भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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कल्पस्थानम्।


धूपकल्पाध्यायः।

................................................ । ................................................ ।।
..........(कु)ष्ठं पूतिकमम्बरं वचा ।।
सर्षपा बस्तलोमानि धूपः स्याद्धिङ्गुसंयुतः ।

.......कुष्ठ, पूतिक (करञ्ज), अम्बर (कपास), बच, सरसों बकरे के बाल तथा हींग-इनका धूप देना चाहिये ।।

घृतं मेषविषाणं च वाजिकुञ्जरयोः खुरौ ।।
कपिशल्यकबभ्रूणां लोमभिर्धूप उत्तमः ।

घी, भेड़ के सींग, घोड़े तथा हाथी के खुर, बन्दर, शल्यक (गोधाकार मृग विशेष) तथा बभ्रु (नेवला)-के लोमों का धूप उत्तम माना जाता है ।।

घृतं सर्जरसः कृष्णो भल्लातकशिलेयके ।।
द्वे हरिद्रे जतूशीरसर्षपाः पुष्पमार्जकम् । विडङ्गं तगरं पत्रं वचा हिङ्गु सबालकम् ।।
कौमारो नाम धूपोऽयं युक्तो वर्धयति प्रजाः ।

घी, राल, कृष्ण (सौवीराञ्जन), भिलावा, शिलेयक (सिलारस), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, लाक्षा, खस, सरसों, अर्जक (तुलसी) का फूल, विडङ्ग, तगर, तेजपत्र, वचा, हींग तथा नेत्रबाला, यह कुमार नामक धूप है। इसका सम्यक् प्रयोग करने से बालकों की वृद्धि होती है ।।

घृतं सर्पस्य निर्मोको गृध्रकौशिकयोश्च विट् ।।
वचा हिङ्गु च धूपः स्यादपस्मारग्रहापहः ।

घी, सांप की केंचुली, गिद्ध तथा उल्लू की विष्ठा, बच तथा हींग-इनका धूप अपस्मार तथा ग्रहरोगों को दूर करता है।

घृतं गुग्गुलु बिल्वं च देवदारु नमेरु च ।।
एष माहेश्वरो धूपो यवयुक्तो ग्रहापहः ।

घी, गूगल, बिल्व, देवदारु, नमेरु (सरल देवदारु) तथा जौ—यह माहेश्वर धूप कहलाता है। यह ग्रहरोगों को नष्ट करता है ।।

३९ का.सं.