भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 628
२७०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

गुरुदेवाग्निपूजाश्च भक्षयन् वर्जयेद्बुधः । स्नात्वा सुगन्धिर्हृष्टात्मा पूजयेद् गुरुदेवताः ।।८५।।

लशुन का सेवन करते हुए बुद्धिमान् व्यक्ति गुरु, देव तथा अग्नि की पूजा न करे। स्नान करने के बाद सुगन्धयुक्त तथा प्रसन्न आत्मा वाला होकर गुरु तथा देवता आदि की पूजा करे।

वक्तव्य-शोढल तथा नावनीतक में भी पूरा लशुन का कल्प दिया हुआ है। नावनीतक में लिखा है—अथ शुद्धतनुः शुचिर्विविक्तः सुरविप्रानग्नितिपूज्य पावकं च। लशुनात्स्वरसं पटान्तपूतं प्रपिबेदह्नि शुभग्रर्हक्षयुक्ते ।। कुडवं कुडवादथापि चार्धं कुडवं सार्धमतोऽपि वातिमात्रम् । नियता न हि काचिदत्र मात्रा प्रपिबेद्दोषबलामयानि दृष्ट्वा ।। सतालवृन्तव्यजनानिलैः शुभैः पिबन्तमेनं समभिस्पृशेच्छनैः । भवेत्तु मूर्च्छा पिबतोऽपि वा यदि स्पृशोत्ततः शीतजलैः सचन्दनैः ।। सुरात्तृतीयांशविमूर्च्छितस्य गण्डूषमेकं प्रपिबेद्रसस्य । पूर्वं गलवब्रीडिविधानहेतोः स्थित्वा मुहूर्त्तञ्च पिबेत्सरशेषम् ।। शोढल ने इसका एक मास तक सेवन करने को लिखा है। आवश्यकतानुसार कम अथवा अधिक अवधि भी की जा सकती है। कहा है—मासः परोऽस्य रसकल्कनिषेवणाय स्वच्छन्दमप्युपदिशन्ति चिकित्सकास्तु ।। षण्मासमन्नविधिना तमु शास्त्रमाहुः पक्ष प्रयोगमपि हीनतरं रसोने ।।८५।।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि लशुने शेषकर्म यत् । बीजाढकं जलद्रोणे जर्जरीकृतमावपेत् ।।८६।। जलानित्येऽग्नि .....(?)वा गोपयेत् षष्टिकेसु वा । अव्याधिरमरप्रख्यो जीवेद्वर्षशतं नरः ।।८७।। यावद्वर्षस्थितं खादेत्तावद्वर्षशतान्यपि । जहाति च त्वचं जीर्णां त्वचमिवोरगः ।।८८।।

इसके बाद मैं लशुन कें शेष कर्मों को कहूंगा—एक द्रोण जल में एक आढक लशुन के बीजों को कूटकर डाल दे तथा उसे अग्नि पर पकाले। तब उसे सांठी के चावलों (धान्यराशि) में रखदें। इसके सेवन से मनुष्य व्याधिरहित एवं अमर होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। जितने वर्ष तक मनुष्य इसका सेवन करता है उतने सौ वर्षों तक वह रोग रहित होकर अमर के समान जीवित रहता है। जिस प्रकार सांप अपनी पुरानी त्वचा (केंचुली) को छोड़कर नवीन त्वचा प्राप्त करलेता है उसी प्रकार वह जितने वर्ष पुराने इस घृत का प्रयोग करता है उतने ही सौ वर्षों तक वह अपनी पुरानी त्वचा उतारता जाता है तथा नवीन प्राप्त करता जाता है ।।८६-८८।।

लशुनानां पलं नित्यं पले द्वे वा घृतस्य तु । मधुनः किञ्चिदव स्यात्तल्लीढ्वाऽनु पिबेत् पयः ।।८९।। संवत्सरमजीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् । सोऽपि सर्वरुजाहीनः शतवर्षाणि जीवति ।।९०।।

लशुन—१. पल। घृत—२. पल। इसमें थोड़ा मधु मिलाकर अवलेह बनाकर नित्य सेवन करे तथा उसके बाद दूध पिये। एक वर्ष तक इसका भोजन के जीर्ण हो जाने पर सेवन करे और दूध तथा चावल का भोजन करे। इससे वह व्यक्ति सम्पूर्ण रोगों से रहित होकर १०० वर्षों तक जीवित रहता है ।।८९-९०।।

आमानि यो न शक्नोति तस्य भृष्टानि सर्पिषि । प^१त्रपूपलिकावच्च संस्कृतान्युपयोजयेत् ।।९१।।

जो व्यक्ति कच्चे लशुन का प्रयोग न कर सके उसको घी में भूनकर तथा शाक के पत्तों की बनी पकौड़ियों की तरह संस्कृत करके प्रयोग कराये ।।९१।।

सिद्धानि सह मांसैर्वा यवाग्वा दाधिकेन वा । निम^२न्दकाश्च शस्यन्ते नानाद्रव्योपसंस्कृताः ।।९२।।


१. शाकपत्रकृतपोलिका (पकौड़ी) वदित्यर्थः । २. मन्दजातं (अव्यक्तरसेषद्नीभूतक्षीररूपं) दधि मन्दकं, तद्रूपा इत्यर्थः ।