भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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लशुनकल्प ? ]कल्पस्थानम्२६७

उष्णोदकं वा मद्यं वा शृतं वाऽनुपिबेत् पयः । हेत्वग्निरोगसात्म्यज्ञो द्वितीयं च भक्षयेत् ।।५१।।

इस के बाद उष्णजल, मद्य अथवा पकाया हुआ दूध पिये। तथा रोगों के हेतु, जाठराग्नि, रोग तथा सात्म्य को जाननेवाले व्यक्ति को किसी दूसरी वस्तु का सेवन नहीं करना चाहिये ।।५१।।

ततः कलायचूर्णेन हस्तमुष्णोदकेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १७० तमं पत्रम्) ।

प्रक्षाल्य मुखमोष्ठौ च गुरुप्रावरणोऽग्निमान् ।।५२।।
ताम्बूलपत्रं सस्वाकं(?) सजातीकटुकाफलम् । लवङ्गपुष्पकर्पूरकक्कोलफलान्वितम् ।।५३।।
निष्ठीवन् धारयेदास्ये न च निद्रां दिवा भजेत् ।
तेनास्य विलयं श्लेष्मा याति मूर्च्छा च शाम्यति ।।५४।।
सौगन्ध्यं जायते चास्य दौर्गन्ध्यं च विनश्यति । तृषितस्तु पिबेदुष्णं दीपनीयशृतं जलम् ।।५५।।
अत्यन्तपैत्तिको वाऽपि कदुष्णं पातुमर्हति । शृतं मुस्तकशुण्ठीभ्यां सशुण्ठीबालकेन वा ।।५६।।
शुण्ठ्या वा केवलं कोष्णं निशि पीत्वा सुखं स्वपेत् ।
एतेन विधिना खादेत् पक्षं मासमृतुं तथा ।।५७।।
त्रिमासं हैमनं वाऽपि चतुरो वा जितेन्द्रियः । द्रव्यमासाद्य रोगं च यथाकालं प्रयोजयेत् ।।५८।।
रूक्षाणि तु न भक्ष्याणि तानि पित्तभयाद्बुधैः । अन्नमप्यल्पशो देयं शृणु यादृशकं हितम् ।।५६।।

उसके बाद मटर के आटे तथा उष्ण जल के साथ हाथ, मुख तथा ओष्ठ का प्रक्षालन करे, भारी वस्त्र पहने, अग्नि का सेवन करे, सस्वाक (?), जायफल, कटुकी, लौंग, कर्पूर तथा शीतलचीनी आदि मसालों से युक्त पान को मुख में धारण करे तथा पहला पीक बाहर थूक दे। दिन में नींद न ले। इससे उसकी श्लेष्मा विलीन हो जाती है तथा मूर्च्छा शान्त हो जाती है। मुख में दुर्गन्ध नष्ट होकर सुगन्ध हो जाती है। प्यास लगने पर दीपनीय औषधियों से पकाया हुआ उष्ण जल पीये। यदि अत्यधिक पित्त का प्रकोप हो तो भी ईषदुष्ण जल पिया जा सकता है। अथवा नागरमोथा और सोंठ से या सोंठ और नेत्रवाला से अथवा केवल सोंठ के द्वारा पकाया हुआ ईषदुष्ण जल रात्रि को पीकर सुख से सोये। इस विधि से एक पक्ष, मास अथवा सम्पूर्ण ऋतु में इसका सेवन करना चाहिये। अथवा हेमन्त ऋतु के तीन या चार मास तक जितेन्द्रिय होकर रोग तथा काल के अनुसार इस द्रव्य का प्रयोग करे। बुद्धिमान् व्यक्ति पित्त के प्रकुपित होने के भय के कारण रूक्ष पदार्थों का सेवन न करें तथा हितकर अन्न भी थोड़ा २ कर के जिस प्रकार देना चाहिये-वह अब तू मेरे से सुन ।।५२-५९।।

कपालभृष्टपक्वाः स्युर्यवगोधूममण्डकाः । रूक्षाः सुगन्धयो हृद्याः पूपटा लवणैर्युताः ।।६०।।
शालीनां पोलिकाश्चोष्णा मुद्गकुल्माषसंस्कृतिः । सक्तुपिण्ड्यः सुलवणाः कुस्नेहाः पञ्चपट्टिताः ।।६१।।
लावैणतित्तिरिशशकपिञ्जलचकोरकाः । मांसार्थं जाङ्गलाश्चान्ये विधेया मृगपक्षिणः ।।६२।।
अभ्युषणाः संस्कृतानम्ललवणस्नेहवेषणैः । मांसं शस्तं फलाम्लं वा कोलामलकदाडिमैः ।।६३।।
वास्तुकं दाडिमे सिद्धंश्चाङ्गेर्यामलकेन वा । बुर्बु(?)वृक्षस्य वा पुष्पमथवा बालमूलकम् ।।६४।।

सुगन्धित, हृदय को अच्छी लगने वाली, नमकीन व्यञ्जनों के साथ, मिट्टी के घड़े के कपाल में सेककर पकाई हुई जौ तथा गेहूं की रूक्ष (बिना चुपड़ी हुई) रोटियां, शालिचावलों की बनाई हुई उष्ण पोलिका (रोटी), मूंग तथा कुल्माष