काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमङ्गलसिद्धिः ८ ] सिद्धिस्थानम् २५३
त्रिफलाश्वगन्धाभूतीकदशमूलपुनर्नवाः । बलागोक्षुरकोशीर ...................... ।।
........................... लीनानि कुट्टयेत् । अष्टभागावशेषं तं जलद्रोणे विपाचयेत् ।।
ततस्तेन कषायेण द्वौ प्रस्थौ तैलसर्पिषोः । पचेच्चतुर्गुणे क्षीरे कल्कं चेमं समावपेत् ।।
सैन्धवं मधुकं द्राक्षां शतपुष्पां महासहाम् । बीजानि चात्मगु(प्ताया) मोर्वारुकस्य च ।।
विडङ्गकुञ्चिकवचावृषकं शिरिवारिका । जीवनीयानि सर्वाणि दद्यात् खरबुषामपि ।।
शैशुको नाम स स्नेहो बस्तिकर्मणि शस्यते । बालानां सर्वरोगघ्नो निर्दिष्टः पुण्यकर्मणा ।।
त्रिफला, अश्वगन्धा, भूतीक, दशमूल, पुनर्नवा, बला, गोखरू, खस, ..... इत्यादि को कूटकर एक द्रोण जल में पकाकर आठवां भाग शेष रखे। उस कषाय में दो प्रस्थ तैल तथा घृत के तथा कषाय से चतुर्गुण दूध डाले। इसमें सैन्धव, मुलहठी, द्राक्षा, सौंफ, महासहा (माषपर्णी), कौंच के बीज, ककड़ी के बीज, विडङ्ग, स्याह जीरा, बचा, बांसा, शिरिवारिका (चांगेरी), सम्पूर्ण जीवनीय गण तथा खरबुष (मरुवा-मरुबक) इत्यादि का कल्क डालकर पकाये। इसका नाम शिशु स्नेह है। यह बस्ति कर्म में उत्तम कहा गया है। पुण्यकर्मा महर्षि कश्यप ने इसे बालकों के सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करने वाला कहा है ।।
वमनं स्त्रंसनीयानि दशमूलं च शोधयेत् । तत्कषायं परिस्त्राव्य गोमूत्रलवणान्वितम् ।।
घृततैलार्धयुक्तोष्णं निरूहमुपकल्पयेत् । तेनास्य विलयं दोषा यान्ति वह्निश्च दीप्यते ।।
वमन, स्त्रंसन (विरेचन) तथा ओषधियों और दशमूल का शोधन करके उसका कषाय बनाये। इसे छानकर उसमें गोमूत्र, लवण तथा कषाय से आधे परिमाण में घी और तेल डाले। इस स्नेह से उष्ण अवस्था में ही निरूह (आस्थापन बस्ति) देवे। इससे रोगी के दोष विलीन हो जाते हैं और अग्नि प्रदीप्त होती है ।।
श्रेष्ठांमदनबीजानामाढकं निस्तुषीकृतम् । विपाचयेदपां द्रोणे चतुर्भागावशेषितम् ।।
उपकुञ्चीखरबुषापिप्पल्यः सैन्धवं वचा । त्रपुसो ........ निः शतपुष्या यवान्यपि ।।
स कषायः समायुक्तः क्षीरगोमूत्रकाञ्जिकैः ।।
सर्वानिलामयहरः स निरूहोऽर्धतैलिकः ।
श्रेष्ठा (त्रिफला अथवा स्थलपद्मिनी) तथा मदन फल के बीजों को निस्तुष (छिलके रहित) एक आढक लेकर एक द्रोण पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष रखे। इसमें उपकुञ्ची (स्याह जीरा), खरबुष (मरुवा-मरुबक), पिप्पली, सैन्धव, बच, खीरे के बीज, ..... सौंफ तथा अजवायन, दूध, गोमूत्र, कांजी, तथा कषाय से आधा भाग तिल तैल डालकर पुनः पकाये, यह कषाय सम्पूर्ण वातरोगों को नष्ट करता है।
त्रिफला सारिवा श्यामा बृहत्यौ वत्सकत्वचम् ।।
त्रायमाणाबलारास्नागुडूचीनिम्बकूलकम् । ................ (क)ल्पयेत् ।।
महासहा शक्रयवाः शतपुष्पाऽथ वत्सकः । मधूकांशुमतीद्राक्षाः समुद्रान्ताऽथ बालकम् ।।
क्षीरक्षौद्रघृतोपेतो निरूहः पित्तनाशनः ।
त्रिफला, सारिवा (अनन्तमूल), श्यामा (त्रिवृत्), दोनों बृहती, कुटज की छाल, त्रायमाणा, बला, रास्ना, गिलोय, नीम, कूलक (पटोलपत्र) ...... महासहा (माषपर्णी), इन्द्रजौ, सौंफ, कुटज, महुआ, अंशुमती (शालपर्णी), द्राक्षा, समुद्रान्ता (अपराजिता), नेत्रबाला इत्यादि के कषाय में दूध, मधु तथा घृत डालकर दिया गया निरूह पैत्तिक रोगों को नष्ट करता है ।।