काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | पञ्चकर्मीय सिद्धिः ७ ]
पञ्च कर्मीया सिद्धिर्नाम सप्तमोऽध्यायः ।
अथातः पञ्चकर्मीयां सिद्धिं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम पञ्चकर्मीय (पञ्चकर्म सम्बन्धी) सिद्धि का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
अथ खलु भगवन् देहिनां व्याधयः के वमनसाध्याः; के न; के विरेचनसाध्याः ? के न; केऽनुवासनसाध्याः ? के न; के निरूह (साध्याः ? के न;) ................ (भ)गवान् कश्यपः- कफज्वरारुचिमुखवैरस्यकफप्रसेककफहृद्रोगविषूचिकाकासश्वासगलग्रहगलशुण्डिकागलगण्डमालारोहिणिका-विदारिकाधोरक्तपित्तहृल्लासप्रमेहहली (मक) ............ स्कन्दग्रहस्कन्दापस्मारस्कन्दपितृनैगमेषक्षीर-गौरवक्षीरवृद्धिक्षीरघनत्वाजीर्णपरिकर्तिकाहृल्लासशूलाटोपातिविरेच्यमानगरितविषपीताद्या वमनसाध्या इति ।।३।।
वृद्धजीवक ने प्रश्न किया—भगवन् ! प्राणियों की कौन सी व्याधियां (रोग) वमन साध्य हैं तथा कौनसी वमन साध्य नहीं हैं ? कौनसी व्याधियां विरेचन साध्य हैं तथा कौनसी विरेचन साध्य नहीं हैं ? कौनसी व्याधियां अनुवासन साध्य हैं तथा कौनसी नहीं ? कौनसी व्याधियां निरूहसाध्य हैं तथा कौनसी नहीं ? (कौनसी व्याधियां शिरोविरेचन साध्य हैं तथा कौनसी नहीं है?—यह अंश खण्डित है) ..... । इन प्रश्नों को सुनकर भगवान् कश्यप ने कहा—वमनसाध्य व्याधियां—कफज्वर, अरुचि, मुखवैरस्य, कफप्रसेक, कफज हृद्रोग, विषूचिका, कास, श्वास, गलग्रह, गलशुण्डिका, गलगण्ड, गण्डमाला, रोहिणिका (Diptheria), विदारिका (प्रमेहपीडिकाविशेषः-विदारीकन्दवत् वृत्ता कठिना च विदारिका), अधोरक्तपित्त, हृल्लास, प्रमेह, हलीमक, स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, स्कन्दपिता, नैगमेष, क्षीरगौरव (दूध का भारी होना), क्षीरवृद्धि, क्षीरघनत्व (दूध का घना-सान्द्र-Consentrated होना), अजीर्ण, परिकर्तिका, हृल्लास, शूल, आटोप, अतिविरेचन (जिसे विरेचन अधिक होता हो) जिसने गर (सयोगज विष) तथा विष का पान किया हो—इत्यादि रोग वमनसाध्य हैं—वमन के द्वारा अच्छे होनेवाले हैं। अर्थात् उपर्युक्त रोगों में वमन कराया जा सकता है। चरक सि. अ. २ में कहा है—पीनसकुष्ठनवज्वरराजयक्ष्माकासश्वासगलग्रहगलगण्डश्लीपदमेहमान्दाग्नि विरुद्धाजीर्णात्रिविसूचिकाल-सकविषगरपीतदृष्टदिग्वविद्धाधःशोणितपित्तप्रसेकहृल्लासारोचकाविपाकापच्यपस्मारोन्मादातिसारशोथपाण्डुरोगमुखपाकदुष्टस्तन्यादयः श्लेष्मव्याधयो विशेषेण महारोगाध्यायोध्यायोक्ताश्च, तेषु हि वमनं प्रधानतममित्युक्तं, केदारसेतुभेदे शाल्याद्यशोषदोषविनाशवत् । इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३३ में भी कहा है ।।३।।
अत्र श्लोकः—
कफाधिकाश्च ये रोगा ................ । ................................ ।।
जिन रोगों में कफ की अधिकता होती है ......... (उनमें वमन कराना चाहिये) अर्थात् श्लेष्मप्रधान रोगों में वमन श्रेष्ठ माना गया है। चरक सू. अ. २० में कहा है—वमनं तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः । तद्ध्यादित एवामाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति । तत्रावजिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते ।।
वृद्धजीवक ! पुष्पिण्यतुमृती गर्भिणी कुटीगताऽल्पक्षीरा लघुक्षीरा नष्टक्षीरा क्षीरच्छर्दनपुत्रा प्रच्छर्दिनी सुभगा पण्डितमानिनी जाठरी वातज्वरी स्थूलोऽक्षिरोगी तृष्णालुर्मूर्च्छावान्निरूढोऽनुवासितः क्षतः क्षीणःसोप-
(इति ताडपत्रपुस्तके १५२ तमं पत्रम्)