भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 871

चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५] खिलस्थानम् ५११

येनोपक्रम्यमाणोऽपि शान्तिं नैति पुनः पुनः ॥९३॥ तेनैवोत्पातरोगोऽयं न विश्वास्यः कथञ्चन । तस्मात् सम्यगुपक्रम्यो यथा वक्ष्ये चिकित्सितम् ॥९४॥

असाध्य रोग की चिकित्सा न करे तथा साध्यरोग की यत्नपूर्वक चिकित्सा करे। जो रूप में द्वन्द्वज हो अथवा जो अधिक पक रहा हो—उस २ रोग को देखकर ठीक प्रकार से चिकित्सा करनी चाहिये। क्योंकि इस रोग की बार २ चिकित्सा करने पर भी शान्ति नहीं होती है इसलिये इसे उत्पात रोग कहते हैं। इस रोग का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। इसलिये इस रोग की ठीक प्रकार से चिकित्सा करनी चाहिये। इस चिकित्सा का मैं आगे वर्णन करूंगा॥

तत्रादितश्चैव धात्रीं स्नेहाभ्यङ्गस्वेदोपपन्नां नीलिकाचूर्णयुतं सर्पिः पाययेत्, त्रिवृच्चूर्णघृतं वा। ततः संसर्गोपपादितालघुस्निग्धैर्युषैर्दाडिमसैन्धवयुतैर्मृदुमोदनमश्रीयान्निवातशयनासनपरा। व्यायामाजीर्णमैथुनं च नानुचरेत्। विदारिगन्धैरण्डबृहतीगोक्षुरकपुनर्नवापृश्निपर्ण्य इति कषायमेनां पाययेत् स्तन्यशोधनार्थं, द्विपञ्चमूलकषायं वा। रास्ना सुगन्धा नाकुलीति कल्कः स्तनालेपः, तथाऽजगन्धाऽवल्गुजकबृहतीकण्टकारिकायुतः प्रदेहः, शताह्वामधुकाजगन्धाकाश्मर्यबृहतीकण्टकारिकाबलापीलुगुडूचीकल्को वा भद्रमुस्तात्व(ग)गरुकल्को वा पुराणसर्पिस्तिलकल्को वेति। अथोरुपूगपलाशपाटलिरास्नाक्वाथः परिषेकः, पयसा वा सुखोष्णेन चेति। देवदारुरास्नाबर्हिणमज्जेति तैलं विपक्रमभ्यञ्जनीयं, बिल्व-देवदारुचूतमूक्तिफलविपक्वं वा द्विबलाबिल्वमूलसुरदार्वाम्रपेषिकाविपक्वं वेति वातचर्मदलचिकित्सितमुक्तम् ॥९५॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २३८ तमं पत्रम्)

वातिक चर्मदल की चिकित्सा—सर्व प्रथम उस धात्री को स्नेहन तथा स्वेदन कराकर नीलिका अथवा त्रिवृत् चूर्ण से युक्त घृत पिलाना चाहिये। इसके बाद अनारदाना तथा नमक डले हुए संसर्गयुक्त गुरु एवं स्निग्ध यूषों के साथ नरम २ चावल खाने चाहिये तथा उस समय उसे निवात (जहां तेज अथवा सीधी हवा न आती हो) स्थान में सोना-बैठना चाहिये। व्यायाम, अजीर्ण तथा मैथुन का सेवन नहीं करना चाहिये। स्तन्य शोधन के लिये विदारीगन्धा, एरण्ड, बृहती, गोखुरू, पुनर्नवा तथा पृश्निपर्णी के कषाय अथवा दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) का कषाय पिलाना चाहिये। स्तनों पर रास्ना, सुगन्धा (स्पृक्का अथवा कृष्णजीरक) और गन्धनाकुली के कल्क का लेप करना चाहिये अथवा अजगन्धा, सोमराजी, बृहती तथा कटेरी का लेप अथवा सोया, मुलहठी, अजगन्धा, गंभारी, बृहती, कटेरी, बला, पीलु और गिलोय के कल्क या नागरमोथा तथा अगरु के कल्क या पुराने घी में तिलकल्क मिलाकर लेप करना चाहिये। तदनन्तर श्वेत एरण्ड, ढाक, पाटली (पाटला) तथा रास्ना के क्वाथ अथवा ईषदुष्ण जल का परिषेक करना चाहिये। देवदारु, रास्ना तथा मयूर की मज्जा के द्वारा अथवा बिल्व, देवदारु, आम तथा मुक्तिफल (कर्पूर अथवा लवलीफल) के द्वारा अथवा बला, अतिबला, बिल्वमूल, देवदारु तथा आम की गुठली की मज्जा के द्वारा सिद्ध तैल का अभ्यङ्ग करना चाहिये। यह वातिक चर्मदल की चिकित्सा कही गई है ॥९५॥

अथ पैत्तिके वक्ष्यामः। तद्यथा-धात्रीं स्नेहाभ्यङ्गस्वेपोपपन्नां वमनविरेचनेनोपक्रमेत्, निम्बोदकपिप्पलीकल्केन वामयेत् पिप्पलीलवणयुक्तेन वा दोषनिर्हरणार्थं, मृद्वीकेक्षुरसाभयादिभिर्विरेचयेन्मृद्वीकामलकसंयोगेन वा आरग्वधफलमज्जकषायसंयुक्तेन वा क्षीरेणेति यथाबलं वीक्ष्य। संसर्गं कारयेद्यवाग्वा यूषकृताकृतविधानेन वा। काश्मर्यमधुकपरूषकशीतपाकस्य इति कृत्वा सुशीतं शर्करामधुलिखितं कषायं पाययेत् स्तन्यशोधनार्थं,

५५ का.सं.