भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ] सिद्धिस्थानम् २४९

............ गैन्नोऽतिबालोऽतिवृद्धो गुल्मप्लीहोर्ध्वरक्तलोमव्यापत्कर्णरोगशिरःकम्पार्दिताधविभेदक-सूर्य्यावर्तरेवतीपौण्डरीकशकुनीपूतनामुखमण्डिकार्ताश्च न वाम्याः, अगर्भा गर्भकामा विवर्णक्षीरा स्रवत्क्षीरा मन्दाग्नयो ......... वैसर्पशोणिताशोंविषमाग्निकुष्ठश्वयथुश्वित्रोर्ध्वरक्तप्लीहगुल्ममधुमेहहलीमककामला-पाण्डुरोगहृद्रोगकृमिकोष्ठापस्मारोपस्तम्भोदावर्तकफोन्मादविद्रधिशलीपदयानि ........... द्या इति ।।

किन्हें वमन हीं कराना चाहिये—हे वृद्धजीवक ! पुष्पिणी (जिसे रजोदर्शन होता है), ऋतुमती, गर्भिणी, जो कुटी में स्थित है, जिसके स्तनों में दूध कम आता है, जिसका दूध हल्का होता है, जिसका दूध नष्ट हो गया है अर्थात् सूख गया है, जिसका पुत्र दूध का वमन कर देता है, जिसे पहले से ही वमन होता हो, जो सुभगा एवं अपने को पण्डित समझने वाली है, जिसे उदररोग हो, वातज्वरी, स्थूल, अक्षिरोग, तृष्णालु (जिसे प्यास बहुत लगती हो), जिसे मूर्च्छा हो जाती हो, जिसने निरूह तथा अनुवासन किया हुआ हो, जो क्षत तथा क्षीण हो, ..... जो अतिबाल हो अर्थात् जिसकी अवस्था बहुत छोटी हो, जो अतिवृद्ध हो तथा जो गुल्म, प्लीहा रोग, ऊर्ध्वरक्त (मुख से रक्त आना), लोमव्यापत् (बाल-केश सम्बन्धी रोग,) कर्णरोग, शिरःकम्प, अर्दित (Facial paralysis) अर्धावभेदक (आधा सीसी—Hemicrania) सूर्यावर्त और रेवती, पुण्डरीक, शकुनी, पूतना तथा मुखमण्डिका आदि ग्रहों से पीडित व्यक्तियों को वमन नहीं कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—अवाम्यास्तावत् क्षतक्षीणातिस्थूलकृशबालवृद्धदुर्बलश्रान्तपिपासितक्षुधितकर्म-भाराध्वहतोपवासमैथुनाध्ययनव्यायामचिन्ताप्रसक्तक्षामगर्भिणीसुकुमारसंवृतकोष्ठदुश्छर्दनोर्ध्वरक्तपित्तप्रसक्तच्छूर्दूध्वर्वातास्थापितानुवासित-हृद्रोगोदावर्तमूत्राघातप्लीहगु- ल्मोदराष्ठीलास्वरोपघाततिमिरशिरःशङ्खकर्णाक्षिपाश्र्वशूलार्ताः। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है।

किन्हें विरेचन कराना चाहिये ?—जिसे गर्भ न ठहरता हो, जो गर्भ की कामना करती हो, जिसका दूध विवर्ण (वर्ण रहित अथवा विकृत वर्ण वाला) हो, जिसका दूध निरन्तर निकलता रहता हो, जिसकी अग्निमन्द हो, ....... विसर्प, रक्तार्श, विषमाग्नि कुष्ठ, श्वयथु (शोथ), श्वित्र (श्वेत कुष्ठ—Leuco derma), ऊर्ध्वरक्त, प्लीहावृद्धि, गुल्म, मधुमेह, हलीमक, कामला (gaunbice), पाण्डुरोग, हृद्रोग, कृमिकोष्ठ (जिसके पेट में कृमि हों), अपस्मार, उपस्तम्भ, उदावर्त, कफोन्माद, विद्रधि, श्लीपद तथा योनि ..... रोग आदिकों में विरेचन कराना चाहिये। चरक सि. अ. २ में कहा है—कुष्ठज्वर मेहोर्ध्वरक्तपित्तभगन्दरोदराशोंब्रध्नप्लीहगुल्मार्बुदगलगन्धग्रन्थिविसूचिकालसकमूत्राघातकृमिकोष्ठ-वीसर्पपाण्डुरोगशिरःपार्श्वशूलोदावर्तनेत्रास्यदाहहृद्रोगव्यङ्गनीलिकानेत्रनासिकास्यश्रवणरोगगुदमेढ्रपाकहलीमकश्वास-कासकामलापच्यपस्मारोन्मादवातरक्तयोनिरतोदोषतैर्मिरैर्यौचकाविपाकच्छर्दिश्वयथुगरविस्फोटकादयः पित्तव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोक्ताश्च, एतेषु हि विरेचनं प्रधानतममित्युक्तमग्न्युपशमेऽग्निगृहवत्। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है॥

अत्र श्लोकः—

व्याकुलान् सन्निपातोत्थान् पैत्तिकान् कफपैत्तिकान् । संसृष्टान् कफमूलांश्च स्त्रंसनेनाभ्युपक्रमेत् ।।

सन्निपात से उत्पन्न हुए पैत्तिक, कफपैत्तिक, संसृष्ट (जिसमें दो दोष मिले हुए हों) तथा कफ की मूल (प्रधानता) वाले रोगों से युक्त रोगियों की विरेचन द्वारा चिकित्सा करे ।।

अनुपस्निग्धरिक्तकोष्ठकृशस्थूलदुष्पाफ(दुर्बल ?) ललितसुकुमारश्रीधननष्ट ......... पक्षतपक्षहत-तृष्णातालुशोषोरुस्तम्भार्दितहनुग्रहवातहृद्रोगरेवतीकेवलवातार्ताश्च न विरेच्याः ।।

किन्हें विरेचन नहीं करना चाहिये ?—जिसने स्नेहन नहीं किया है, जिसका कोष्ठ रिक्त (खाली) हो, कृश, स्थूल, दुष्पाफ (दुर्बल ?), ललित (जिसका अच्छी प्रकार लालनपोषण किया गया हो), सुकुमार (नाजुक—Delicate) जिसका