काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 620, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लशुनकल्प ? ] |
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धूपन करें, सम्पूर्ण पशु शक्ति एवं शान्ति के लिये तेरा धूपन करें। तथा सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, ऋत के द्वारा तेरा धूपन करता हूँ, ऋत और सत्य के द्वारा तेरा धूपन करता हूं, तथा देवताओं को नमस्कार करता हूँ। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥
(इति कल्पस्थाने) धूपनकल्पः ॥
लशुनकल्पाध्यायः ।
अथातो लशुनकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम लशुन कल्प का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
हुताग्निहोत्रमासीनं गङ्गाद्वारे प्रजापतिम् । पप्रच्छ स्थविरः काले प्रजानां हितकाम्यया ।।३।।
जिसने अग्निहोत्र में आहुति दी है ऐसे तथा गङ्गाद्वार पर स्थित (अर्थात् गङ्गा के आसपास के प्रदेश में रहने वाले) प्रजापति कश्यप से ज्ञानी वृद्धजीवक ने लोककल्याण की दृष्टि से उचित काल में निम्न प्रश्न किया ।।३।।
भगवँल्लशुनोत्पत्तिं प्रयोगं चोपयोजने । श्रोतुमिच्छामिकालं च रोगान्, येषु न येषु च ।।४।।
व्यापदश्चास्य काः सन्ति, किं च तासां चिकित्सितम् ।
अन्नपानं च किं तत्र, परिहारः फलं च किम् ।।५।।
हे भगवन् ! मैं लशुन की उत्पत्ति, प्रयोग, उपयोग और काल को जानना चाहता हूँ। तथा इसका किन रोगों में प्रयोग करना चाहिये तथा किन में नहीं ? इसके प्रयोग से कौन से उपद्रव हो जाते हैं ? उनकी चिकित्सा क्या है ? लशुन के प्रयोग काल में किस अन्नपान का सेवन करना चाहिये ? उस काल में परहेज (त्याज्य) क्या हैं तथा इसके फल क्या हैं ? ।।४-५।।
इति पृष्टः स शिष्येण मुनिराह प्रजाहितम् । शृणु सौम्य ! यथोत्पन्नं लशुनं सपरायणम् ।।६।।
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर महर्षि कश्यप ने लोक कल्याण की दृष्टि से उत्तर दिया-हे सौम्य ! लशुन की उत्पत्ति को तू ध्यानपूर्वक सुन ।।६।।
न लेभे गर्भमिन्द्राणी यदा वर्षशतादपि । तदैनां खादयामास शक्रोऽमृतमिति श्रुतिः ।।७।।
सव्येन परिरभ्यैनां बाहुनां चारुणा स्निहा । व्रीडन्तीं सान्त्वयन् देवीं पतिर्भार्यामपाययम् ।।८।।
तस्यास्तु सौकुमार्येण ह्रिया च पतिसन्निधौ । अमृतस्य च सारत्वादुद्गार उदयद्यदा ।।९।।
यदृच्छया च गामागादमेध्ये निपपात च । ततोऽब्रवीच्छचीमिन्द्रो बहुपुत्रा भविष्यसि ।।१०।।
एतच्चाप्यमृतं भूमौ भविष्यति रसायनम् । स्थानदोषात्तु दुर्गन्धं भविष्यत्यद्विजोपगम् ।।११।।
लशुनं नामतस्तच्च भविष्यत्यमृतं भुवि । एवमेतत् समुत्पन्नं, शृणु तस्य क्रियाविधिम् ।।१२।।
ऐसा सुनने में आता है कि जब सौ वर्ष तक भी इन्द्राणी को गर्भ की प्राप्ति नहीं हुई तब इन्द्र ने उसे अमृत का पान कराया। पति (इन्द्र) ने शरमाती हुई पत्नी-देवी शची को अपनी सुन्दर बांई भुजा से स्नेह पूर्वक पकड़कर सान्त्वना देते हुए अमृत पिलाया। इन्द्राणी को सुकुमार होने के कारण तथा पति की उपस्थिति में शर्म (लज्जा) के कारण तथा