भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 624

२६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लशुनकल्प ? ]

पुण्येऽहनि नरो (धीरो) लशुनाननुपचारयेत् ।।३९।। बह्वग्निके निरुद्वेगं निवातशरणः सुखी । मार्गकौशेयकार्पासकोवया(?)जिनकम्बलैः ।।४०।। वासोभिर्निर्मलैर्युक्तो भृशं चागुरुधूपितैः । धूपैश्चूर्णैश्च युक्तः स्यान्नित्यं (विधुत) पादुकः ।।४१।। लशुनान्यानयेदन्यस्त्वथान्य उपकल्पयेत् । पत्राणि वर्जयेदेषां बीजं नालं च कल्पयेत् ।।४२।। सूक्ष्मच्छिन्नानि कृत्वा च सर्पिषा प्लावयेद्भूशम् । हैयङ्गवीनं तु घृतं तैलं बालोचितं नवम् ।।४३।। प्लावनं यावदुत्साहं तिष्ठेयुश्चाप्लतान्यपि । द्वित्रिपञ्चदशाष्टाहं प्रशस्तस्नेहभावितम् ।।४४।। आत्मचिन्तामनुस्वापं दन्तकाष्ठं विवर्ज्य च । जीर्णाहारः सुखोत्थायी ब्राह्मणान् स्वस्तिवाच्य च ।।४५।। आसित्वा भक्षयेत्तानि सेव्यमुष्णोदकं सदा । उपदंशेऽपि दातव्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् ।।४६।। केसरं मातुलुङ्गानामथ वा जीवदाडिमम् । मूलकं वर्जयित्वा च दद्याद्धरितकान्यपि ।।४७।।

लशुन सेवन विधि-पुण्य दिन में बहुत अग्नि से युक्त हो कर धीर मनुष्य को लशुन का सेवन करना चाहिये । उस समय रोगी को उद्वेग रहित (शान्त मन वाला) होना, निवात स्थान में सुखपूर्वक रहना, मृगचर्म, रेशम, कपास (सूत), कोवय (?) तथा अजिन के कम्बलों अथवा निर्मलवस्त्रों से युक्त होना, अगुरु के द्वारा धूपित, धूप एवं चूर्णों से युक्त होना तथा नित्य पादुकाओं (खड़ाऊं) का धारण करना चाहिये । लशुन लाने का काम एक व्यक्ति करे तथा खाने के लिये तैयार करने का काम दूसरा ही व्यक्ति करे । इसके पत्तों को पृथक् छोड़ दे तथा उसके बीज एवं नाल के छोटे २ टुकड़े करके घी में अच्छी प्रकार भून ले । इसके लिये रुग्ण बालक के अनुसार मक्खन का घी अथवा नवीन तैल को उपयोग में लाना चाहिये । घी अथवा तेल में उन्हें तबतक भूनना चाहिये जबतक कि वे तैरना बन्द करके नीचे न बैठ जांय । तब शरीर का अच्छी प्रकार स्नेहन करके आवश्यकतानुसार दो, तीन, पांच, दस अथवा आठ दिन तक आत्मचिन्ता सेवन के बाद दिन में सोना तथा दन्त धावन आदि के त्यागपूर्वक पूर्व आहार के जीर्ण हो जाने पर सुखपूर्वक शयन के बाद उठकर, ब्राह्मणों का स्वस्तिवाचन करके तथा बैठकर इनका सेवन करना चाहिये । और सदा गरम जल का सेवन करना चाहिये । अचार आदि में भी आर्द्रक, सोंठ, बिजौरे के केसर (पराग), जीवनीय गण के पदार्थ तथा अनार दाने के साथ इसको देना चाहिये । तथा मूली को छोड़कर हरित वर्ग के सब पदार्थ उसे खाने को दिये जा सकते हैं ।।३९-४७।।

अङ्गानामपि भृष्टानां चूर्ण स्यादवचूर्णनम् । त्वक्पत्रशुण्ठीमरिचसूक्ष्मैलाजातिमिश्रितम् ।।४८।। लवणान्यपि सर्वाणि लाभतस्तत्र चूर्णयेत् ।

भूने हुए लशुन में भी दालचीनी, तेजपत्र, सोंठ, मरिच, छोटी इलायची, जायफल तथा लवण आदि में से जो २ मिलसकें उनका चूर्ण डालकर प्रयोग करे ।।४८।।

सुजातं मद्यमप्यस्य युक्तितःच समुदानयेत् ।।४९।।

तथा अच्छी प्रकार से तैयार हुए मद्य का भी युक्तिपूर्वक सेवन कराना चाहिये ।।४९।।

लशुनान्यन्तरा खादेत् पिबेन्मद्यं तथाऽन्तरा । सुखमग्निमुपासीनो भक्षयेत्तृप्तये शनैः ।।५०।।

सुखपूर्वक अग्नि के पास बैठकर लशुन तथा मद्य का बारी २ से एक दूसरे के बीच में सेवन करे । अर्थात् एक बार लशुन खाये तथा पुनः मद्य इत्यादि क्रम से सेवन करे । इस प्रकार धीरे २ तृप्तिपर्यन्त इनका सेवन करे ।।५०।।

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