काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 631, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंकटुतैलकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७३
देवता, वैद्य एवं ब्राह्मणों द्वारा सिद्धि (कार्यसाधन) के निमित्त इसका प्रयोग करना चाहिये। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था॥१९५॥
(इति) कल्पेषु लशुनकल्पः ॥
कटुतैलकल्पाध्यायः ।
अथातः कटुतैलकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम कटुतैल के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। कटुतैल से अभिप्राय कड़वे तेल अर्थात् सरसों के तेल से है ॥१-२॥
कटुतैलोपदेशं तु वक्ष्यामि प्लीहनाशनम्। न ह्यतः परं किञ्चिदौषधं प्लीहशान्तये ॥३॥
प्लीहा (Spleen) को नष्ट करने वाले कटु तैल का मैं उपदेश करूंगा। प्लीहा (Enlargement of Spleen) की शान्ति के लिये इससे बढ़कर कोई ओषधि नहीं है ॥३॥
'प्लीहोदरिणमादौ तु बलिनं निरुपद्रवम्। कल्याणकेन वा स्निग्धं सर्पिषा षट्पलेन वा ॥४॥
मात्रया पाययेत्तैलं पथ्यचेष्टाशनस्थितिम्। पञ्चप्रयोगास्तस्योक्ता मात्रासात्म्यभोजनैः ॥५॥
सर्वप्रथम बलवान् एवं उपद्रव रहित प्लीहोदरी का कल्याण घृत अथवा षट्पल घृत के द्वारा स्नेहन करके मात्रा के अनुसार तैल का पान कराये। तथा उसके बाद चेष्टा, आहार एवं निवास में पथ्य का सेवन करे। मात्रा सात्म्य एवं भोजन के अनुसार इसके पांच प्रयोग कहे हैं ॥४-५॥
पलानि द्वादश ज्येष्ठा, मध्यमा षट्पला स्मृता।
मात्रा चतुष्पली ह्रस्वा, यावद्धाऽग्निबलं भवेत् ॥६॥
इसकी ज्येष्ठ मात्रा (Maximum dose) १२ पल, मध्यम मात्रा ६ पल, तथा ह्रस्व मात्रा ४ पल होती है। अथवा अग्नि एवं बल के अनुसार मात्रा का निश्चय करना चाहिये ॥६॥
स्नेहपीतोपचारं च विदध्यादखिलं भिषक्। प्रजागरनिवाताग्निस्यातन्त्र्याम्बरसेविनाम् ॥७॥
इसके बाद वैद्य रोगी को स्नेहपान के बाद का सम्पूर्ण उपचार अर्थात् जागरण, निवातस्थान, अग्नि तथा स्वतन्त्रतापूर्वक आकाश का सेवन इत्यादि कराये ॥७॥
पीतमात्रे क्रमं विद्याद् व्यथा तन्द्री च जीर्यति। उद्गारशुद्धिर्वैशद्यलाघवानि जरां गते ॥८॥
स्नेह का पान करने पर व्यथा होती है। स्नेह के जीर्ण होते हुए तन्द्रा तथा उसके जीर्ण हो जाने पर शुद्ध डकार विशदता एवं लघुता हो जाती है ॥८॥
कृशं चातिविरिक्तं च मण्डादिभिरुपक्रमेत्। बली मन्दविरिक्तश्च भुञ्जीत मृदुमोदनम् ॥९॥
कृश तथा अत्यन्त विरिक्त (जिसे बहुत विरेचन हुए हों) व्यक्ति का मण्ड आदि के द्वारा उपचार करे तथा बलवान् एवं मन्द विरिक्त (जिसे कम विरेचन हुआ हो) व्यक्ति को मृदु ओदन का सेवन कराये ॥९॥