काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ]
श्री (कान्ति) एवं धन नष्ट हो गया हो, .... जो क्षत, पक्षाघात तृष्णा, तालुशोष, ऊरुस्तम्भ, अर्दित, हनुग्रह, वातिक हृद्रोग, रेवती तथा शुद्ध वायु के प्रकोप से पीडित रोगियों में विरेचन नहीं देना चाहिये। चरक. सि. अ. २ में कहा है—अविरेच्यास्तु—सुभगक्षतगुदमुक्तनालाधोभागरक्तपित्तविलङ्घितदुर्बलेन्द्रियाल्पाग्निनिरूढकामादिव्यग्राजीर्णनवज्वरमदात्ययिताध्मात-शल्यादितताभिहतातिस्निग्धरूक्षा दारुणकोष्ठाः क्षतादयश्च गर्भिण्यन्ताः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है ।।
प्रतिश्यायकासश्वासशोषहिक्कामुखशोषापस्मारगलग्रहरोहिणिका ........ तिमुखार्बुदाधिमन्थना-सार्शालिज्युपजिह्विकागलगण्डगण्डमालागलशुण्डिकाक्ष्यभिष्यन्दाश्च नस्ततो विरेच्याः ।।
किन्हें शिरोविरेचन देना चाहिये ?-प्रतिश्याय, कास, श्वास, शोष, हिक्का, मुखशोष, अपस्मार, गलग्रह, रोहिणिका, ....... मुखार्बुद (मुख में रसौली-Tumour), अधिमन्थ, नाशार्श, अलजी, उपजिह्विका, गलगण्ड, गण्डमाला, गलशुण्डिका तथा आंखों के अभिष्यन्द रोगों में नस्य के द्वारा विरेचन कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—विशेषतस्तु शिरोदन्तमन्यास्तम्भहनुग्रहपीनसगलशुण्डिकाशालूकशुक्रतिमिरवर्त्मरोगव्यङ्गोपजिह्विकार्धावभेदकग्रीवास्कन्धा-स्यनासिकाकर्णाक्षिमूर्धकपालशिरोरोगार्दितापतन्त्रकापातानकगलगण्डदन्तशूलहर्षचालाक्षिराज्यर्बुदस्वरभेदवाग्ग्रहगद्गदक्रथनादय ऊर्ध्वजत्रुगता वातादिविकाराः परिपक्वाश्च, एतेषु शिरोविरेचनं प्रधानतममित्युक्तं तद्ध्यूत्तमाङ्गमनुप्रविश्य मुञ्जादिषीकामिकासक्तां केवलं विकारकरं दोषमपकर्षति ।।
दन्तचालहनुस्तम्भमन्यास्तम्भशिरोग्रहबाधिर्यकर्णशूलार्धावभेदकसूर्यावर्तापिता(नक) ................... स्वरभेदवाग्ग्रहौष्ठस्फुरणतिमिरमुखनासिकादौर्गन्ध्याकालपलितखालित्यानिलात्मकार्ताश्च नस्तत उपस्नेह्या इति ।।
किन्हें नस्य के द्वारा स्नेहन कराना चाहिये ?—दांतों का हिलना, हनुस्तम्भ, मन्यास्तम्भ, शिरोग्रह, बाधिर्य (बहरापन, Deafness), कर्णशूल, अर्धावभेदक, सूर्यावर्त, अपतानक, .....स्वरभेद, वाग्ग्रह, ओष्ठस्फुरण (होठों का हिलना), तिमिर, मुख, एवं नाक से दुर्गन्ध आना, असमय में बालों का सफेद होना तथा झड़ना (गंजापन-Baldness) तथा वायु के रोगों से पीडित रोगियों में नस्य के द्वारा स्नेहन कराना चाहिये अर्थात् तर्पण नस्य देना चाहिये ।।
अत्र श्लोकः—
स्नेहयेद्वातिकांस्त्वस्तः कफजांस्तु विरेचयेत् । ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगांस्तद्विद्वांस्तेषां परायणम् ।।
ऊर्ध्वजत्रुगत रोग यदि वातिक हों तो नस्य के द्वारा स्नेहन करे। तथा यदि श्लैष्मिक (कफज) हों तो नस्य के द्वारा विरेचन कराये। यही इनकी मुख्य चिकित्सा है ।।
.................... शोषमर्मवातप्लीहवातगुल्ममूत्रकृच्छ्रपक्वाशयशूलकुक्षिवातकुण्डलयानिशूलोदावर्त-सन्धिग्रहगात्रवेष्टगात्रभेदापतानकार्दिताल्पपुष्पानष्टपुष्यानष्टबीजाकर्मण्यबीजपरीता ........................... (अनुवास्या इति) ।।
किनका अनुवासन करना चाहिये ? ...... शोष, मर्मवात, (यदि मर्मस्थानों में वात का प्रकोप हो), प्लीहवात, गुल्म, मूत्रकृच्छ्र, पक्वाशयशूल, कुक्षिशूल, वातकुण्डल, योनिशूल, उदावर्त, सन्धिग्रह, गात्रवेष्टन, गात्रभेद, अपतानक, अर्दित, अल्पपुष्पा (आर्तव-मासिक स्राव का कम होना), नष्टपुष्पा (मासिकस्राव का बन्द हो जाना-Menopause), नष्टबीज (जिसका वीर्य नष्ट हो गया हो), जिसका वीर्य अकर्मण्य (कार्य में असमर्थ) हो गया है तथा जिसका वीर्य दूषित हो गया है ....... इत्यादिकों को अनुवासन करना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—य एवास्थाप्यास्त एवानुवास्याः, विशेषतस्तु रूक्षतीक्ष्णाग्नयः केवलवातरोगार्ताश्च, एतेषु ह्यनुवासनं प्रधानतममित्युक्तं वनस्पतिमूलच्छेदनवत्, मूले द्रुमाणां प्रसेकवच्चेति। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३६ में भी कहा है ।।