काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधूपकल्पः ? ] कल्पस्थानम् २५७
श्रीवेष्टक (सरल निर्यास), ...... लाक्षा, पद्मक, चन्दन, देवदारु, तुलसी तथा शाल–इस वारुण नामक धूप का 'शकुनी, पुण्डरीक, रेवती एवं श्लैष्मिक रोगों में ग्रीष्मकाल में प्रयोग करना चाहिये ॥
घृतं मज्जा वसा लाक्षा धूपोऽयं चतुरङ्गिकः ।।
अल्पदोषे कृशे बाले प्रयोज्यो ग्रहवैकृते ।
घृत, मज्जा, वसा तथा लाक्षा–इस चतुरङ्गिक (चार अङ्गों-घटकों वाले) धूप का अल्प दोष वाले व्यक्ति, कृश, बालक तथा ग्रहों के विकारों में प्रयोग करना चाहिये ॥
घृतं वचा तरक्षोश्च विष्ठा लोमानि चर्म च ।।
प्रसहानां पुरीषं च धूपो नन्दक उच्यते ।
घी, बच, भालू (रीछ) की विष्ठा, लोम एवं चर्म तथा प्रसह (चील आदि झपट्टा मारने वाले) पक्षियों का पुरीष नन्दक धूप कहलाता है।
वक्तव्य—अपने भक्ष्य को जबरदस्ती पकड़ कर खाने वाले प्राणियों को प्रसह कहते हैं। कहा भी है–प्रसह्य भक्षयन्तीति प्रसहास्तेन संज्ञिताः ॥
घृतं कणा व्रीहितुषाः कपिलोमत्वचं वचा ।।
सर्षपाः कुष्ठमेला च कणधूपो ग्रहापहः ।
घी, पिप्पली, चावलों के छिलके, बन्दर के बाल तथा त्वचा, बच, सरसों, कुष्ठ तथा एला–इसे कणधूप कहते हैं। यह ग्रहरोगों को नष्ट करता है ॥
घृतं सर्पत्वचं बिल्वं सरः सिद्धार्थका जतु ।।
श्रीधूप इति निर्दिष्टः श्रीकामेषूपयोजयेत् ।
घी, सांप की त्वचा (केंचुली), बिल्व, सर (महापिण्डी), श्वेत सरसों तथा लाक्षा–यह श्री धूप कहलाता है। ऐश्वर्य को चाहने वालों में इसका प्रयोग करे ॥
श्वविण्मूत्रं मयूराणां लोमान्यथ वचा घृतम् ।।
सर्षपाश्चेति धूपोऽयं ग्रहघ्न इति विश्रुतः ।
कुत्ते की विष्ठा तथा मूत्र, मोर के बाल, बच, घृत तथा सरसों–यह ग्रहघ्न (ग्रहों को नष्ट करने वाला) धूप है ॥
घृतं कुञ्जरदन्तं च तनुजान्यजमेषयोः ।।
गोशृङ्गमिति धूपोऽयं पुण्यः पुण्यजनावहः ।
घृत, हाथी दांत, बकरी तथा भेड़ के बाल तथा गौ के सींग–यह पुण्यकारक धूप पुण्यजनों के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥
घृतं स्थौणेयकं मांसी तगरं परिपेलवम् ।।
ह्रीबेरं शतपुष्पां च हरितालं मनःशिलाम् । मुस्तं हरेणुकामेलां धूपार्थमुपकल्पयेत् ।।
शिशुको नाम धूपोऽयं सर्वरोगग्रहापहः । धूपने चानुधूपे च प्रतिधूपे च भार्गव ! ।।