भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 609

पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ] सिद्धिस्थानम् २४१

अत्र श्लोकः—

वातिका वातभूयिष्ठाः शोषणाः स्तम्भना गदाः । हुण्डना भञ्जनाश्चैव तेऽनुवास्या हितैषिणा ।।

हित को चाहने वाले वैद्य को चाहिये कि वातिक, वातप्रधान तथा जिनका शोषण एवं स्तम्भन करना है, जिनका हुण्डन (मस्तक आदि के अन्दर प्रवेश) करना हो एवं भञ्जन (विभक्त) करना हो उनका अनुवासन करना चाहिये ॥

हृदयग्रहपाण्डुत्वश्वयथूदरप्रमेहकुष्ठरोगाशोर्भगन्दरराजयक्ष्मवैसर्प ............. कफरोगार्तांश्च नानुवासयेत् ।।

किनका अनुवासन नहीं करना चाहिये ?—हृदयग्रह, पाण्डु, श्वयथु, उदररोग, प्रमेह, मधुमेह, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, राजयक्ष्मा, विसर्प ...... तथा कफज रोगों में अनुवासन नहीं करना चाहिये । सुश्रुत चि. अ. ३५ में कहा है—उदरी च प्रमेही च कुष्ठी स्थूलश्च मानवः । अवश्यं स्थापनीयास्ते नानुवास्याः कथञ्चन ॥

हृद्रोगोदावर्त्तवातगुल्मवातोदरविबन्धमूत्रग्रहबस्तिकुण्डलप्रमेहरक्तगुल्मयौनिजाड्योपरोधपार्श्वरूजामधुमेहकुष्ठ-श्वित्रभगन्दरापस्तम्भसंससृष्ट ............. हृदयद्रवकृशव्याधिपरिगतरक्तातीसारमूर्च्छाशोथमैथुनश्रमभय-चिन्तेर्ष्याप्रजागरहताश्च न निरूह्या इति ।।

किनका निरूह (आस्थापन) करना चाहिये ?—हृद्रोग, उदावर्त्त, वातगुल्म, वातोदर, विबन्ध, मूत्रग्रह, बस्तिकुण्डल, प्रमेह, रक्तगुल्म, योनि की जड़ता, योनि के मार्ग का रुकना, पार्श्वशूल, मधुमेह, कुष्ठ, श्वित्र, भगन्दर, अपस्तम्भ तथा संसृष्ट ..... रोगों में निरूह कराना चाहिये । चरक सि. अ. २ में कहा है—सर्वाङ्गैकाङ्गकुक्षिरोगवातवर्चोमूत्रशुक्रसङ्गबलवर्णमांसरेतःक्षयदोषाधमानाङ्गसुप्तिकृमिकोष्ठोदावर्त्तस्तब्धाङ्गातिसारसर्व्वाङ्गाभितापप्लीहगुल्महृद्रोगभगन्दरोन्मादज्वरब्रध्नशिरःकर्णशूलहृदय-पार्श्वपृष्ठकटीग्रहवेपनाक्षेपकगौरवातिलाघवज्वरःक्षयान्तार्त्तवविषमाग्निस्रिग्फ्ग्जानुजङ्घोरुगुल्फपाष्णिप्रपदयोनिबाह्वङ्गुलिस्तनान्त-दन्तनखपर्वास्थिशूलशोथस्तम्भान्त्रकूजनपरिकर्तिकाल्याल्पसशब्दोग्रगन्थोत्यानादयो वातव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोक्ताश्च, एतेष्वास्थापनं प्रधानतममित्युक्तं वनस्पतेर्मूलच्छेदेवत् ॥

...... किनका निरूह (आस्थापन) नहीं करना चाहिये ?—हृदयद्रव (Palpitation of Heart) कृश, व्याधि से युक्त, रक्तातीसार, मूर्च्छा, शोथ, मैथुन, श्रम, भय, चिन्ता, ईर्ष्या एवं रात्रिजागरण से पीडित व्यक्तियों को निरूह नहीं कराना चाहिये ।

चरक सि. अ. २ में कहा है—अनास्थाप्यास्तु—अजीर्ण्यतिस्निग्धपीतस्नेहोत्क्लिष्टदोषाल्याग्नियानक्लान्तात दुर्बलक्षुत्तृष्णाश्र-मार्त्तातिक्षुशभुक्तभक्तपीतोदकवभितविरिक्तकृतनस्तःकर्मक्रुद्धभीतमत्तमूर्च्छितप्रसक्तच्छर्दिनिष्ठीविकाश्वासकासहिक्काबद्धच्छिद्रद-कोदराध्मानालसकविसूचिकामप्रजातामातिसारमधुमेहकुष्ठार्ताः ॥

अत्र श्लोकाः—

स्नेहप्रमाणं यद्बस्तौ निरूहस्त्रिगुणस्ततः । एके तु सममेवाहुर्वयःकालादिदर्शनात् ।।

बस्ति में जितना स्नेह डाला जाता है निरूह में उससे तिगुना डालना चाहिये तथा कुछ आचार्य अवस्था तथा काल के अनुसार निरूह में भी बस्ति के समान (समप्रमाण) ही स्नेह डालने को कहते हैं ॥

निरूहं यदि वा बस्तिमल्पमल्पं महर्षयः । प्रशंसन्ति बहु त्वज्ञाः प्रभूतादत्ययो ध्रुवः ।।

महर्षि लोग निरूह तथा बस्ति के कार्य को थोड़ा २ करने को अच्छा मानते हैं क्योंकि अधिक करने से निश्चित रूप से रोग या उपद्रव हो जाते हैं ॥