काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६५
करना), जीर्ण ज्वर, विदाह, तृतीयक एवं चातुर्थिक सन्तत ज्वर (Tertian and Ouarten malarial fever), स्रोतों का बन्द हो जाना, शरीर की जडता, उपशोष, अश्मरी, मूत्रकृच्छ, कुण्डल (बस्तिकुण्डल), भगन्दर, प्रदर, प्लीहारोग, शोष, पङ्गुता (चल न सकना), वातरक्त (Gout)—इत्यादि रोगों में मेधा, अग्नि एवं बल की वृद्धि के लिये लशुन का उपयोग करना चाहिये। इससे रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है तथा उस के शरीर की वृद्धि होती है ॥२६-३०॥
नान्यत्तच्छ्लैष्मिके व्याधौ पैत्तिके वा प्रयोजयेत् ।
ह्रसिष्ठः स्थविरोऽनग्निः सूतिका गर्भिणी शिशुः ॥३१॥
आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलायां तथाऽर्शसि । ऊरुस्तम्भविबन्धेषु गलवक्त्ररुजासु च ॥३२॥
सद्योवान्ते विरिक्ते च कृतनस्ये विशोषिते । तृष्णाच्छर्द्दिपरीतेषु हिक्काश्वासातिवृद्धिषु ॥३३॥
अधृतिष्वसहायेषु दरिद्रेषु दुरात्मसु । दत्तबस्तिनिरूहेषु लशुनं न प्रयोजयेत् ॥३४॥
किन रोगों में लशुन का प्रयोग नहीं करना चाहिये—श्लैष्मिक एवं पैत्तिक रोग, शरीर का ह्रास, स्थविर (वृद्धावस्था), अग्निमान्द्य, सूतिका, गर्भिणी, शिशु, आमरोग, ज्वर, अतिसार (अथवा ज्वरातिसार), कामला (Jaundice) अर्श, उरुस्तम्भ, विबन्ध, गले एवं मुख के रोग, सद्योवान्त (जिसने अभी वमन किया हो), विरिक्त (जिसे विरेचन दिया गया हो), जिसने नस्य (शिरोविरेचन) लिया है, शोष, तृष्णा, छर्दि, हिक्का एवं श्वास की अधिक वृद्धि, धैर्यरहित असहाय, दरिद्र एवं दुरात्मा रोगी तथा जिसे बस्ति एवं निरूह (आस्थापन) दिया गया है—इनमें लशुन का प्रयोग न करे ॥३१-३४॥
अक्षीणाग्निबलानां तु सर्वरोगेषु शस्यते । पौषे, माघेऽथवा मासे लशुनान्युपयोजयेत् ॥३५॥
जिनकी जाठराग्नि एवं बल क्षीण नहीं हुए हैं उनके सब रोगों में लशुन का प्रयोग किया जा सकता है। पौष एवं माघ के महीने में आयु को स्थिर करने वाले, हृदय को अच्छे लगने वाले तथा छिलके रहित लशुन का प्रयोग करना चाहिये। नावनीतक में चैत्र एवं वैशाख में लशुन के प्रयोग का विधान दिया है। कहा है—अब बहुविधमद्यमाससर्पिर्यवगोधूमभुजा सुखात्मकानाम्। अयमिह लशुनोत्सवः प्रयोज्यो हिमकाले च मधौ च माधवे च ॥३५॥
वयस्थानि सुहृद्यानि निस्तुषाण्यविशोधितम् ।
कायाग्निकालसात्म्येन मात्रा स्यान्नियमोऽपि च ॥३६॥
इसकी मात्रा तथा सेवन का नियम जाठराग्नि, काल एवं सात्म्य के अनुसार होता है ॥३६॥
चतुष्पली भवेन्मात्रा लशुनानां कनीयसी ।
षट्पली मध्यमा, श्रेष्ठा पलाष्टौ च दशाथ वा ॥३७॥
लशुन की लघु (निकृष्ट) मात्रा चार पल, मध्यम मात्रा छः पल तथा श्रेष्ठ (उत्तम) मात्रा आठ या दस पल होती है॥
शतं षष्टिः शतार्धं च मात्राः स्युर्गणितेष्वपि । शुष्केषु बद्धबीजेषु, पलवद्धरितेषु तु ॥३८॥
अथवा यावदुत्साहं भक्षयेदपि मूर्च्छितः ।
अथवा शुष्क एवं बद्धबीज (जिन के बीज अन्दर स्थिर हो गये हैं) लशुनों की गणित (संख्या) के अनुसार श्रेष्ठ, मध्यम तथा निकृष्ट मात्रा क्रमशः १००, ६० तथा ५० होती है। परन्तु हरे लशुनों की मात्राएँ पलों के अनुसार ही होती हैं। अथवा जबतक खाने का उत्साह (रुचि) हो तथा खाते २ रोगी मूर्च्छित न हो जाय तबतक खा सकता है ॥३८॥