भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

२५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् धूपकल्पः ? ]

आग्नेयस्तु स्मृतो धूपो गोबाला घृतसंयुताः ।।
ब्राह्मणानां विशेषेण सर्वरोगेषु शस्यते ।

गौ के बाल घी में मिलाकर जलाने से आग्नेय धूप कहलाता है। ब्राह्मणों के बाल विशेष रूप से सब रोगों में प्रशस्त माने गये हैं ।।

घृतं हयखरोष्ट्राणां बालाः केशाश्च मातृकाः ।।
नखाश्चतुष्पदां लाभाद्धूपो भद्रङ्करः स्मृतः । पिशाचयक्षगन्धर्वभूतस्कन्दकफार्दिते ।।
धूपमेतं प्रयुञ्जीत यमिच्छेद्गदं क्षणात् ।

घी, घोड़े गदहे तथा ऊंट के बाल एवं रोम, मातृका (ऋषभक) तथा चतुष्पादों (चौपाये-पशुओं) के जिन २ के मिल सके उनके नख-इनका धूप कल्याणकारक माना गया है। पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, भूत, स्कन्द तथा कफ रोगों से पीड़ित व्यक्तियों में इस धूप का प्रयोग करने से रोगी शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाता है।

घृतं सिद्धार्थको हिङ्गु देवनिर्माल्यमक्षताः ।।
सर्पत्वग्भिक्षुसंघाटी धूपो रक्षोघ्न उच्यते ।

घी, श्वेत सरसों, हींग, देवनिर्माल्य, अक्षत (चावल), सांप की त्वचा (केंचुली) तथा भिक्षुसंघाटी (बौद्ध भिक्षुक का प्राचीन वस्त्र)-इनका धूप रक्षोघ्न कहलाता है ।।

घृतं सिद्धार्थकाः क्षौद्रं मेषशृङ्गमजापयः ।।
खरस्य मूत्रं बालांश्च सोमं चैवात्र योजयेत् । एष धूपोत्तमो नाम्ना परः प्रेतनिवारणः ।।
परः प्रेताभिभूतेषु पूतनायां च शस्यते ।

घी, श्वेत सरसों, मधु, भेड़ के सींग, बकरी का दूध, गदहे के मूत्र तथा बाल और सोम (कर्पूर अथवा रक्तचन्दन) यह उत्तम धूप है जो कि प्रेतों को दूर करता है। प्रेतों तथा पूतना नामक ग्रह द्वारा आक्रान्त रोगियों में इसका प्रयोग करना चाहिये ।।

घृतं सिद्धार्थकाः श्वेताः कुष्ठं भल्लातकं वचा ।।
बस्तलोमानि तगरं भूर्जावर्तं सगुग्गुलु । दशाङ्गो नाम धूपोऽयं प्र योज्यः सर्वरोगिषु ।।
अपस्मारे विशेषेण ग्रहेषूपग्रहेषु च ।

घी, श्वेत सरसों, कूठ, भिलावा, बच, बकरे के लोम, तगर, भोजपत्र तथा गूगल—यह दशाङ्ग नामक धूप सब रोगों में-विशेषकर अपस्मार, ग्रह तथा उपग्रह रोगों में प्रयुक्त करना चाहिये ।।

घृतं सिद्धार्थकाः श्वेताश्चोरकं सपलङ्कषम् ।।
शूकरी जटिला चेति धूपो मोह इति स्मृतः ।

घी, श्वेत सरसों, चोरक (ग्रन्थिपर्णभेद-भटेउर), गूगल, शूकरी (वराहीकन्द) तथा जटिला (जटामांसी)—यह धूप मोहित करनेवाला कहलाता है ।।

स्मृतं श्रीवेष्टका ........ रलाक्षापद्मकचन्दनम् ।।
सदेवदारुसुरसं शालजं चेति योजयेत् । धूपोऽयं वारुणो नाम ग्रीष्मकाले प्रशस्यते ।।
शकुन्यां पौण्डरीके च रेवत्यां च कफाधिके ।