भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 627

लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६९

स्नेहादण्डोपचाराच्च पाण्डुशोफरुजाभयम्। स्नेहाद् गुर्वन्नपानाच्च ग्रहणीदोषकामले ।।७४।।

स्नेह तथा अण्डे के सेवन से रोगी को पाण्डु तथा शोफ रोग हो जाते हैं। तथा स्नेह एवं गुरु अन्नपान के सेवन से रोगी को ग्रहणी विकार तथा कामला हो जाता है ॥७४॥

कुमद्यमत्स्यगव्यैस्तु ज्वरकुष्ठक्षयाहतिः । रूक्षेभ्यश्चोष्णकाले च सर्वपित्तरुजाभयम् ।।७५।।
शूलातिसारसाध्मानहृल्लासच्छर्द्यरोचकाः । हिक्का विसूचिका श्वासनिद्रेऽन्येऽत्राप्युपद्रवाः ।।७६।।

दूषित मद्य, मछली एवं गौ के दूध आदि के सेवन से ज्वर, कुष्ठ तथा क्षय रोग हो जाते हैं। रूक्ष व्यक्तियों तथा उष्ण काल में लशुन के सेवन से सम्पूर्ण पैत्तिक रोग हो जाते हैं। तथा अन्य भी शूल, अतिसार, आध्मान, हृल्लास, छर्दि, अरोचक, हिक्का, विसूचिका, श्वास निद्रा आदि उपद्रव हो जाते हैं ॥७५-७६॥

उपद्रवप्रतीकारः कार्यः स्वैः स्वैश्चिकित्सितैः । छर्द्यजीर्णविदाहेषु गौरवे कफसंभवे ।।७७।।
लङ्घयित्वा यथायोगं पथ्याशी पुनराचरेत् । विरेकं वमनं नस्यं कुर्याच्च कवलग्रहान् ।।७८।।
देहव्याधिबलापेक्षी तीक्ष्णांस्त्वस्य विवर्जयेत् । श्रद्दधानो भवेद्धीमान्न त्वरेतोद्विजेत वा ।।७९।।

अपनी २ चिकित्सा के अनुसार इन उपद्रवों का प्रतीकार करना चाहिये। छर्दि, अजीर्ण, विदाह तथा कफ के कारण शरीर के भारी होने पर आवश्यकतानुसार लङ्घन (उपवास) करके पथ्य के सेवनपूर्वक देह और व्याधि के बल के अनुसार विरेचन, वमन, नस्य और कवलग्रह का प्रयोग करे तथा तीक्ष्ण वस्तुओं का परित्याग करे। शरीर के स्वस्थ हो जाने का विश्वास रखे तथा शीघ्रता और उद्वेग से दूर रहे ॥७७-७९॥

अथ पथ्याशने वृत्ते सप्ताहात् सर्वभोजनम् । निरुपद्रवमाश्वस्तं बलिनं लशुनादिनम् ।।८०।।
पाययेत्त्रिफलायुक्तं सर्पिः सलवणं त्र्यहम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७१ तमं पत्रम्।)
न विहन्याद्यथाऽऽहारः पक्वमन्नं च भोजयेत् ।।८१।।

इसके बाद पथ्य सेवनपूर्वक सप्ताह भर में सम्पूर्ण भोजन का सेवन करने वाले, उपद्रवशून्य बलवान् तथा लशुन का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को आश्वासन देकर त्रिफला युक्त घृत में लवण डालकर तीन दिन तक पिलाये। इसकी मात्रा इतनी होनी चाहिये कि भूख न मारी जाये तथा भोजन में कमी न आये। उसके बाद पकाया हुआ अन्न खिलायें ॥

काये दोषोऽस्य यो लीनः स तेनाशु प्रशाम्यति । न च स्नेहकृतो दोषः पश्चात् संप्रबाधते ।।८२।।

रोगी के शरीर में जो लीन (छिपे) हुए दोष शेष होते हैं वे इस से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं तथा स्नेह से उत्पन्न होने वाले दोष इसे पीछे से कष्ट नहीं पहुंचाते ॥८२॥

पामा विस्फोटकाः कण्डूर्बाधैर्यं जाड्यसुप्तते । एते ह्येतं प्रबाधन्ते यद्यसौ न विरिच्यते ।।८३।।

यदि रोगी को विरेचन न दिया जाये तो उसे पामा, विस्फोटक, कण्डू, बाधिर्य (बधिरता-Deafness), जडता एवं सुप्ति (अङ्गों का सो जाना) रोग हो जाते हैं ॥८३॥

तस्मान्मृदुविरेकः स्यात्त्रिवृत्त्रिफलया घृतम् । विदध्यात् सोष्णलवणमनु चोष्णोदकं पिबेत् ।।८४।।

इसलिये त्रिवृत् तथा त्रिफलायुक्त घृत में लवण मिलाकर गरम करके उसके द्वारा मृदुविरेचन देना चाहिये। तथा उसके बाद अनुपानरूप में उष्ण जल पीना चाहिये ॥८४॥