काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लशुनकल्प ? ] |
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न रूपं भ्रश्यते चासां न प्रजा न बलायुषी।
(इति ताडपत्रपुस्तके १६९ तमं पत्रम्।)
सौभाग्यं वर्धते चासां दृढं भवति यौवनम् ॥२०॥
अमृत से उत्पन्न हुआ यह लशुन रूप अमृत-रसायन है। लशुन का सेवन करने वाले व्यक्तियों के उत्पन्न हुए दांत, मांस, नख, श्मश्रु, केश, वर्ण, अवस्था, एवं बल कभी क्षीण नहीं होते। तथा लशुन का सेवन करने वाली स्त्रियों के स्तन कभी ढीले होकर नीचे नहीं लटकते। स्त्रियों के रूप, सन्तान, बल एवं आयु क्षीण नहीं होते। उनके सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा यौवन दृढ़ होता है ॥१८-२०॥
प्रमदाऽतिविधायापि लशुनैः प्राप्नुते मृजाम्। न चैनां संप्रबाधन्ते ग्राम्यधर्मोद्भवा गदाः ॥२१॥
स्त्रियां लशुन का अत्यन्त सेवन करके भी शुद्ध रहती हैं तथा उन्हें ग्राम्यधर्म (मैथुन) से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं ॥२१॥
कटीश्रोण्यङ्गमूलानां न जातु वशगा भवेत्। न जातु बन्ध्या भवति न जात्वप्रियदर्शना ॥२२॥
लशुन का सेवन करने से स्त्रियां कटि, श्रोणि तथा अन्य अङ्गों के रोगों के वशवर्ती नहीं होती हैं अर्थात् उन्हें कटि, श्रोणि एवं अन्य अङ्गों के रोग नहीं होते हैं। स्त्री कभी बन्ध्या (बांझ) तथा अप्रियदर्शना (जिसका दर्शन प्रिय न हो) नहीं होती है ॥२२॥
दृढमेधाविदीर्घायुर्दर्शनीयप्रजा भवेत्। अश्रान्तो ग्राम्यधर्मेषु शुक्रधाश्च भवेन्नरः ॥२३॥
लशुन के सेवन से पुरुष भी दृढ़, मेधावी, दीर्घायु, एवं दर्शनीय, (सुन्दर) सन्तानयुक्त होता है, मैथुन में थकता नहीं, तथा शुक्र को धारण करने वाला होता है अर्थात् इसके प्रयोग से शुक्र की भी वृद्धि होती है ॥२३॥
यावतीभिश्च समियात्तावत्यो गर्भमाप्नुयुः। नीलोत्पलसुगन्धिश्च पद्मवर्णश्च जायते ॥२४॥
जितनी भी स्त्रियों से वह मैथुन करता है सबको गर्भस्थिति हो जाती है। तथा गर्भ भी नील कमल की सुगन्धि वाला तथा पद्म के वर्ण का होता है ॥२४॥
गात्रमार्दवमाप्नोति कण्ठमाधुर्यमेव च। ग्रहणीदोषशमनं परं कायाग्निदीपनम् ॥२५॥
इस के सेवन से शरीर मृदु एवं कण्ठ मधुर हो जाता है, ग्रहणी के दोषों की शान्ति होती है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है ॥२५॥
च्युतभग्नास्थिरोगेषु सर्वेष्वनिलरोगिषु। पुष्परेतोभ्रमे कासे कुष्ठरोगेषु सर्वशः ॥२६॥
कृमिगुल्मकिलासेषु कण्ड्वां विस्फोटकेषु च। वैवर्ण्यतिमिरश्वासनक्तान्ध्याल्पभोजने ॥२७॥
जीर्णज्वरे विदाहे च तृतीयकचतुर्थके। स्रोतसामुपघातेषु गात्रजाड्योपशोषयोः ॥२८॥
अश्मरीमूत्रकृच्छ्रेषु कुण्डलेऽथ भगन्दरे। प्रदर प्लीहशेषेषु पाङ्गुल्ये वातशोणिते ॥२९॥
लशुनान्युपयुञ्जीत मेधामिबलवृद्धये। मुच्यते व्याधिभिः क्षिप्रं वपुश्चाधिकमाप्नुते ॥३०॥
किन रोगों में लशुन का प्रयोग करना चाहिये—अस्थिच्युत (Dislocation), अस्थिभग्न (Fracture) एवं अन्य अस्थिरोग, सम्पूर्ण वातरोग, पुष्प (आर्तव संबन्धी) रोग, वीर्य संबन्धी रोग, भ्रम, कास, कुष्ठरोग, कृमि, गुल्म, किलास, कण्डू, विस्फोटक, विवर्णता, तिमिर (नेत्ररोग), श्वास, नक्तान्ध्य (Night Blindness), अल्प भोजन (कम भोजन