भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]

तथा आसन के अधोवस्त्र भी लशुन युक्त बनाये। घर के द्वारों पर लशुन युक्त वस्त्र टांगे। तथा इस गन्धवर (महागन्ध) कल्प में पत्नी, भ्राता, पुत्र, दासी, तथा अन्य उपचारक आदि सबको भी अपने ही समान (लशुनवान्) कर दे अर्थात् उनके भी सम्पूर्ण अन्न-पान आदि लशुन युक्त कर दे। मन बहलाव के लिये वहां बाजे बजने चाहिये, गीतों का गान होना चाहिये, तथा वहां नट, भील एवं मल्ल अपनी २ विद्या का प्रदर्शन कर रहे हों। गन्धद्रव्य, माला एवं अन्नपान भी यथाशक्ति लशुन युक्त कर देने चाहिये। इस प्रकार गन्धमह को देखकर वायु द्वार पर से ही वापिस लौट जाता है अर्थात् उसे वातरोग बिलकुल नहीं हो सकते हैं ।।१००-१०६।।

देवदारुवने भैक्षं चरता छन्नरूपिणा। अवज्ञातेन रुद्रेण मुनिभार्या निरीक्षिताः ।।१०७।।
ततस्तासां प्रजा नासीत्ततस्ताः शरणं ययुः। भद्रकालीमुमां देवः स च तुष्टोऽब्रवीद्वचः ।।१०८।।
अयं गन्धमहो नाम तं कुरुध्वमृषिस्त्रियः। सर्वरोगविनाशाय बलरूपप्रजाकरम् ।।१०९।।
उन्मादविषशापघ्नं वातानीकविशातनम्। अश्मनीव ध्रुवा लेखा प्रजाऽवश्यं भविष्यति ।।११०।।
ततस्ता ब्रह्मवादिन्यश्चक्रुर्गन्धमहं तदा। लेभिरे चेप्सितान् कामाञ्छास्त्रं चेदं प्रचक्रिरे ।।१११।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७२ तमं पत्रम्।)

देवदारु के वन में प्रच्छन्न रूप वाले तथा अज्ञात अवस्था में भिक्षा के लिये विचरण करते हुए (महादेव) ने मुनियों की स्त्रियों को देखा। उन स्त्रियों के सन्तान न होने से वे देव (महादेव) की शरण में पहुँचीं। महादेव ने प्रसन्न होकर भद्रकाली उमा से कहा कि तुम इन ऋषियों की पत्नियों को सम्पूर्ण रोगों के नाश के लिये बल, रूप एवं सन्तान को देने वाले महान् गन्ध का प्रयोग कराओ। यह उन्माद, विष, शाप तथा वातरोगों को नष्ट करता है। तथा पत्थर की लकीर के समान निश्चित रूप से इसके प्रयोग से इन्हें अवश्य सन्तान उत्पन्न होगी। तब भगवान् का नाम लेनेवाली उन ऋषिपत्नियों ने महान् गन्ध का प्रयोग करके अभीप्सित मनोरथों को प्राप्त किया तथा इस शास्त्र का प्रारंभ किया ।।१०७-१११।।

आख्यातं गुरुपुत्राय रहस्यं ह्येतदुत्तमम्। भिषजा न प्रमादेन वक्तव्यं यत्रकुत्रचित् ।।११२।।

आचार्य द्वारा गुरुपुत्र के लिये यह उत्तम रहस्य प्रकट किया गया है इसलिये वैद्य को प्रमादवश इसको सब जगह नहीं कहना चाहिये अर्थात् प्रकाशित नहीं करना चाहिये ।।११२।।

सम्यक् सुभूषितश्चाहं त्वयेदं प्राप्नुवन्मुने ! । यं पठित्वा भिषग्लोके न क्रियास्ववसीदति ।।११३।।

हे भगवन् ! अच्छे प्रकार भूषित हुए मैंने आपके द्वारा यह प्रयोग प्राप्त किया है जिसे जानकर वैद्य चिकित्सा में अवसन्न (मूढ) नहीं होता ।।११३।।

गिरिजं क्षेत्रजं चैव द्विविधं लशुनं स्मृतम्। अमृतेन समं पूर्वं तदलाभे परं हितम् ।।११४।।

लशुन दो प्रकार का होता है—१. गिरिज (पहाड़ी) २. क्षेत्रज (देशी)। इनमें प्रथम अमृत के समान लाभदायक है तथा उसके अभाव में दूसरे (क्षेत्रज) का प्रयोग करना चाहिये ।।११४।।

देववैद्यद्विजपरैरुपयोज्यं च सिद्धये। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।११५।।

(इति कल्पेषु लशुनकल्पः ।।)