।।

ते देवाश्चासुराश्च कालेन भक्ष्यमाणाः प्रजापतिमेव शरणमीयुः। स एभ्योऽमृतमाचख्यौ, तेऽमृतं ममन्युस्तदभवदिति। कोन्विदमग्रे भक्षयिष्यतीति। तं देवा एवाभक्षयन्त। ततो देवा अजराश्चामराश्चाभवन्।


१. ऋजीषं नाम सारांशे गृहीतेऽवशिष्टं नीरसचूर्णम्, 'ऋजीषं नीरसं सोमलताचूर्णम्' इति वेददीपे। तत्र सोमपद्मुपलक्षणम्।

२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

ते देवा अमृतेन क्षुधं कालं चानुदन्त । स कालः प्रतिनुन्न इमानि भूतानि तस्मादादत्ते, ततो देवानसुराअभ्यषजन्त; तेऽन्योऽन्यं युयुधिरे । अथो दीर्घजिह्वी नामाऽसुरकन्या सा देवसेनामक़्षिणोत् । ते देवाः स्कन्दमब्रुवन्-दीर्घजिह्वी नो बलं क्षिणोति, तां शाधीति । सोऽब्रवीत्-वरं वृणुतेति, ते देवा ॐ मित्यचुः । सोऽब्रवीत्-वसुष्वेको रुद्रेष्वेक आदित्येष्वेकोऽहं स्यामिति । ते देवा ॐ मित्यचुः; स तथाऽभवत् । सोमो धरोऽग्निर्मातरिश्वा प्रभासः प्रत्यूषश्चैते पुरा सप्त बसव आसन्, तेषामष्टमो ध्रुवो नामाभवत्, ध्रुवो भवत्येषु लोकेषु य एवं वेद । अज एकपादहिर्ब्रध्नो हरो वैश्वानरो बहुरूपस्त्र्यम्बको विश्वरूपः स्थाणुः शिवो रुद्र इत्येते पुरा दश रुद्रा आसन्, तेषां गुह एकादशोऽभवच्छङ्करो नाम; सम एषु लोकेष्वस्य भवति (य एवं वेद) । इन्द्रो भगः पूषाऽर्यमा मित्रावरुणौ धाता विवस्वानंशो भास्करस्त्वष्टा विष्णुरिति द्वादश पुरा आदित्या आसन् । तेषां त्रयोदशो गुहोऽभवदहस्पतिर्नाम, तस्यैष त्रयोदशो मासोऽधिकस्तस्मात्तत्र तपति मुच्यते सर्वेभ्योऽर्तिभ्यो य एवं वेद । तस्मात् सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु छन्दःसु सर्वासु देवतासु स्कन्दो राजाऽधिपतिरित्युच्यते । तस्मै नमो नम इत्युक्त्वा सर्वार्थनारभेत, सिध्यन्ति, य एवं वेद ।। ६ ।।

(इति ताडपत्रपुस्तके १७६ तमं पत्रम्)

काल के द्वारा भक्षण किये जाते हुए वे देवता एवं असुर प्रजापति की ही शरण में पहुँचे। प्रजापति ने इनके लिये अमृत का उपदेश किया। उन्होंने अमृत का मन्थन किया तथा उसे प्राप्त किया। फिर यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि पहले इसका कौन सेवन करे। तब देवताओं ने ही इसका सेवन किया। इसके सेवन से देवता अजर (जरा-वृद्धावस्था से रहित) तथा अमर हो गये। अमृत के द्वारा देवताओं ने क्षुधा एवं काल दोनों पराभूत कर दिया। पराजित होकर काल ने प्रजापति से इन भूतों को छीन लिया। तब असुरों (राक्षसों) ने देवताओं पर आक्रमण किया। वे परस्पर युद्ध करने लगे। तब दीर्घजिह्वी नाम की असुरकन्या देवताओं की सेना का संहार करने लगी। वे देवता स्कन्द (कार्तिकेय) के पास जाकर कहने लगे-दीर्घजिह्वी हमारी सेना का संहार कर रही है, उसे आप वश में करें। स्कन्द बोला-आप लोग मुझे वर देवें। देवताओं ने ओं का उच्चारण किया। तब वह कहने लगा कि वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों में मैं एक हो जाऊँ अर्थात् मैं वसु, रुद्र एवं आदित्य इन सबमें व्याप्त हो जाऊं। उन देवताओं ने ॐ का उच्चारण किया तथा वह वैसा ही हो गया अर्थात् वह सम्पूर्ण वसु, रुद्र एवं आदित्यों में व्याप्त हो गया। प्राचीन काल में सोम, धर, अग्नि, मातरिश्वा, प्रभास, प्रत्यूष तथा आह-ये सात वसु थे। इनमें आठवां ध्रुव नाम का वसु हो गया। सम्पूर्ण प्राणियों में निश्चित रूप से होने के कारण उसका ध्रुव नाम हुआ। प्राचीनकाल में अज, एकपात्, अहिर्ब्रध्न, हर, वैश्वानर, बहुरूप, त्र्यम्बक, विश्वरूप, स्थाणु तथा शिव-ये १० रुद्र थे। इनमें गुह (कार्तिकेय) शङ्कर नाम का ११ वां रुद्र हो गया। समः एषु लोकेष्वस्य भवति-अर्थात् इन लोकों में इसका कल्याण हो इस व्युत्पत्ति के अनुसार उसका यह नाम हो गया प्राचीनकाल में इन्द्र, भग, पूषा, अर्यमा, मित्र, वरुण, धाता, विवस्वान्, अंश, भास्कर, त्वष्टा तथा विष्णु-ये १२ आदित्य थे। इनमें कार्तिकेय अहस्पति नाम का १३ वां आदित्य हो गया। इसका वर्ष में १३ वां मास अधिक होता है इस लिये उस मास में वह अहस्पति नामक आदित्य तपता है। तथा सम्पूर्ण पीडाओं (रोगों) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक, छन्द (मन्त्रों) तथा देवताओं में स्कन्द (कार्तिकेय) राजा एवं अधिपति माना जाता है। उसे नमस्कार करके सम्पूर्ण कार्य प्रारंभ करने चाहिये। जो इस प्रकार जानता है उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

वक्तव्य— ऐतरेय ब्राह्मण में भी दीर्घजिह्वी आसुरी का वर्णन आता है। वहां कहा है—'आसुरी वै दीर्घजिह्वी देवानां प्रातः सवनमवालेट्' ॥ ऐ. ब्रा. २-३ ॥ वहां असुरों को वाणी को दीर्घजिह्वी नामक कुतिया कहा है जो कि कृपणता की शिक्षा देती है ॥ ६ ॥

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८५

अथो स दीर्घजिह्व्यै रेवतीमेव प्राहिणोत् । सा शालावृकी भूत्वाऽसुरसेनाभ्यवर्तत । अथो दीर्घजिह्वीमेवाग्रेऽभक्षयत् । तां हत्वा शकुनिर्भूत्वा सोल्का सविद्युत्साऽश्मवर्षा सर्वप्रहरणवर्षिणी बहुरूपाऽसुरानभ्यजयत्तेऽसुरा वध्यमाना बहुरूपया गर्भानीयुर्मानुषीणां चामानुषीणां च । अथो रेवती तान्सुरान् गर्भेष्वपश्यत् मानुषीणां चामानुषीणां च । तत एनानवधीज्जातहारिणी भूत्वा । तस्माज्जातहारिणी पुष्पं हन्ति वपुश्च हन्ति गर्भंश्च हन्ति जातांश्च हन्ति जायमानांश्च जनिष्यमाणांश्च हन्ति, यद्भवत्या-सुरमधार्मिकाणामपत्यमधर्मोपहतं विशेषेण । सैषा वृद्धजीवक ! रेवती बहुरूपा जातहारिणी पिलिपिच्छकेति चोच्यते, रौद्रीति चोच्यते, वारुणीति चोच्यते । सैषा स्कन्दवराज्ञया सर्वजातिषु भूता याऽधार्मिकाणि मूढयत्यसतां विच्छेदाय । वृद्धजीवक ! तस्यास्तु निदानं चागमनं च पूर्व रूपं च निवर्तनं च भेषजं चोपदेक्ष्यामः । कस्मात्, संस (जने) ह्येषामासुराणामसतां सन्तोऽपि बध्यन्ते । संसर्गे हि जातहारिणी दिव्येन चक्षुषा दृश्यते । तस्यास्तु धर्मएव निवृत्तिकारणमुक्तमिति ।।७।।

उसने दीर्घजिह्वी के लिये रेवती को भेजा। उसने शालावृकी होकर (गीदड़ या वनविलाव का रूप धारण करके) असुरों की सेना का संहार प्रारम्भ किया। तथा सबसे पहले वह दीर्घजिह्वी का ही भक्षण कर गई। उसे मारकर उसने शकुनि बनकर उल्का, विद्युत् (बिजली), पत्थरों की वर्षा करने वाली तथा सम्पूर्ण प्रहरणों (आयुधों) की वर्षा करने वाली-इत्यादि अनेक रूपों वाली होकर असुरों को पराजित किया। इस प्रकार अनेक रूपों वाली शकुनि द्वारा संहार किये जाते हुए वे असुर मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो को प्राप्त हुए अर्थात् उनके गर्भो में स्थित हो गये। रेवती ने मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो में उन्हें देख लिया। तब उसने जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का संहार करने वाली) बनकर उनका संहार किया। इस प्रकार वह जातहारिणी पुष्प (आर्त्तवरूप में विद्यमान गर्भ), वपु (शरीर-पिण्ड), गर्भ, उत्पन्न हुए, उत्पन्न होने वाले तथा उत्पन्न किये जाने वाले-प्राणी को नष्ट करती है। विशेषरूप से वह असुरों, अधार्मिक व्यक्तियों के पुत्रों तथा अधर्म युक्त प्राणियों को नष्ट करती है। हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह अनेक रूपों वाली तथा जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का हरण करने वाली) रेवती-पिलिपिच्छिका, रौद्री तथा वारुणी आदि नामों से कहलाती है। यह रेवती स्कन्द की आज्ञा से सम्पूर्ण जातियों में उत्पन्न हुए अधार्मिक व्यक्तियों को मूढ कर देती है तथा दुष्टों का विच्छेद (नाश) करती है। हे वृद्धजीवक ! अब इस रेवती का निदान, आगमन (संप्राप्ति), पूर्वरूप, निवृत्ति तथा ओषधि (चिकित्सा) आदि का उपदेश किया जायगा क्योंकि असुरों एवं दुष्टों के संसर्ग से सज्जन प्राणियों का भी वध हो जाता है। संसर्ग होने पर यह यह जातहारिणी (रेवती) दिव्य चक्षुओं के द्वारा ही दिखलाई देती है तथा धर्म (धार्मिक कृत्य) ही उसकी निवृत्ति का उपाय माना गया है ॥७॥

अथ खलु या स्त्री त्यक्तधर्ममङ्गलाचारशौचदेवक्रिया देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसद्वेषिणी दुराचाराऽहङ्कृताऽनवस्थिता वैरकलिमांसाहिंसानिद्रामैथुनप्रिया चण्डाऽरुन्तुदा दन्दशूका वावदूका विगतसाध्वसाऽथोऽकस्मात्प्रहसनाऽथोऽकस्मात्प्ररोदनाऽथोऽकस्माच्छोचनाऽनृतवादिनी घस्मराऽथो आहुः सर्वशिनी स्वमतकारिणी पथ्यवचनभोजनत्यागिनी भृशमहृद्याना परविजातोपहिंसिका स्वार्थपरा परार्थविलम्बिनी प्रतीपा भर्तरि, पुत्रेषु च निःस्नेहा, तैश्च नित्यशपथा, श्वस्रश्वशुरननन्दादेवरातृृत्विजमन्यान् वा तत्स्थानीयान्महतो वाऽवमन्यते तथैनान्मन्युना निर्दहन्त्यभिशपन्ति वा, सपत्नीं वा दुःशीला पापचक्षुरभिध्यायति, मन्त्रासदौषधकर्मभिर्वैनामभिचरति, मूर्ध्नि चाभिहन्ति बालं, न चैषां सुखदुःखज्ञा भवति, मित्रद्रोहिणी ह्यमङ्गलवादिनी शान्तिहोमजपदानबलिकर्मस्वस्त्ययनावष्ठीवनपरिचुम्बनपरिष्वजनपरिवर्जिता स्थानेष्वपि भवति; तस्या एभिः कर्मभिरन्यैश्चाशुभैः पूर्वकैश्चैह कृतैरतिपानभोजनस्वप्नव्यायामसेवनैश्च छिद्रेष्वेतेष्वधर्मद्वारेषु

२८६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रेवतीकल्पः ? ]

जातहारिणी सज्जते। अथो परितरस्या एवंशीलो भवति। तयोरसाध्यां जातहारिणीं विद्यात्। अथो दम्पत्यो-

(इति ताडपत्रपुस्तके १७७ तमं पत्रम्)

रेकतरोऽधार्मिको भवति कृच्छ्रा भवति। उभयोस्तु धार्मिकयोरार्जवयोरनभिमानिकयोररोगयोश्च प्रजा वर्धते। यदा वा स्त्री प्रथमगर्भिणी म्रियमाणापत्याभिरालिभिर्वाऽन्याभिरचौक्षाभिरशुभाभिरसतीभिर- मानुषपरिगृहीताभिर्जातहारिणीसत्ताभिर्वा संयोगमुपैति, सह भुङ्क्ते, सह स्नाति, वस्त्रालङ्कारं वा ददाति, तासां स्नानमूत्रबलिभूमीराक्रामति, विशेषदार्तवोपहतानि चैतानि केशलोमनुखोद्धर्त्तनकजीर्णवस्त्रावकर्त्तनान्याक्रामति, भोजनशेषं पानशेषमौषधशेषं गन्धशेषं पुष्पशेषं जीर्णोपानहौ वा दधाति, तदा जातहारिणी सज्जते। यदा वैनां प्रथमगर्भिणीं वा दर्शनीयां वपुष्मतीमरोगान्पीनश्रोणिपयोधरोरुबाहुवदनामभिजायमानसौभाग्यां सुकेशीं विशालरक्तान्तलोचनामभिवर्धमानलोमराजिं स्निग्धकरचरणनखदृष्टित्वचमतिसुकुमारीमक्लेशसहामनायासपरमां कालयोगादभिवर्धमानगर्भामुपचीयमानवपुषमाप्यायमानपयसं स्त्रियं गर्भिणीं दृष्ट्वा दुरात्मानोऽन्वीक्षन्तेन चास्याः शान्तिकर्म क्रियते तदाऽस्य जातहारिणी सज्जते। एतस्मात् कारणात् पुत्रीया काम्येष्टिरह न्यहन्युक्ता, सा ह्यस्याः पापं शमयति तस्माज्जनन्याऽपि सह भोक्तुं नार्हति गर्भिणी ।।८।।

जातहारिणी किन्हें आक्रान्त करती है—? जिस स्त्री ने धर्म, मङ्गलाचार, शौच (शुद्धि) तथा देवताओं के पूजन आदि आवश्यक कर्मों का त्याग कर दिया है। जो देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध तथा सज्जनों से द्वेष करती है, जो दुराचारिणी, अहंकारयुक्त एवं अस्थिर चित्त वाली है, वैर, कलि (लड़ाई-झगड़ा), मांस, हिंसा, निद्रा एवं मैथुन आदि जिसे प्रिय हैं, जो चण्डा (भयंकर), अरन्तुदा (मर्मस्थल पर प्रहार करने वाली), दन्दशूका (बार २ खाने वाली), वावदूका (बकवाद करने वाली) तथा विगतसाध्वसा (भयरहित) है। जो सहसा हंसने, रोने, एवं शोक करने लगती है, जो असत्य भाषण करती है, जो घस्मरा (बहुत खाती) है, जो सब कुछ खा जाती है, अपनी इच्छा के अनुसार ही कार्य करती है, पथ्य वचन एवं पथ्य भोजन का जिसने त्याग किया हुआ है, जो बिलकुल श्रद्धा (विश्वास) नहीं करती है, जो दूसरों की उत्पन्न हुई सन्तान को मार देती है। जो अत्यन्त स्वार्थिनी है, परार्थ में विलम्ब करने वाली है, जो पति के प्रतिकूल रहती हो, पुत्रों से स्नेह (प्रेम) न करती हो, तथा सदा उनकी शपथ खाती हो, जो अपने श्वशुर, ननद, देवर, ऋत्विज अथवा उनके समान अन्य बड़े व्यक्तियों का अपमान करती हो, इन्हें क्रोधपूर्वक मारती हो तथा शाप देती हो। जो दुश्चरित्र स्त्री अपनी सौत के विषय में पापयुक्त विचार करती हो अथवा मन्त्रों, दूषित ओषधियों एवं दूषित कर्मों के द्वारा उसका अभिचार (मान्त्रिक क्रिया जादू टोना आदि) करती हो, जो बालकों के सिर पर प्रहार करती है तथा उसके सुख एवं दुःख का जिन्हें ज्ञान नहीं होता है। जो मित्रों से द्रोह करती है, अमङ्गल भाषण (प्रवचन) करती है, जो उचित स्थान पर भी शान्ति, होम, जप, दान, बलिकर्म, स्वस्त्ययन, अवष्ठीवन (थूकना), चुम्बन तथा आलिङ्गन आदि से रहित होती है—उस स्त्री को इन कर्मों अथवा पूर्व जन्म के या इस जन्म के अशुभ कर्मों, अतिपान (पेय पदार्थ का अत्यन्त सेवन), अतिभोजन, अतिस्वप्न, तथा अति त्व्यायाम आदि के सेवन के कारण उत्पन्न हुए दोषों अथवा अन्य अधार्मिक कार्यों के कारण जातहारिणी आक्रान्त करती है। इससे उसका पति भी इसी स्वभाव अथवा आचरण वाला हो जाता है। उन दोनों में असाध्य जातहारिणी को जाने। यदि इन दोनों पति-पत्नियों में से एक व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है तो वह जातहारिणी कृच्छ्र होती है। यदि वे दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति वाले, सरल प्रकृति के, अभिमानशून्य तथा रोगरहित हों तो उनकी सन्तान की वृद्धि होती है। अथवा जब स्त्री को प्रथम गर्भ हो उस समय म्रियमाण (जिनकी सन्तान मर जाती है) पुत्रों वाली सखियों के साथ तथा अन्य अचौक्ष (असुन्दर), अशुभ, असती तथा मनुष्यों ने जिन्हें स्वीकार नहीं किया ऐसी तथा जातहारिणियों

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८७

से युक्त स्त्रियों के साथ संयोग करती हो, उनके साथ भोजन तथा स्नान करती हो, वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करती हो, उनके स्नान, मूत्र तथा बलिस्थान को आक्रान्त करती है, तथा विशेषरूप से इनके आर्तव (मासिक स्राव) से युक्त केश, लोम, नख, उबटन, जीर्णवस्त्र तथा कटे हुए नाखून-बाल आदि पर आक्रमण करती है, उनके भोजन शेष (भोजन के अवशिष्ट अंश), पानशेष, औषधशेष, गन्धशेष, पुष्प (आर्तव) शेष पर आक्रमण करती है तथा पुराने जूतों को धारण करती है तब उन पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। अथवा जब प्रथम गर्भ वाली, दर्शनीय शरीर वाली, रोगरहित, मोटे श्रोणि, स्तन, ऊरु (जंघा), बाहु तथा सुन्दर मुख वाली, सौभाग्यवती, उत्तम बालों वाली तथा नेत्र के अन्तः भाग जिसके विशाल एवं रक्तवर्ण के हैं, जिसके लोम (शरीर के बाल) बहुत बढ़े हुए हैं, जिसके हाथ, पैर, नख, दृष्टि तथा त्वचा अत्यन्त स्निग्ध हैं, जो अत्यन्त सुकुमारी है तथा क्लेश और परिश्रम को सहन नहीं कर सकती है, कालयोग से जिसका गर्भ वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, जिसके शरीर तथा दूध की वृद्धि हो रही है—ऐसी गर्भिणी स्त्री कोक देखकर दुष्ट लोग ईर्ष्या करते हैं, अथवा नजर लगा देते हैं और यदि उसका शान्ति कर्म न किया जाय तो उस पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसी कारण से प्रतिदिन पुत्रीय (पुत्रोत्पत्ति) के लिये काम्येष्टि (उत्तम फल की इच्छा से यज्ञ करना) करने का विधान कहा गया है। इससे उसके पाप शान्त हो जाते हैं। इस लिये गर्भिणी स्त्री को अपनी जननी (माता) के साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये ॥८॥

विशेषात् प्रथमे गर्भे प्रमादं चात्र वर्जयेत्। बहुयाज्यस्य विप्रस्य संप्रसक्तस्य याजने ॥९॥
विदुषोऽपि स्वदोषेण सज्जते जातहारिणी।
आक्षेप्ता यश्च वादेषु दाम्भिकोऽहङ्कृतश्च यः ॥१०॥
सर्वे ते जातहारिण्या भक्ष्यभूताः सयाजकाः।

विशेष कर प्रथम गर्भ में प्रमाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि बहुत यज्ञ करने वाले ब्राह्मण तथा यज्ञ-याग में लगे हुए विद्वान् व्यक्ति पर भी अपने दोष से ही जातहारिणी आक्रमण कर देती है। विवाद में बहुत आक्षेप करने वाला, बहुत दम्भ करने वाला, अहंकारी तथा याजक आदि सब व्यक्ति जातहारिणी के भक्ष्य होते हैं ॥९-१०॥

रात्रौ यदा गतो मार्गात् पतिः पांसुलपादकः ॥११॥
स्पृशेदृतौ वा गर्भे वा तदाऽऽविशति रेवती।

जब रात्रि में मार्गस्खलित पति पांवों में धूल लगे हुए अथवा ऋतुकाल में स्त्री का स्पर्श करता है तब गर्भ में रेवती प्रविष्ट हो जाती है अर्थात् रेवती गर्भ पर आक्रमण कर देती है ॥

गृहीतां जातहारिण्या सेवित्वा यः स्त्रियं पतिः ॥१२॥
भार्यामुपैति तत्कालं सज्जते जातहारिणी।

जब पति जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री से संभोग करके अपनी पत्नी के पास जाता है तब उस समय जातहारिणी आक्रमण कर देती है ॥१२॥

गृहीतं जातहारिण्या गृहं नित्यं च वर्जयेत् ॥१३॥
आददानं ततः किञ्चिद्गृह्णीते जातहारिणी।

जातहारिणी से आक्रान्त घर का सदा त्याग कर देना चाहिये अन्यथा उस घर में से कुछ भी लेने वाले व्यक्ति को जातहारिणी ग्रहण कर लेती है अर्थात् उसे आक्रान्त कर देती है ॥१३॥

वधभेदाङ्करणैर्गवां बन्धनदोहनैः ॥१४॥

४१ का.सं.

२८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

गोपालस्य प्रजा हन्ति गोमाता जातहारिणी । महिष्युष्ट्र्यजपालानामेवमेव प्रजाक्षयम् ।।१५।। करोत्यधर्मसंजाता प्रसक्ता जातहारिणी ।

गौओं के वध, अङ्गभेद तथा बन्धन, दोहन इत्यादि कारणों से जातहारिणी रूप गोमाता गौओं के पालन करने वाले (ग्वाले) की सन्तान का हनन कर देती है। इसी प्रकार अधर्म से उत्पन्न हुई जातहारिणी भैंस, ऊंटनी तथा बकरी के पालन करने वाले व्यक्तियों की भी सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१४-१५॥

ब्रह्मस्वहारिणां लोके विषमाणां दुरात्मनाम् ।।१६।। तस्कराणां शठानां च प्रजा हन्त्युग्ररेवती ।

उग्रस्वरूप वाली रेवती लोक में ब्रह्म (ज्ञान) का हरण करने वाले विषम, दुष्ट, चोर तथा धूर्त व्यक्तियों की सन्तान को नष्ट कर देती है ॥१६॥

रसनाः पापकार्याणां दुष्कुला भिन्नसेतवः ।।१७।। ये भवन्त्यनयप्राया निर्दयाः सर्वजातिषु । अरक्षिणस्तीक्ष्णदण्डा वृद्धानां शासनातिगाः ।।१८।। अनपेक्षितवृत्तान्ता अधर्मस्य प्रवर्तकाः । राज्ञो यस्य च दौर्बल्यात् क्षयं यान्तीह च प्रजाः ।।१९।। गोब्राह्मणं विशेषेण हन्ति तं जातहारिणी ।

जो व्यक्ति पाप कार्यों में रत रहते हैं, नीच कुलवाले होते हैं, जो व्यक्ति मर्यादा का उल्लंघन करने वाले हैं जो अन्याय करते हैं और सम्पूर्ण जातियों के प्रति दयारहित होते हैं, जिनकी कोई रक्षा नहीं की जाती, जो तीक्ष्ण दण्डों को धारण करते हैं, जो वृद्ध व्यक्तियों के शासन (वश) में नहीं रहते, जिनका वृतान्त अपेक्षित नहीं होता, जो अधर्म के प्रवर्तक हों तथा जिस राजा की दुर्बलता के कारण प्रजा—विशेषकर गौ एवं ब्राह्मणों का नाश होता हो—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥१७-१९॥

एवमेव दुरात्मानो राजमात्रा नृपाज्ञया ।।२०।। प्रजा यदा प्रबाधन्ते हन्ति ताञ्जातहारिणी ।

इसी प्रकार जब दुष्ट दुष्ट लोग राजा की आज्ञा से प्रजा को सताते हैं तब उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२०॥

वणिक् पण्योपघाती यो यश्चाप्यस्य¹ प्रतीक्षकः ।।२१। अतिवार्धुषिकश्चैव हन्यन्ते बहुरूपया ।

जो बनिया बाजार का व्यतिक्रम करता है (अर्थात् Black marketing करता है) अथवा जो इसीका अनुगामी है, तथा जो अत्यन्त धन की वृद्धि का इच्छुक है वह अनेक रूपों वाली जातहारिणी के द्वारा विनष्ट हो जाता है ॥२१॥

कन्याया यश्च भूमेश्च हिरण्यस्याश्वरवाससाम् ।।२२।। कुर्वन्ति येऽनृतान्येषां (घातिनी) जातहारिणी ।

जो व्यक्ति कन्या, भूमि, स्वर्ण, अश्व तथा वस्त्रों के विषय में अनृत (असत्य) व्यवहार करते हैं—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२२॥


१. तदनुगामीत्यर्थः ।

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८९

सन्ध्ययोरप्सु रजसि शून्यदेवालयेषु च ।।२३।।
मैथुनं यान्ति ये मोहाद्धन्ति ताञ्जातहारिणी ।

जो व्यक्ति अज्ञानवश दोनों सन्ध्याओं में, नदी तालाब आदि के पानी में, धूल में तथा खाली मन्दिरों में मैथुन करता है—उन्हें जातहारिणी नष्ट कर देती है ॥२३॥

अधर्मद्वारमासाद्य यदा विशति रेवती ।।२४।।
नारीं तदा भवन्त्यस्या रूपाणीमानि जीवक ! ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७८¹ तमं पत्रम्)

हे जीवक ! उपर्युक्त अधर्मयुक्त मार्गों से जब रेवती स्त्री में प्रवेश करती है तब उसके शरीर के मलिन होने पर निम्न रूप (लक्षण) होते हैं ॥२४॥

प्रम्लायतस्तनोस्तस्या रूपाणीमानि, हीयते ।।२५।।
दृष्टिर्व्याकुलतां याति यथाकालं न पुष्यति । भ्रष्टसत्त्वा निरुत्साहा कुक्षिशूलनिपीडिता ।।२६।।
भवत्यप्रियरूपा च तैस्तै रोगैरुपद्रुता ।। विपरीतसमारम्भा विपरीतनिषेविणी ।।२७।।
उच्छिष्टा विकृता धृष्टा सर्वार्थेषु प्रवर्तते । अर्थसिद्धिर्न भवति संपच्चास्याः प्रलुप्यते ।।२८।।
गोजाविमहिषीष्वस्या न जीवन्ति च वत्सकाः । अयशः प्राप्नुते घोरं वैधव्यं वा निगच्छति ।।२९।।
कुलक्षयं वा कुरुते प्रसक्ता जातहारिणी ।

जातहारिणी के द्वारा उसके शरीर के म्लान होने पर निम्न लक्षण होते हैं—उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है, व्याकुलता रहती है, ठीक समय पर पोषण नहीं होता, उसका मन पतित हो जाता है, कार्य में उत्साह नहीं होता है, तथा वह कुक्षिशूल से पीडित रहती है । उसका रूप (आकृति) अप्रिय हो जाता है तथा अनेक प्रकार के रोगों से व्याप्त हो जाती है । उसके सब कार्यों के प्रारम्भ विपरीत होते हैं तथा वह विपरीत ही आचरण करती है । वह उच्छिष्ट, विकृत तथा धृष्ट होती है । सम्पूर्ण विषयों में वह प्रवृत्त हो जाती है । उसे अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती तथा उसकी सम्पत्ति (प्रशस्त गुण) लुप्त हो जाती है । इसकी गौ, बकरी, भेड़ तथा भैंस आदि के बच्चे जीवित नहीं रहते । उसे भयंकर अपयश प्राप्त होता है, वह विधवा हो जाती है तथा प्रसक्त हुई जातहारिणी उसके कुल का क्षय (नाश) कर देती है ॥२५-२९॥

शास्त्रतस्त्रिविधामाहुर्मुनयो जातहारिणीम् ।।३०।।
साध्यां याप्यामसाध्यां च तासां लक्षणमुच्यते ।।

शास्त्रों के अनुसार ऋषियों ने तीन प्रकार की जातहारिणियां कही हैं । १. साध्य २. याप्य ३. असाध्य । अब उ के लक्षण कहे जाते हैं ॥३०॥

आषोडशवर्षप्राप्ता या स्त्री पुष्पं न पश्यति ।।३१।।
प्रम्लानबाहुरुकुचा तामाहुः शुष्करेवतीम् ।।

पहले साध्य जातहारिणी (रेवती) के भेद तथा उनके लक्षण कहे जाते हैं—


१. मूलताडपत्रपुस्तके ७८-७९ पत्रयोः, ८०-८१ पत्रयोश्च मिथः पत्राङ्कव्यत्ययो दृश्यते, परं ग्रन्थसंलापने लेखकप्रमादाद्व्यत्ययमवधार्य सम्बद्धो ग्रन्थपौर्वापर्यविन्यासस्तदनुसारी पत्राङ्कविन्यासश्चात्र निर्दिष्टः ।

२९०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रेवतीकल्पः ? ]

शुष्क रेवती के लक्षण—सोलह वर्ष की अवस्था तक भी जिस स्त्री को रजोदर्शन नहीं होता तथा जिसके बाहु एवं कुच (नितम्ब) पतले होते हैं उसे शुष्क रेवती कहते हैं ॥३१॥

विना पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रणश्यति ।।३२।।
कृशा हीनबला क्रुद्धा साऽपि चोक्ता कटम्भरा ।।

कटम्भरा के लक्षण—बिना रजोदर्शन के ही जो स्त्री उचित काल में नष्ट हो जाती है, जो कृश, हीनबल वाली एवं शुद्ध होती है उसे कटम्भरा कहते हैं ॥३२॥

वृथा पुष्पं तु या नारी यथाकालं प्रपश्यति ।।३३।।
स्थूललोमशगण्डा वा पुष्पघ्नी साऽपि रेवती ।।

पुष्पघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री को यथासमय रजोदर्शन होता है परन्तु वह व्यर्थ (बिना फल वाला) होता है। जिसके गण्डस्थल (कपोल) स्थूल एवं लोम युक्त होते हैं उस रेवती को पुष्पघ्नी कहते हैं ॥३३॥

कालवर्णप्रमाणैर्या विषमं पुष्पमृच्छति ।।३४।।
अनिवित्तबलम्लानिर्विकुटा नाम सा स्मृता ।।

विकुटा के लक्षण—जिस स्त्री का पुष्प (ऋतुस्त्राव) काल वर्ण एवं प्रमाण से विषम हो अर्थात् विषम काल में, विषम वर्ण वाला तथा प्रारंभ में भी विषम हो। बिना कारण के ही जिसे बल एवं ग्लानि हो जाती हो उसे विकुटा कहते हैं ॥३४॥

अभीक्ष्णं स्त्रवते यस्या नार्या योनिः कृशात्मनः ।।३५।।
परिस्रुतेति सा ज्ञेया नारीणां जातहारिणी ।।

परिस्रुता के लक्षण—जिस कृश स्त्री की योनि से निरन्तर स्राव बहरा रहता है। उस जातहारिणी को परिस्रुता कहते हैं ॥

यस्यास्त्वालक्ष्यमालग्नमण्डं प्रपतति स्त्रियाः ।।३६।।
अण्डघ्नीमिति ह्याहुस्तां दारुणां जातहारिणीम् ।।

अण्डघ्नी के लक्षण—जिस स्त्री का लक्ष्ययुक्त तथा चिपका हुआ अण्ड (गर्भ) गिर जाता है—उस दारुण (भयंकर) जातहारिणी को अण्डघ्नी कहते हैं ॥३६॥

नातिनिर्वृत्तदेहाङ्गो यस्या गर्भो विनश्यति ।।३७।।
दुर्धरा नाम सा ज्ञेया सुघोरा जातहारिणी ।।

दुर्धरा के लक्षण—जिसके देह के अङ्ग अधिक प्रकट नहीं हुए हैं ऐसा गर्भ जिस स्त्री का नष्ट हो जाता है उस अत्यन्त भयंकर जातहारिणी को दुर्धरा कहते हैं ॥३७॥

सम्पूर्णाङ्गं यदा गर्भं हरते जातहारिणी ।।३८।।
कालरात्रीति सा प्रोक्ता दुःखात् स्त्री तत्र जीवतित ।।

कालरात्रि के लक्षण—जब जातहारिणी सम्पूर्ण अङ्गों वाले (अर्थात् पूर्ण रूप से बने हुए) गर्भ का हरण कर लेती है उसे कालरात्रि कहते हैं। इसमें स्त्री बड़े दुःख से जीवित रहती है ॥३८॥

यया विषज्जते गर्भः प्रतीतो वाऽथ मुच्यते ।।३९।।

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९१

स्त्रीविनाशाय सा प्रोक्ता मोहिनी जातहारिणी ।।

मोहिनी के लक्षण—जिसके द्वारा गर्भ आक्रान्त होता है अथवा वह अपने स्थान से मुक्त हुआ प्रतीत होता है उस जातहारिणी को मोहिनी कहते हैं । इससे स्त्री विनष्ट हो जाती है ॥३९॥

यस्या नस्पन्दते गर्भः स्तम्भनी नाम सा स्मृता ।।४०।।

स्तम्भनी के लक्षण—जिसका गर्भ स्पन्दन नहीं करता उसे स्तम्भनी कहते हैं ॥४०॥

उदरस्थो यया क्रोशेत् क्रोशना नाम सा स्मृता ।।

जिस जातहारिणी के कारण उदर में स्थित हुआ गर्भ आक्रोश करता है (चिल्लाता) है उसे क्रोशना कहते हैं ।

दशैता जातहारिण्यो जीवमानासु मातृषु ।।४१।।
असाध्याः पुष्पघातिन्यः साध्या गर्भोपघातिकाः ।।

इस प्रकार जीवित माताओं में ये दस जातहारिणियां कही गई हैं अर्थात् इनमें माताओं की मृत्यु नहीं होती । इनमें पुष्प (आर्तव) को नष्ट करनेवाली असाध्य होती है तथा गर्भ को नष्ट करने वाली साध्य होती हैं ॥४१॥

जायते तु मृतं नित्यं यस्या नार्याः सवे सवे ।।४२।।
नाकिनीमिति तां विद्याद्दारुणां जातहारिणीम् ।।

अब याप्य जातहारिणी के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—नाकिनी का लक्षण—जिस स्त्री का गर्भ नित्य मृत उत्पन्न होता है उस दारुण जातहारिणी को नाकिनी कहते हैं ॥४२॥

जातं जातमपत्यं तु यस्याः सद्यो विनश्यति ।।४३।।
पिशाची नाम सा घोरा मांसादी जातहारिणी ।।

पिशाची का लक्षण—जिस स्त्री के पुत्र उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाते हैं उस मांस भक्षण करनेवाली जातहारिणी को पिशाची कहते हैं ॥४३॥

द्वितीये दिवसे यक्षी, तृतीयेऽहनि चासुरी ।।४४।।
कलिनर्म चतुर्थेऽह्नि, पञ्चमेऽह्नि च वारुणी ।।
षष्ठेऽहनि स्मृता षष्ठी, सप्तमेऽहनि भीरुका ।।४५।।
अष्टमे दिवसे याम्या, मातङ्गी नवमेऽहनि ।।
दशमे भद्रकालीति, रौद्री त्वेकादशेऽहनि । द्वादशे वर्धिका प्रोक्ता, त्रयोदशे च चण्डिका ।।४६।।
कपालमालिनी नाम चतुर्दशे च रेवती । ततः पक्षात् परे काले विज्ञेया पिलिपिच्छिका ।।४७।।

जिस स्त्री के पुत्र जन्म के द्वितीय दिवस नष्ट हो जाते हैं, उसे यक्षी, तृतीय दिवस नष्ट हो जाने वाली को आसुरी, चतुर्थ दिवस नष्ट हो जाने वाली को कलि, पांचवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को वारुणी, छठे दिवस नष्ट हो जाने वाली को षष्ठी, सातवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को भीरुका, आठवें दिवस नष्ट हो जाने वाली को याम्या, नवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को मातङ्गी, दसवें दिवस नष्ट हो जानेवाली को भद्रकाली, ११ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को रौद्री, १२ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को वर्धिका, १३ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली को चण्डिका, १४ वें दिवस नष्ट हो जानेवाली रेवती को कपालमालिनी तथा एक पक्ष के बाद जिसका गर्भ नष्ट होता है उसे पिलिपिच्छिका कहते हैं ॥४४-४७॥

एताः षोडश निर्दिष्टा नामभिः कर्मभिः पृथक् । दारुणा जातहारिण्यो याप्या धर्मक्रियावताम् ।।४८।।

२९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

इस प्रकार धर्म-कर्म से युक्त स्त्रियों में नाम एवं कर्म के अनुसार ये १६ प्रकार की दारुण याप्य याप्य जातहारिणियों का निर्देश किया गया है ॥४८॥

यस्यास्तु गर्भरूपाणि पञ्च षट् सप्त वा मुने ! । म्रियन्तेऽनन्तरं वश्या असाध्या जातहारिणी ॥४९॥
अब असाध्य जातहारिणियों के भेद एवं लक्षण कहे जाते हैं—
वश्या के लक्षण—जिस स्त्री के गर्भरूप बालक ५, ६ या ७ मास की अवस्था में नष्ट हो जाते हैं उसे वश्या नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥४९॥

म्रियन्ते दारका यस्याः कन्या जीवन्त्ययततः । कुलक्षयकरी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५०॥
कुलक्षयकरी का लक्षण—जिसके पुत्र मर जाते हैं तथा कन्याएँ बिना यत्न के भी जीवित रहती हैं उसे कुलक्षयकरी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५०॥

जातं जातमपत्यं तु यस्याश्च म्रियते स्त्रियाः । घोरा पुण्यजनी नाम साऽसाध्या जातहारिणी ॥५१॥
पुण्यजनी का लक्षण—जिस स्त्री की सन्तान उत्पन्न होते ही मर जाती है उसे भयंकर पुणजनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५१॥

निष्पन्नं म्रियतेऽपत्यं यस्याः प्राक् षोडशाब्दतः । पौरुषादिनी सा प्रोक्ता असाध्या जातहारिणी ॥५२॥
पौरुषादिनी का लक्षण—जिसका पुत्र १६ वर्ष की अवस्था से पूर्व मर जाता है उसे पौरुषादिनी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५२॥

बिभर्त्यन्यं यदा गर्भं तदा पूर्वः प्रमीयते । संदंशीति वदन्त्येनामसाध्यां जात(हारिणीम्) ॥५३॥
इति ताडपत्रपुस्तके १७९ तमं पत्रम्)
संदंशी का लक्षण—जब स्त्री दूसरे गर्भ को धारण करती है तब उसका पहला गर्भ (पुत्र) नष्ट हो जाता है । तब उसे संदंशी नाम की असाध्य जातहारिणी कहते हैं ॥५३॥

गर्भेणैकं ग्रहेणैकं मृत्युनैकेन युज्यते । एषा कर्कोटोकीत्युक्ता दारुणा जातहारिणी ॥५४॥
कर्कोटकी का लक्षण—कभी व्यक्ति गर्भ, कभी ग्रह तथा कभी मृत्यु से युक्त हो जाता है । उस भयंकर जातहारिणी को कर्कोटकी कहते हैं ॥५४॥

यमजं म्रियते यस्या एकं वोभयमेव वा । तामाहुरिन्द्रवडवामसाध्यां जातहारिणीम् ॥५५॥
इन्द्रवडवा का लक्षण—जिसके एक या दोनों यमज (जुडवां-Twins) मर जाते हैं उस असाध्य जातहारिणी को इन्द्रवडवा कहते हैं ॥५५॥

एकनाभिप्रभवयोरेकश्चेन्म्रियते पुरा । म्रियते तद्गदप्येकस्तामाहुर्बडवामुखीम् ॥५६॥
बडवामुखी का लक्षण—एक नाभि से उत्पन्न होनेवाले अर्थात् यमज में से यदि एक की पहले मृत्यु हो जाय तो दूसरे की भी मृत्यु हो जाती है । उसे बडवामुखी कहते हैं ॥५६॥

अथैवंवदिनमृषिं कश्यपं लोकपूजितम् । पुनरेव महाप्रश्नमपृच्छद् वृद्धजीवकः ॥५७॥
इस प्रकार उपदेश करते हुए लोकपूजित महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने पुनः निम्न प्रश्न किया ॥५७॥

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९३

एकनाभिकयोः कस्मात्तुल्यं मरणजीवितम्। रोगारोग्यं सुखं दुःखं न तु तृप्तिः समानजा ।।५८।।

एक नाभि से उत्पन्न होने वाले (अर्थात् यमल=जुड़वां-Twins) पुत्रों की तृप्ति-पोषण समान न होने पर भी मृत्यु जीवन, रोग, आरोग्य एवं सुख दुःख आदि समान क्यों होते हैं। अर्थात् उनमें से एक की मृत्यु होने पर दूसरे की भी मृत्यु इत्यादि क्यों हो जाते हैं जबकि उनको पोषण समान नहीं मिलता है ॥५८॥

अथ खलु भगवान् कश्यप उवाच-

एकमेव हि तद् बीजं भिन्नं वायुबलादथ ।
समानकर्मकत्वात् प्राङ्नाड्यैकत्वं च जन्म च ।।५९।।
तुल्यं निषेकाद् वृद्धेश्च जन्मनः स्तनसेवनात् ।।
तस्मातुल्यं वयः प्रोक्तं सुखं दुःखं भवाभवौ ।।६०।।
लक्षणाकृतिवर्णाङ्गबलप्रकृतितुल्यता ।। न तु तृप्तिविसर्गाणां पृथग्भावात् समानता ।।६१।। इति

भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—गर्भ में वह बीज एक ही होता है। वह समान कर्मों के कारण वायु द्वारा दो भागों में विभक्त हो जाता है। इन दोनों के नाडी तथा जन्म एक समान होते हैं। इनके निषेक (गर्भाधान), वृद्धि, जन्म तथा स्तनपान आदि तुल्य होने वय (अवस्था-Age), सुख, दुःख, भव (कल्याण-आरोग्य) तथा अभव (रोग) आदि सब समान होते हैं। इनके लक्षण, आकृति, वर्ण, अङ्ग, बल, प्रकृति आदि सब समान होते हैं। परन्तु पृथक् होने से उनकी तृप्ति (पोषण) तथा विसर्ग (मल-मूत्र आदि का त्याग) में समानता नहीं होती है ॥५९-६१॥

अथ खलु वृद्धजीवक ! त्रिविधैव जातहारिणी प्रोच्यते लोकभेदतः—दैवी, मानुषी, तिरश्चीनेति । तस्मात्रयो लोका भगवत्या रेवत्या बहुरूपया व्याप्ताः । इत्यतश्च सर्वलोकभयङ्करी रेवती पठ्यते । तां देवा अ(म)न्यन्त, तत एषां प्रजाः प्रावृध्यन्त; न एषां प्रजा विच्छेदगममत् । नास्य प्रजा विच्छिद्यते य एवं वेद । तामथ रेवतीं सर्वलोकगुरुमभिव्यापिकां सर्वर्षीणां कश्यप एवाग्रे तपसोग्रेणाऽविन्दत । तस्मै प्रजां बहुलामाशीरायुष्मतीमविच्छिन्नां प्रादात् । ततः सर्वेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् । रेवतीमेकशोऽभिज्ञश्च रेवतीकल्पं शिष्येभ्यः प्रादाज्जगद्धितार्थम् ।।६२।।

हे वृद्धजीवक ! लोक भेद से पुनः तीन प्रकार की ही जातहारिणियां कही गई हैं। १ दैवी २ मानुषी ३ तिरश्चीना (पशु-पक्षिसंबन्धी)। इस प्रकार तीनों लोक अनेक रूपों वाली भगवती रेवती के द्वारा व्याप्त हैं। इसलिये रेवती सम्पूर्ण लोकों में भयंकर कही जाती है। देवता उसका सम्मान करते हैं इसलिये उनकी सन्तानों की वृद्धि होती है। उनकी सन्तानों का विच्छेद (वियोग) नहीं होता है। जो इस तथ्य को जानता है उसकी सन्तान का विच्छेद नहीं होता। सम्पूर्ण लोकों की गुरु तथा व्यापक इस रेवती को सब ऋषियों से पूर्व महर्षि कश्यप ने ही उग्र तपस्या के द्वारा प्राप्त किया था। इससे रेवती ने कश्यप को आशीर्वाद दिया तथा उसके बहुत सारी आयुष्मती सन्तान हो गई जो अविच्छिन्न थी। इससे उसके सबसे अधिक सन्तान हो गई। रेवती को प्रकारान्तरूप (पूर्णरूप) से जानकर कश्यप ने लोक कल्याण के लिये शिष्यों को रेवतीकल्प का ज्ञान प्रदान किया ॥६२॥

अतो वृद्धजीवक ! निरुक्ता दैवी रेवती; मानुषीमत्र व्याख्यास्यामः—तत्र यथोक्तैरधर्मद्वारैर्यां यां स्त्रियमत्र प्रविशति, तां तां स्त्रियमनुवर्तयिष्यामः ।।६३।।

२९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]

इस प्रकार हे वृद्धजीवक ! दैवी रेवती का वर्णन कर दिया गया है। अब हम मानुषी रेवती का व्याख्यान करेंगे। यथोक्त अधर्म उपायों के द्वारा जिस २ स्त्री में वह प्रवेश करती है उस २ स्त्री का हम अनुवर्तन करेंगे ॥६३॥

कस्मिन् वयसि काले वा कस्मिन् कर्मणि वा मुने । स्त्रियमाविशते क्रुद्धा भगवञ्जातहारिणी ॥६४॥

हे भगवन् ! क्रुद्ध हुई जातहारिणी (रेवती) किस अवस्था काल तथा कर्म में स्त्री में प्रविष्ट होती है ॥६४॥

अथोवाच भगवान् कश्यपः— रजस्वलां गर्भिणीं वा प्रसूतां वा कुटीगताम् । स्त्रियमाविशते क्रुद्धा त्रिषु कालेषु रेवती ॥६५॥ न चाधर्ममृते नारीं विशते जातहारिणी । मातुः पितुः सुतानां च साऽधर्मेण प्रवर्तते ॥६६॥ ..................... मातृणां च प्रजाक्षयम् । आयुः क्षयं च बालानां करोत्येषा स्वकर्मजम् ॥६७॥

भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—क्रुद्ध हुई रेवती तीनों कालों में रजस्वला, गर्भिणी, प्रसूता तथा कुटी में स्थित अर्थात् कुटीप्रावेशिक नामक रसायन का प्रयोग करनेवाली स्त्रीमें प्रवेश करती है। यह जातहारिणी माता, पिता अथवा पुत्रों के अधर्म के बिना स्त्री में प्रविष्ट नहीं होती है। इसकी प्रवृत्ति का कारण अधर्म ही है। यह अपने कर्मों के कारण माताओं की सन्तान का तथा बालकों की आयु का नाश करती है ॥६५-६७॥

अथ खलु वृद्धजीवक ! इमाः स्त्रियश्चतुविधा जातहारिण्याविश्य स्त्रियमत्र प्रविशति । वर्णां, वर्णान्तरां लिङ्गिनीं, कारूकीमिति । ताः खल्वतो व्याख्यास्यामः । अथो वृद्धजीवक ! ब्राह्मणीं समाविष्टां गृहानागतां स्त्रीं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदन्ति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या ब्राह्मणी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां ब्राह्मणी ऋतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या ब्राह्मणी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! क्षत्रियां जातहारिणीं समाविष्टां गृहानागतां स्त्रियं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमा-

(इति ताडपत्रपुस्तके १८० तमं पत्रम् ।)

क्रामति वा तस्याः क्षत्रिया जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां क्षत्रिया ऋतुमतीमवसिञ्चेत्, सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः क्षत्रिया जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! वैश्यां जातहारिण्याऽऽविष्ठामथो महाशूद्रीं स्त्रीं प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या वैश्या जातहारिणी भवति, अथो शूद्रा, अथो महाशूद्री वा । अथो आहुः—सैवैनां वैश्याऽथो शूद्राऽथो महाशूद्री स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वैश्या वा शूद्रा वा महाशूद्रा वा जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! सूतमागधवेनपुक्कसाम्बष्ठप्राच्यकचण्डालमुष्टिकमेत(द)डोम्बडवाकद्रुमिसिंहलोड्रखशशकयवनपह्नवतुखा(षा)-रकम्बोजावन्त्यनेमकाभीरकहूणपारंशवकुलिन्दकिरातशवरशम्बरजा जातहारिण्यो भवन्ति । अथो आहुः—तामेवैनां(ना)स्तिकनिषादप्रभृतीनां वर्णसंकराणां वा या स्त्रियो जातहारिण्याऽऽविष्टा गृहाणीयुस्ताः स्त्रीः प्रत्युपतिष्ठते, अभिवादयते, अभिनन्दयते, संव्यवहरति, संवदति, संस्पृशति, संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशति, उपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः एता वर्णसंकरजा जातहारिण्यो भवन्ति । अथो

रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २९५

आहुः—तामेवैनां स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या वर्णसङ्करा जातहारिणी स्त्री जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! लिङ्गिनी परिव्राजिका श्रमणका कण्डनी निर्ग्रन्थी चीरवल्कलधारिणी तापसी चरिका जटिनी मातृमण्डलिकी देवपरिवारिका वेक्षणिका वा जातहारिण्यो वा जातहारिण्याऽऽविष्टा वा गृहानुपेयात् तां प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते वा संव्यवहरते वा संस्पृशति संभुङ्क्तेऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्मात्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां लिङ्गिनी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्या लिङ्गिनी जातहारिणी भवति, या एवं वेद । अथो वृद्धजीवक ! अयस्करी जातहारिण्याऽऽविष्टा कार्ष्णायसेनार्हेणे^१नाभ्यैत्यथो तक्षणी दारवेणाथो कुलाली मार्तिकेनाथो पदकरी चार्मणेनाथो मालाकारी मुक्तकुसुमेनाथो कुविन्दी तानुकेनाथो सौचिकी स्यूतेनाथो रजकी सुरक्तेनाथो नेजिका निर्णिंक्तेनाथो गोपी तक्रेणाथो कारुकुणी(की) स्वेनार्हेणेन जातहारिण्याविष्टा गृहानुपेयात् तां स्त्री प्रत्युपतिष्ठतेऽभिवादयते संव्यवहरते संवदति संस्पृशति संभुङ्केऽभिहन्त्याक्रोशत्युपशेते पदमृतुनिर्माल्यवासोलङ्कारमाक्रामति वा तस्याः कारुकुणी(की)जातहारिणी भवति । अथो आहुः—सैवैनां कारुकी स्त्रियमृतुमतीमवसिञ्चेत् । सैव तत्र प्रायश्चित्तिः । स्वेनैवैनां भागधेयेन प्रजावतीं करोति । नास्याः कारुकी जातहारिणी भवति, या एवं वेद ।।६८।।

(इति ताडपत्रपुस्तके १८१ तमं पत्रम् ।)

हे वृद्धजीवक ! ये स्त्रियां वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्ण वाली), वर्णान्तरा (वर्ण संकर से उत्पन्न हुई), लिङ्गिनी तथा कारुकी आदि चार प्रकार की जातहारिणी स्त्रियों में प्रवेश करके पुनः स्त्रियों में प्रविष्ट होती है । उनका अब हम हम व्याख्यान करेंगे । जो स्त्री घरों में आई हुई तथा ब्राह्मणी जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है, अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में ब्राह्मणी जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वही ब्राह्मणी इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे । तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे ब्राह्मणी जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती है । हे वृद्धजीवक ! जो स्त्री घर में आई हुई तथा क्षत्रिय जातहारिणी द्वारा आविष्ट स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उस स्त्री में क्षत्रिय जातहारिणी प्रवेश करती है । इसका प्रायश्चित (उपचार) यही है कि वह क्षत्रिय (स्त्री) इस ऋतुमती स्त्री का अवसिंचन करे, तथा अपने भागधेय (अंश) से उसे सन्तानयुक्त कर दे । जो इस तत्त्व को जानती है उसे क्षत्रिय जातहारिणी आक्रान्त नहीं करती । हे वृद्धजीवक ! जो जातहारिणी द्वारा आविष्ट वैश्या अथवा महाशूद्री स्त्री के पास बैठती है, उसका अभिवादन करती है, उससे व्यवहार करती है, उससे बोलती है, उसका स्पर्श करती है, उसके साथ बैठकर खाती है, उसे मारती है, उसे गाली देती है, उसके साथ सोती है अथवा उसके पैर, ऋतु, माला, वस्त्र तथा अलंकारों पर आक्रमण करती है उसे वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री जातहारिणी आक्रान्त करती है । इसका प्रायश्चित्त (उपचार) यही है कि वे ही वैश्या, शूद्रा अथवा महाशूद्री स्त्रियां इस ऋतुमती स्त्री


१. अर्हेणेन उपहारेणेत्यर्थः स्यात् ।