काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २७१
अथवा मांस, यवागू और दधि के साथ सिद्ध करके तथा नाना द्रव्यों से संस्कृत करके बनाये हुए निमन्दक (पूर्णरूप से न जमा हुआ दही) का प्रयोग कराना चाहिये ॥९२॥
लशुनानां पलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । क्वाथयेद्द्रोणशेषं तं पचेद्भूयो घृताढके ॥९३॥ आढकं पयसो दद्याद्गर्भं चेमं समावपेत् । लशुनानां पलशतं बीजानां श्लक्ष्णसंस्कृतम् ॥९४॥ दीपनं जीवनं वृष्यं यत्किञ्चित् सर्वमावपेत् । अक्षवद्दशमूलं च तत् सिद्धमवतारयेत् ॥९५॥ एतत् पाने च भोज्ये च हितं समधुशर्करम् ।
१०० पल लशुन ५ द्रोण जल में डालकर पकाये। एक द्रोण शेष रहने पर उसमें एक आढक घृत डालकर पुनः पाक करे। इसमें एक आढक दूध तथा १०० पल चिकने एवं संस्कृत लशुन के बीज तथा अन्य जो भी दीपनीय, जीवनीय एवं वृष्य ओषधियां मिल सकें, तथा एक अक्ष (कर्ष) दशमूल डालकर पकाये। सिद्ध होने पर इसे उतारलें। इसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पान तथा भोजन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥९३-९५॥
तेनैव विधिना तैलं बस्तिकर्मणि शस्यते ॥९६॥
उपर्युक्त विधि से ही इनका तैल बनाकर उसकी बस्ति देनी चाहिये ॥९६॥
क्लीबबन्ध्यातिवृद्धानामपि वीर्यप्रजाप्रदम् । विरेकवमनद्रव्यैः संस्कृते कुष्ठम्रक्षणम् ॥९७॥
यह नपुंसक, बन्ध्या तथा अत्यन्त वृद्ध व्यक्तियों को भी वीर्य एवं सन्तान का देने वाला है। तथा विरेचन एवं वमन द्रव्यों से संस्कृत करने पर यह कुष्ठ पर रगड़ने के लिये हितकर है ॥९७॥
श्वित्रनाडीक्रिमीणां च पानभोजनम्रक्षणे । प्रयुक्तमारोग्यकर गन्धसर्पिरनुत्तमम् ॥९८॥
श्वित्र, नाडीव्रण एवं कृमिरोगों में पान, भोजन एवं म्रक्षण (रगड़ना-स्थानिक प्रयोग) के लिये गन्धसर्पि का प्रयोग श्रेष्ठ माना जाता है ॥९८॥
अथ गन्धमहन्नाम धनिनामुपदिश्यते । यं दृष्ट्वा भज्यते शीघ्रं साक्षादपि सदागतिः ॥९९॥ रोगानीकेन सहितः सहितश्च मरुद्गणैः ।
अब धनियों के लिये गन्धमहत् (महान् गन्ध उपचार) का वर्णन किया जाता है जिसे देखकर रोगसमूह—तथा मरुत गण के साथ साक्षात् वायु भी शीघ्र ही भाग जाता है ॥९९॥
लशुनं न्यायतः खादेन्मुकुटं रचयेदपि ॥१००॥ कुर्याल्लशुनमालां च शिरसः कर्णयोरपि । बहिः प्रावरणस्यापि कुर्याल्लशुनकम्बलम् ॥१०१॥ हस्तयोः पादयोः कण्ठे बध्नीयाद्गुच्छितान्यपि । अधस्ताद्वाससश्चापि विदद्ध्याच्छयनाशने ॥१०२॥ दद्याल्लशुनचीराणि गृहद्वारेषु सर्वशः । भार्याणां भ्रातृपुत्राणां दासीनामुपचारिणाम् ॥१०३॥ सर्वेषामात्मवत् कुर्यात् कृते गन्धवरे बुधः । अन्नपानानि सर्वाणि कुर्याल्लशुनवन्ति च ॥१०४॥ वादयन्तु च वादित्रं गान्तु गीतानि चेच्छया । नटा भल्लाश्च मल्लाश्च दर्शयन्त्वात्मशिक्षितम् ॥१०५॥ गन्धमाल्यान्नपानानि यथार्हमुपकल्पयेत् । दृष्ट्वा गन्धमहं वातो द्वारादेव निवर्तते ॥१०६॥
लशुन का विधिपूर्वक सेवन करे, लशुन का मुकुट बनाकर धारण करे, सिर तथा कानों में लशुन की माला पहने, ऊपर ओढने के उत्तरीय वस्त्र एवं कम्बल में भी लशुन सिये हुए हों, हाथों पैरों कण्ठ में लशुन के गुच्छे बांधे। शयन
४० का.सं.