काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
| २७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लशुनकल्प ? ] |
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गुरुदेवाग्निपूजाश्च भक्षयन् वर्जयेद्बुधः । स्नात्वा सुगन्धिर्हृष्टात्मा पूजयेद् गुरुदेवताः ।।८५।।
लशुन का सेवन करते हुए बुद्धिमान् व्यक्ति गुरु, देव तथा अग्नि की पूजा न करे। स्नान करने के बाद सुगन्धयुक्त तथा प्रसन्न आत्मा वाला होकर गुरु तथा देवता आदि की पूजा करे।
वक्तव्य-शोढल तथा नावनीतक में भी पूरा लशुन का कल्प दिया हुआ है। नावनीतक में लिखा है—अथ शुद्धतनुः शुचिर्विविक्तः सुरविप्रानग्नितिपूज्य पावकं च। लशुनात्स्वरसं पटान्तपूतं प्रपिबेदह्नि शुभग्रर्हक्षयुक्ते ।। कुडवं कुडवादथापि चार्धं कुडवं सार्धमतोऽपि वातिमात्रम् । नियता न हि काचिदत्र मात्रा प्रपिबेद्दोषबलामयानि दृष्ट्वा ।। सतालवृन्तव्यजनानिलैः शुभैः पिबन्तमेनं समभिस्पृशेच्छनैः । भवेत्तु मूर्च्छा पिबतोऽपि वा यदि स्पृशोत्ततः शीतजलैः सचन्दनैः ।। सुरात्तृतीयांशविमूर्च्छितस्य गण्डूषमेकं प्रपिबेद्रसस्य । पूर्वं गलवब्रीडिविधानहेतोः स्थित्वा मुहूर्त्तञ्च पिबेत्सरशेषम् ।। शोढल ने इसका एक मास तक सेवन करने को लिखा है। आवश्यकतानुसार कम अथवा अधिक अवधि भी की जा सकती है। कहा है—मासः परोऽस्य रसकल्कनिषेवणाय स्वच्छन्दमप्युपदिशन्ति चिकित्सकास्तु ।। षण्मासमन्नविधिना तमु शास्त्रमाहुः पक्ष प्रयोगमपि हीनतरं रसोने ।।८५।।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि लशुने शेषकर्म यत् । बीजाढकं जलद्रोणे जर्जरीकृतमावपेत् ।।८६।। जलानित्येऽग्नि .....(?)वा गोपयेत् षष्टिकेसु वा । अव्याधिरमरप्रख्यो जीवेद्वर्षशतं नरः ।।८७।। यावद्वर्षस्थितं खादेत्तावद्वर्षशतान्यपि । जहाति च त्वचं जीर्णां त्वचमिवोरगः ।।८८।।
इसके बाद मैं लशुन कें शेष कर्मों को कहूंगा—एक द्रोण जल में एक आढक लशुन के बीजों को कूटकर डाल दे तथा उसे अग्नि पर पकाले। तब उसे सांठी के चावलों (धान्यराशि) में रखदें। इसके सेवन से मनुष्य व्याधिरहित एवं अमर होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है। जितने वर्ष तक मनुष्य इसका सेवन करता है उतने सौ वर्षों तक वह रोग रहित होकर अमर के समान जीवित रहता है। जिस प्रकार सांप अपनी पुरानी त्वचा (केंचुली) को छोड़कर नवीन त्वचा प्राप्त करलेता है उसी प्रकार वह जितने वर्ष पुराने इस घृत का प्रयोग करता है उतने ही सौ वर्षों तक वह अपनी पुरानी त्वचा उतारता जाता है तथा नवीन प्राप्त करता जाता है ।।८६-८८।।
लशुनानां पलं नित्यं पले द्वे वा घृतस्य तु । मधुनः किञ्चिदव स्यात्तल्लीढ्वाऽनु पिबेत् पयः ।।८९।। संवत्सरमजीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् । सोऽपि सर्वरुजाहीनः शतवर्षाणि जीवति ।।९०।।
लशुन—१. पल। घृत—२. पल। इसमें थोड़ा मधु मिलाकर अवलेह बनाकर नित्य सेवन करे तथा उसके बाद दूध पिये। एक वर्ष तक इसका भोजन के जीर्ण हो जाने पर सेवन करे और दूध तथा चावल का भोजन करे। इससे वह व्यक्ति सम्पूर्ण रोगों से रहित होकर १०० वर्षों तक जीवित रहता है ।।८९-९०।।
आमानि यो न शक्नोति तस्य भृष्टानि सर्पिषि । प^१त्रपूपलिकावच्च संस्कृतान्युपयोजयेत् ।।९१।।
जो व्यक्ति कच्चे लशुन का प्रयोग न कर सके उसको घी में भूनकर तथा शाक के पत्तों की बनी पकौड़ियों की तरह संस्कृत करके प्रयोग कराये ।।९१।।
सिद्धानि सह मांसैर्वा यवाग्वा दाधिकेन वा । निम^२न्दकाश्च शस्यन्ते नानाद्रव्योपसंस्कृताः ।।९२।।
१. शाकपत्रकृतपोलिका (पकौड़ी) वदित्यर्थः । २. मन्दजातं (अव्यक्तरसेषद्नीभूतक्षीररूपं) दधि मन्दकं, तद्रूपा इत्यर्थः ।
लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २७१
अथवा मांस, यवागू और दधि के साथ सिद्ध करके तथा नाना द्रव्यों से संस्कृत करके बनाये हुए निमन्दक (पूर्णरूप से न जमा हुआ दही) का प्रयोग कराना चाहिये ॥९२॥
लशुनानां पलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । क्वाथयेद्द्रोणशेषं तं पचेद्भूयो घृताढके ॥९३॥ आढकं पयसो दद्याद्गर्भं चेमं समावपेत् । लशुनानां पलशतं बीजानां श्लक्ष्णसंस्कृतम् ॥९४॥ दीपनं जीवनं वृष्यं यत्किञ्चित् सर्वमावपेत् । अक्षवद्दशमूलं च तत् सिद्धमवतारयेत् ॥९५॥ एतत् पाने च भोज्ये च हितं समधुशर्करम् ।
१०० पल लशुन ५ द्रोण जल में डालकर पकाये। एक द्रोण शेष रहने पर उसमें एक आढक घृत डालकर पुनः पाक करे। इसमें एक आढक दूध तथा १०० पल चिकने एवं संस्कृत लशुन के बीज तथा अन्य जो भी दीपनीय, जीवनीय एवं वृष्य ओषधियां मिल सकें, तथा एक अक्ष (कर्ष) दशमूल डालकर पकाये। सिद्ध होने पर इसे उतारलें। इसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पान तथा भोजन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥९३-९५॥
तेनैव विधिना तैलं बस्तिकर्मणि शस्यते ॥९६॥
उपर्युक्त विधि से ही इनका तैल बनाकर उसकी बस्ति देनी चाहिये ॥९६॥
क्लीबबन्ध्यातिवृद्धानामपि वीर्यप्रजाप्रदम् । विरेकवमनद्रव्यैः संस्कृते कुष्ठम्रक्षणम् ॥९७॥
यह नपुंसक, बन्ध्या तथा अत्यन्त वृद्ध व्यक्तियों को भी वीर्य एवं सन्तान का देने वाला है। तथा विरेचन एवं वमन द्रव्यों से संस्कृत करने पर यह कुष्ठ पर रगड़ने के लिये हितकर है ॥९७॥
श्वित्रनाडीक्रिमीणां च पानभोजनम्रक्षणे । प्रयुक्तमारोग्यकर गन्धसर्पिरनुत्तमम् ॥९८॥
श्वित्र, नाडीव्रण एवं कृमिरोगों में पान, भोजन एवं म्रक्षण (रगड़ना-स्थानिक प्रयोग) के लिये गन्धसर्पि का प्रयोग श्रेष्ठ माना जाता है ॥९८॥
अथ गन्धमहन्नाम धनिनामुपदिश्यते । यं दृष्ट्वा भज्यते शीघ्रं साक्षादपि सदागतिः ॥९९॥ रोगानीकेन सहितः सहितश्च मरुद्गणैः ।
अब धनियों के लिये गन्धमहत् (महान् गन्ध उपचार) का वर्णन किया जाता है जिसे देखकर रोगसमूह—तथा मरुत गण के साथ साक्षात् वायु भी शीघ्र ही भाग जाता है ॥९९॥
लशुनं न्यायतः खादेन्मुकुटं रचयेदपि ॥१००॥ कुर्याल्लशुनमालां च शिरसः कर्णयोरपि । बहिः प्रावरणस्यापि कुर्याल्लशुनकम्बलम् ॥१०१॥ हस्तयोः पादयोः कण्ठे बध्नीयाद्गुच्छितान्यपि । अधस्ताद्वाससश्चापि विदद्ध्याच्छयनाशने ॥१०२॥ दद्याल्लशुनचीराणि गृहद्वारेषु सर्वशः । भार्याणां भ्रातृपुत्राणां दासीनामुपचारिणाम् ॥१०३॥ सर्वेषामात्मवत् कुर्यात् कृते गन्धवरे बुधः । अन्नपानानि सर्वाणि कुर्याल्लशुनवन्ति च ॥१०४॥ वादयन्तु च वादित्रं गान्तु गीतानि चेच्छया । नटा भल्लाश्च मल्लाश्च दर्शयन्त्वात्मशिक्षितम् ॥१०५॥ गन्धमाल्यान्नपानानि यथार्हमुपकल्पयेत् । दृष्ट्वा गन्धमहं वातो द्वारादेव निवर्तते ॥१०६॥
लशुन का विधिपूर्वक सेवन करे, लशुन का मुकुट बनाकर धारण करे, सिर तथा कानों में लशुन की माला पहने, ऊपर ओढने के उत्तरीय वस्त्र एवं कम्बल में भी लशुन सिये हुए हों, हाथों पैरों कण्ठ में लशुन के गुच्छे बांधे। शयन
४० का.सं.
२७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]
तथा आसन के अधोवस्त्र भी लशुन युक्त बनाये। घर के द्वारों पर लशुन युक्त वस्त्र टांगे। तथा इस गन्धवर (महागन्ध) कल्प में पत्नी, भ्राता, पुत्र, दासी, तथा अन्य उपचारक आदि सबको भी अपने ही समान (लशुनवान्) कर दे अर्थात् उनके भी सम्पूर्ण अन्न-पान आदि लशुन युक्त कर दे। मन बहलाव के लिये वहां बाजे बजने चाहिये, गीतों का गान होना चाहिये, तथा वहां नट, भील एवं मल्ल अपनी २ विद्या का प्रदर्शन कर रहे हों। गन्धद्रव्य, माला एवं अन्नपान भी यथाशक्ति लशुन युक्त कर देने चाहिये। इस प्रकार गन्धमह को देखकर वायु द्वार पर से ही वापिस लौट जाता है अर्थात् उसे वातरोग बिलकुल नहीं हो सकते हैं ।।१००-१०६।।
देवदारुवने भैक्षं चरता छन्नरूपिणा। अवज्ञातेन रुद्रेण मुनिभार्या निरीक्षिताः ।।१०७।।
ततस्तासां प्रजा नासीत्ततस्ताः शरणं ययुः। भद्रकालीमुमां देवः स च तुष्टोऽब्रवीद्वचः ।।१०८।।
अयं गन्धमहो नाम तं कुरुध्वमृषिस्त्रियः। सर्वरोगविनाशाय बलरूपप्रजाकरम् ।।१०९।।
उन्मादविषशापघ्नं वातानीकविशातनम्। अश्मनीव ध्रुवा लेखा प्रजाऽवश्यं भविष्यति ।।११०।।
ततस्ता ब्रह्मवादिन्यश्चक्रुर्गन्धमहं तदा। लेभिरे चेप्सितान् कामाञ्छास्त्रं चेदं प्रचक्रिरे ।।१११।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७२ तमं पत्रम्।)
देवदारु के वन में प्रच्छन्न रूप वाले तथा अज्ञात अवस्था में भिक्षा के लिये विचरण करते हुए (महादेव) ने मुनियों की स्त्रियों को देखा। उन स्त्रियों के सन्तान न होने से वे देव (महादेव) की शरण में पहुँचीं। महादेव ने प्रसन्न होकर भद्रकाली उमा से कहा कि तुम इन ऋषियों की पत्नियों को सम्पूर्ण रोगों के नाश के लिये बल, रूप एवं सन्तान को देने वाले महान् गन्ध का प्रयोग कराओ। यह उन्माद, विष, शाप तथा वातरोगों को नष्ट करता है। तथा पत्थर की लकीर के समान निश्चित रूप से इसके प्रयोग से इन्हें अवश्य सन्तान उत्पन्न होगी। तब भगवान् का नाम लेनेवाली उन ऋषिपत्नियों ने महान् गन्ध का प्रयोग करके अभीप्सित मनोरथों को प्राप्त किया तथा इस शास्त्र का प्रारंभ किया ।।१०७-१११।।
आख्यातं गुरुपुत्राय रहस्यं ह्येतदुत्तमम्। भिषजा न प्रमादेन वक्तव्यं यत्रकुत्रचित् ।।११२।।
आचार्य द्वारा गुरुपुत्र के लिये यह उत्तम रहस्य प्रकट किया गया है इसलिये वैद्य को प्रमादवश इसको सब जगह नहीं कहना चाहिये अर्थात् प्रकाशित नहीं करना चाहिये ।।११२।।
सम्यक् सुभूषितश्चाहं त्वयेदं प्राप्नुवन्मुने ! । यं पठित्वा भिषग्लोके न क्रियास्ववसीदति ।।११३।।
हे भगवन् ! अच्छे प्रकार भूषित हुए मैंने आपके द्वारा यह प्रयोग प्राप्त किया है जिसे जानकर वैद्य चिकित्सा में अवसन्न (मूढ) नहीं होता ।।११३।।
गिरिजं क्षेत्रजं चैव द्विविधं लशुनं स्मृतम्। अमृतेन समं पूर्वं तदलाभे परं हितम् ।।११४।।
लशुन दो प्रकार का होता है—१. गिरिज (पहाड़ी) २. क्षेत्रज (देशी)। इनमें प्रथम अमृत के समान लाभदायक है तथा उसके अभाव में दूसरे (क्षेत्रज) का प्रयोग करना चाहिये ।।११४।।
देववैद्यद्विजपरैरुपयोज्यं च सिद्धये। इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।११५।।
(इति कल्पेषु लशुनकल्पः ।।)
कटुतैलकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७३
देवता, वैद्य एवं ब्राह्मणों द्वारा सिद्धि (कार्यसाधन) के निमित्त इसका प्रयोग करना चाहिये। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था॥१९५॥
(इति) कल्पेषु लशुनकल्पः ॥
कटुतैलकल्पाध्यायः ।
अथातः कटुतैलकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम कटुतैल के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। कटुतैल से अभिप्राय कड़वे तेल अर्थात् सरसों के तेल से है ॥१-२॥
कटुतैलोपदेशं तु वक्ष्यामि प्लीहनाशनम्। न ह्यतः परं किञ्चिदौषधं प्लीहशान्तये ॥३॥
प्लीहा (Spleen) को नष्ट करने वाले कटु तैल का मैं उपदेश करूंगा। प्लीहा (Enlargement of Spleen) की शान्ति के लिये इससे बढ़कर कोई ओषधि नहीं है ॥३॥
'प्लीहोदरिणमादौ तु बलिनं निरुपद्रवम्। कल्याणकेन वा स्निग्धं सर्पिषा षट्पलेन वा ॥४॥
मात्रया पाययेत्तैलं पथ्यचेष्टाशनस्थितिम्। पञ्चप्रयोगास्तस्योक्ता मात्रासात्म्यभोजनैः ॥५॥
सर्वप्रथम बलवान् एवं उपद्रव रहित प्लीहोदरी का कल्याण घृत अथवा षट्पल घृत के द्वारा स्नेहन करके मात्रा के अनुसार तैल का पान कराये। तथा उसके बाद चेष्टा, आहार एवं निवास में पथ्य का सेवन करे। मात्रा सात्म्य एवं भोजन के अनुसार इसके पांच प्रयोग कहे हैं ॥४-५॥
पलानि द्वादश ज्येष्ठा, मध्यमा षट्पला स्मृता।
मात्रा चतुष्पली ह्रस्वा, यावद्धाऽग्निबलं भवेत् ॥६॥
इसकी ज्येष्ठ मात्रा (Maximum dose) १२ पल, मध्यम मात्रा ६ पल, तथा ह्रस्व मात्रा ४ पल होती है। अथवा अग्नि एवं बल के अनुसार मात्रा का निश्चय करना चाहिये ॥६॥
स्नेहपीतोपचारं च विदध्यादखिलं भिषक्। प्रजागरनिवाताग्निस्यातन्त्र्याम्बरसेविनाम् ॥७॥
इसके बाद वैद्य रोगी को स्नेहपान के बाद का सम्पूर्ण उपचार अर्थात् जागरण, निवातस्थान, अग्नि तथा स्वतन्त्रतापूर्वक आकाश का सेवन इत्यादि कराये ॥७॥
पीतमात्रे क्रमं विद्याद् व्यथा तन्द्री च जीर्यति। उद्गारशुद्धिर्वैशद्यलाघवानि जरां गते ॥८॥
स्नेह का पान करने पर व्यथा होती है। स्नेह के जीर्ण होते हुए तन्द्रा तथा उसके जीर्ण हो जाने पर शुद्ध डकार विशदता एवं लघुता हो जाती है ॥८॥
कृशं चातिविरिक्तं च मण्डादिभिरुपक्रमेत्। बली मन्दविरिक्तश्च भुञ्जीत मृदुमोदनम् ॥९॥
कृश तथा अत्यन्त विरिक्त (जिसे बहुत विरेचन हुए हों) व्यक्ति का मण्ड आदि के द्वारा उपचार करे तथा बलवान् एवं मन्द विरिक्त (जिसे कम विरेचन हुआ हो) व्यक्ति को मृदु ओदन का सेवन कराये ॥९॥
| २७४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कटुतैलकल्पः ? ] |
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ईषत्स्नेहाम्लयूषेण संस्कृतेन यथाबलम्। रोहितमोचयोर्वश्यं कुर्यात् काम्ब¹लिकं सदा ।।१०।।
बल के अनुसार ईषत् स्नेह एवं अम्लयुक्त यूष द्वारा संस्कृत तैल से रोहीतक (रोहेड़ा) एवं मोचरस को वश में करे तथा काम्बलिक (दधिमस्तु एवं अम्ल से सिद्ध यूष) का सेवन कराये।
वक्तव्य—काम्बलिक का लक्षण सुश्रुत सू. अ. ४६ में निम्न कहा है—दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः। तथा अन्यत्र कहा है—तक्रं कपित्थचाङ्गेरी-मरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वं खडयूषोऽयमयं काम्बलिकोऽपरः ।।१०।।
फलाम्लदीपनोपेतं कटुतैलोपसंस्कृतम्। तेनैनं भोजयेन्नित्यं यावत्प्राणो यथा भवेत् ।।११।।
इसे प्राणों के यथास्थिर होने तक नित्य फलाम्ल एवं दीपनीय द्रव्यों से युक्त तथा कटुतैल से संस्कृत भोजन कराये॥
लब्धप्राणं ततश्चैनं मात्रया पाययेत् सदा। कटुतैलं यथाशक्ति संस्कृतं नवमेव वा ।।१२।।
इसके बाद प्राणों के सम्यक् स्थित हो जाने पर इसे उचित मात्रा में यथाशक्ति संस्कृत अथवा नवीन कटुतैल का पान कराये॥१२॥
द्राक्षाकाश्मर्यमधूकबालकोशीरचन्दनैः। कटुतैलं पचेत् क्षीरे प्लीह्नि दाहोत्तरे नृणाम् ।।१३।।
द्राक्षा, गम्भारी, मुलहठी, नेत्रबाला, खस तथा चन्दन के साथ कटुतैल का क्षीर पाक करे तथा इसका प्लीहा और दाह से पीडित रोगियों को सेवन कराये॥१३॥
जीर्णेऽपराह्ने चोद्वर्त्य लघुरूष्णोदकाप्लुतः। अभयां कटुतैलेन भृष्टां दधनि साधिताम् ।।१४।। शाल्योदनेन भञ्जीत तथा काम्बलिकेन च। तच्चेद्विदाहं जनयेत् कल्याणकं ततः ।।१५।।
स्नेह के जीर्ण हो जाने पर अपराह्न काल में उद्वर्तन कर के लघु तथा उष्ण जल पीकर कटु तैल में भूनी हुई तथा दही के साथ सिद्ध की हुई हरड़ को शाली चावलों तथा काम्बलिक के साथ खिलाये। यदि इससे विदाह उत्पन्न हो तो कल्याण घृत पिलाना चाहिये॥१४-१५॥
मत्स्याः कटुकतैलं च दधि माषान् घृतं पयः। क्षारेण पारिजातस्य तत् पक्वमवचारयेत् ।।१६।। एतत्तैलघृतं प्रोक्तं प्लीहगुल्मनिवारणम्। दीपनं स्नेहनं बल्यं ग्रहणीणश्वरोगनुत् ।।१७।।
मछली, कटुतैल, दही, उड़द, घृत तथा दूध को पारिजात (रोहीतक-रोहेड़ा) के क्षार के साथ पकाकर प्रयोग करे। यह तैल तथा घृत प्लीहा और गुल्म का नाशक, दीपन, स्नेहन, बल्य तथा ग्रहणी और पार्श्व के रोगों को नष्ट करते हैं॥१६-१७॥
कर्णिकारत्वचतुलां चतुर्द्रोणे पचेदपाम्। पादशेषे समक्षीरे कषाये तत्र पाचयेत् ।।१८।। प्रस्थं कटुकतैलस्य द्वौ प्रस्थौ दधिमाषयोः। दशमूलोपसंसिद्धरोहीतरसमावपेत् ।।१९।। क्षारजीवनवर्गं च सैन्धवं दीपनं च यत्। एतत् सिद्धं प्रयोगेण कर्णिकारीयमृत्तमम् ।।२०।।
कनेर की छाल १ तुला (१०० पल), ४ द्रोण जल में डालकर पकाये। चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें समान दूध, कटुतैल १ प्रस्थ, दधि तथा माष (उड़द) २ प्रस्थ, दशमूल से सिद्ध रोहित मछली का मांसरस, क्षार, जीवनीय वर्ग, सैन्धव तथा अन्य दीपन द्रव्य डालकर पाक करें। सिद्ध हो जाने पर इस उत्तम कर्णिकार तैल का प्रयोग करे॥१८-२०॥
१. 'दधिमस्त्वम्लसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः' इति सुश्रुतः।
षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७५
उद्वर्त्तनं ब्रह्मचर्यं कटुतैलोपसेवनम् । सुखाः शय्यासनस्वप्नाश्चिन्तेर्ष्याभयवर्जनम् ।। २१ ।। कटुतैल के सेवनकाल में उद्वर्त्तन (उबटन), ब्रह्मचर्य, सुखकारी शय्या तथा आसन, स्वप्न, चिन्ता, ईर्ष्या तथा भय का त्याग करना चाहिये ॥२१॥
वामपार्श्वोपशयनं दधिमत्स्योपसेवनम् । लघ्वल्पस्निग्धसेवा च शमयन्ति प्लीहोदरम् ।। २२ ।। वाम पार्श्व (बांई करवट) से शयन, दधि एवं मत्स्य का सेवन तथा लघु अल्प एवं स्निग्ध पदार्थों के सेवन से प्लीहोदर शान्त हो जाता है ॥२२॥
कर्णिकारस्य वा कल्कश्चूर्णितः स्वरसोऽपि वा । कटुतैलेन तक्रेर्वा सेवितः प्लीहनाशनः ।। २३ ।। कनेर के कल्क, चूर्ण अथवा स्वरस का कटुतैल अथवा तक्र के साथ सेवन करने से प्लीहा नष्ट हो जाती है ॥२३॥
रागसर्षपतैलं वा पूर्ववत् प्लीहनाशनम् । सेवितं मात्रया नित्यं दधिमाषौदकाशिनाम् ।। २४ ।। नित्य मात्रा के अनुसार दही, उड़द तथा भात का सेवन करने वाले व्यक्तियों में पीली सरसों का तैल पूर्वोक्तानुसार सेवन करने से प्लीहा को नष्ट करता है ॥२४॥
रागसर्षपमुष्टिं तु पिष्टं काञ्जिकयोजितम् । पिबेत् सलवणक्षारं भोज्यं काम्बलिकेन च ।। २५ ।। सप्ताहादतिवृद्धोऽपि प्लीहा प्रशममृच्छति । दाहश्चेदतिबाधेत रसक्षीरं च भोजयेत् ।। २६ ।। एक मुष्टि (मुट्ठीभर) पीली सरसों कांजी के साथ पीसकर उसमें लवण तथा क्षार मिलाकर पीना चाहिये तथा काम्बलिक के साथ भोजन करना चाहिये । इसके एक सप्ताह के प्रयोग से अत्यन्त बढ़ा हुआ (Enlarged) प्लीहा भी शान्त हो जाता है । यदि इसके प्रयोग से बहुत दाह हो तो रोगी को मांसरस तथा दूध पिलाना चाहिये ॥२५-२६॥
इत्याह भगवान् वृद्धो जीवको लोकपूजितः । बालानां महतां चैव प्लीहोदरनिवर्त्तनम् ।। २७ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १७३ तमं पत्रम् ।)
इस प्रकार बालकों तथा बड़े व्यक्तियों के प्लीहोदर की शान्ति के लिये लोकपूजित भगवान् वृद्धजीवक ने प्रवचन किया । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥२७॥
(इति कल्पस्थाने) कटुतैलकल्पः ॥
षट्कल्पाध्यायः ।
अथातः षट्कल्पं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम षट्कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । इसमें ६ ओषधियों के कल्प का विधान दिया गया है इसलिये इसका नाम षट्कल्पाध्याय है ॥१-२॥
२७६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]
मारीचमृषिमासीनं सूर्यवैश्वानरद्युतिम् । विनयेनोपसङ्गम्य प्राह स्थविरजीवकः ।। ३ ।।
सूर्य एवं वैश्वानर की कान्ति वाले, बैठे हुए महर्षि कश्यप के पास जाकर नम्रतापूर्वक वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।
भगवन्नक्षिरोगेण परिक्लिष्टस्य चक्षुषः । कदा संशमनं देयं किञ्च संशमनं हितम् । कः प्रयोगश्च तत्रोक्तः किञ्च तत्र हिताहितम् । इति पृष्टः स कल्याणं भगवान् प्रश्नमब्रवीत् ।। ५ ।।
हे भगवन् ! अक्षिरोग से पीडित बालकों की आंखों में कब तथा कौनसा संशमन देना चाहिये ? कौनसा प्रयोग कराना चाहिये ? उसमें क्या हितकर है तथा क्या हितकर नहीं है ? इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर भगवान् कश्यप ने कल्याणकारक उत्तर दिया ।।४-५।।
अक्षिरोगेण बालेषु क्लिष्टं वाऽऽश्च्योतनादिभिः । रागश्वयथुशूलास्रनिवृत्तौ षडहात् परम् ।। ६ ।। अल्पशो वा निवृत्तेषु बाधमानेषु वाऽल्पशः । रागादिषु प्रयुञ्जीत काले संशमनं हितम् ।। ७ ।।
बालकों में अक्षिरोग से पीडित आंख में राग (लालिमा-Congestion), शोथ (Swelling), शूल (Pain) तथा अंश्रुओं (Lacrimation) के शान्त हो जाने पर ६ दिन के बाद आश्चोतन (नेत्रसेचन-आंख का स्नेह द्वारा पूरण) कराना चाहिये । अथवा लालिमा आदि के थोड़ा निवृत्त हो जाने पर या थोड़ा कष्ट शेष रहने पर उचित काल में हितकर संशमन का प्रयोग करना चाहिये ।
वक्तव्य-आश्चोतन का लक्षण—उन्मीलितेऽक्षिङ्मध्ये बिन्दु भिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् । क्वाथक्षौद्रासवस्नेहबिन्दूनां यत्तु पातनम् ।। तद्द्व्यङ्गुलोन्मिते नेत्रे प्रोक्तमाश्चोतनं हितम् ।। ६-७ ।।
दूषिका चोपलेपश्च दृष्टिव्याकुलताऽरतिः । वर्त्मशोथः शिरोरोगः स्त्रावशेषेऽक्षिपक्ष्मणि ।। ८ ।। एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कुर्यात् संशमनं विधिम् । स्तनपं सह धात्र्या च स्थापयेत् पथ्यभोजने ।। ९ ।।
दूषिका (नेत्रमल), उपलेप (मुखलिप्तता), दृष्टिव्याकुलता, अरति, वर्त्मशोथ (Swelling of Lids), शिरोरोग, आंखों की पलकों से स्त्राव का आना-इत्यादि लक्षण होने पर संशमन विधि का प्रयोग करना चाहिये । तथा स्तन-पान करनेवाले शिशु और धात्री दोनों को पथ्य भोजन का सेवन कराना चाहिये ।।८-९।।
चक्षुष्या पुष्पकं माता रोचनाऽथ रसाञ्जनम् । कतकस्य फलं षष्ठं तेषां कल्पान्निबोध मे ।। १० ।।
चक्षुरोगों में चक्षुष्या (चाक्षु बीज), पुष्पक (जस्ते के फूल), माता (हरड़), रोचना (गोरोचन), रसाञ्जन (रसौंत) तथा कतक (निर्मली बीज) का फल-इन ६ द्रव्यों के कल्प को तू मेरे से सुन ।।१०।।
जन्मतश्चतुरो मासान् पञ्च षड् वाऽद्धि:रोगिणाम् । विघृष्य नारीस्तन्येन चक्षुषी प्रतिपूरयेत् ।। ११ ।।
जन्म के बाद चार, पांच या छ मास तक उपर्युक्त ओषधियों को स्त्री के दूध में घिसकर अक्षिरोगियों की आंखों में डाले ।।११।।
कांस्ये हिरण्यशकलं सस्तन्यक्षौद्रनाभिकम् । घृष्ट्वाऽक्षिणी पूरयेद्वा सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।। १२ ।।
कांसी के बर्तन में दूध, मधु एवं शंखनाभि के साथ स्वर्ण को घिसकर उससे आंखों का पूरण करना चाहिये । इससे सम्पूर्ण अक्षिरोग नष्ट हो जाते हैं ।।१२।।
षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७७
एतैः कल्याणकैर्गावृषिभिः संप्रकीर्तितौ । नाभ्यञ्जनकृतौ मुख्यौ कश्यपेन महर्षिणा ।।१३।।
इन उपर्युक्त कल्याण कारक ओषधियों में से महर्षि कश्यप ने नाभि एवं अञ्जन के दो मुख्य प्रयोग बतलाये हैं ॥१३॥
शरद्धेमन्तयोः पक्वां चक्षुष्यां ग्राहयेद्भिषक । नवे कमण्डलौ चैनामनुगुप्तां निधापयेत् ।।१४।। ततः फलान्युपत्रिंशद्यवांश्च दश साधयेत् । शरावे पूतिकां बद्ध्वा गोमयालोडितां प्लुताम् ।।१५।। यवसिद्धौ भवेत्सिद्धा तत्तस्तां निस्तुषीकृताम् । स्तन्यपिष्टां प्रयुञ्जीत विशेषश्रोपदेक्ष्यते ।।१६।।
शरद् तथा हेमन्त ऋतु में वैद्य पकी हुई चक्षुष्या (कुलथी) का ग्रहण करे इसे नवीन कमण्डलु (बर्तन) में सावधानीपूर्वक रख दे। इसके बाद शराव में वस्त्र बांधकर गोबर से आलोडित करके उसमें चक्षुष्या के ३० फलों तथा १० यवों (जौ) को सिद्ध करे। जौ के सिद्ध हो जाने पर इन्हें भी सिद्ध हुआ जानकर छिलके उतार कर दूध में घिसकर उसका लेप करना चाहिये। इसका विशेष प्रयोग आगे कहा जायेगा ॥१४-१६॥
सरागे रोचनोपेता सस्त्रावे च ससैन्धवा । दूषिकामलशोथेषु प्रयोज्या सरसक्रिया ।।१७।। सपुष्पकां सगोमूत्रां ससैन्धवरसक्रियाम् । पिल्लिमाशोथजाड्येषु चक्षुष्यां संप्रयोजयेत् ।।१८।।
लालिमायुक्त आंखों में रोचना (गोरोचन) से युक्त, स्रावयुक्त में सैन्धव सहित तथा दूषिका, मल एवं शोथ में चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये। तथा पिल्लिमा (पिल्लरोग), शोथ एवं जडता में पुष्पक (जस्ते के फूल), गोमूत्र तथा सैन्धव से युक्त चक्षुष्या की रसक्रिया का प्रयोग करना चाहिये ॥१७-१८॥
अम्ले ताम्रं च कांस्यं च विघृष्य मरिचं तथा । चक्षुष्यया समायुक्तं शमयत्यक्षिभूनिनाम् ।।१९।।
उपर्युक्त अक्षिरोगों में किसी अम्ल में चक्षुष्या के साथ ताम्र, कांसी तथा मरिच को घिसकर प्रयोग करने से आंखों के रोग अच्छे हो जाते हैं ॥१९॥
चक्षुष्यां रोचनां स्तन्यं पुष्पकं च समानयेत् । सर्वाक्षिरोगशमनो योगोऽयं संप्रकीर्तितः ।।२०।।
चक्षुष्या, रोचना, दूध तथा पुष्पक—इनको एकत्रित कर के योग बनाया जाता है। यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों का शामक कहा गया है ॥२०॥
एकाऽपि स्तन्यसंयुक्ता चक्षुष्या संप्रशस्यते । चक्षुष्याकल्प इत्येष, पुष्पकल्पं निबोध मे ।।२१।।
दूध में मिलाकर अकेली चक्षुष्या का प्रयोग भी आंखों के लिये हितकर माना गया है। इस प्रकार यह चक्षुष्या का फल कहा गया है। अब तू मेरे से पुष्पक कल्प को सुन ॥२१॥
निवाते पुंष्पकं पूतमपराह्ने प्रयोजयेत् । निशि वा शुष्कचूर्णस्य पूरयित्वाऽक्षिणी स्वपेत् ।।२२।।
निवात स्थान में अपराह्न काल में पवित्र होकर पुष्पक का प्रयोग करे। अथवा रात्रि में इसका शुष्क चूर्ण (Powder) आंखों में डालकर सो जाय ॥२२॥
रसाञ्जनेन वा सार्धं पुष्पकं मधुनाऽपि वा । स्तन्येन वा समायुक्तं सर्वानक्षिगदाञ्जयेत् ।।२३।।
पुष्पक का रसाञ्जन, मधु अथवा दूध के साथ मिलाकर प्रयोग करने से यह सम्पूर्ण अक्षिरोगों को नष्ट करता है ॥२३॥
एत एव त्रयो योगाः स्तन्यक्षौद्ररसाञ्जनैः । रोचनायाः प्रशस्यन्ते सर्वाक्षिगदशान्तये ।।२४।।
२७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् षट्कल्पः ? ]
सम्पूर्ण आंखों के रोगों को शान्त करने के लिये रोचना के भी दूध, मधु और रसाञ्जन के साथ ये ही तीन योग प्रशस्त माने गये हैं ॥२४॥
रसाञ्जनस्य चाप्येते त्रयो योगाः सहाम्भसा । कतकस्य फलस्यापि योगाश्चत्वार एव ते ॥२५॥
रसाञ्जन के भी ये ही तीन योग माने गये हैं तथा निर्मलीबीज के उपर्युक्त अनुपानो के साथ जल को मिलाकर चार योग होते हैं अर्थात् निर्मलीबीज का दूध, मधु, रसाञ्जन तथा जल के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥२५॥
अक्षिरोगप्रशमनाश्चक्षुश्च प्रसादनाः । उक्तसूत्रानुसारेण बालानां हितकाम्यया ।।२६।।
उक्त सूत्रों के अनुसार बालकों के हित की दृष्टि से चक्षुरोगों को शान्त करने वाले तथा नेत्रों के प्रसादक योग कहे गये हैं ॥२६॥
स्वादुर्विकासिनी शीता त्रिदोषशमनी शिवा । कषाया स्तम्भिनी स्निग्धा चक्षुष्या चक्षुषे हिता ।।२७।।
हरीतकी—स्वादु, विकासिनी (शरीर का विकास करने वाली), शीत, त्रिदोषशामक, कषाय, स्तम्भक तथा स्निग्ध होती है । तथा चक्षुष्या आंखों के लिये हितकर होती है ॥२७॥
रूक्षोष्णात्तिक्तलवणाऽनलघ्नी पिच्छिला घना । (इति ताडपत्रपुस्तके १७४ तमं पत्रम् ।) मङ्गल्या पापनाशनी रोचना पक्ष्मवर्धनी ।।२८।।
रोचना—रूक्ष, उष्ण, तिक्त, लवण, वातनाशक, पिच्छिल, घन, मङ्गलकारक, पापनाशक एवं पक्ष्म (पलक- Eyelashes) को बढ़ाने वाली है ॥२८॥
तीक्ष्णमुष्णं मलहरं रक्तपित्तकफापहम् । दृष्टिप्रसादनं चाशु पुष्पकं शीतमन्ततः ।।२९।।
पुष्पक—तीक्ष्ण, उष्ण एवं मलनाशक है । यह रक्तपित्त और कफ को नष्ट करता है । दृष्टि का शीघ्र ही प्रसादन करता है तथा इसका आन्तरिक गुण शीत है ॥२९॥
त्रिदोषशमनं रूक्षं षड्रसं चानुसारि च । शोधनं पक्ष्मजननं चक्षुष्यं च रसाञ्जनम् ।।३०।।
रसाञ्जन—यह त्रिदोषनाशक तथा रूक्ष है । यह छहों रसों का अनुसरण करता है । यह पक्ष्म (पलकों) का शोधक एवं जनक (उत्पन्न करने वाला) है तथा आंखों के लिये हितकर होता है ।
कषायमधुरं शीतमाशुदृष्टिप्रसादनम् । विकासि ह्लादनं स्निग्धं चक्षुष्यं कतकं विदुः ।।३१।।
निर्मलीबीज—कषाय, मधुर एवं शीत होता है । शीघ्र ही दृष्टि का प्रसादन करता है । यह विकासी, ह्लादन (प्रसन्नता को उत्पन्न करने वाला), स्निग्ध एवं चक्षुष्य माना गया है ॥३१॥
इदं तैलं तु वक्ष्यामि नाम्नोक्तं पाञ्चभौतिकम् । प्रोक्तं तीर्थकरैः सर्वैः पञ्चेन्द्रियविवर्धनम् ।।३२।।
अब मैं पाञ्चभौतिक नामक तैल का वणन करता हूँ । सब आचार्यों ने इसे पांचों इन्द्रियों की शक्ति की वृद्धि करने वाला कहा है ॥३२॥
जीवकऋषभकौ द्राक्षा मधुकं पिप्पली बला । प्रपौण्डरीकं बृहती मञ्जिष्ठा त्वक् पुनर्नवा ।।३३।।
षट्कल्पः ? ] कल्पस्थानम् २७९
शर्करांऽशुमती मेदा विडङ्गं नीलमुत्पलम् । श्वदंष्ट्रा सैन्धवं रास्ना भवेदपि निदिग्धिका ॥३४॥ समभागैः पचेदेतैस्तैलं वा यदि वा घृतम् । चतुर्गुणेन पयसा सम्यक्सिद्धं निधापयेत् ॥३५॥
जीवक, ऋषभक, द्राक्षा, मुलहठी, पिप्पली, बला, पुण्डरीक (कमल), बृहती (बर्हण्टा), मंजीठ, दालचीनी, पुनर्नवा, शर्करा, अंशुमती (शालपर्णी), मेदा, विडङ्ग, नीलकमल, गोखरू, सेंधानमक, रास्ना, निदिग्धिका (कटेरी) इनके समभाग लेकर चतुर्गुण दुग्ध से घी या तैल को अच्छी प्रकार सिद्ध करके रखें ॥३३-२५॥
नस्यमेतत् प्रयुञ्जीत यथा सिद्धौ निदर्शनम् । अक्षिरोगैश्चिरोत्पन्नैर्नस्येनानेन मुच्यते ॥३६॥
इस घृत या तैल का नस्य के रूप में प्रयोग करे। इस नस्य के प्रयोग से अत्यन्त प्राचीन अक्षिरोग भी अच्छे हो जाते हैं ॥३६॥
तिमिर पटलं काचं पिल्लमन्ध्याकुलाक्षिताम् । दूषिकां स्रावरागौ च शोथं शूलं च नाशयेत् ॥३७॥ खालित्यं पलितेन्द्राख्यौ शिरोरोगमथार्दितम् । दन्तचालं हनुव्याधि पूतित्वं स्रोतसामपि ॥३८॥ प्रजागरं प्रलापं च वाग्ध्वंसं मूकतां जडम् । बाधिर्यं हनुसंदंशं स्मृतिलोपं च नाशयेत् ॥३९॥ इन्द्रियाणि प्रसीदन्ति स्मृतिर्मेधा वपुर्बलम् । स्नेहेनानेन वर्धन्ते मङ्गल्यं पाञ्चभौतिकम् ॥४०॥ इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥
इसके प्रयोग से तिमिर रोग (लिङ्ग नाश नामकनेत्र रोगनजला), पटल, काच, पिल्ल (क्लिन्न नेत्ररोग), अन्धेपन से युक्त दृष्टि, दूषिका, स्राव, राग, शोथ, शूल इत्यादि अक्षिरोग, खालित्य (गंजापन-Baldness), पलित (बालों का सफेद होना), इन्द्रलुप्त (बालों का झड़ना), शिरोरोग, अर्दित (Facial parelysis), दांतों का हिलना, हनु के रोग, स्रोतों का दुर्गन्धित होना, जागरण (निद्रानाश), प्रलाप, वाग्ध्वंस (वाक्शक्ति-वाणी का नाश), गूंगापन (Dumbness), जड़ता, बहरापन, हनुसन्दंश तथा स्मृतिनाश इत्यादि रोग नष्ट होते हैं। इस स्नेह के प्रयोग से इन्द्रियां प्रसन्न (निर्मल) होती हैं, स्मृति, मेधा, शरीर एवं बल की वृद्धि होती है तथा यह पाञ्चभौतिक स्नेह मङ्गलकारक है।
वक्तव्य—तिमिर का लक्षण—तिमिराख्यः स वै दोषश्चतुर्थपटलं गतः । रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशमतः परम् ॥ अस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे । चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरीक्षे च विद्युतम् ॥ निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णून्यथ पश्यति । शिरानुसारिणि मले प्रथमं पटलं श्रिते ॥ अव्यक्तमीक्षते रूपं व्यक्तमप्यनिमित्ततः । प्राप्ते द्वितीयं पटलमभूतमपि पश्यति ॥ भूतन्तु यत्नादासन्नं दूरे सूक्ष्मं च नेक्षते । दूरान्तिकस्थं रूपञ्च विपर्यासेन मन्यते ॥ दोषे मण्डलसंस्थाने मण्डलानीव पश्यति । द्विवैकदृष्टिमध्यस्थे बहुधा बहुधास्थिथे ॥ दृष्टेरभन्तरगते ह्रस्ववृद्धविपर्ययम् । नान्तिकस्थमधःसंस्थे दूरगं नोपरिस्थितम् ॥ पार्श्वे पश्येत्र पार्श्वस्थे तिमिराख्योऽयमामयः ॥ पटल रोग का लक्षण—अधस्तादुपरिष्टाद्वा पटलं यस्य जायते । रुणद्धि नयने सद्यः ॥ काचरोग का लक्षण—तृतीय पटलगत नेत्र रोग (Affection of optic Nerue) को काच रोग कहते हैं। वाग्भट उत्तर. अ. १२ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—प्राप्नोति काचतां दोषे तृतीयपटलाश्रिते । तेनोर्ध्वमीक्षते नाधस्तनुचैलावतोपमम् ॥ यथावर्णं च रज्येत दृष्टिर्र्हीयेत च क्रमात् । इसी के चतुर्थपटल में पहुंचने पर लिङ्गनाश अथवा पूर्वोक्त तिमिररोग कहलाता है ॥३७-४०॥
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२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ]
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥
शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ।
अथातः शतपुष्पा(शता)वरीकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शतपुष्पा (सौंफ) तथा शतावरी के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
शतपुष्पाशतावर्त्यौ रसवीर्यविपाकतः । प्रयोगतश्च भगवंश्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥
भगवान् ! मैं शतपुष्पा तथा शतावरी के रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव को पूर्णरूप से जानना चाहता हूँ ॥३॥
इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । शतपुष्पाशतावर्त्यौ प्रोवाच गुणकर्मतः ॥४॥
इस प्रकार ज्ञानवृद्ध (ज्ञानी) शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर प्रजापति कश्यप ने शतपुष्पा तथा शतावरी के गुण एवं कर्मों का वर्णन किया ॥४॥
मधुरा बृंहणी बल्या पुष्टिवर्णाग्निवर्धनी । ऋतुप्रवर्तनी धन्या योनिशुक्रविशोधनी ॥५॥
उष्णा वातप्रशमनी मङ्गल्या पापनाशनी । पुत्रप्रदा वीर्यकरी शतपुष्पा निदर्शिता ॥६॥
शतपुष्पा के गुण—यह रस में मधुर, बृंहण तथा बलदायक है। पुष्टि, वर्ण और जाठराग्नि को बढ़ाती है। आर्तव को प्रवृत्त करती है। धन्य है। योनि और शुक्र का शोधन करती है। यह उष्ण, वातशामक, मङ्गलकारक, पापनाशक, पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा वीर्यवर्धक है ॥५-६॥
शीता कषायमधुरा स्निग्धा वृष्या रसायनी । वातपित्तविबन्धघ्नी वर्णोजोबलवर्धनी ॥७॥
स्मृतिमेधामतिकरी पथ्या पुष्पप्रजाकरी । भूतकल्मषशापघ्नी शतवीर्या शतावरी ॥८॥
यह वीर्य में शीत, रस में कषाय एवं मधुर तथा स्निग्ध घृष्य और रसायन है। वात, पित्त तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। वर्ण, ओज एवं बल की वृद्धि करती है। स्मृति, मेधा एवं मति को बढ़ाती है। पथ्यकारक है। पुष्प (मासिक स्त्राव) तथा पुत्र को उत्पन्न करती है। भूत, पाप तथा शाप को नष्ट करती है तथा यह सैकड़ों वीर्यों वाली है ॥
तयोः प्रयोगं ब्रुवते कृत्वा दोषविशोधनम् । प्रावृटशरद्वसन्तेषु धृतिपथ्यान्नसेविनाम् ॥९॥
दोषों का शोधन करके, प्रावृट्, शरद् तथा वसन्त ऋतु में धृति (धैर्य-धारणशक्ति) एवं पथ्यभोजन के सेवन पूर्वक इनका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥
आर्तवं या न पश्यन्ति पश्यन्ति विफलं च याः । अतिप्रभूतमत्यल्पमतिक्रान्तमनागतम् ॥१०॥
अकर्मण्यमविस्त्रांसि किञ्जातमृतयश्च याः । दुर्बलाऽदृढपुत्राश्च कृशाश्च वपुषाऽथ याः ॥११॥
प्रस्कन्दना विवर्णाश्च याश्च प्रचुरमूर्तयः । स्पर्शं च या न विन्दन्ति याश्च स्युः शुष्कयोनयः ॥१२॥
शतपुष्पाशतावर्त्यौ स्यातां तत्रामृतं यथा । पुमानप्युपयुञ्जानो यथोक्तानाप्नुते गुणान् ॥१३॥
शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८१
जिन स्त्रियों को आर्तव (मासिक ऋतुस्राव) नहीं होता है, अथवा जिनका मासिक स्राव विफल होता है (अर्थात् जो फल शून्य हो—जिसका गर्भप्राप्ति रूप कोई फल न हो), जिन्हें बहुत अधिक या बहुत कम मासिक स्राव आता हो, जिनका मासिक स्राव समाप्त हो गया हो (Menapanse), जिनको अभी मासिक स्राव प्रारंभ न हुआ हो, जिनका मासिक स्राव अकर्मण्य (कर्मशून्य-Inactive) तथा स्रावरहित हो, जिन्हें अनेक प्रकार का स्राव होता हो, जो दुर्बल हों, जिनकी सन्तान कमजोर हो, जो शारीरिक दृष्टि से कृश (Physically weak) हों, जिन्हें अतिसार रोग हो रहा हो अथवा जो विवर्ण तथा प्रचुरमूर्तिवाली हो, जो स्पर्श का अनुभव न करती हो तथा जिनकी योनि शुष्क हो—उन स्त्रियों में शतपुष्पा तथा शतावरी अमृत के समान गुणकारी होता है। पुरुष भी इनका सेवन करने पर उपर्युक्त गुणों को प्राप्त करता है॥१०-१३॥
चूर्णितायाः पलशतं नवे भाण्डे निधापयेत्। तच्चूर्णं शतपुष्पायाः प्रातरुत्थाय जीर्णवान् ॥१४॥ पलाधार्धं पलार्धं वा पलं वा सर्पिषा लिहेत्। शक्त्या वा तस्य जीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् ॥१५॥ विस्रंसितोपचारं च विदध्यादत्र पण्डितः। उपयुक्ते पलशते यथेष्टांल्लभते सुतान् ॥१६॥
१०० पल चूर्ण की हुई शतपुष्पा को एक नवीन पात्र में रखें। प्रातःकाल उठकर पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर इस चूर्ण का डेढ़, एक अथवा आधा पल की मात्रा में अथवा शक्ति के अनुसार घृत के साथ लेहन करे तथा उसके जीर्ण हो जाने पर दूध और चावल का भोजन करे। विद्वान् व्यक्ति यहां विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है) मनुष्य के समान उपचार करे। इस प्रकार १०० पल का सेवन करने पर यथेष्ट पुत्रों की प्राप्ति होती है॥१४-१६॥
अपि बन्ध्या च षण्ढा च सूयेते शतपुष्पया। युवा भवति वृद्धोऽपि बलवर्णौ लभेत च ॥१७॥ तेजसा चौजसा बुद्ध्या दीर्घायुष्केण मेधया। युज्यते प्रजया धृत्या वलीपलितवर्जितः ॥१८॥
शतपुष्पा के प्रयोग से बांझ एवं नपुंसक स्त्री को भी पुत्रोत्पत्ति हो जाती है। वृद्ध व्यक्ति भी बल और वर्ण को प्राप्त करके युवा हो जाता है। वह झुर्रियों तथा सफेद बालों से रहित होकर तेज, ओज, बुद्धि, दीर्घायुष्य, मेधा, सन्तान एवं धृति (धारण शक्ति) से युक्त हो जाता है॥१७-१८॥
अतो बिडालपदकं लिह्यान्मधुघृताप्लुतम्। मेधावी शतपुष्पाया मासाच्छ्रुतधरो भवेत् ॥१९॥ (इति ताडपत्रपुस्तके १७५ तमं पत्रम्।)
बुद्धिमान् मनुष्य एक मास पर्यन्त एक कर्ष (२ तो.) मात्रा में शतपुष्पा के चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ मिलाकर सेवन करने से श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला धृतिमान्) हो जाता है॥१९॥
अग्निकामस्तु मधुना, रूपार्थी क्षीरसर्पिषा। बलकामस्तु तैलेन, प्लीहकी कटुतैलयुक् ॥२०॥ कामलापाण्डुशोथेषु महिषीक्षीरमूत्रवत्। गुल्मी चैरण्डतैलेन, कुष्ठी खदिरवारिणा ॥२१॥ शुष्कविण्मत्स्यवसया पिबेन्मांसरसेन वा।। जीर्णमांसरसेनाद्यान्मुद्गमण्डेन कुष्ठिकः ।।२२।।
जाठराग्नि की वृद्धि के लिये मधु के साथ, रूप (सौन्दर्य) की वृद्धि के लिये दूध तथा घी के साथ, बलवृद्धि के लिए तिलतैल के साथ, प्लीहोदरी (प्लीहा रोगी) को कटुतैल (सरसों के तेल) के साथ, कामला, पाण्डु तथा शोथरोगी को भैंस के दूध तथा मूत्र के साथ, गुल्म रोगी को एरण्ड तैल के साथ, कुष्ठरोगी को खदिर के स्वरस अथवा क्वाथ, शुष्कमल, मछली की वसा (चर्बी), मांस रस, जीर्ण मांसवस अथवा मुद्गमण्ड के साथ शतपुष्पा का सेवन करना चाहिये॥२०-२२॥
२८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शतपुष्पाशतावरीकल्पः ? ]
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
इति कल्पस्थाने षट्कल्पः ॥
शतपुष्पाशतावरीकल्पाध्यायः ।
अथातः शतपुष्पा(शता)वरीकल्पं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शतपुष्पा (सौंफ) तथा शतावरी के कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
शतपुष्पाशतावर्यौ रसवीर्यविपाकतः । प्रयोगतश्च भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥
भगवन् ! मैं शतपुष्पा तथा शतावरी के रस, वीर्य, विपाक एवं प्रभाव को पूर्णरूप से जानना चाहता हूँ ॥३॥
इति पृष्टः स शिष्येण स्थविरेण प्रजापतिः । शतपुष्पाशतावर्यौ प्रोवाच गुणकर्मतः ॥४॥
इस प्रकार ज्ञानवृद्ध (ज्ञानी) शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर प्रजापति कश्यप ने शतपुष्पा तथा शतावरी के गुण एवं कर्मों का वर्णन किया ॥४॥
मधुरा बृंहणी बल्या पुष्टिवर्णाग्निवर्धनी । ऋतुप्रवर्तनी धन्या योनिशुक्रविशोधनी ॥५॥
उष्णा वातप्रशमनी मङ्गल्या पापनाशनी । पुत्रप्रदा वीर्यकरी शतपुष्पा निदर्शिता ॥६॥
शतपुष्पा के गुण—यह रस में मधुर, बृंहण तथा बलदायक है। पुष्टि, वर्ण और जाठराग्नि को बढ़ाती है। आर्तव को प्रवृत्त करती है। धन्य है। योनि और शुक्र का शोधन करती है। यह उष्ण, वातशामक, मङ्गलकारक, पापनाशक, पुत्रों को उत्पन्न करने वाली तथा वीर्यवर्धक है ॥५-६॥
शीता कषायमधुरा स्निग्धा वृष्या रसायनी । वातपित्तविबन्धघ्नी वर्णौजॉबलवर्धनी ॥७॥
स्मृतिमेधामतिकरी पथ्या पुष्पप्रजाकरी । भूतकल्मषशापघ्नी शतवीर्या शतावरी ॥८॥
यह वीर्य में शीत, रस में कषाय एवं मधुर तथा स्निग्ध घृष्य और रसायन है। वात, पित्त तथा विबन्ध (मलबन्ध) को नष्ट करती है। वर्ण, ओज एवं बल की वृद्धि करती है। स्मृति, मेधा एवं मति को बढ़ाती है। पथ्यकारक है। पुष्प (मासिक स्त्राव) तथा पुत्र को उत्पन्न करती है। भूत, पाप तथा शाप को नष्ट करती है तथा यह सैकड़ों वीर्यों वाली है ॥
तयोः प्रयोगं ब्रुवते कृत्वा दोषविशोधनम् । प्रावृट्शरद्वसन्तेषु धृतिपथ्यान्नसेविनाम् ॥९॥
दोषों का शोधन करके, प्रावृट्, शरद् तथा वसन्त ऋतु में धृति (धैर्य-धारणशक्ति) एवं पथ्यभोजन के सेवन पूर्वक इनका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥
आर्तवं या न पश्यन्ति पश्यन्ति विफलं च याः । अतिप्रभूतमत्यल्पमतिक्रान्तमनागतम् ॥१०॥
अकर्मण्यमविस्रंसि किञ्चानमृतयश्च याः । दुर्बलाऽदृढपुत्राश्च कृशाश्च वपुषाऽथ याः ॥११॥
प्रस्कन्दना विवर्णाश्च याश्च प्रचुरमूर्तयः । स्पर्शं च या न विन्दन्ति याश्च स्युः शुष्कयोनयः ॥१२॥
शतपुष्पाशतावर्यौ स्यातां तत्रामृतं यथा । पुमानप्युपयुञ्जानो यथोक्तानाप्नुते गुणान् ॥१३॥
शतपुष्पाशातावरीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८१
जिन स्त्रियों को आर्तव (मासिक ऋतुस्राव) नहीं होता है, अथवा जिनका मासिक स्राव विफल होता है (अर्थात् जो फल शून्य हो—जिसका गर्भप्राप्ति रूप कोई फल न हो), जिन्हें बहुत अधिक या बहुत कम मासिक स्राव आता हो, जिनका मासिक स्राव समाप्त हो गया हो (Menapanse), जिनको अभी मासिक स्राव प्रारंभ न हुआ हो, जिनका मासिक स्राव अकर्मण्य (कर्मशून्य-Inactive) तथा स्रावरहित हो, जिन्हें अनेक प्रकार का स्राव होता हो, जो दुर्बल हों, जिनकी सन्तान कमजोर हो, जो शारीरिक दृष्टि से कृश (Physically weak) हों, जिन्हें अतिसार रोग हो रहा हो अथवा जो विवर्ण तथा प्रचुरमूर्तिवाली हो, जो स्पर्श का अनुभव न करती हो तथा जिनकी योनि शुष्क हो—उन स्त्रियों में शतपुष्पा तथा शतावरी अमृत के समान गुणकारी होता है । पुरुष भी इनका सेवन करने पर उपर्युक्त गुणों को प्राप्त करता है ॥११०-१३॥
चूर्णितायाः पलशतं नवे भाण्डे निधापयेत् । तच्चूर्णं शतपुष्पायाः प्रातरुत्थाय जीर्णवान् ।।१४।। पलार्धार्थं पलार्धं वा पलं वा सर्पिषा लिहेत् । शक्त्या वा तस्य जीर्णान्ते भुञ्जीत पयसौदनम् ।।१५।। विस्रंसितोपचारं च विदध्यादत्र पण्डितः । उपयुक्ते पलशते यथेष्टांल्लभते सुतान् ।।१६।।
१०० पल चूर्ण की हुई शतपुष्पा को एक नवीन पात्र में रखें । प्रातःकाल उठकर पूर्व भोजन के जीर्ण हो जाने पर इस चूर्ण का डेढ़, एक अथवा आधा पल की मात्रा में अथवा शक्ति के अनुसार घृत के साथ लेहन करे तथा उसके जीर्ण हो जाने पर दूध और चावल का भोजन करे । विद्वान् व्यक्ति यहां विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया है) मनुष्य के समान उपचार करे । इस प्रकार १०० पल का सेवन करने पर यथेष्ट पुत्रों की प्राप्ति होती है ॥१४-१६॥
अपि बन्ध्या च षण्ढा च सूयेते शतपुष्पया । युवा भवति वृद्धोऽपि बलवर्णौ लभेत च ।।१७।। तेजसा चौजसा बुद्ध्या दीर्घायुष्केण मेधया । युज्यते प्रजया धृत्या वलीपलिंतवर्जितः ।।१८।।
शतपुष्पा के प्रयोग से बांझ एवं नपुंसक स्त्री को भी पुत्रोत्पत्ति हो जाती है । वृद्ध व्यक्ति भी बल और वर्ण को प्राप्त करके युवा हो जाता है । वह झुर्रियों तथा सफेद बालों से रहित होकर तेज, ओज, बुद्धि, दीर्घायुष्य, मेधा, सन्तान एवं धृति (धारण शक्ति) से युक्त हो जाता है ॥१७-१८॥
अतो बिडालपदकं लिह्यान्मधुघृताप्लुतम् । मेधावी शतपुष्पाया मासाच्छ्रुतधरो भवेत् ।।१९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७५ तमं पत्रम् ।)
बुद्धिमान् मनुष्य एक मास पर्यन्त एक कर्ष (२ तो.) मात्रा में शतपुष्पा के चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ मिलाकर सेवन करने से श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला धृतिमान्) हो जाता है ॥१९॥
अग्निकामस्तु मधुना, रूपार्थी क्षीरसर्पिषा । बलकामस्तु तैलेन, प्लीहकी कटुतैलयुक् ।।२०।।
कामलापाण्डुशोथेषु महिषीक्षीरमूत्रवत् । गुल्मी चैरण्डतैलेन, कुष्ठी खदिरवारिणा ।।२१।।
शुष्कविण्मत्स्यवसाया पिबेन्मांसरसेन वा ।। जीर्णमांसरसेनाद्यान्मुद्गमण्डेन कुष्ठिकः ।।२२।।
जाठराग्नि की वृद्धि के लिये मधु के साथ, रूप (सौन्दर्य) की वृद्धि के लिये दूध तथा घी के साथ, बलवृद्धि के लिए तिलतैल के साथ, प्लीहोदरी (प्लीहा रोगी) को कटुतैल (सरसों के तेल) के साथ, कामला, पाण्डु तथा शोथरोगी को भैंस के दूध तथा मूत्र के साथ, गुल्म रोगी को एरण्ड तैल के साथ, कुष्ठरोगी को खदिर के स्वरस अथवा क्वाथ, शुष्कमल, मछली की वसा (चर्बी), मांस रस, जीर्ण मांxrस अथवा मुद्गमण्ड के साथ शतपुष्पा का सेवन करना चाहिये ॥२०-२२॥
२८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
शतपुष्पापलशतं जलद्रोणेषु पञ्चसु । पादावशेषं निष्क्वाथ्य पूतं भूयो विपाचयेत् ।।२३।।
धात्रीचिकित्सिते वर्गः सामान्यो य उदाहृतः । तैलाढकं पचेत्तेन शनैः क्षीरे चतुर्गुणे ।।२४।।
तत् पक्वं नस्यपानाद्यस्नेहम्रक्षणबस्तिषु । प्रशस्तमृषिणा नित्यं यथोक्तगुणलब्धये ।।२५।।
१०० पल शतपुष्पा को ५ द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें । उसे छान कर धात्री चिकित्सा में कहे सामान्य वर्ग के साथ उसे पुनः पकाये । फिर उसमें एक आढक तैल चतुर्गुण दूध के साथ डालकर पाक करे । सिद्ध हो जाने पर यथोक्त गुणों की प्राप्ति के लिये उसे नित्य नस्य, पान, स्नेहन, मालिश एवं बस्ति आदि के द्वारा प्रयोग करने के लिये महर्षि कश्यप ने श्रेष्ठ माना है ॥२३-२५॥
य एवं शतपुष्पाया विधिर्द्दष्टोऽत्र सर्वशः । स एवोक्तः शतावर्या घृतं पाके तु शस्यते ।।२६।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।
जो शतपुष्पा से सेवन की विधि बताई गई है, वही सम्पूर्ण विधि शतावरी के घृत पाक आदि की भी समझनी चाहिये ॥२६॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति कल्पस्थाने) शतपुष्पाशतावरीकल्पः ।।
रेवतीकल्पाध्यायः ।
अथातो रेवतीकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
प्रजापतिर्वै खलु ह स्मैक एवेदं सर्वमासीत् । स कालमेवाग्रेऽसृजत । ततो देवाँश्चासुराँश्च पितॄँश्च मनुष्याँश्च सप्त च ग्राम्यान् पशूनारण्यानोषधींश्च वनस्पतींश्च । अथो स प्रजापतिरैक्षत, ततः क्षुदजायत, सा क्षुत् प्रजापतिमेवाविवेश, सोऽग्लासीत्, तस्मात् क्षुधितो ग्लायतीति । स ओषधीः क्षुत्प्रतीघातमपश्यत् । स ओषधीरादत् । स ओषधीरुपह्वित्वा क्षुधो व्यत्यमुच्यत । तस्मात् प्राणिन ओषधीरशित्वा क्षुधो व्यतिमुच्यन्ते । कर्मसु च युज्यन्ते ।।३।।
प्रारंभ में प्रजापति (ब्रह्मा) ही अकेला सब कुछ था । उसने सर्वप्रथम काल को उत्पन्न किया । उसके बाद देव, असुर, पितर, मनुष्य, सात ग्रामीण एवं जंगली पशु तथा ओषधियों एवं वनस्पतियों की रचना की । तब प्रजापति ने इच्छा की जिससे क्षुधा (भूख) की उत्पत्ति हो गई । वह क्षुधा प्रजापति में ही प्रविष्ट हो गई जिससे उसे ग्लानि (खिन्नता) हो गई इसीलिये क्षुधित (भूखे) व्यक्ति को ग्लानि होती है । उसने क्षुधा के प्रतीकार के लिये ओषधियों को देखा । तब उसने ओषधि का सेवन किया । वह ओषधि का सेवन करके क्षुधा से मुक्त हो गया । इसीलिये सब प्राणी ओषधियों को खाकर क्षुधा से मुक्त हो जाते हैं तथा अपने २ कार्यों में लगे रहते हैं ।
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८३
वक्तव्य—(i) इससे काल की महिमा बतलाई गई है। अथर्ववेद के १९वें काण्ड में भी काल की विशेष महिमा का वर्णन किया गया है। वहां ५३ तथा ५४ पूरे सूक्त काल के विषय में दिये हैं। वहां काल का घोड़े के रूप में वर्णन किया गया है। वे सूक्त निम्न प्रकार हैं—कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः। तमारोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा।। सप्तचक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभिरमृतं न्वक्षः। स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत्कालः स ईयते प्रथमो नु देवः।। पूर्णः कुम्भोऽधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तः। य इमः विश्वा भुवनानि प्रत्यङ्कालं तमाहुः परमे व्योमन्।। स एवं स भुवनान्यभरत्स एव सं भुवनानि पर्यैत्। पिता सन्नभवत्पुत्र एषां तस्माद्वै नान्यत्परमस्ति तेजः।। कालोऽमू दिवमजनयत्काल इमाः पृथिवीरुत। काले ह भूतं भव्यं चेष्टितं ह वितिष्ठते।। कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः। काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्विपश्यति।। काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्। कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः।। काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्। कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत्प्रजापतेः। तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन्प्रतिष्ठितम्। कालो ह ब्रह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्।। कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयंभूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत।। अथर्व. कां. १९ सूक्त ५३—कालादापः समभवन्कालाद्ब्रह्म तपो दिशः। कालेनॊदेति सूर्यः काले निविशते पुनः।। कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही। द्यौर्मही काल आहिता।। कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत्पुरा। कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत।। कालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्। काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः।। कालेऽयमङ्गिरा देवोऽथर्वा चाधितिष्ठतः। इमं च लोकं परमञ्च लोकं पुण्यांश्च लोकान्विधृतींश्च पुण्याः। सर्वाँल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालः स ईयते परमो नु देवः।। (ii) सप्त पशून्—वेदों में भी प्रारंभ में पशुओं को उत्पन्न करने का वर्णन मिलता है। परन्तु वहाँ सात के स्थान पर ५ पशुओं का वर्णन मिलता है। रुद्र (पशुपति) का वर्णन करते हुए अथर्ववेद में कहा है—पशुपते नमस्ते। तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।। (iii) ओषधि—ओषधि का अभिप्राय गेहूँ, चावल, जौ, तिल तथा मूंग आदि अन्न से है जो फल के पक जाने पर नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं। सुश्रुत सू. अ. १ में कहा है—‘फलपाकनिष्ठा ओषधय’ इति। इसी प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है—‘ओषध्यः फलपाकान्ता बहुपुष्पफलोपगाः’ ।।३।।
स प्रजापतिरग्रीयमेव रसमासां यस्मादग्रहीत्, तस्मात् स तृप्त एव स्यात्। ऋ^१जीषं प्राणिन ओषधीनां रसमश्नन्ति। तस्मादहरहः क्षुध्यन्ति प्रजाः ।।४।।
उस प्रजापति ने क्योंकि प्रारंभ में ही इन ओषधियों के अन्न का आदान (ग्रहण) कर लिया था इससे वह तृप्त हो गया। अन्य प्राणी ओषधियों के नीरस (रस-साररहित) चूर्ण (कल्क) को ही खाते हैं इसलिये प्राणियों को निरन्तर क्षुधा (भूख) सताती (लगती) रहती है ।।४।।
प्रजापतिर्ह्यासां सारमघसत्, स प्रजापतिस्तृप्तस्तां क्षुधं काले न्यदधात्। ततः स कालः क्षुधितो देवाँश्चासुराँश्च प्राभक्षयत् ।।५।।
प्रजापति ने इसके सार का भक्षण कर लिया इससे तृप्त होकर उसने क्षुधा (भूख) का काल में आधान कर दिया। इससे वह काल क्षुधित (भूखा) हुआ देवता तथा असुरों का भक्षण करने लगा ।।५।।
ते देवाश्चासुराश्च कालेन भक्ष्यमाणाः प्रजापतिमेव शरणमीयुः। स एभ्योऽमृतमाचख्यौ, तेऽमृतं ममन्युस्तदभवदिति। कोन्विदमग्रे भक्षयिष्यतीति। तं देवा एवाभक्षयन्त। ततो देवा अजराश्चामराश्चाभवन्।
१. ऋजीषं नाम सारांशे गृहीतेऽवशिष्टं नीरसचूर्णम्, 'ऋजीषं नीरसं सोमलताचूर्णम्' इति वेददीपे। तत्र सोमपद्मुपलक्षणम्।
२८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रेवतीकल्पः ? ]
ते देवा अमृतेन क्षुधं कालं चानुदन्त । स कालः प्रतिनुन्न इमानि भूतानि तस्मादादत्ते, ततो देवानसुराअभ्यषजन्त; तेऽन्योऽन्यं युयुधिरे । अथो दीर्घजिह्वी नामाऽसुरकन्या सा देवसेनामक़्षिणोत् । ते देवाः स्कन्दमब्रुवन्-दीर्घजिह्वी नो बलं क्षिणोति, तां शाधीति । सोऽब्रवीत्-वरं वृणुतेति, ते देवा ॐ मित्यचुः । सोऽब्रवीत्-वसुष्वेको रुद्रेष्वेक आदित्येष्वेकोऽहं स्यामिति । ते देवा ॐ मित्यचुः; स तथाऽभवत् । सोमो धरोऽग्निर्मातरिश्वा प्रभासः प्रत्यूषश्चैते पुरा सप्त बसव आसन्, तेषामष्टमो ध्रुवो नामाभवत्, ध्रुवो भवत्येषु लोकेषु य एवं वेद । अज एकपादहिर्ब्रध्नो हरो वैश्वानरो बहुरूपस्त्र्यम्बको विश्वरूपः स्थाणुः शिवो रुद्र इत्येते पुरा दश रुद्रा आसन्, तेषां गुह एकादशोऽभवच्छङ्करो नाम; सम एषु लोकेष्वस्य भवति (य एवं वेद) । इन्द्रो भगः पूषाऽर्यमा मित्रावरुणौ धाता विवस्वानंशो भास्करस्त्वष्टा विष्णुरिति द्वादश पुरा आदित्या आसन् । तेषां त्रयोदशो गुहोऽभवदहस्पतिर्नाम, तस्यैष त्रयोदशो मासोऽधिकस्तस्मात्तत्र तपति मुच्यते सर्वेभ्योऽर्तिभ्यो य एवं वेद । तस्मात् सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु छन्दःसु सर्वासु देवतासु स्कन्दो राजाऽधिपतिरित्युच्यते । तस्मै नमो नम इत्युक्त्वा सर्वार्थनारभेत, सिध्यन्ति, य एवं वेद ।। ६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७६ तमं पत्रम्)
काल के द्वारा भक्षण किये जाते हुए वे देवता एवं असुर प्रजापति की ही शरण में पहुँचे। प्रजापति ने इनके लिये अमृत का उपदेश किया। उन्होंने अमृत का मन्थन किया तथा उसे प्राप्त किया। फिर यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि पहले इसका कौन सेवन करे। तब देवताओं ने ही इसका सेवन किया। इसके सेवन से देवता अजर (जरा-वृद्धावस्था से रहित) तथा अमर हो गये। अमृत के द्वारा देवताओं ने क्षुधा एवं काल दोनों पराभूत कर दिया। पराजित होकर काल ने प्रजापति से इन भूतों को छीन लिया। तब असुरों (राक्षसों) ने देवताओं पर आक्रमण किया। वे परस्पर युद्ध करने लगे। तब दीर्घजिह्वी नाम की असुरकन्या देवताओं की सेना का संहार करने लगी। वे देवता स्कन्द (कार्तिकेय) के पास जाकर कहने लगे-दीर्घजिह्वी हमारी सेना का संहार कर रही है, उसे आप वश में करें। स्कन्द बोला-आप लोग मुझे वर देवें। देवताओं ने ओं का उच्चारण किया। तब वह कहने लगा कि वसुओं, रुद्रों तथा आदित्यों में मैं एक हो जाऊँ अर्थात् मैं वसु, रुद्र एवं आदित्य इन सबमें व्याप्त हो जाऊं। उन देवताओं ने ॐ का उच्चारण किया तथा वह वैसा ही हो गया अर्थात् वह सम्पूर्ण वसु, रुद्र एवं आदित्यों में व्याप्त हो गया। प्राचीन काल में सोम, धर, अग्नि, मातरिश्वा, प्रभास, प्रत्यूष तथा आह-ये सात वसु थे। इनमें आठवां ध्रुव नाम का वसु हो गया। सम्पूर्ण प्राणियों में निश्चित रूप से होने के कारण उसका ध्रुव नाम हुआ। प्राचीनकाल में अज, एकपात्, अहिर्ब्रध्न, हर, वैश्वानर, बहुरूप, त्र्यम्बक, विश्वरूप, स्थाणु तथा शिव-ये १० रुद्र थे। इनमें गुह (कार्तिकेय) शङ्कर नाम का ११ वां रुद्र हो गया। समः एषु लोकेष्वस्य भवति-अर्थात् इन लोकों में इसका कल्याण हो इस व्युत्पत्ति के अनुसार उसका यह नाम हो गया प्राचीनकाल में इन्द्र, भग, पूषा, अर्यमा, मित्र, वरुण, धाता, विवस्वान्, अंश, भास्कर, त्वष्टा तथा विष्णु-ये १२ आदित्य थे। इनमें कार्तिकेय अहस्पति नाम का १३ वां आदित्य हो गया। इसका वर्ष में १३ वां मास अधिक होता है इस लिये उस मास में वह अहस्पति नामक आदित्य तपता है। तथा सम्पूर्ण पीडाओं (रोगों) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक, छन्द (मन्त्रों) तथा देवताओं में स्कन्द (कार्तिकेय) राजा एवं अधिपति माना जाता है। उसे नमस्कार करके सम्पूर्ण कार्य प्रारंभ करने चाहिये। जो इस प्रकार जानता है उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
वक्तव्य— ऐतरेय ब्राह्मण में भी दीर्घजिह्वी आसुरी का वर्णन आता है। वहां कहा है—'आसुरी वै दीर्घजिह्वी देवानां प्रातः सवनमवालेट्' ॥ ऐ. ब्रा. २-३ ॥ वहां असुरों को वाणी को दीर्घजिह्वी नामक कुतिया कहा है जो कि कृपणता की शिक्षा देती है ॥ ६ ॥
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८५
अथो स दीर्घजिह्व्यै रेवतीमेव प्राहिणोत् । सा शालावृकी भूत्वाऽसुरसेनाभ्यवर्तत । अथो दीर्घजिह्वीमेवाग्रेऽभक्षयत् । तां हत्वा शकुनिर्भूत्वा सोल्का सविद्युत्साऽश्मवर्षा सर्वप्रहरणवर्षिणी बहुरूपाऽसुरानभ्यजयत्तेऽसुरा वध्यमाना बहुरूपया गर्भानीयुर्मानुषीणां चामानुषीणां च । अथो रेवती तान्सुरान् गर्भेष्वपश्यत् मानुषीणां चामानुषीणां च । तत एनानवधीज्जातहारिणी भूत्वा । तस्माज्जातहारिणी पुष्पं हन्ति वपुश्च हन्ति गर्भंश्च हन्ति जातांश्च हन्ति जायमानांश्च जनिष्यमाणांश्च हन्ति, यद्भवत्या-सुरमधार्मिकाणामपत्यमधर्मोपहतं विशेषेण । सैषा वृद्धजीवक ! रेवती बहुरूपा जातहारिणी पिलिपिच्छकेति चोच्यते, रौद्रीति चोच्यते, वारुणीति चोच्यते । सैषा स्कन्दवराज्ञया सर्वजातिषु भूता याऽधार्मिकाणि मूढयत्यसतां विच्छेदाय । वृद्धजीवक ! तस्यास्तु निदानं चागमनं च पूर्व रूपं च निवर्तनं च भेषजं चोपदेक्ष्यामः । कस्मात्, संस (जने) ह्येषामासुराणामसतां सन्तोऽपि बध्यन्ते । संसर्गे हि जातहारिणी दिव्येन चक्षुषा दृश्यते । तस्यास्तु धर्मएव निवृत्तिकारणमुक्तमिति ।।७।।
उसने दीर्घजिह्वी के लिये रेवती को भेजा। उसने शालावृकी होकर (गीदड़ या वनविलाव का रूप धारण करके) असुरों की सेना का संहार प्रारम्भ किया। तथा सबसे पहले वह दीर्घजिह्वी का ही भक्षण कर गई। उसे मारकर उसने शकुनि बनकर उल्का, विद्युत् (बिजली), पत्थरों की वर्षा करने वाली तथा सम्पूर्ण प्रहरणों (आयुधों) की वर्षा करने वाली-इत्यादि अनेक रूपों वाली होकर असुरों को पराजित किया। इस प्रकार अनेक रूपों वाली शकुनि द्वारा संहार किये जाते हुए वे असुर मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो को प्राप्त हुए अर्थात् उनके गर्भो में स्थित हो गये। रेवती ने मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों के गर्भो में उन्हें देख लिया। तब उसने जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का संहार करने वाली) बनकर उनका संहार किया। इस प्रकार वह जातहारिणी पुष्प (आर्त्तवरूप में विद्यमान गर्भ), वपु (शरीर-पिण्ड), गर्भ, उत्पन्न हुए, उत्पन्न होने वाले तथा उत्पन्न किये जाने वाले-प्राणी को नष्ट करती है। विशेषरूप से वह असुरों, अधार्मिक व्यक्तियों के पुत्रों तथा अधर्म युक्त प्राणियों को नष्ट करती है। हे वृद्धजीवक ! इस प्रकार यह अनेक रूपों वाली तथा जातहारिणी (उत्पन्न हुए प्राणियों का हरण करने वाली) रेवती-पिलिपिच्छिका, रौद्री तथा वारुणी आदि नामों से कहलाती है। यह रेवती स्कन्द की आज्ञा से सम्पूर्ण जातियों में उत्पन्न हुए अधार्मिक व्यक्तियों को मूढ कर देती है तथा दुष्टों का विच्छेद (नाश) करती है। हे वृद्धजीवक ! अब इस रेवती का निदान, आगमन (संप्राप्ति), पूर्वरूप, निवृत्ति तथा ओषधि (चिकित्सा) आदि का उपदेश किया जायगा क्योंकि असुरों एवं दुष्टों के संसर्ग से सज्जन प्राणियों का भी वध हो जाता है। संसर्ग होने पर यह यह जातहारिणी (रेवती) दिव्य चक्षुओं के द्वारा ही दिखलाई देती है तथा धर्म (धार्मिक कृत्य) ही उसकी निवृत्ति का उपाय माना गया है ॥७॥
अथ खलु या स्त्री त्यक्तधर्ममङ्गलाचारशौचदेवक्रिया देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसद्वेषिणी दुराचाराऽहङ्कृताऽनवस्थिता वैरकलिमांसाहिंसानिद्रामैथुनप्रिया चण्डाऽरुन्तुदा दन्दशूका वावदूका विगतसाध्वसाऽथोऽकस्मात्प्रहसनाऽथोऽकस्मात्प्ररोदनाऽथोऽकस्माच्छोचनाऽनृतवादिनी घस्मराऽथो आहुः सर्वशिनी स्वमतकारिणी पथ्यवचनभोजनत्यागिनी भृशमहृद्याना परविजातोपहिंसिका स्वार्थपरा परार्थविलम्बिनी प्रतीपा भर्तरि, पुत्रेषु च निःस्नेहा, तैश्च नित्यशपथा, श्वस्रश्वशुरननन्दादेवरातृृत्विजमन्यान् वा तत्स्थानीयान्महतो वाऽवमन्यते तथैनान्मन्युना निर्दहन्त्यभिशपन्ति वा, सपत्नीं वा दुःशीला पापचक्षुरभिध्यायति, मन्त्रासदौषधकर्मभिर्वैनामभिचरति, मूर्ध्नि चाभिहन्ति बालं, न चैषां सुखदुःखज्ञा भवति, मित्रद्रोहिणी ह्यमङ्गलवादिनी शान्तिहोमजपदानबलिकर्मस्वस्त्ययनावष्ठीवनपरिचुम्बनपरिष्वजनपरिवर्जिता स्थानेष्वपि भवति; तस्या एभिः कर्मभिरन्यैश्चाशुभैः पूर्वकैश्चैह कृतैरतिपानभोजनस्वप्नव्यायामसेवनैश्च छिद्रेष्वेतेष्वधर्मद्वारेषु
| २८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रेवतीकल्पः ? ] |
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जातहारिणी सज्जते। अथो परितरस्या एवंशीलो भवति। तयोरसाध्यां जातहारिणीं विद्यात्। अथो दम्पत्यो-
(इति ताडपत्रपुस्तके १७७ तमं पत्रम्)
रेकतरोऽधार्मिको भवति कृच्छ्रा भवति। उभयोस्तु धार्मिकयोरार्जवयोरनभिमानिकयोररोगयोश्च प्रजा वर्धते। यदा वा स्त्री प्रथमगर्भिणी म्रियमाणापत्याभिरालिभिर्वाऽन्याभिरचौक्षाभिरशुभाभिरसतीभिर- मानुषपरिगृहीताभिर्जातहारिणीसत्ताभिर्वा संयोगमुपैति, सह भुङ्क्ते, सह स्नाति, वस्त्रालङ्कारं वा ददाति, तासां स्नानमूत्रबलिभूमीराक्रामति, विशेषदार्तवोपहतानि चैतानि केशलोमनुखोद्धर्त्तनकजीर्णवस्त्रावकर्त्तनान्याक्रामति, भोजनशेषं पानशेषमौषधशेषं गन्धशेषं पुष्पशेषं जीर्णोपानहौ वा दधाति, तदा जातहारिणी सज्जते। यदा वैनां प्रथमगर्भिणीं वा दर्शनीयां वपुष्मतीमरोगान्पीनश्रोणिपयोधरोरुबाहुवदनामभिजायमानसौभाग्यां सुकेशीं विशालरक्तान्तलोचनामभिवर्धमानलोमराजिं स्निग्धकरचरणनखदृष्टित्वचमतिसुकुमारीमक्लेशसहामनायासपरमां कालयोगादभिवर्धमानगर्भामुपचीयमानवपुषमाप्यायमानपयसं स्त्रियं गर्भिणीं दृष्ट्वा दुरात्मानोऽन्वीक्षन्तेन चास्याः शान्तिकर्म क्रियते तदाऽस्य जातहारिणी सज्जते। एतस्मात् कारणात् पुत्रीया काम्येष्टिरह न्यहन्युक्ता, सा ह्यस्याः पापं शमयति तस्माज्जनन्याऽपि सह भोक्तुं नार्हति गर्भिणी ।।८।।
जातहारिणी किन्हें आक्रान्त करती है—? जिस स्त्री ने धर्म, मङ्गलाचार, शौच (शुद्धि) तथा देवताओं के पूजन आदि आवश्यक कर्मों का त्याग कर दिया है। जो देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध तथा सज्जनों से द्वेष करती है, जो दुराचारिणी, अहंकारयुक्त एवं अस्थिर चित्त वाली है, वैर, कलि (लड़ाई-झगड़ा), मांस, हिंसा, निद्रा एवं मैथुन आदि जिसे प्रिय हैं, जो चण्डा (भयंकर), अरन्तुदा (मर्मस्थल पर प्रहार करने वाली), दन्दशूका (बार २ खाने वाली), वावदूका (बकवाद करने वाली) तथा विगतसाध्वसा (भयरहित) है। जो सहसा हंसने, रोने, एवं शोक करने लगती है, जो असत्य भाषण करती है, जो घस्मरा (बहुत खाती) है, जो सब कुछ खा जाती है, अपनी इच्छा के अनुसार ही कार्य करती है, पथ्य वचन एवं पथ्य भोजन का जिसने त्याग किया हुआ है, जो बिलकुल श्रद्धा (विश्वास) नहीं करती है, जो दूसरों की उत्पन्न हुई सन्तान को मार देती है। जो अत्यन्त स्वार्थिनी है, परार्थ में विलम्ब करने वाली है, जो पति के प्रतिकूल रहती हो, पुत्रों से स्नेह (प्रेम) न करती हो, तथा सदा उनकी शपथ खाती हो, जो अपने श्वशुर, ननद, देवर, ऋत्विज अथवा उनके समान अन्य बड़े व्यक्तियों का अपमान करती हो, इन्हें क्रोधपूर्वक मारती हो तथा शाप देती हो। जो दुश्चरित्र स्त्री अपनी सौत के विषय में पापयुक्त विचार करती हो अथवा मन्त्रों, दूषित ओषधियों एवं दूषित कर्मों के द्वारा उसका अभिचार (मान्त्रिक क्रिया जादू टोना आदि) करती हो, जो बालकों के सिर पर प्रहार करती है तथा उसके सुख एवं दुःख का जिन्हें ज्ञान नहीं होता है। जो मित्रों से द्रोह करती है, अमङ्गल भाषण (प्रवचन) करती है, जो उचित स्थान पर भी शान्ति, होम, जप, दान, बलिकर्म, स्वस्त्ययन, अवष्ठीवन (थूकना), चुम्बन तथा आलिङ्गन आदि से रहित होती है—उस स्त्री को इन कर्मों अथवा पूर्व जन्म के या इस जन्म के अशुभ कर्मों, अतिपान (पेय पदार्थ का अत्यन्त सेवन), अतिभोजन, अतिस्वप्न, तथा अति त्व्यायाम आदि के सेवन के कारण उत्पन्न हुए दोषों अथवा अन्य अधार्मिक कार्यों के कारण जातहारिणी आक्रान्त करती है। इससे उसका पति भी इसी स्वभाव अथवा आचरण वाला हो जाता है। उन दोनों में असाध्य जातहारिणी को जाने। यदि इन दोनों पति-पत्नियों में से एक व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है तो वह जातहारिणी कृच्छ्र होती है। यदि वे दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति वाले, सरल प्रकृति के, अभिमानशून्य तथा रोगरहित हों तो उनकी सन्तान की वृद्धि होती है। अथवा जब स्त्री को प्रथम गर्भ हो उस समय म्रियमाण (जिनकी सन्तान मर जाती है) पुत्रों वाली सखियों के साथ तथा अन्य अचौक्ष (असुन्दर), अशुभ, असती तथा मनुष्यों ने जिन्हें स्वीकार नहीं किया ऐसी तथा जातहारिणियों
रेवतीकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २८७
से युक्त स्त्रियों के साथ संयोग करती हो, उनके साथ भोजन तथा स्नान करती हो, वस्त्र तथा अलंकार प्रदान करती हो, उनके स्नान, मूत्र तथा बलिस्थान को आक्रान्त करती है, तथा विशेषरूप से इनके आर्तव (मासिक स्राव) से युक्त केश, लोम, नख, उबटन, जीर्णवस्त्र तथा कटे हुए नाखून-बाल आदि पर आक्रमण करती है, उनके भोजन शेष (भोजन के अवशिष्ट अंश), पानशेष, औषधशेष, गन्धशेष, पुष्प (आर्तव) शेष पर आक्रमण करती है तथा पुराने जूतों को धारण करती है तब उन पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। अथवा जब प्रथम गर्भ वाली, दर्शनीय शरीर वाली, रोगरहित, मोटे श्रोणि, स्तन, ऊरु (जंघा), बाहु तथा सुन्दर मुख वाली, सौभाग्यवती, उत्तम बालों वाली तथा नेत्र के अन्तः भाग जिसके विशाल एवं रक्तवर्ण के हैं, जिसके लोम (शरीर के बाल) बहुत बढ़े हुए हैं, जिसके हाथ, पैर, नख, दृष्टि तथा त्वचा अत्यन्त स्निग्ध हैं, जो अत्यन्त सुकुमारी है तथा क्लेश और परिश्रम को सहन नहीं कर सकती है, कालयोग से जिसका गर्भ वृद्धि को प्राप्त हो रहा है, जिसके शरीर तथा दूध की वृद्धि हो रही है—ऐसी गर्भिणी स्त्री कोक देखकर दुष्ट लोग ईर्ष्या करते हैं, अथवा नजर लगा देते हैं और यदि उसका शान्ति कर्म न किया जाय तो उस पर जातहारिणी आक्रमण कर देती है। इसी कारण से प्रतिदिन पुत्रीय (पुत्रोत्पत्ति) के लिये काम्येष्टि (उत्तम फल की इच्छा से यज्ञ करना) करने का विधान कहा गया है। इससे उसके पाप शान्त हो जाते हैं। इस लिये गर्भिणी स्त्री को अपनी जननी (माता) के साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये ॥८॥
विशेषात् प्रथमे गर्भे प्रमादं चात्र वर्जयेत्। बहुयाज्यस्य विप्रस्य संप्रसक्तस्य याजने ॥९॥
विदुषोऽपि स्वदोषेण सज्जते जातहारिणी।
आक्षेप्ता यश्च वादेषु दाम्भिकोऽहङ्कृतश्च यः ॥१०॥
सर्वे ते जातहारिण्या भक्ष्यभूताः सयाजकाः।
विशेष कर प्रथम गर्भ में प्रमाद नहीं करना चाहिये। क्योंकि बहुत यज्ञ करने वाले ब्राह्मण तथा यज्ञ-याग में लगे हुए विद्वान् व्यक्ति पर भी अपने दोष से ही जातहारिणी आक्रमण कर देती है। विवाद में बहुत आक्षेप करने वाला, बहुत दम्भ करने वाला, अहंकारी तथा याजक आदि सब व्यक्ति जातहारिणी के भक्ष्य होते हैं ॥९-१०॥
रात्रौ यदा गतो मार्गात् पतिः पांसुलपादकः ॥११॥
स्पृशेदृतौ वा गर्भे वा तदाऽऽविशति रेवती।
जब रात्रि में मार्गस्खलित पति पांवों में धूल लगे हुए अथवा ऋतुकाल में स्त्री का स्पर्श करता है तब गर्भ में रेवती प्रविष्ट हो जाती है अर्थात् रेवती गर्भ पर आक्रमण कर देती है ॥
गृहीतां जातहारिण्या सेवित्वा यः स्त्रियं पतिः ॥१२॥
भार्यामुपैति तत्कालं सज्जते जातहारिणी।
जब पति जातहारिणी से आक्रान्त स्त्री से संभोग करके अपनी पत्नी के पास जाता है तब उस समय जातहारिणी आक्रमण कर देती है ॥१२॥
गृहीतं जातहारिण्या गृहं नित्यं च वर्जयेत् ॥१३॥
आददानं ततः किञ्चिद्गृह्णीते जातहारिणी।
जातहारिणी से आक्रान्त घर का सदा त्याग कर देना चाहिये अन्यथा उस घर में से कुछ भी लेने वाले व्यक्ति को जातहारिणी ग्रहण कर लेती है अर्थात् उसे आक्रान्त कर देती है ॥१३॥
वधभेदाङ्करणैर्गवां बन्धनदोहनैः ॥१४॥
४१ का.सं.