भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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लशुनकल्प ? ] कल्पस्थानम् २६३

अमृत का सार होने के कारण जब डकार आई तब उस डकार के द्वारा वह अमृत सहसा भूमि पर अपवित्र स्थान में गिर पड़ा। तब इन्द्र ने इन्द्राणी से कहा तू बहुत पुत्रोंवाली होगी तथा यह अमृत भी भूमि पर रसायन के रूप में उत्पन्न होगा। परन्तु स्थान के दोष के कारण वह दुर्गन्धियुक्त होगा तथा उसे द्विज (ब्राह्मण) सेवन नहीं करेंगे। तथा वह अमृत भूमि पर लशुन नाम से प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार लशुन उत्पन्न हुआ।

वक्तव्य—इसी प्रकार हमारे अन्य प्राचीन शास्त्रों में भी लशुन की उत्पत्ति भिन्न २ प्रकार से लिखी है। गदनिग्रह में कहा है—राहोरच्युतचक्रेण लूनार्धे पतिता गलात्। अमृतस्य कणा भूमौ ते रसोनत्वमागताः॥ द्विजा नाश्नन्ति तमतो दैत्यदेहसमुद्भवम्। साक्षात्वमृतसंभूतं ग्रामीणकरसायनम्॥ अर्थात् अमृत पीते हुए राहु के गले को भगवान् विष्णु द्वारा काटे जाने पर जमीन पर गिरी हुई अमृत की बूंदों से लहसुन की उत्पत्ति हुई। नावनीतक में कहा है—पुराऽमृतं प्रमथितमसुरेन्द्रैः स्वयं पपौ। तस्य चिच्छेद भगवानुत्तमाङ्गं जनार्दनः॥ कण्ठनाडीसमासन्न विच्छित्रे तस्य मूर्धनि। बिन्दवः पतिता भूमावाद्यं तस्येह जन्म तु॥ न भक्षयन्त्येनमतश्च विप्राः, शरीरसम्पर्कविनिस्सृतत्वात्। गन्धोग्रताभावत एव चास्य वदन्ति शास्त्राधिगमप्रवीणाः॥ इसी प्रकार भावप्रकाश में भी कहा है ॥७-११॥

रसोऽस्य बीजे कटुको नाले लवणतिक्तकौ।
पत्राण्यस्य कषायाणि, विपाके मधुरं च तत्॥१२॥

अब तू उसकी क्रिया (कर्म) की विधि को सुन ॥१२॥
इसके बीजों में कटु रस, पुष्प नाल में लवण एवं तिक्त रस तथा पत्तों में कषाय रस होता है। और इसका विपाक मधुर होता है।

वक्तव्य—भावप्रकाश का मत इससे भिन्न है। उसके अनुसार कन्द (मूल) में कटुरस, पत्तों में तिक्तरस, पुष्पनाल में कषायरस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीजों में मधुर रस होता है। कहा भी है—कटुश्चापीह मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः। नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥१३॥

स्वादुस्तिक्तः कटुश्चात्र यथापरपरोत्कटाः । स्वादुत्वाद्गुरु सस्नेहं बृंहणं लशुनं परम् ॥१४॥

इसमें स्वादु, तिक्त एवं कटु रस क्रमशः बलवान् होते हैं। स्वादु होने से गुरु तथा स्नेह युक्त होने से लशुन अत्यन्त बृंहण होता है। नावनीतक के लेखक ने इसे गुरु नहीं अपितु लघु माना है, कहा भी है—रसे च पाके च कटुः प्रदिष्टः पाके तथा स्वादुरुदाहृतोऽन्यः। लघुश्च गन्धेन स दुर्जरश्च वीर्येण चोष्णः प्रथितश्च वृष्यः ॥१४॥

रससाधारणत्वाच्च साधारणरुजापहम्। आयुष्यं दीपनं वृष्यं धन्यमारोग्यमग्रिमम् ॥१५॥
स्मृतिमेधाबलवयोवर्णचक्षुःप्रसादनम्। मुखसौगन्ध्यजननं स्रोतसां च विशोधनम् ॥१६॥
शुक्रशोणितगर्भाणां जननं ह्रीनिषेधयोः । सौकुमार्यकरं केश्य वयसः स्थापनं परम् ॥१७॥

तथा अन्य साधारण रसों के कारण वह साधारण रोगों को नष्ट करता है। यह आयु को बढ़ाने वाला, दीपन, वृष्य, धन्य, एवं आरोग्य का देने वाला है। स्मृति, मेधा, बल, अवस्था एवं वर्ण को बढ़ाने वाला तथा चक्षुओं के लिये हितकर है। यह मुख की दुर्गन्धि को नष्ट कर के उसे सुगन्धित करता है, स्रोतों का शोधन करता है, शुक्र शोणित (रक्त) एवं गर्भ को बढ़ाता है। लज्जा एवं निषेध का उत्पादक है। यह सुकुमारता उत्पन्न करता है, बालों के लिये हितकर है तथा आयु को स्थिर करता है ॥१५-१७॥

अमृतोद्भूतममृतं लशुनानां रसायनम्। दन्तमांसनखश्मश्रुकेशवर्णवयोबलम् ॥१८॥
न जातु भ्रश्यते जातं नृणां लशुनखादिनाम् । न पतन्ति स्तनाः स्त्रीणां नित्यं लशुनसेवनात् ॥१९॥