भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 610

२५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् मङ्गलसिद्धिः ८ ]

य एते कफजा रोगा एते संतर्पणोद्भवाः । ते चापतर्पणीयाः स्युर्लङ्घनीयास्त एव च ।।

(इति ताडपत्रपुस्तके १५३ तमं पत्रम् ।)

जो कफज तथा सन्तर्पण से उत्पन्न होने वाले रोग हैं उनमें अपतर्पण तथा लङ्घन कराना चाहिये ।।

य एव वातिका रोगास्तेऽपतर्पणजाः स्मृताः ।
त एव बृंहणीयाः स्युः संसृष्टास्तु ततः परम् ।।

जो वातिक रोग होते हैं उन्हें अपतर्पणजन्य माना जाता है। उनका बृंहण करना चाहिये। उसके बाद संसृष्ट (मिश्रित दोष वाले) रोगों की चिकित्सा करनी चाहिये ।।

स्नेहस्वेदोपपन्नानामूर्ध्वं चाधश्च शोधनम् । सवसंसृष्टरोगाणां स्नेहनं न तु बस्तिभिः ।।

इन सम्पूर्ण संसृष्ट रोगों में स्नेहन एवं स्वेदन कराके ऊर्ध्व तथा अधः शोधन (वमन तथा विरेचन) करना चाहिये ।। इनमें बस्तियों के द्वारा स्नेहन नहीं कराना चाहिए ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।

(इति सिद्धिस्थाने) पञ्चकर्मीयासिद्धि(र्नामसप्तमोऽध्यायः ।।७।।)

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

(इति सिद्धिस्थाने) पञ्चकर्मीयासिद्धि(र्नामसप्तमोऽध्यायः ।।७।।)


मङ्गलसिद्धिर्नामाष्टमोऽध्यायः ।

अथातो मङ्गलसिद्धि व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम मङ्गलसिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

मङ्गलान्येव सततं प्रजानामभिवर्धयेत् । सर्वे गृहस्थाः सेवेरन् दानानि च तपांसि च ।।३।।

बालकों के मङ्गलकारी भावों की ही निरन्तर वृद्धि करे। प्रत्येक गृहस्थ को दान, तप आदि का सेवन करना चाहिये ।।

मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च नियतात्मनाम् । ददतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ।।४।।

मङ्गल (शुभ) आचरण करने वाले, नित्य संयम से रहने वाले (जितेन्द्रिय), दान एवं हवन करने वाले व्यक्तियों को रोग आदि आपत्तियां नहीं आतीं ।।४।।

आमः पक्वोऽपि वा स्नेहो बस्ति ............. । ............. नित्ये च तच्चोक्तमनुवासनम् ।।

बालक को आम अथवा पक्व स्नेह की बस्ति तथा ..... नित्य अनुवासन देना चाहिये ।।

कषायैर्विविधैर्मिश्रः स्नेहः स्नेहैश्च मूर्च्छितः । सक्षौद्रमूत्रलवणो निरूहो दोषवाहनात् ।।

नाना प्रकार के कषायों से मिश्रित तथा स्नेहों के द्वारा मूर्च्छित किये हुए स्नेह का-जिसमें मधु, गोमूत्र तथा सैन्धव डाला गया है-निरूह (आस्थापन) दोषों को निकाल देता है ।।