काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 632, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कटुतैलकल्पः ? ] |
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ईषत्स्नेहाम्लयूषेण संस्कृतेन यथाबलम्। रोहितमोचयोर्वश्यं कुर्यात् काम्ब¹लिकं सदा ।।१०।।
बल के अनुसार ईषत् स्नेह एवं अम्लयुक्त यूष द्वारा संस्कृत तैल से रोहीतक (रोहेड़ा) एवं मोचरस को वश में करे तथा काम्बलिक (दधिमस्तु एवं अम्ल से सिद्ध यूष) का सेवन कराये।
वक्तव्य—काम्बलिक का लक्षण सुश्रुत सू. अ. ४६ में निम्न कहा है—दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः। तथा अन्यत्र कहा है—तक्रं कपित्थचाङ्गेरी-मरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वं खडयूषोऽयमयं काम्बलिकोऽपरः ।।१०।।
फलाम्लदीपनोपेतं कटुतैलोपसंस्कृतम्। तेनैनं भोजयेन्नित्यं यावत्प्राणो यथा भवेत् ।।११।।
इसे प्राणों के यथास्थिर होने तक नित्य फलाम्ल एवं दीपनीय द्रव्यों से युक्त तथा कटुतैल से संस्कृत भोजन कराये॥
लब्धप्राणं ततश्चैनं मात्रया पाययेत् सदा। कटुतैलं यथाशक्ति संस्कृतं नवमेव वा ।।१२।।
इसके बाद प्राणों के सम्यक् स्थित हो जाने पर इसे उचित मात्रा में यथाशक्ति संस्कृत अथवा नवीन कटुतैल का पान कराये॥१२॥
द्राक्षाकाश्मर्यमधूकबालकोशीरचन्दनैः। कटुतैलं पचेत् क्षीरे प्लीह्नि दाहोत्तरे नृणाम् ।।१३।।
द्राक्षा, गम्भारी, मुलहठी, नेत्रबाला, खस तथा चन्दन के साथ कटुतैल का क्षीर पाक करे तथा इसका प्लीहा और दाह से पीडित रोगियों को सेवन कराये॥१३॥
जीर्णेऽपराह्ने चोद्वर्त्य लघुरूष्णोदकाप्लुतः। अभयां कटुतैलेन भृष्टां दधनि साधिताम् ।।१४।। शाल्योदनेन भञ्जीत तथा काम्बलिकेन च। तच्चेद्विदाहं जनयेत् कल्याणकं ततः ।।१५।।
स्नेह के जीर्ण हो जाने पर अपराह्न काल में उद्वर्तन कर के लघु तथा उष्ण जल पीकर कटु तैल में भूनी हुई तथा दही के साथ सिद्ध की हुई हरड़ को शाली चावलों तथा काम्बलिक के साथ खिलाये। यदि इससे विदाह उत्पन्न हो तो कल्याण घृत पिलाना चाहिये॥१४-१५॥
मत्स्याः कटुकतैलं च दधि माषान् घृतं पयः। क्षारेण पारिजातस्य तत् पक्वमवचारयेत् ।।१६।। एतत्तैलघृतं प्रोक्तं प्लीहगुल्मनिवारणम्। दीपनं स्नेहनं बल्यं ग्रहणीणश्वरोगनुत् ।।१७।।
मछली, कटुतैल, दही, उड़द, घृत तथा दूध को पारिजात (रोहीतक-रोहेड़ा) के क्षार के साथ पकाकर प्रयोग करे। यह तैल तथा घृत प्लीहा और गुल्म का नाशक, दीपन, स्नेहन, बल्य तथा ग्रहणी और पार्श्व के रोगों को नष्ट करते हैं॥१६-१७॥
कर्णिकारत्वचतुलां चतुर्द्रोणे पचेदपाम्। पादशेषे समक्षीरे कषाये तत्र पाचयेत् ।।१८।। प्रस्थं कटुकतैलस्य द्वौ प्रस्थौ दधिमाषयोः। दशमूलोपसंसिद्धरोहीतरसमावपेत् ।।१९।। क्षारजीवनवर्गं च सैन्धवं दीपनं च यत्। एतत् सिद्धं प्रयोगेण कर्णिकारीयमृत्तमम् ।।२०।।
कनेर की छाल १ तुला (१०० पल), ४ द्रोण जल में डालकर पकाये। चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें समान दूध, कटुतैल १ प्रस्थ, दधि तथा माष (उड़द) २ प्रस्थ, दशमूल से सिद्ध रोहित मछली का मांसरस, क्षार, जीवनीय वर्ग, सैन्धव तथा अन्य दीपन द्रव्य डालकर पाक करें। सिद्ध हो जाने पर इस उत्तम कर्णिकार तैल का प्रयोग करे॥१८-२०॥
१. 'दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः' इति सुश्रुतः।