भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 626
२६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लशुनकल्प ? ]

के बने हुए पदार्थ, अच्छी तरह नमक पड़े हुए परन्तु कम स्नेह (तैल या घृत) वाली तथा पांच पट्टियों वाली अर्थात् पांच रेखाओं से चिह्नित सत्तुओं की पिन्नियां देनी चाहिये तथा लाव (बटेर), एण (मृगविशेष), तीतर, खरगोश, कपिञ्जल (सफेद तीतर), चकोर तथा अन्य भी जांगल पशु-पक्षियों का मांस देना चाहिये। तथा वह मांस उष्ण एवं अम्लरहित, लवण, स्नेह एवं वेषण (मसालों) से तथा कोल, आंवला और अनारदाने से संस्कृत होना चाहिये। तथा दाडिम, चांगरी और आंवले से सिद्ध बथुए का शाक, बुर्बु (?) या बांसे के फूल अथवा कच्ची मूली का प्रयोग करना चाहिये ॥६०-६४॥

यः स्नेहं बहु भुञ्जीत रूक्षान्नं तस्य शस्यते। अल्पस्नेहाशिनो भोज्यं सुस्निग्धं तु निधापयेत् ।।६५।।

जो स्नेह का बहुत प्रयोग करता हो उसे रूक्ष अन्न देना चाहिये तथा जो अल्प स्नेह का व्यवहार करते हों उन्हें अच्छी तरह स्निग्ध किया हुआ भोजन देना चाहिये ॥६५॥

कुष्ठी श्वासी तमी कासी प्रमेही वातकुण्डली। ध्यायी प्लीहार्शसो गुल्मी भक्षयेयुविनाऽम्भसा ।।६६।।

कुष्ठ, श्वास, तमक श्वास (Asthma), कास, प्रमेह वातकुण्डल, प्लीहा, अर्श तथा गुल्मरोग से पीडित व्यक्तियों को लशुन खाने के साथ पानी नहीं पीना चाहिये। लशुन खाने के बाद कुछ दिनों तक इन्हें यूष का सेवन करना चाहिये ॥६६॥

भक्षितान्ते ततो यूषं विदध्यात् पानभोजने। लशुनानां पलं पिष्टं द्विपलं दाडिमस्य च ।।६७।। द्विपलं द्विपलं दद्यान्मांसस्य घृततैल्योः। सुवेषणं सुलवणं सोष्णं क्षुधितमाशयेत् ।।६८।।

भूख लगने पर लशुन एक पल तथा अनारदाना, मांस, घृत तथा तैल—प्रत्येक दो २ पल—इन्हें पीसकर इसमें अच्छी तरह कसौंदी तथा नमक डालकर गरम २ सेवन कराये ॥

शालिषष्टिकगौराणां भक्तं तेनाल्पशो भजेत्। त्र्यहं सदधितक्रं तु यूषमस्योपपादयेत् ।।६९।। ततस्त्र्यहे सशूक्तं तु मुद्द्रमण्डाद्यतः परम्। न पर्युषितमश्रीयाद्यूथं नित्यं तु साधयेत् ।।७०।।

शालि तथा सांठी के सफेद चावलों का भात थोड़ा २ तीन दिन तक दही तथा तक्र (मठे) के साथ खाये तथा उसके बाद यूष का सेवन करे। इसके बाद तीन दिन तक शुक्त और तदनन्तर मुद्ग मण्ड आदि का सेवन करें। पर्युषित (बासी) पदार्थों का सेवन न करे तथा यूष भी नित्य नवीन तैयार करे ॥६९-७०॥

विरुद्धानि विदाहीनि वर्जयेच्छाकगोरसान्। अभिष्यन्दीनि चान्नानि मांसं भक्ष्यैक्षवाणि च ।।७१।। अध्वानं मैथुनं चिन्तां शोकव्यायामशोषणम्। अहितं वर्जयेत् सर्वं निवातशयनासनः ।।७२।।

लशुन सेवन के बाद अपथ्य—विरुद्ध तथा विदाह उत्पन्न करनेवाले शाक तथा गोरस (दूध अथवा दूध से बने पक्वान्न आदि), अभिष्यन्दी अन्न, मांस तथा इक्षुविकार (गन्ने से बने पदार्थ) खाने को न दे। अध्व (मार्गगमन) मैथुन, चिन्ता, शोक, व्यायाम, शरीर का शोषण करने वाले तथा अन्य भी सम्पूर्ण अहितकर भावों का त्याग करे। और निवात स्थान में शयन करे तथा बैठे ॥७१-७२॥

त्यजञ्छीतोपचारांश्च लशुनान्युपयोजयेत्। शीतोपचारात् स्नेहाच्च जलोदरमवाप्नुयात् ।।७३।।

लशुन के सेवन काल में होनेवाले उपद्रव—लशुन का सेवन करते हुए शीतल उपचारों का त्याग करना चाहिये। शीत उपचार तथा स्नेह के सेवन से रोगी को जलोदर हो जाता है ॥७३॥

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