भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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२५४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मङ्गलसिद्धिः ८ ]

त्रिफलादारुभूतीककरञ्जद्वयचित्रकान् ।।
एकाष्ठीलां विषाणीं च ........... । (कणा)मूलं त्रिवृद्दन्त्यौ पूर्वकल्पेन शोधयेत् ।।
ऊर्ध्वाधःशोधनैः कल्कैर्युक्तो लवणतैल्योः । ईषदूष्णः सगोमूत्रो निरूहः कफनाशनः ।।

त्रिफला, देवदारु, भूतीक, करञ्ज, पूतिकरञ्ज, चित्रक, एकाष्ठीला (बक अथवा पाठा), विषाणी (क्षीरकाकोली) ......., पिप्पलीमूल, त्रिवृत्, दन्तीमूल, द्रवन्ती, इन ऊर्ध्व एव अधः शोधक ओषधियों के कल्क में लवण, तैल एवं गोमूत्र मिला कर बनाया हुआ उष्ण निरूह कफ रोगों को नष्ट करता है ।।

अयं तु सर्वदोषघ्नो निरूहः कत्तृणादिकः ।

निम्नलिखित कत्तृण आदि का निरूह सब दोषों (त्रिदोष) को नष्ट करने वाला है ।।

कत्तृणोशीरभूतीकत्रिफला .............
रास्नाश्वगन्धाश्वदंष्ट्राशिग्रुश्यामाः शतावरी । एलापुनर्नवाभार्ग्यः सपतोला गुडूच्यपि ।।
त्रिपलीनां जलद्रोणे पचेत् पादावशेषिते । ततस्तेन कषायेण पेष्याणीमानि योजयेत् ।।
वचाजमोदे मदनपिप्पली ......... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १५४ तमं पत्रम्)

(अस्याग्रे द्वादशपत्रात्मको ग्रन्थो लुप्तस्ताडपत्रपुस्तके)

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(सिद्धिस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ॥)

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कत्तृण, खस, भूतीक, त्रिफला, ....... रास्ना, अश्वगन्धा, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), सहिजना, त्रिवृत् शतावरी, छोटी इलायची, पुनर्नवा, भारंगी, पटोलपत्र तथा गिलोय, इत्यादि ओषधियों के ३ पल लेकर एक द्रोण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे । इस कषाय में बच, अजमोद, मैनफल तथा पिप्पली (आदि ओषधियों का कल्क पीसकर डाले । यह निरूह सर्व दोषघ्न माना गया है) ।।

(सिद्धिस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ॥)