काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५] खिलस्थानम् ५११
येनोपक्रम्यमाणोऽपि शान्तिं नैति पुनः पुनः ॥९३॥ तेनैवोत्पातरोगोऽयं न विश्वास्यः कथञ्चन । तस्मात् सम्यगुपक्रम्यो यथा वक्ष्ये चिकित्सितम् ॥९४॥
असाध्य रोग की चिकित्सा न करे तथा साध्यरोग की यत्नपूर्वक चिकित्सा करे। जो रूप में द्वन्द्वज हो अथवा जो अधिक पक रहा हो—उस २ रोग को देखकर ठीक प्रकार से चिकित्सा करनी चाहिये। क्योंकि इस रोग की बार २ चिकित्सा करने पर भी शान्ति नहीं होती है इसलिये इसे उत्पात रोग कहते हैं। इस रोग का कभी विश्वास नहीं करना चाहिये। इसलिये इस रोग की ठीक प्रकार से चिकित्सा करनी चाहिये। इस चिकित्सा का मैं आगे वर्णन करूंगा॥
तत्रादितश्चैव धात्रीं स्नेहाभ्यङ्गस्वेदोपपन्नां नीलिकाचूर्णयुतं सर्पिः पाययेत्, त्रिवृच्चूर्णघृतं वा। ततः संसर्गोपपादितालघुस्निग्धैर्युषैर्दाडिमसैन्धवयुतैर्मृदुमोदनमश्रीयान्निवातशयनासनपरा। व्यायामाजीर्णमैथुनं च नानुचरेत्। विदारिगन्धैरण्डबृहतीगोक्षुरकपुनर्नवापृश्निपर्ण्य इति कषायमेनां पाययेत् स्तन्यशोधनार्थं, द्विपञ्चमूलकषायं वा। रास्ना सुगन्धा नाकुलीति कल्कः स्तनालेपः, तथाऽजगन्धाऽवल्गुजकबृहतीकण्टकारिकायुतः प्रदेहः, शताह्वामधुकाजगन्धाकाश्मर्यबृहतीकण्टकारिकाबलापीलुगुडूचीकल्को वा भद्रमुस्तात्व(ग)गरुकल्को वा पुराणसर्पिस्तिलकल्को वेति। अथोरुपूगपलाशपाटलिरास्नाक्वाथः परिषेकः, पयसा वा सुखोष्णेन चेति। देवदारुरास्नाबर्हिणमज्जेति तैलं विपक्रमभ्यञ्जनीयं, बिल्व-देवदारुचूतमूक्तिफलविपक्वं वा द्विबलाबिल्वमूलसुरदार्वाम्रपेषिकाविपक्वं वेति वातचर्मदलचिकित्सितमुक्तम् ॥९५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २३८ तमं पत्रम्)
वातिक चर्मदल की चिकित्सा—सर्व प्रथम उस धात्री को स्नेहन तथा स्वेदन कराकर नीलिका अथवा त्रिवृत् चूर्ण से युक्त घृत पिलाना चाहिये। इसके बाद अनारदाना तथा नमक डले हुए संसर्गयुक्त गुरु एवं स्निग्ध यूषों के साथ नरम २ चावल खाने चाहिये तथा उस समय उसे निवात (जहां तेज अथवा सीधी हवा न आती हो) स्थान में सोना-बैठना चाहिये। व्यायाम, अजीर्ण तथा मैथुन का सेवन नहीं करना चाहिये। स्तन्य शोधन के लिये विदारीगन्धा, एरण्ड, बृहती, गोखुरू, पुनर्नवा तथा पृश्निपर्णी के कषाय अथवा दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) का कषाय पिलाना चाहिये। स्तनों पर रास्ना, सुगन्धा (स्पृक्का अथवा कृष्णजीरक) और गन्धनाकुली के कल्क का लेप करना चाहिये अथवा अजगन्धा, सोमराजी, बृहती तथा कटेरी का लेप अथवा सोया, मुलहठी, अजगन्धा, गंभारी, बृहती, कटेरी, बला, पीलु और गिलोय के कल्क या नागरमोथा तथा अगरु के कल्क या पुराने घी में तिलकल्क मिलाकर लेप करना चाहिये। तदनन्तर श्वेत एरण्ड, ढाक, पाटली (पाटला) तथा रास्ना के क्वाथ अथवा ईषदुष्ण जल का परिषेक करना चाहिये। देवदारु, रास्ना तथा मयूर की मज्जा के द्वारा अथवा बिल्व, देवदारु, आम तथा मुक्तिफल (कर्पूर अथवा लवलीफल) के द्वारा अथवा बला, अतिबला, बिल्वमूल, देवदारु तथा आम की गुठली की मज्जा के द्वारा सिद्ध तैल का अभ्यङ्ग करना चाहिये। यह वातिक चर्मदल की चिकित्सा कही गई है ॥९५॥
अथ पैत्तिके वक्ष्यामः। तद्यथा-धात्रीं स्नेहाभ्यङ्गस्वेपोपपन्नां वमनविरेचनेनोपक्रमेत्, निम्बोदकपिप्पलीकल्केन वामयेत् पिप्पलीलवणयुक्तेन वा दोषनिर्हरणार्थं, मृद्वीकेक्षुरसाभयादिभिर्विरेचयेन्मृद्वीकामलकसंयोगेन वा आरग्वधफलमज्जकषायसंयुक्तेन वा क्षीरेणेति यथाबलं वीक्ष्य। संसर्गं कारयेद्यवाग्वा यूषकृताकृतविधानेन वा। काश्मर्यमधुकपरूषकशीतपाकस्य इति कृत्वा सुशीतं शर्करामधुलिखितं कषायं पाययेत् स्तन्यशोधनार्थं,
५५ का.सं.
५१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५]
पयस्यासारिवामृतामधूकमृद्वीकानां कषायं शर्करायुतं चेति । प्रपौण्डरीकसारिवोशीरचन्दनकल्कः स्तनालेपः, मधुकक्षीरशुक्लाचन्दनरसाञ्जनतुङ्गयुतः प्रदेहः, यष्टीमधुकचन्दनकल्को वा, मधुकचन्दनभद्रमुस्तामञ्जिष्ठार-साञ्जनकल्को वा, रसाञ्जनसारिवामधुकचन्दनोशीरकल्को वा, ककुभोदुम्बराश्वत्थवटनलमूलशालूक-वञ्जुलकल्को वा घृतयुतः, विशमृणालपद्मकमञ्जिष्ठापद्मरसाञ्जनकल्को वेति । मधुकमधुपर्णीवेडवेत-सशतावरीनलमूलकदलीकुशकाशपद्मोत्पलेक्षुविदारीवटोदुम्बरत्वग्जम्बुकुम्भिका मधुरा चेत्येतानि जलाढके पक्त्वा चतुर्थांशावशेषे घृतप्रस्थं पाचयेत् कषायद्विगुणक्षीरेण सगर्भः स्यान्मञ्जिष्ठावितूर्णकपयस्याधातक्युशीर चन्दनक्षीरकाकोलीप्रपौण्डरीकक्षीरशुक्लातालीसमृद्वीकेति सुपिष्टं विदध्यादेतेन सिद्धेनाभ्यज्य ततोऽव-चूर्णयेल्लोध्रमधुकदारुहरिद्रामलकीत्वक्पत्रचूर्णैनेतेनेत्येवम्, अस्माज्ज्वरदाहरागपाकव्रणादयश्चोपशाम्यन्तीति-पित्तचर्मदलचिकित्सितमुत्तमम् ।। १६ ।।
अब पैत्तिक चर्मदल की चिकित्सा कही जायगी—जैसे-धात्री को स्नेह का अभ्यङ्ग कराकर वमन तथा विरेचन कराये। दोषों का निर्हरण करने के लिये नीम के पानी (क्वाथ) में पिप्पली का कल्क मिलाकर उससे अथवा पिप्पली और लवण के द्वारा वमन कराये। तथा रोगी के बल के अनुसार मुनक्का, इक्षुरस तथा अभया (हरड़) अथवा मुनक्का और आंवला अथवा दूध में अमलतास के फल के गूदे का कषाय मिलाकर विरेचन कराये। उसके बाद रोगी को यवागू, कृतयूष तथा अकृतयूष के क्रम से संसर्जन कराये। अर्थात् यवागू आदि के क्रम से धीरे २ साधारण भोजन पर पहुंचे। स्तन्यशोधन के लिये उसे गंभारी, मुलहठी, फालसा तथा शीतपाकय (बलाफल) का क्वाथ बनाकर उसे ठण्डा करके शर्करा एवं मधु मिलाकर देना चाहिये अथवा पयस्या (क्षीरकाकोली), सारिवा, गिलोय, महुए का फल तथा मुनक्के के कषाय में शर्करा मिलाकर देना चाहिये। फिर पुण्डरीक, सारिवा, खस तथा चन्दन के कल्क का स्तनों पर लेप करना चाहिये। तथा मुलहठी, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी), रक्तचन्दन, रसौंत तथा तुङ्ग (नागकेसर या पद्माकेसर) अथवा मुलहठी और चन्दन का कल्क अथवा मुलहठी, रक्तचन्दन, नागरमोथा, मंजीठ तथा रसौंत के कल्क अथवा रसौंत, सारिवा, मुलहठी, रक्तचन्दन एवं खस के कल्क अथवा अर्जुन की छाल, गूलर, पीपल, बड़, नल की मूल, शालूक (कमलकन्द) तथा वञ्जुल (वेतस् अथवा जलवेतस) के कल्क में घी मिलाकर अथवा विसमृणाल, पद्माख, मंजीठ, कमल तथा रसाञ्जन के कल्क का लेप करना चाहिये। उसके बाद मुलहठी, मधुपर्णी (गिलोय), वेड (वेट्ट या वेल्ल-गीला चन्दन), वेतस्, शतावरी, नल (नड) की मूल, कदली (केला), कुश, काश, पद्म, उत्पल (नील कमल), इक्षु, विदारी (अथवा इक्षुविदारी शब्द एक ही हो तो भूमिकूष्माण्ड अर्थ होगा), बड़, गूलर की छाल, जामुन, कुम्भीका (जलपर्णी या रक्तपाढल) तथा मधुरा (शतपुष्पा सौंफ अथवा मेदा)-इन सबको एक आढक जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें एक प्रस्थ घृत तथा कषाय से दुगुना दूध डाले और मंजीठ, वितूर्णक (केवटीमाथा), काकोली, धाय के फूल, खस, रक्तचन्दन, क्षीरकाकोली, पुण्डरीक, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी), तालीशपत्र तथा मुनक्के को अच्छी प्रकार पीसकर इस कल्क के द्वारा घृत सिद्ध करें। इस घृत का अभ्यङ्ग करके शरीर पर लोध्र, मुलहठी, दारुहल्दी, आंवला, दालचीनी तथा तेजपत्र का चूर्ण छिड़क दे (Dusting) उपर्युक्त विधि से ज्वर, दाह, रंग (लालिमा) पाक तथा व्रण आदि शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह पैत्तिक चर्मदल की श्रेष्ठ चिकित्सा कही गई है ॥ १६॥
अत ऊर्ध्वं श्लैष्मिके वक्ष्यामः-अथ धात्रीं पूर्वेण विधिनोपचार्य निम्बकषायमदनफलसिद्धां व्यक्तलवणां यवागूं पाययेन्मदनफलतिलपिष्टतण्डुलसिद्धां वा वमनविधानेन सुखसलवणस्निग्धायाः श्लेष्मोद्धरणार्थं च पिप्पलीयुष्णोदकं पीत्वा च्छर्दयेत्, कृतवमनायाः शिरोविरेचनं विदध्यान्मुद्गसकतीनवेत्राग्रपटोल-निम्बमुस्तकानामन्यतमपरिगृहीतेन यूषेण मृदुमोदनं भोजयेत्। कुटजफलमुस्ताप्रियङ्गशार्ङ्गिष्ठापाठा-
चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५] खिल्स्थानम् ५१३
लोध्रगुडूचीमूर्वेत्यक्षमात्राणि यथालाभं सुखोष्णोदकेनानुपिबेत्, पाठाशृङ्गबेरकल्कं वा, कुटजफलपाठाकल्कं वा, किराततिक्तकमुस्ताचूर्णं वा मधुना लिहेत्। भद्रमुस्तारिष्टपटोलमूर्वादारुहरिद्रात्रिफलासप्तपर्णत्वगित्येतैः कषायमासुतं मधुना पाकव्यपदेशतश्चोपयोजयेत्, मुस्तकमालतीपत्रकल्केन स्तनावालेपयेत्। अथ विरेचनं त्रिवृत्त्रिफलोष्णोदकलवणसंयुक्तमुपयोज्य यूषश्चाहारविधिः। कुटजारिष्टारग्वधमदनस्वादुकण्टकमुस्त-कनक्तमालयुतः प्रदेहः, कुष्ठशुकनासारोहिणीमुस्तकिराततिक्तातिविषायुतो वा, सुरसशिग्रुमुस्ताकाल-मालकविडङ्गहिङ्गुपर्णीति वा, त्रिफलादारुहरिद्राकल्को वा हरिद्रारसाञ्जनकल्को वेति। भद्रमुस्तोशीरा-स्फोटाटरूषकहरिद्राकरञ्जसुमनारिष्टसिद्धं तैलमभ्यञ्जनीयमिति ।।१७।।
इसके बाद अब हम श्लैष्मिक चर्मदल की चिकित्सा कहेंगे—धात्री का पूर्वोक्त विधि से उपचार करके उसे वमन के विधान के अनुसार यवागू पिलाये जो नीम के कषाय तथा मैनफल के द्वारा सिद्ध की हुई हो तथा जिसमें पर्याप्त मात्रा में लवण डला हुआ हो अथवा जो मैनफल, तिलपिष्ट (तिलकुट) और चावलों के द्वारा सिद्ध की गई हो। सुखपूर्वक लवणयुक्त द्रव्यों के द्वारा स्नेहन हो जाने के बाद कफ को निकालने के लिये पिप्पली तथा गरम पानी पिलाकर वमन करादे। वमन कराने के बाद उसका शिरोविरेचन कराये। तदनन्तर मूंग, सतीन (मटर भेद—कलायस्त्रिपुटः प्रोक्तः सतीनो वर्त्तलो मतः), वेत्राग्र, पटोल, नीम तथा नागरमोथे में से किसी एक के यूष के साथ मृदु ओदन (भात) का भोजन कराये। इन्द्रजौ, नागरमोथा, प्रियङ्गु, शाङ्गिष्ठा (काकजंघा अथवा काकमाची), पाठा, लोध्र, गिलोय तथा मूर्वा (मोरवेल) में से जो २ ओषधि मिल जाये उन सबका एक २ अक्ष (तोला) चूर्ण अथवा पाठा और आर्द्रक का कल्क अथवा इन्द्रजौ और पाठा का कल्क सुखोष्ण जल से पीये। अथवा चिरायते और नागरमोथे का चूर्ण मधु से सेवन करे। नागरमोथा, नीम, पटोल, मूर्वा, दारुहल्दी, त्रिफला तथा सप्तपर्ण छाल के क्वाथ का संधान करके मधु के साथ पाक के रूप में प्रयोग करे तथा नागरमोथा और चमेली के पत्तों के कल्क का स्तनों पर लेप करे। तथा त्रिवृत्, त्रिफला एवं उष्णजल में नमक मिलाकर उसका विरेचन देवे तथा आहार के रूप में यूष का सेवन करना चाहिये। कुटज, नीम, अमलतास, मैनफल, गोखरू, नागरमोथा तथा करंज अथवा कुष्ठ, शुकनासा (शुकशिम्बी), रोहिणी, नागरमोथा, चिरायता तथा अतीस अथवा तुलसी, सहिजना, नागरमोथा, कालमालक (काली तुलसी), विडङ्ग तथा हिङ्गुपर्णी (इसी नाम का तृण विशेष) अथवा त्रिफला और दारुहल्दी के कल्क अथवा हल्दी और रसौंत के कल्क का लेप करना चाहिये। तथा नागरमोथा, खस, आस्फोट (आक), बांसा, हल्दी, करञ्ज, पूतिकरञ्ज तथा नीम से सिद्ध तैल का अभ्यङ्ग करना चाहिये ।।१७।।
भवति चात्र श्लोकः—
एषा चर्मदलोत्पत्तिर्व्याख्याता वर्णरूपतः। साध्यासाध्यविधानेश्च (प्रतीकार्यो) यथाक्रमम् ।।१८।।
इस प्रकार वर्ण (रंग) तथा रूप (आकृति आदि) के अनुसार चर्मदल की उत्पत्ति का वर्णन कर दिया गया है। साध्य एवं असाध्य के अनुसार यथाक्रम इनकी चिकित्सा करनी चाहिये ।।१८।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (ह ८५)।
(इति) खिलेषु चर्मदलचिकित्सा (ध्यायः पञ्चदशः) ।।१५।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। ह (८५)।
(इति) खिलेषु चर्मदलचिकित्सा (ध्यायः पञ्चदशः) ।।१५।।
५१४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]
अथाम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः षोडशः ।
अथातोऽम्लपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥ २ ॥
अब हम अम्लपित्त चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। जब कोई व्यक्ति पित्त के प्रकोपक अन्नपान का अधिक सेवन करता है तब उसके पित्त का सम्यक् पाक नहीं होता है। अपितु वह विदग्ध (Fermented) होकर अम्लभाव को प्राप्त हो जाता है उसे अम्लपित्त (Hyperacidity) कहते हैं ॥ १-२ ॥
विरुद्धमध्यशनाजीर्णादामे चामे च पूरणात् । पिष्टान्नानामपक्वानां मद्यानां गोरसस्य च ॥ ३ ॥
गुर्वाविष्यन्दिभोज्यानां वेगानां धारणस्य च । अत्युष्णस्निग्धरूक्षाम्लद्रवाणामतिसेवनात् ॥ ४ ॥
फाणितेक्षुविकाराणां कुलत्थानां च शीलनात् । भृष्टधान्यपुलाकानां पृथुकानां तथैव च ॥ ५ ॥
भुक्त्वा भुक्त्वा दिवास्वप्नादतिस्नानावगाहनात् । अन्तरोदकपानाच्च भुक्तपर्युषिताशनात् ॥ ६ ॥
वातादयः प्रकुप्यन्ति तेषामन्यतमो यदा । मन्दीकरोति कायाग्निमग्नौ मार्दवमागते ॥ ७ ॥
एतान्येव तथा भूयः सेवमानस्य दुर्मतेः । यत्किञ्चिदशितं पीतं देहिनस्तद्धि दह्यति ॥ ८ ॥
विदग्धं शुक्ततां याति शुक्तमामाशये स्थितम् । तदम्लपित्तमित्याहुर्भूयिष्ठं पित्तदूषणात् ॥ ९ ॥
जन्तौर्यदनुबध्नाति लौल्यादनियतात्मनः ।
निदान तथा सम्प्राप्ति—विरुद्ध भोजन (मानविरुद्ध तथा संयोग विरुद्ध), अध्यशन (अजीर्ण पर भोजन–अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते), अजीर्ण तथा शरीर में आम रस अथवा आम आहार के उपस्थित होने पर पुनः भोजन करने से, पिष्टान्न (उड़द की पिट्ठी आदि से बने द्रव्य) तथा अपक्व मद्य एवं गोरस (दूध) से, गुरु तथा अभिष्यन्दि भोजन से, वेगों के धारण करने से, अत्यन्त उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष एवं अम्ल भोजन से तथा द्रव पदार्थों के अधिक प्रयोग करने से, फाणित (राब) तथा गुड़ आदि अन्य इक्षु विकारों, कुलत्थ, भूने हुए धान्य, पुलाक (तुष अथवा तुच्छ धान्य) एवं पृथुक (चिउड़े) के अधिक सेवन से, भोजन करने के बाद तुरन्त दिन में सोने से, अत्यधिक स्नान एवं अवगाहन से, भोजन के बीच में पानी पीने से, पर्युषित (बासी) भोजन के करने से–वात आदि दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इनमें से जब कोई दोष जाठराग्नि को मन्द कर देता है उस समय अग्नि के मन्द हो जाने पर उपर्युक्त विरुद्धाशन आदि अथवा अन्य कारणों का सेवन करने पर मूर्ख व्यक्ति जो कुछ भी अन्न आदि खाता पीता है वह विदग्ध हो जाता है। वह विदग्ध हुआ अन्न शुक्त (अम्ल) बन जाता है। तथा वह शुक्त (अम्लत्व को प्राप्त हुआ अन्न रस) आमाशय में स्थित होता है। इस अवस्था में असंयमी मनुष्य जिह्वालोल्य के कारण जो कुछ भी खाता है वह विदग्ध हुए पित्त के कारण दूषित हो जाता है इसलिये इसे अम्लपित्त कहते हैं। माधवनिदान में इसके हेतु एवं सम्प्राप्ति के विषय में कहा है कि अपने कारणों से पहले से ही वृद्धि को प्राप्त हुआ पित्त, पित्तप्रकोपक आहार-विहार आदि के सेवन से प्रकुपित होकर अम्लभाव को प्राप्त हो जाता है–उसे अम्लपित्त कहते हैं।
अविशुष्के यथा क्षीरं प्रक्षिप्तं दधिभाजने ॥ १० ॥
क्षिप्रमेवाम्लतामेति कूर्चीभावं च गच्छति । रसधातौ तथा व्यम्ले भुक्तं मुक्तं विदह्यते ॥ ११ ॥
जिस प्रकार अच्छी तरह बिना सूखे हुए दही के वर्तन में यदि दूध डाल दिया जाय तो वह तुरन्त खट्टा हो जाता है तथा उसकी फुट्टियां (Curd) बन जाती हैं उसी प्रकार रस धातु के अम्लयुक्त होने पर (विदग्ध पित्त की उपस्थिति के कारण) जो कुछ भी भोजन किया जाता है वह विदग्ध हो जाता है ॥ १०-११ ॥
अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६] खिलस्थानम् ५१५
अव्यापन्ने त्वधिष्ठाने जाग्रतः स्वपतोऽपि वा। प्रेर्यमाणः समानेन प्रश्वासोच्छ्वासयोगतः ॥१२॥
इससे विपरीत शारीरिक अधिष्ठान के दूषित न होने पर जागृत तथा स्वप्नावस्था में श्वास-प्रश्वास के योग से समानवायु के द्वारा प्रेरित हुआ तथा उदान वायु के द्वारा धमन किया जाता हुआ पाचकाग्नि भोजन को सम्यक् प्रकार से पचा देती है। इस प्रकार इसकी उत्पत्ति का वर्णन किया गया है ॥१२॥
धम्यमान उदानेन सम्यक् पचति पाचकः। इत्युद्दिष्टं समुत्थानं, लिङ्गं वक्ष्याम्यतः परम् ॥१३॥ विड्भेदो गुरुकोष्ठत्वमम्लोत्क्लेशः शिरोरुजा। हृच्छूलमुदराध्मानमङ्गसादोऽन्त्रकूजनम् ॥१४॥ कण्ठोरसी विदह्येते रोमहर्षश्च जायते। सामान्यलक्षणं त्वेतद्विशेषश्चोपदेक्ष्यते ॥१५॥
अब मैं इसके लक्षणों का वर्णन करूंगा। अम्ल पित्त के सामान्य लक्षण—विड्भेद (अतिसार), कोष्ठ का भारी होना, अम्ल के कारण उत्क्लेश, शिरःशूल, हृच्छूल, पेट में आध्मान (अफारा), अङ्गसाद (शरीर का सुस्त होना) तथा आन्त्रकूजन (आंतों में वायु के कारण गड़गड़ाहट) होते हैं। रोगी के कण्ठ एवं छाती में जलन होती है तथा उसे रोमहर्ष होता है। ये अम्लपित्त के सामान्य लक्षण कहे गये हैं। आगे उसके विशेष लक्षणों का वर्णन किया जायगा ॥१३-१५॥
वाताच्छूलाङ्गसादौ च जृम्भा स्निग्धोपशायिता। पित्ताद्भ्रमो विदाहश्च स्वादुशीतोपशायिता ॥१६॥ कफाद् गुरुत्वं छर्दिश्च स्याद्रूक्षोष्णोपशायिता ॥१७॥
वातिक अम्लपित्त के लक्षण—वायु के कारण शूल, अङ्गसाद, जृम्भा (जंभाई) आती है तथा स्निग्ध पदार्थ उपशय होते हैं अर्थात् स्निग्ध पदार्थ शरीर के लिये सात्म्य होते हैं (वायु से विपरीत गुण होने के कारण)। पैत्तिक अम्लपित्त के लक्षण—पित्त के कारण शरीर में भ्रम एवं विदाह होता है तथा स्वादु और शीत पदार्थ शरीर के लिये उपशय होते हैं (पित्त से विपरीत गुणों के कारण)। श्लैष्मिक अम्लपित्त के लक्षण—कफ के कारण शरीर में भारीपन तथा वमन होती है और रूक्ष एवं उष्ण पदार्थ शरीर के लिये उपशय होते हैं (श्लेष्मा से विपरीत गुणों के कारण)।
वक्तव्य—उपशय जो आहार विहार शरीर के लिये सुख कर अथवा अनुकूल हो उसे उपशय कहते हैं। इसे ही सात्म्य भी कहते हैं। चरक वि. अ. १ में कहा है—सात्म्यं नाम तत्द्यदात्मन्युपशेते, सात्वार्थो ह्युपशयार्थः ॥१६-१७॥
व्याधिरामाशयोत्थोऽयं कफपित्ते तदाश्रये। तस्मादादित एवास्य मूलच्छेदाय बुद्धिमान् ॥१८॥ अक्षीणबलमांसस्य वमनं संप्रकल्पयेत्। नान्यो मान्यः क्र(मो) ह्यस्य शान्तये वमनादृते ॥१९॥ मूलच्छेदादिव तरोःस्कन्धशाखाविपर्यये।
यह रोग आमाशय से उत्पन्न होता है तथा कफ और पित्त उसके आश्रित होते हैं। इसलिये इसके मूल छेदन के लिये जिस रोगी का शारीरिक बल तथा मांस क्षीण नहीं हुए हैं उसे प्रारम्भ में ही वमन कराना चाहिये। स्कन्ध एवं शाखा के दूषित होने पर वृक्ष के मूल के काटने के समान इस रोग की शान्ति के लिये वमन के अतिरिक्त और कोई चिकित्सा क्रम नहीं है अर्थात् जिस प्रकार वृक्ष के मूल के काट दिये जाने पर वृक्ष का तना एवं शाखायें स्वयं सूख कर नष्ट हो जाती हैं उसी प्रकार यह रोग क्योंकि आमाशय से उत्पन्न होता है अतः आमाशय स्थित कफ की शान्ति के लिये वमन कराया जाता है इससे उसके अनुबन्धभूत अन्य दोष स्वयं शान्त हो जाते हैं ॥१८-१९॥
दोषशेषश्च वान्तस्य यः स्यात्तदनुबन्धकृत् ॥१२०॥ (इति ताडपत्रपुस्तके २३९ तमं पत्रम्।)
५१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]
तस्योपशमनं कुर्याल्लङ्घनैर्लघुभोजनैः । सात्म्यकालोपपन्नैश्च योगैः शमनपाचनैः ॥२१॥
वमन कराने के बाद यदि कोई अनुबन्ध्ररूप दोष बच जाता है तो उसकी शान्ति लङ्घन, लघुभोजन तथा सात्म्य एवं कालोचित शमन-पाचन योगों के द्वारा करनी चाहिये। अर्थात् इसमें पहले वमन कराने के बाद लङ्घन कराना चाहिये तथा लघु आहार देने चाहिये। तदनन्तर शमन-पाचन योगों का सेवन कराना चाहिये ॥२०-२१॥
दोषोत्क्लेशे न सहसा द्रवमौषधमाचरेत् । वमनीयादृते तद्धि न सम्यक् परिपच्यते ॥२२॥
दोषों का उत्क्लेश (प्रवृत्त्युन्मुख) होने के बाद वमन के अतिरिक्त और कोई द्रव औषध तुरन्त नहीं देनी चाहिये। क्योंकि उसका ठीक प्रकार से पाक नहीं हो पाता है ॥२२॥
चेष्टाहारविशेषेण किञ्चित् परिणते ततः । पीतं तु कुरुते यस्माच्छमपाचनभेदनम् ॥२३॥
कुछ समय के बाद चेष्टा एवं आहार आदि के कारण शारीरिक अवस्थाओं के परिणत हो जाने पर सेवन की हुई द्रव औषध दोषों का शमन-पाचन एवं भेदन कर सकती है ॥
नागरातिविषे मुस्ता नागरातिविषेऽभया । त्रायमाणा पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥२४॥ त्रयस्त्रिकार्षिका होते पातव्या दोषदर्शनात् । किरातातिक्तक्वाथो वा रोहिण्या वाऽथ केवलः ॥२५॥
जब तक शरीर में दोष दिखाई दें तब तक सोंठ, अतीस तथा नागरमोथा अथवा सोंठ, अतीस और हरड़ अथवा त्रायमाणा, पटोलपत्र और कुटकी तीनों का तीन २ कर्ष क्वाथ अथवा अकेले चिरायते या रोहिणी का क्वाथ पिलाना चाहिये।
संसर्गहतदोषस्य विशुद्धामाशयस्य च । यत्नेनाग्निसमाधाने प्रयतेत विचक्षणः ॥२६॥
संसर्ग से दोषों के नष्ट हो जाने पर तथा आमाशय के शुद्ध हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक जाठराग्नि को बढ़ाने का यत्न करना चाहिये ॥२६॥
यथा गोमयचूर्णाद्यैः सूक्ष्मैः सन्धुक्षितोऽनलः । क्रमेणाप्यायितबलो दहत्यार्द्रमपीन्धनम् ॥२७॥ तथा विशुद्धदेहानां कायाग्निः समुदीरितः । पाचयत्यन्नपानानि सारवन्त्यपि देहिनाम् ॥२८॥
जिस प्रकार सूक्ष्म गोबर आदि के चूर्ण से जलाई हुई अग्नि क्रमशः अधिक प्रज्वलित होकर पीछे गीले हुए ईधन (लकड़ी आदि) को भी जला देती है उसी प्रकार शरीर के शुद्ध हो जाने पर प्रदीप्त हुई जाठराग्नि पीछे से सारयुक्त (अर्थात् गुरु) अन्न-पान को भी पचा देती है। अर्थात् प्रारम्भ में लघु अन्नपान के द्वारा जाठराग्नि को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये। बाद में प्रवृद्ध हुई अग्नि गुरु भोजन आदि को भी पचा देती है ॥२७-२८॥
सम्यक्परिणतेष्वेसु न स्युरामान्वया गदाः । जायते च तदोत्साहस्तुष्टिः पुष्टिर्वपुर्बलम् ॥२९॥
इन दोषों अथवा आहार रसों का सम्यक् परिपाक हो जाने के बाद आमयुक्त रोग नहीं हो सकते हैं तथा उस समय शरीर में उत्साह, तुष्टि (संतोष), पुष्टि (पोषण) तथा शारीरिक बल की प्राप्ति होती है ॥२९॥
ततः क्रमविशेषेण जातप्राणस्य देहिनः । पक्वाशयगतान् दोषान् स्त्रंसनेन विनिर्हरेत् ॥३०॥
उसके बाद उस व्यक्ति के प्राणों में क्रमशः बल आजाने पर स्त्रंसन (विरेचन) के द्वारा उसके पक्वाशयगत दोषों का निर्हरण करना चाहिये ॥३०॥
अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६] खिलस्थानम् ५१७
लवणाम्बुना सुखोष्णेन क्षीरेणेक्षुरसेन वा । मधूदकेन तिक्तैर्वा वमनं संप्रकल्पयेत् ॥३१॥
वमन योग—लवणाम्बु (नमक के पानी), सुखोष्ण दूध, इक्षुरस, मधूदक (मधु में पानी मिलाकर) अथवा तिक्तद्रव्यों के द्वारा वमन कराना चाहिये ॥३१॥
त्रिफलां त्रायमाणां च कटुका रोहिणीं त्रिवृत् । पञ्चैषामर्धपलिकास्त्रिवृता त्वर्धभागिका ॥३२॥
पीत्वा विरेचनं ह्येतदम्लपित्ताद्विमुच्यते ।
विरेचन योग—त्रिफला, त्रायमाणा, कटुकी; रोहिणी तथा त्रिवृत्—ये पांचों आधापल तथा त्रिवृत् इनसे आधा लेवे । इस विरेचन को पीकर मनुष्य अम्लपित्त से मुक्त हो जाता है ॥
पटोलपत्रं त्रिफलात्वचश्चार्धपलोन्मिताः ॥३३॥
त्रायन्तीरोहिणीनिम्बयष्टिकाः कर्षसंमिताः । पलद्वयं मसूराणां चैकध्यं तद्विपाचयेत् ॥३४॥
जलाढकेऽष्टभागं तु पूतशेषं पुनः पचेत् । सर्पिषः कुडवं दत्त्वा प्रस्थार्धमवशेषितम् ॥३५॥
तत् पीत्वा नातिशीतोष्णं सुखेनाशु विरिच्यते । चिरप्रसक्तमप्येतदम्लपित्तं व्यपोहति ॥३६॥
वातपित्तं ज्वरं कुष्ठं विसर्पं वातशोणितम् । विद्रधि रक्तगुल्मं च विस्फोटांश्चाशु नाशयेत् ॥३७॥
पटोल पत्र एवं त्रिफला की छाल—आधा पल, त्रायमाणा, रोहिणी, नीम तथा मुलहठी—एक कर्ष तथा मसूर दो पल इन सबको एकत्र करके एक आढक जल में पकाये । अष्टमांश शेष रहने पर उसे छान कर एक कुडव घृत डालकर पुनः पकाये । आधा प्रस्थ शेष रहने पर उतार ले । इस घृत का न बहुत शीत तथा न बहुत उष्णरूप में सेवन करने से सुखपूर्वक विरेचन हो जाता है तथा यह अत्यन्त पुराने अम्लपित को भी नष्ट कर देता है । तथा इसके प्रयोग से वात, पित्त, ज्वर, कुष्ठ, विसर्प, वातरक्त, विद्रधि, रक्तगुल्म तथा विस्फोट शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ॥३३-३७॥
पुराणाः शालयो मुद्गा मसूराः सहरेणवः । गव्यं सर्पिः पयो वाऽपि जाङ्गलाश्च मृगद्विजाः ॥३८॥
कलायशाकं पौतीकं वासापुष्पं सवास्तुकम् ।
यानि चान्यानि शाकानि तिक्तानि च लघूनि च ॥३९॥
भोजनेनाऽतिशस्यन्ते यच्चान्यदविदाहि च । तत्सात्म्यानां प्रयोगाणां यथोक्तानां च शीलनम् ॥४०॥
अम्लपित्त में पथ्य—पुराने शालि चावल, मूंग, मसूर, हरेणु, गोघृत, गोदुग्ध, जांगल पशुपक्षियों का मांस, मटर का शाक, पौतीक (करंज), बांसे के फूल, बथुआ तथा अन्य भी तिक्त एवं लघु शाक और जो भी अविदाही (जो विदाह उत्पन्न न करते हों) आहार आदि द्रव्य हैं—उनका भोजन में प्रयोग करना चाहिये । इसके अतिरिक्त यथोक्त सात्म्य प्रयोगों का सेवन करना चाहिये ॥३८-४०॥
लशुनस्य हरीतक्याः पिप्पल्याः सर्पिषस्तथा । मदिरायाश्च जीर्णायाः कालाग्निबलवृद्धये ॥४१॥
व्याघेरस्य यथोक्तानां निदानानां च वर्जनम् ।
इसके अतिरिक्त रोगी के काल, अग्नि एवं बल की वृद्धि के लिये लहसुन, हरड़, पिप्पली, घृत तथा पुरानी मदिरा का सेवन करना चाहिये तथा इस रोग के यथोक्त निदान को छोड़ देना चाहिये अर्थात् इस रोग के उत्पन्न करने वाले कारणों का सेवन नहीं करना चाहिये ॥४१॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तव्यायामसेविनः ॥४२॥
५१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]
शुक्त१कोऽयमलोलस्य शाम्यत्यात्मवतः सतः ।
समुचित आहार-विहार का सेवन करने वाले, समुचित व्यायाम करने वाले, जिह्वालौल्य से रहित अर्थात् संयमी, आत्मवान् (जितेन्द्रिय) तथा सज्जन पुरुष का शुक्तक (अम्लपित्त) रोग शान्त हो जाता है ॥४२॥
यश्च यस्यानुबन्धः(द्धः) स्याद्दोषस्तस्योपशान्तये ।।४३।।
प्रयतेत भिषङ् नित्यं तच्छान्तौ स प्रशाम्यति ।
जो दोष जिसका अनुबन्ध हो, चिकित्सक को उसकी शान्ति का प्रयत्न करना चाहिये । उस दोष के शान्त होने पर वह अनुबन्ध दोष तो स्वयं शान्त हो जायेगा ॥४३॥
आनूपदेशे प्रायेण संभवत्येष देहिनाम् ।।४४।।
तस्माज्जाङ्गलजैरेनमौषधैः समुपक्रमेत् । अप्रशाम्यति चैतस्मिन्नपि देशान्तरं व्रजेत् ।।४५।।
यह रोग प्रायः आनूप देश में रहने वाले प्राणियों को होता है इसलिये उस मनुष्य का जांगल ओषधियों के द्वारा उपचार करना चाहिये । तथा तब भी उसके शान्त न होने पर रोगी को दूसरे देश में चले जाना चाहिये अर्थात् अपना Change of climate कर लेना चाहिये । जलवायु परिवर्तन से रोग पर अवश्य प्रभाव होता है । जो रोग हठी (Obstinate) हो गये हों उनपर जलवायु के परिवर्तन का ही कुछ प्रभाव पड़ सकता है उस पर ओषधियों का बहुत कम प्रभाव होता है । अनुभवी लोगों का कथन है कि एक चिरकालीन रोगी को यदि एक कमरे से दूसरे कमरे में ही बदल दिया जाय तो भी उसके रोग में थोड़ा बहुत अवश्य अन्तर हो जाता है परन्तु परिवर्तन स्वच्छ तथा शुद्ध वायु वाले स्थान पर ही होना चाहिये ॥
स एव देशो यत्र स्यादारोग्यं ते च बान्धवाः ।
गच्छन्ति ये न गच्छन्ति ये चास्य हितकारिणः ।।४६।।
वही देश (स्थान) उत्तम माना जाता है जहां मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक रहता हो । तथा वे ही बन्धु माने जाते हैं जो उससे दूर नहीं जाते हैं तथा जो उसके हितकारी हों ॥४६॥
नित्यालोलस्य दीनस्य परिदूनस्य देहिनः । क्रियाः सर्वाः प्रहीयन्ते स्वजनो विजनीभवेत् ।।४७।।
जो व्यक्ति नित्य अस्वस्थ (निष्क्रिय-बोदा) रहता हो, जो दीन हो तथा जिसका शरीर कष्टमय हो उसके सब कार्य नष्ट हो जाते हैं तथा स्वजन (अपने संबन्धी) भी सब उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥४७॥
तस्मात् सततमारोग्ये प्रयतेत विचक्षणः । अरोगो जीवितफलं सुखं समधिगच्छति ।।४८।।
इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति को सदा आरोग्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये । स्वस्थ व्यक्ति जीवन के फल (धर्मार्थ काम मोक्ष) को सुखपूर्वक प्राप्त कर लेता है । चरक सू. अ. १ में कहा है—धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥
ज्वरातीसारपाण्डुत्वशूलशोथारुचिभ्रमैः । उपद्रवैरिमैर्जुष्टः क्षीणधातुर्न सिद्ध्यति ।।४९।।
यदि अम्लपित्त रोग में ज्वर, अतिसार, पाण्डु, शूल, शोथ, अरुचि तथा भ्रम आदि उपद्रव हो जायें तथा रोगी की
१. अलोलस्य जिह्वालौल्यादिरहितस्याऽयं शुक्तकोऽम्लपित्तामयः शाम्यतीत्यर्थः ।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५१९
धातुएं क्षीण हो जायें तो वह सिद्ध नहीं होता अर्थात् उपर्युक्त उपद्रव हो जाने पर अम्लपित्त रोग असाध्य हो जाता है ॥४९॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। पृह (४६)
इति खिलेष्वम्लपित्तचिकित्साध्यायः षोडशः ।। ड ट (१६)
(इति ताडपत्रपुस्तके २४० तमं पत्रम् ।)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था । पृह (४६)
इति खिलेष्वम्लपित्तचिकित्साध्यायः षोडशः ।। ड ट (१६)
अथ शोथचिकित्साध्यायः सप्तदशः ।
अथातः शोथचिकित्सितं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम शोथ चिकित्सित् नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
वान्तस्याथ विरिक्तस्य कर्शितस्य ज्वरादिभिः । महोपवासक्लिष्टस्य विरुद्धार्जीर्णभोजिनः ।।३।।
सद्यश्चात्यर्थलवणक्षारोष्णाम्लकटून् रसान् । शूकरोरभ्रमांसादि दधिमृद्भक्षणादि च ।।४।।
शीतप्रवातव्यायामव्यवायांश्चातिसेवतः । तथैव दुष्प्रजाताया नार्याः कृच्छ्रेण वा पुनः ।।५।।
सूताया निःस्रुतायाश्च द्विषन्त्याः स्वमुपक्रमम् । एतदेव निदानं च शीलयन्त्यास्ततस्तयोः ।।६।।
शोथः संजायते शीघ्रं दारुणः, स चतुर्विधः ।
निदान तथा सम्प्राप्ति— वमन तथा विरेचन के बाद, ज्वर आदि के द्वारा कृश हो जाने से, लम्बे उपवास के बाद, विरुद्ध भोजन से तथा अजीर्ण पर भोजन करने से, अत्यधिक लवण, क्षार, उष्ण पदार्थ, अम्ल एवं कटु रसों के सेवन से, सूअर तथा मेंढे के मांस और दही एवं मिट्टी के खाने से, तेज ठण्डी हवा, व्यायाम, तथा व्यवाय (मैथुन) के अधिक प्रयोग से, जिसे प्रसव ठीक प्रकार से न हुआ हो अथवा कष्ट से हुआ हो, जिसका गर्भस्राव हो गया हो, जो चिकित्सा से द्वेष करती हो अर्थात् चिकित्सा न करवाती हो—इत्यादि उपर्युक्त कारणों तथा अन्य निदानों का सेवन करने से शीघ्र ही दारुण शोथ हो जाता है ॥३-६॥
वातिकः पैत्तिकश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातिकः ।।७।।
शोथ के भेद— यह शोथ चार प्रकार का होता है १. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक तथा ४. सान्निपातिक ॥७॥
आगन्तुः क्षतनिष्पिष्टच्युतभग्नादिसंभवः । दष्टावमूत्रिताघ्रातसंस्पर्शगरयोगजः ।।८।।
आगन्तु शोथ— इसके अतिरिक्त आगन्तु शोथ क्षत (चोट लग जाने) से, पिसजाने से, गिर पड़ने से अथवा हड्डी आदि के टूट जाने से तथा सर्प आदि विषैले प्राणियों के द्वारा काटने, मूत्र करने, सूंघने, स्पर्श करने अथवा विष के कारण
५२० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शोथचिकित्साध्यायः १७]
भी हो जाती है। इस प्रकार आगन्तु एवं विषंज मिला कर कुल ६ प्रकार की शोथ होती है। माधवनिदान में द्वन्द्वज शोथों के तीन पृथक् भेद देकर ९ भेद कर दिये गये हैं। यथा—दोषैः पृथक् द्वयैः सर्वैरभिघाताद्विषादपि। अर्थात् तीनों दोषों से पृथक् २ तीन, द्वन्द्वज से तीन, सन्निपात से एक, अभिघात से एक और विष से एक-इस प्रकार कुल ९ होते हैं। द्वन्द्वज शोथों में दोष प्रकृतिसमसमवायावस्था में विद्यमान होने से उन्हें पृथक् नहीं गिना गया है। इस प्रकार जो यहां ६ ही शोथों का वर्णन किया गया है वह समुचित ही है ॥८॥
प्रकोपेहेतुः सर्वेषां सामान्येनैव कीर्तितः । पूर्वं ज्वरनिदाने तु प्रोक्तः प्रत्येकशो मया ।।९।।
इन सब प्रकार की शोथों के प्रकोप के कारण सामान्य रूप से ही कहे गये हैं क्योंकि पहले ज्वर निदान में मैंने प्रत्येक का पृथक् २ प्रकोप कारण कहा है ॥९॥
यथावदेषां रूपाणि संप्रवक्ष्याम्यतः परम् । अपराह्ने ध्रु वा वृद्धिः श्वयथो रनिलात्मनः ।।१०।। पूर्वाह्ने श्लैष्मिकस्य स्यान्मध्याह्ने पैत्तिकस्य तु ।
अब मैं इन सबके स्वरूप का यथावत् वर्णन करूंगा। शोथों का वृद्धि काल-वातिक शोथ की अपराह्न (सायंकाल-दिन के पिछले प्रहर), श्लैष्मिक की पूर्वाह्न (दिन के पहले प्रहर में) तथा पैत्तिक की मध्याह्न काल में वृद्धि होती है ॥१०॥
पूर्वमध्यापरे यामे ह्रासश्चैषां यथाक्रमम् ।।११।।
शोथों का ह्रास—इनका ह्रास क्रमशः पूर्वाह्न, मध्याह्न तथा अपराह्न में होता है। अर्थात् वातिक शोथ का पूर्वाह्न में, श्लैष्मिक का मध्याह्न तथा पैत्तिक का अपराह्न में ह्रास होता है।
श्याववर्णः सवर्णो^१ वा क्षिप्रोत्थाननिवर्तनः । पिपीलिकाकीर्ण इव ताम्यते परितुद्यते ।।१२।। विषमज्वरजुष्टस्य चिराच्चैव विदह्यते । भिन्नरोमा चलोऽङ्गुल्या निम्नो भवति पीडितः ।।१३।। सिरास्नायुत्वगायामैरधःकाये च वर्धते । स्निग्धोष्णोपशयी रूक्षः श्वयथुर्वातसंभवः ।।१४।।
वातिक शोथ के लक्षण—वातिक शोथ का रंग काला अथवा सवर्ण (अविकृत) होता है। यह शीघ्र ही उत्पन्न होती है तथा शीघ्र ही शान्त भी हो जाती है, वह स्थान चीटियों से घिरे हुए के समान होता है। तथा उसमें ऐसा प्रतीत होता है कि मानों चींटियां काट रही हों तथा पीडा होती है। यदि रोगी को विषम ज्वर हो तो वह शोथ शीघ्र ही विदग्ध हो जाती है-पक जाती है। उसमें रोम (बाल) टूट जाते हैं, वह शोथ अस्थिर होती है तथा उंगली से दबाने पर वह शोथयुक्त स्थान नीचे दब जाता है (Pits on pressure) शरीर के निचले भाग में सिरा, स्नायु एवं त्वचा के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होता है, स्निग्ध एवं उष्ण वस्तुएं उसके अनुकूल-सात्म्य होती हैं तथा वह रूक्ष होती है ॥१२-१४॥
नीललोहितपीताभः पीड्यते धूप्यते मुहुः । क्षिप्रपाकी सविद्भेदस्तृष्णादाहज्वरान्वितः ।।१५।। नाभ्यां च बस्तिमूले च वृद्धिश्चास्य विशेषतः । नित्यं च (रोच)ते शीतं श्वयथुः पित्तसंभवः ।।१६।।
पैत्तिक शोथ के लक्षण—जो शोथ नीले, लाल तथा पीले रंग की हो, जिसमें बहुत पीडा तथा धूप लगे, जो शीघ्र ही पक जाये, जिसमें साथ में अतिसार, तृष्णा, दाह एवं ज्वर हो, जिसकी नाभि एवं बस्तिमूल में विशेष वृद्धि हो तथा जिसमें शीत (ठण्डी वस्तुएं) अच्छी लगती हों-वह पैत्तिक शोथ होती है ॥१५-१६॥
स्थिरः शीतोऽतिबहलः श्लक्ष्णः पाण्डुरवेदनः । सोत्क्लेशा रोचकस्वापकण्डूकाठिन्यगौरवः ।।१७।।
१. अविकृतवर्ण इत्यर्थः ।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२१
चिराद् वृद्धिमवाप्नोति चिराच्च विनिवर्तते । उरोगण्डाक्षिकूटेषु वृद्धिश्चास्य विशेषतः ॥१९८॥
शीतज्वरकरः शीतद्वेषी शोफः कफात्मकः ।
श्लैष्मिक शोथ के लक्षण—जो शोथ स्थिर, शीतल, अत्यन्त घनी, चिकनी, पाण्डुवर्ण का तथा वेदना रहित हो, जिसमें उत्क्लेश (जी मचलाना) तथा अरुचि हो, जिसमें स्पर्शज्ञान न हो (सोई हुई सी-सुन्न हो), जिसमें कण्डू हो, जो कठिन तथा गुरु हो, जो शोथ बहुत देर में बढ़ती हो तथा बहुत देर में हटती हो, छाती, कपोल एवं अक्षिकूटों में जिसकी विशेष वृद्धि होती हो, जिसमें ठण्ड लग कर ज्वर आता हो तथा जिसमें शीत अच्छी न लगे-वह श्लैष्मिक शोथ होती है।
नीलपीतारुणाभासः सिराजालोपसन्ततः ॥१९९॥
अनेकोपद्रवस्त्रावः सर्वरूपसमन्वितः । सुतीव्रवेदनोऽसाध्यः श्वयथुः सान्निपातिकः ॥२००॥
सान्निपातिक शोथ के लक्षण—जो नीली, पीली एवं अरुण वर्ण की हो, जो सिराजाल से युक्त हो, जिसमें अनेक उपद्रव तथा स्त्राव होते हों, जिसमें वात, पित्त एवं कफ तीनों के लक्षण विद्यमान हों, जिसमें अत्यन्त तीव्र वेदना होती हो वह सान्निपातिक शोथ होती है। यह असाध्य है ॥१९-२०॥
रक्तश्यावारुणोऽत्युष्णस्तोदभेदरुजान्वितः । आगन्तुः, सविषस्ताम्रः कृष्णो वाऽऽशु विसर्पतिः ॥२१॥
हल्लासारुचितृण्मूर्च्छाज्वरारुचिकरो भृशम् ।
आगन्तु शोथ के लक्षण—आगन्तु शोथ लाल, काली तथा अरुण वर्ण की होती है, अत्यन्त उष्ण होती है तथा इसमें तोद (सुई चुभने के समान) तथा भेद (शस्त्र के काटे जाने के समान) से युक्त पीडा होती है। विषज शोथ के लक्षण—विषज शोथ ताम्र एवं कृष्ण वर्ण की होती है, सारे शरीर में शीघ्र फैल जाती है, इसमें अत्यधिक हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर एवं अरोचकता होती है ॥२१॥
इति षड्विधमुद्दिष्टं श्वयथोर्लक्षणं मया ॥२२॥
इस प्रकार मैंने ६ प्रकार की शोथों के लक्षण कह दिये हैं॥
नृणां तु पादप्रभवः स्त्रीणां च मुखसंभवः । उभयोर्यश्च गुह्यस्थः सर्वगश्च न सिद्ध्यति ॥२३॥
असाध्य शोथ—जो शोथ मनुष्य में पैरों से उत्पन्न हो कर मुख की ओर आता है तथा स्त्रियों में मुख से उत्पन्न हो कर पैरों की ओर आता है वह असाध्य होता है। अथवा स्त्री एवं पुरुष दोनों के ही गुह्यस्थानों पर तथा सम्पूर्ण शरीर पर होने वाली शोथ असाध्य होती है। पुरुष का ऊर्ध्वकाय प्रधान एवं भारी माना गया है अतः पैरों से प्रारम्भ हो कर मुख (प्रधान स्थान) की ओर आने वाली शोथ असाध्य हो जाती है। इसी प्रकार स्त्री का अधः काय प्रधान एवं भारी होता है अतः मुख से प्रारम्भ हो कर पैरों (प्रधान स्थान) की ओर आने वाली शोथ असाध्य होती है ॥२३॥
मारुतः सर्वशोफानां मूलहेतुरुदाहृतः । यथा च पित्तं दाहस्य, शैत्यस्य च यथा कफः ॥२४॥
जिस प्रकार दाह का मूल हेतु पित्त होता है तथा शीतलता का कफ होता है उसी प्रकार सब शोफों का मूल हेतु वायु माना गया है। इसी लिये चरक चि. अ. १२ में शोथ की सम्प्राप्ति बताते हुए कहा है कि जब दूषित हुआ वायु बाह्य शिराओं में पहुंच कर कफ, रक्त और पित्त को दूषित करता है तब उनके द्वारा मार्ग के रुक जाने से अन्य स्थानों पर न जा सकने के कारण वहीं उभर कर शोथ हो जाती है। अर्थात् शोथ में सर्व प्रथम वायु ही दूषित होता है तथा वही कफ, पित्त आदियों को दूषित करके शोथ का कारण बनता है ॥२४॥
५२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]
त्वग्रक्तमांसमेदांसि शोथोऽधिष्ठाय वर्धते । तदस्याशु क्रियां कुर्याद्दारुणस्य यथोत्तरम् ।। २५ ।।
शोथ त्वचा, रक्त, मांस और मेदा का आश्रय करके बढ़ता है। यह यथोत्तर दारुण होता जाता है। इस लिये इसकी शीघ्र ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् शोथ क्रमशः त्वचा से रक्त, रक्त से मांस और मांस से मेदा में आश्रय करता हुआ बढ़ता जाता है। तथा यह क्रमशः कष्टसाध्य होता जाता है अर्थात् त्वचा की अपेक्षा रक्त में पहुंचने पर अधिक कष्टसाध्य हो जाता है। रक्त की अपेक्षा मांस में तथा मांस की अपेक्षा मेदा में पहुंचने पर कष्टसाध्य हो जाता है। इस लिये इसकी प्रारंभ से ही चिकित्सा करनी चाहिये जिससे यह पहली से अगली धातु में न पहुंचने पाये ।। २५ ।।
कफपित्तोत्तरे शोफे क्षामदेहस्य देहिनः । वमनाद्यां क्रियां कुर्यात्तद्युक्तमनिलोत्तरे ।। २६ ।।
शाल्यन्नमुद्गमण्डेन शोथी भुञ्जीत मात्रया । सबालमूलकव्योषपिप्पलीकेन वाऽऽदितः ।। २७ ।।
जिस शोथ में कफ एवं पित्त की प्रधानता हो तथा रोगी का शरीर क्षीण हो उसमें प्रारंभ में वमन कराना चाहिये। तथा वातप्रधान शोथ में रोगी को युक्तिपूर्वक मात्रा में शालि चावल तथा मुद्गमण्ड के साथ अथवा कच्ची मूली, त्रिकटु तथा पिप्पली के साथ भोजन करे ।। २६-२७ ।।
लध्वामाशयकोष्ठस्य पञ्चगव्येन सर्पिषा । कल्याणकेन तिक्तेन दशमूलादिकेन वा ।। २८ ।।
स्निग्धस्विन्नस्य वमनं विदध्याच्च विरेचनम् । ततो दशाहान् सोऽश्रीयात् पयसा वाऽप्पभोजनम् ।।
रोगी का आमाशय एवं कोष्ठ लघु हो जाने पर उसे स्नेहन तथा स्वेदन कराकर पञ्चगव्य घृत, कल्याण घृत, तिक्त घृत अथवा दशमूल घृत के द्वारा वमन एवं विरेचन कराये। उसके बाद दस दिन तक उसे दूध के साथ भोजन कराना चाहिये ।। २८-२९ ।।
ततो यवान्नं तक्रेण शीलयेच्च यथाबलम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २४१ तमं पत्रम्)
पञ्चमुष्टिकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा ।। ३० ।।
तदनन्तर रोगी को बल के अनुसार तक्र, पञ्चमुष्टिक यूष, अथवा जाङ्गल मांसरस के साथ यवान्न (यवों का बना हुआ भात) का सेवन करना चाहिये ।। ३० ।।
दधिमद्यसुरास्नेहशाकपिष्टाम्लसेवनम् । असात्म्यानि निदानं च वर्जयेत् पथ्यमाचरेत् ।। ३१ ।।
शोथ में अपथ्य—दही, मद्य, सुरा, स्नेह (घृत तैल आदि स्निग्ध द्रव्य), शाक, उड़द की पिठ्ठी आदि तथा अम्ल (खट्टे द्रव्य-अचार चटनी आदि) का सेवन और अन्य असात्म्य एवं निदानोक्त भावों का त्याग करना चाहिये। तथा पथ्य का सेवन करना चाहिये ।। ३१ ।।
सगुडं शृङ्गबेरं च भक्षयेत् प्रातरुत्थितः । हरीतकीं गुडयुतां त्रिस्र¹मां वाऽभ्यसेत् सदा ।। ३२ ।।
प्रातःकाल उठ कर रोगी को अदरक अथवा हरीतकी में गुड मिलाकर सेवन करना चाहिये। अथवा समान भाग हरीतकी, गिलोय और सोंठ के चूर्ण का प्रयोग करना चाहिये ।।
१. समभागा हरीतकी गुडूची शुण्ठी=त्रिसमा।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२३
पिप्पलीवर्धमानं वा, पिप्पल्यो मधुकेन वा । देवदार्वाभयाशुण्ठीचूर्णकल्कमथापि वा ।।३३।।
पिबेत्त्रयाणामेतेषां क्वाथं च सपुनर्नवम् ।
अथवा वर्धमान पिप्पली का प्रयोग करना चाहिये या पिप्पली और मुलहठी का प्रयोग करे। अथवा पुनर्नवा के साथ देवदारु, हरड़ तथा सोंठ—इन तीनों के चूर्ण के कल्क का क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥३३॥
महौषधं चित्रकं वा पिप्पल्यो देवदारु वा ।।३४।।
तक्रेण पयसा वाऽथ सेवमानः सुखी भवेत् ।
अथवा सोंठ, चित्रक, पिप्पली और देवदारु के चूर्ण को तक्र या दूध से पीने से रोगी सुखी (स्वस्थ) होता है ॥३४॥
चित्रामूलाग्निकश्यामात्रिव्योषैर्वा शृतं पयः ।।३५।।
महौषधं देवदारुकल्कं वा पयसा पिबेत् ।
चित्रा (द्रवन्ती अथवा इन्द्रवारुणी) की जड़, चित्रक, त्रिवृत् तथा त्रिकुट से सिद्ध किये हुए दूध का प्रयोग करना चाहिये अथवा दूध के साथ सोंठ और देवदारु के कल्क का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥
गन्धर्वहस्तं त्रिव्योषं श्यामामूलं च पञ्चमम् ।।३६।।
क्षीरसिद्धं पिबेदेतद्यस्य स्याच्छ्वयथुर्महान् ।
जिसके शरीर में महान् शोथ हो उसे एरण्ड, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) और त्रिवृन्मूल—इन पांचों द्रव्यों को दूध में सिद्ध करके पीना चाहिये ॥३६॥
गोमूत्रं महिषीमूत्रमुष्ट्रमूत्रमथो पिबेत् ।।३७।।
यथास्वं क्षीरमिश्रं वा शीलयेच्छोफशान्तये ।
शोफ (शोथ) की शान्ति के लिये गौ, भैंस तथा ऊंटनी का मूत्र पीना चाहिये। अथवा उपर्युक्त मूत्रों में योग्य परिमाण में दूध मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥३७॥
सर्पिः पुनर्नवाक्वाथे कल्कैरेभिविपाचयेत् ।।३८।।
व्योषमुस्ता .......... दिने दिने । सर्वेषामेव शोथानां प्रयोगोऽयं विधीयते ।।३९।।
पुनर्नवा के क्वाथ में त्रिकटु, नागरमोथा आदि ओषधियों का कल्क डालकर घृत सिद्ध करना चाहिये। सम्पूर्ण शोथों में प्रतिदिन इसका प्रयोग करना चाहिये ॥३८-३९॥
अयोरजस्त्रिकटुकं त्रिवृता कटुरोहिणी । त्रिफलाया रसेनैतत् पीत्वा चूर्णं सुखी भवेत् ।।४०।।
त्रिफला के रस के साथ लोहचूर्ण, त्रिकटु, त्रिवृत् तथा कुटकी के चूर्ण का सेवन करके रोगी सुखी होता है ॥४०॥
त्रिफला त्रिवृता दन्ती विडङ्गं गजपिप्पली । त्रिव्योषं रोहिणी दारु चित्रकं चेति चूर्णयेत् ।।४१।।
अयोरजस्तद् द्विगुणं क्षीरेणाभ्यस्य मुच्यते ।
त्रिफला, त्रिवृत्, दन्ती, विडङ्ग, गजपिप्पली, त्रिकटु, रोहिणी, दारुहल्दी तथा चित्रक का चूर्ण बनाये । इसमें इन सबसे दुगुना लोहचूर्ण मिलाये । इसे दूध के साथ सेवन करने से रोगी रोगमुक्त हो जाता है ॥४१॥
५२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]
त्रिव्योषत्रिफलामुस्ताविडङ्गचित्रकाः समाः ।।४२।। नवैते सुधृता भागा नवायोरजसस्तथा । तच्चूर्णं मधुना लीढ्वा भुञ्जीत यवषष्टिकम् ।।४३।। शुष्कमूलकयूषेण मुस्ताक्तपयसाऽपि वा ।
त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), नागरमोथा, बिडङ्ग तथा चित्रक—ये ९ द्रव्य तथा लोहचूर्ण—इन सबको समभाग में लेकर बनाये हुए चूर्ण को मधु से चाटकर ऊपर से सूखी मूली के यूष अथवा नागरमोथे से युक्त दूध के साथ जौ और सांठी के चावलों का भोजन करना चाहिये ।।४२-४३।।
भल्लातकं त्रिवृद्दन्ती त्रिव्योषं त्रिफलाऽग्निकः ।।४४।। तिला गुडा विडङ्गं च मधु सर्पिरयोरजः । नाम्ना कटुकबिन्दुहि लेहः शोथप्रमर्दनः ।।४५।।
कटुकबिन्दु अवलेह—भिलावा, त्रिवृत्, दन्ती, त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, तिल, गुड, विडङ्ग, मधु, घृत तथा लोहचूर्ण-इन सबको मिलाकर अवलेह बनाया जाता है। इसका नाम कटुकबिन्दु है। यह शोथ को नष्ट करता है ।।४४-४५।।
सामान्यैतदाख्यातं पृथक्त्वेन निबोध मे । तत्रादितः प्रवक्ष्यामि वातिकस्य भिषग्जितम् ।।४६।।
यह सब शोथों की सामान्य चिकित्सा कही गई है। अब मेरे से इनकी पृथक् २ चिकित्सा सुनो। सबसे पहले मैं वातिक शोथ की चिकित्सा कहूंगा ।।४६।।
कुलत्थयवकोलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । निर्यूहे साधितं तैलं कल्कैरेतैः समांशिकैः ।।४७।। शतावरीकृष्णगन्ध्यायष्टीमधुकजीवनैः । सक्षीरैस्तत् पिबेत् काले कुर्यादभ्यञ्जनं च तत् ।।४८।।
वातिक शोथ की चिकित्सा—कुलत्थ, यव, कोल तथा दोनों पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल) के क्वाथ में समान मात्रा में शतावरी, कृष्णगन्धा (सहिजना), मुलहठी तथा जीवनीय गण की ओषधियों का कल्क डालकर तैल सिद्ध करे। उचित काल में दूध के साथ इस तैल का पान तथा अभ्यंग द्वारा सेवन करे ।।४७-४८।।
शताह्वां मधुकं दारु सश्वेतां च गवाडनीम् । वत्साडनीं च पिष्ट्वा तैः सुखोष्णैः शोथमादिहेत् ।।४९।।
शतपुष्पा (सौंफ), मुलहठी, दारुहल्दी, श्वेता (सफेद वच), गवाडनी (इन्द्रवारुणी) तथा वत्साडनी (गिलोय) इन्हें पीस ले । शोथ पर इसका सुखोष्ण लेप करे ।।४९।।
वर्चीवं बिल्वमेरण्डं तर्कारीं सपुनर्नवाम् । निष्क्वाथ्य वारिणोष्णेन श्वयथुं परिषेचयेत् ।।५०।।
वर्चीव (श्वेत पुनर्नवा), बिल्व, एरण्ड, तर्कारी (अग्निमन्थ अथवा जयन्ती) तथा रक्त पुनर्नवा-इनका क्वाथ बनाये । इस उष्ण क्वाथ से शोथ का परिषेचन करना चाहिये ।।५०।।
तिलानां सर्षपाणां च गोधूमस्य यवस्य च । चूर्णानां तैलमिश्राणामुपनाहं विधापयेत् ।।५१।। तथैवैरण्डबीजानां भृष्टानां वोपनाहनम् ।
तिल, सरसों, गेहूं तथा जौ के चूर्ण को तिल तैल में मिलाकर (उपनाह) (पुलटिस) लगानी चाहिये। अथवा एरण्ड के बीजों को भूनकर अवलेह बनाये ।।५१।।
एरण्डो बिल्वमूलं च बृहती कण्टकारिका ।।५२।।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२५
करञ्जश्चिरिबिल्वश्च श्वदंष्ट्रा च समांशिका । लेपोऽयं सर्पिषा युक्तो वातश्वयथुनाशनः ।।५३।। एष एव यथालाभं परिषेकः सुखावहः ।
वातशोथ को नष्ट करने के लिये एरण्ड, बिल्वमूल, बृहती, कटेरी, करञ्ज, चिरबिल्व (नाटाकरञ्ज अथवा पूतिकरञ्ज) तथा गोखरू समभाग लेकर चूर्ण करके घी में मिलाकर लेप करना चाहिये तथा इन्हीं वस्तुओं में से जो २ मिल जायें उनका परिषेक करना चाहिये । यह सुखकारी होता है ।।
शारिवा मूलकं शुष्कं शुकनासा महौषधम् ।।५४।। कुष्ठं मुस्ता जलं लम्बा प्रलेपः शोफनाशनः ।
सारिवा, सूखीमूली, शुकनासा (श्योनाक-अरलु), साठ, कुष्ठ, नागरमोथा, हीबेर (सुगन्धवाला) तथा लम्बा (कटुकालाबु) का लेप शोथ को नष्ट करता है ।।५४।।
श्वदंष्ट्रैरण्डमूलं च बिल्वमूलं महौषधम् ।।५५।। पुराणमूलकं चैषां क्वाथे क्षीरं विपाचयेत् । क्षीरावशेषमाहृत्य काले सघृतशर्करम् ।।५६।। यथाग्नि पाचयेदेनं वातश्वयथुनाशनम् ।
गोखरू, एरण्डमूल, बिल्वमूल, सोंठ—इन सबकी पुरानी जड़ों का क्वाथ बनाकर उसमें दूध डालकर पाक करें । दुग्धमात्र शेष रहने पर उतार ले । फिर इसमें घी और शर्करा मिलाकर क्रमशः मन्द, मध्य एवं तीक्ष्ण अग्नि पर उसे पकाये । यह घृत वातशोथ को नष्ट करता है ।।५५-५६।।
एरण्डतैलं पयसा गवां मूत्रेण वा पिबेत् ।।५७।। तेनास्य दोषशेषश्च श्वयथुश्च निवर्तते ।
दूध अथवा गोमूत्र के साथ रोगी को एरण्डतैल पिलाये । इससे उसके अवशिष्ट दोष तथा शोथ नष्ट हो जाता है ।।५७।।
लघून्यन्नानि भुञ्जीत स्निग्धोष्णसहितानि च ।।५८।। (इति ताडपत्रपुस्तके २४२ तमं पत्रम्)
तथा इस वातशोथ में, लघु, स्निग्ध एवं उष्ण अन्न का भोजन करना चाहिये ।।५८।।
अथ पित्तसमुत्थस्य प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् । अभयाऽऽमलकीदन्तीत्रिकर्ममधुचन्दनैः ।।५९।। संजीवनीयमञ्जिष्ठैर्मधूककुसुमैः समैः । सक्षीरैः पाचितं सर्पिः शोफस्याभ्यञ्जनं परम् ।।६०।। पानं चैतत् प्रदातव्यं शोफरोगनिवारणम् ।
अब मैं पैत्तिक शोथ की चिकित्सा कहूँगा । पैत्तिक शोथ की चिकित्सा—हरड़, आंवला, दन्ती, त्रिकर्म, मधु, चन्दन, जीवनीयगण की ओषधियां, मंजीठ तथा महुए के फूल समभाग तथा दूध के द्वारा पकाये हुए घृत का शोथ में अभ्यङ्ग करना चाहिये । तथा शोथरोग को नष्ट करने के लिये इस घृत को पीना भी चाहिये ।।५९-६०।।
वक्तव्य—त्रिकर्म-त्रिकर्म के स्थान पर यदि त्रिकर्ष पाठ हो तो अर्थ ठीक प्रतीत होता है । त्रिकर्ष शब्द-सोंठ, अतीस तथा नागरमोथे के लिये सम्मिलित रूप में व्यवहृत होता है । राजनिघण्टु में कहा है—नागरातिविषामुस्ता त्रयमेतत्त्रिकर्षिकम् ।।
५२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]
जीवकर्षभकावैन्द्री मधुपर्णी शतावरी ।। ६१ ।।
मुदिता वेतसं चैव प्रलेपः सरसाञ्जनः ।
जीवक, ऋषभक, ऐन्द्री (इन्द्रवारुणी), मधुपर्णी (गिलोय), सतावरी, मुदिता तथा वेतस् में रसाञ्जन मिलाकर शोथ पर लेप करना चाहिये ।।६१।।
तालीशोशीरमुदिताचन्दनं सरसाञ्जनम् ।। ६२ ।।
मधुकं पद्मकं चेति लेपः श्वयथुनाशनः ।
तालीशपत्र, खस, मुदिता, चन्दन, रसौंत, मुलहठी तथा पद्माख—यह लेप शोथ को नष्ट करता है ।।६२।।
शतावरीं हंसपदीं मधुपर्णीं च चित्रकम् ।। ६३ ।।
बन्दां तालीसपत्रं च पिष्ट्वा श्वयथुमादिहेत् ।
शतावर, हंसपदी, गिलोय, चित्रक, बन्दा तथा तालीशपत्र को पीसकर शोथ पर लेप करना चाहिये ।।६३।।
क्षीरद्रुमाणां त्वङ्मूलक्वाथस्तु परिषेचने ।। ६४ ।।
सदाहरागपाके च हितः सक्षीरशर्करः ।
शोथ में दाह, राग (लालिमा) तथा पाक होने पर क्षीरी वृक्षों की त्वचा तथा मूल के क्वाथ में दूध तथा शर्करा मिलाकर परिषेचन करना चाहिये ।।६४।।
त्रिवृन्मधुकमृद्वीकाकाश्मर्याभिः शृतं पयः ।। ६५ ।।
विरेचनीयमन्यद्वा यथावस्थं प्रयोजयेत् ।
विरेचन के लिये त्रिवृत्, मुलहठी, मुनक्का तथा गंभारी के द्वारा सिद्ध किया हुआ दूध अथवा अवस्था के अनुसार अन्य द्रव्य प्रयुक्त करना चाहिये ।।६५।।
नात्यच्छस्निग्धशीतानि स्वादूनि च लघूनि च ।। ६६ ।।
पयो द्रवाणि भुञ्जीत यथोक्तानि च मात्रया ।
पैत्तिक शोथ में पथ्य—जो बहुत अधिक सान्द्र, स्निग्ध तथा शीतल नहीं है ऐसे तथा स्वादु एवं लघु द्रव्य, दूध तथा अन्य यथोक्त द्रव पदार्थों का मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ।।
श्वयथोः कफजस्यापि चिकित्सां शृण्वतः परम् ।। ६७ ।।
अब कफज श्वयथु (शोथ) की भी चिकित्सा सुनो ।।६७।।
ह्रीबेरागरुदारूणि चव्यचित्रकनागरम् । अभया पिप्पलीमूलं रजन्यौ हिङ्गु मात्रया ।। ६८ ।।
क्वाथं गोमूत्रपिष्टं वा पिबेच्छोफनिबर्हणम् ।
कफज शोथ की चिकित्सा—शोथ को नष्ट करने के लिये ह्रीबेर (बालक), अगरु, देवदारु, चव्य, चित्रक, सोंठ, हरड़, पिप्पलीमूल, हल्दी, दारुहल्दी तथा हींग आदि का क्वाथ बनाकर अथवा गोमूत्र में पीसकर पीना चाहिये ।।६८।।
चित्रकारग्वधौ मूर्वाविडङ्गामलकाभयाः ।। ६९ ।।
पिप्पलीशारिवापाठाकषायं मधुना पिबेत् ।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिलस्थानम् ५२७
चित्रक, अमलतास, मूर्वा (मोरबेल), विडङ्ग, आंवला, हरड़, पिप्पली, सारिवा तथा पाठा-इनका कषाय मधु के साथ पीना चाहिये ॥६९॥
देवदारु च पाठां च शृङ्गबेरं च भागशः ।।७०।।
तथा पुष्करमूलं च गोमूत्रक्वथितं पिबेत्।
देवदारु, पाठा, अदरक तथा पुष्करमूल की गोमूत्र में क्वाथ बनाकर पीना चाहिये ॥७०॥
पाठा मुस्ताऽभया दारु चित्रको विश्वभेषजम् ।।७१।।
पिप्पल्यातिविषा मूर्वा तथा ताडकपत्रिका। बाधासु तत् पिबेत् पूतं कफश्वयथुनाशनम् ।।७२।।
श्लैष्मिक शोथ के कष्ट को दूर करने के लिये पाठा, नागरमोथा, हरड़, देवदारु, चित्रक, सोंठ, पिप्पली, अतीस, मूर्वा तथा ताडपत्र के क्वाथ को छानकर पीना चाहिये ॥७१-७२॥
तगरागरुमुस्तानि सरलं देवदारु च। कुष्ठं त्वचा च लेपोऽयं कफश्वयथुवारणः ।।७३।।
तगर, अगरु, नागरमोथा, सरल (चीड़), देवदारु तथा कुष्ठ की छाल का लेप श्लैष्मिक शोथ को नष्ट करता है ॥७३॥
कालां गोधापदीं हिंस्रां सुषवीं तालपत्रिकाम्। पिष्ट्वा शीतकमूलं च शोथमस्य प्रलेपयेत् ।।७४।।
काला (त्रिवृत्), गोधापदी (हंसपदी), हिंस्रा (जटामांसी), सुषवी (काला जीरा), तालपत्रिका (मुशली-मूसली) तथा शीतक (अशनपर्णी)-की जड़ों को पीसकर शोथ पर लेप करना चाहिये ॥७४॥
कुष्ठच्छत्राकवल्कं च यातुमूलं त्रिकण्टकम्। भद्रदारुं सुगन्धां च पिष्ट्वोष्णैः शोफमादिहेत् ।।७५।।
कुष्ठ तथा छत्राक (आंवला) की छाल, यातुक्रमूल (पत्र शाक विशेष), गोखुरू, देवदारु तथा सुगन्धा (सर्पलोचना अथवा स्पृक्का) को पीसकर गरम करके शोथ पर लेप करे ॥
मूलकानि च शुष्काणि भद्रमुस्तं सशारिवम्। गोमूत्रपिष्टो लेपोऽयं श्वयथोविनिवारणः ।।७६।।
सूखी मूली, नागरमोथा तथा सारिवा को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से शोथ नष्ट हो जाता है ॥७६॥
पलाशभस्म चैकाङ्गलेपो गोमूत्रसंयुतः। श्लैष्मिके श्वयथावेष परिषॆको विधीयते ।।७७।।
पञ्चमूलशृतं तोयं गोमूत्रं वाऽपि केवलम्।
पलाश (ढाक) की भस्म को गोमूत्र में मिलाकर अङ्ग पर लेप करना चाहिये। श्लैष्मिक श्वयथु में पञ्चमूल से सिद्ध किये हुए जल अथवा अकेले गोमूत्र के द्वारा परिषेचन करना चाहिये ॥७७॥
निम्बाङ्कोठोरुपूगानां तर्कार्याः कुटजस्य च ।।७८।।
नक्तमालस्य वंशस्य पत्रक्वाथोऽवगाहनः।
नीम, अङ्कोठ (Alangium Decapetalum-निकोचक), एरण्ड, तर्कारी (अग्निमन्थ-अरणी), कुटज, नक्तमाल (करञ्ज) तथा बांस के पत्तों के क्वाथ से अवगाहन करना चाहिये ॥७८॥
त्रिफला चित्रकवचे द्वे हरिद्रे कुठेरकः ।।७९।।
५६ का.सं.
५२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शोथचिकित्साध्यायः १७]
श्यामाखुकर्णीकटुकाकाकमाचीसुवर्चलाः । वार्तार्की निचुलं निम्बो विडङ्गं विश्वभेषजम् ।।८०।। रास्ना पुनर्नवा मूर्वा कुष्ठं व्याघ्रनखं वृषम् । शिग्रुमूलमथार्कं च यथालाभं समाहृतैः ।।८१।। गोमूत्रपिष्टैर्लेपः स्यात् कथितैः परिषेचनम् । एतैरेव द्रवैः पकैरभ्यङ्गः शोथनाशनः ।।८२।।
त्रिफला, चित्रक, बच, हल्दी, दारुहल्दी, कुठेरक (श्वेत तुलसी भेद-हाराणचन्द्र), श्यामा (त्रिवृत्-काली निशोथ), आखुकर्णी, कुटकी, मकोय, हुलहुल, वार्तार्की (बैंगन), निचुल (हिज्जल-समुद्रफल), नीम, विडङ्ग, सोंठ, रास्ना, पुनर्नवा, मूर्वा (मोरबेल), कुष्ठ, व्याघ्रनख (नखी-व्याघ्रनख नामक गन्धद्रव्य), वृष (बांसा), सहिजने की जड़ तथा आक इनमें से जो २ द्रव्य मिल सकें उन्हें लेकर गोमूत्र में पीसकर लेप करें तथा इन्हीं के क्वाथ से परिषेक और इन्हीं द्रव्यों को पकाकर अभ्यङ्ग करने से शोथ नष्ट होता है ।।७९-८२।।
पटोलमूलं त्रिफला विडङ्गं रजनीति षट् । कार्षिकाः स्युस्तथैकस्माद् द्विगुणं रोचनीफलम् ।।८३।। नीलिका त्रिगुणा देया त्रिवृता तु चतुर्गुणा । चूर्णमेतद्गवां मूत्रसंयुक्तं मात्रया पिबेत् ।।८४।। काले विरिक्तो भुञ्जीत जाङ्गलानां रसेन तु ।
पटोल की जड़, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), विडङ्ग तथा हल्दी-ये छहों द्रव्य प्रत्येक १ कर्ष, जमाल गोटा इससे दुगुना (अर्थात् २ कर्ष), नीलिका (विद्रुमलता अथवा रुक्मलौह) तिगुना (अर्थात् ३ कर्ष) तथा त्रिवृत् चौगुना (अर्थात् ४ कर्ष)-इनका चूर्ण योग्यमात्रा में गोमूत्र में मिलाकर पीये। इससे उचित समय में विरेचन हो जाने के बाद जांगल मांस रस का भोजन करना चाहिये ।।८३-८४।।
त्रिफला सरलं दारु रजन्यो रोहिणी वचा ।।८५।। पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरातिविषे घनम् । क्षारद्वयं विडङ्गं च पाठाऽगरु सचित्रकम् ।।८६।। अयोरजश्च चूर्णानि गोमूत्रेण विपाचयेत् । (इति ताडपत्रपुस्तके २४३ तमं पत्रम् ।) द्रा(क्षाव)लयमाहृत्य गुटिका बदरोपमाः ।।८७।। कृत्वाऽथैकां ततो द्वे वा पिबेदुष्णेन वारिणा । मुच्यते कफजाच्छोफाद्देवं श्वयथुपीडितः ।।८८।। एषा हि ग्रहणीदोषं पाण्डुरोगं कफात्मकम् । कफार्शांसि च वृद्धिं च प्रमेहं च शमं नयेत् ।।८९।।
त्रिफला, सरल (चीड़), देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, रोहिणी, बच, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोंठ, अतीस, घन (नागरमोथा), दोनों क्षार (सर्जक्षार तथा यवक्षार), विडङ्ग, पाठा, अगरु, चित्रक तथा लोहचूर्ण-इन सबका चूर्ण करके गोमूत्र से पकाये। फिर मुनक्के के साथ पीसकर बेर के समान गोलियां बनाये। ये एक या दो गोलियां उष्ण जल के साथ सेवन करनी चाहिये। इस प्रकार कफज शोथ से पीडित रोगी शोथ से मुक्त हो जाता है। यही प्रयोग ग्रहणी दोष, श्लैष्मिक पाण्डु, श्लैष्मिक अर्शरोग, वृद्धि तथा प्रमेह रोग को शान्त करता है ।।८५-८९।।
पञ्चमूलं वरुणाकं सरलं देवदारु च । हस्तिकर्णपलाशश्च फलानि निचुलस्य च ।।९०।। पलाशः काकला काला गुडूची देवपुष्पकम् । अहिंस्रा श्रेयसी हिंस्रा कृष्णागन्धा पुनर्नवा ।।९१।। कायस्था च वयःस्था च चोरको जटिला जटा । अलम्बुषं सोरुपूगं प्रपुन्नाडं सनागरम् ।।९२।।
शोथचिकित्साध्यायः १७] खिल्स्थानम् ५२९
शिग्रुर्गोधापदी भार्गी तर्कारी शुष्कमूलकम्। एतैः सिद्धं यथालाभं तैलमभ्यञ्नैस्त्रिभिः ।।९३।। निहन्युदीर्णंश्वयथुं जन्तोर्वातकफोत्तरम् ।
पञ्चमूल (बृहत् पञ्चमूल-बिल्व, श्योनाक, गंभारी, पाटला, गणिकारिका), वरुण, सरल (चीड़), देवदारु, हस्तिकर्ण पलाश (गजकर्णाकार पत्र वाला पलाश भेद-भूपलाश), निचुल (जलवेतस्) के फल, पलाश, काकला (षष्टि धान्य जाति भेद), काला (त्रिवृत्-काली निशोथ), गिलोय, लौंग, अहिंस्रा (कण्टकपाली), श्रेयसी (हरड़), हिंस्रा (जटामांसी अथवा कण्टकारी), कृष्णगन्धा (शोभाञ्जन-सहिजना), पुनर्नवा, कायस्था (आंवला), वयस्था (हरड़), चोरक (गन्धद्रव्य विशेष-ग्रन्थिपर्णकभेद-डल्हण, भटेउर), जटिला (जटामांसी), जटा (भूम्यामलकी), अलम्बुष (भूकदम्ब), उरुबूक (एरण्ड), प्रपुन्नाट (चक्रमर्द-पवाड), सोंठ, सहिजना, गोधापदी (हंसपदी), भार्गी, तर्कारी (अग्निमन्थ), सूखीमूली- इनमें से जो २ औषध मिल सके उनसे सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग करने से तीनों प्रकार के विशेषकर वात एवं कफ की प्रधानता वाले शोथ नष्ट हो जाते हैं ।।९०-९३।।
उभे हरिद्रे मञ्जिष्ठा यष्टीमधुकचन्दनम् ।।९४।। पिप्पल्यो बालकं चैव पीतद्रुः पद्मकं तथा । मांम्युशीरं सतगरमेलाऽगरु कुटन्नटम् ।।९५।। श्रीवेष्टकं सर्जरसं मूर्वाकुष्ठप्रियङ्गवः । एतैस्तैलं विपक्तव्यमभ्यङ्गाच्छोथनाशनम् ।।९६।।
हल्दी, दारुहल्दी, मंजीठ, मुलहठी, रक्तचन्दन, पिप्पली, बालक (हीबेर), पीतद्रु (सरल-चीड़), पद्माख, जटामांसी, खस, तगर, छोटी इलायची, अगर, कुटन्नट (भद्रमुस्ता), श्रीवेष्टक, (सरल निर्यास-गन्धाबिरोजा), सर्जरस (राल-Resin), मूर्वा (मोरबेल), कुष्ठ तथा प्रियङ्गु-इन ओषधियों से तैल सिद्ध करके पकाना चाहिये । यह शोथ को नष्ट करता है ।।९४-९६।।
क्रियैषा दोषजस्योक्ताऽऽगन्तोर्वैसर्पवत् क्रिया । अग्निसादो ज्वरस्तृष्णा कार्श्यारुचितमोभ्रमाः ।।९७।। श्वासव्रणातिसाराश्च स्वैश्चिकित्स्या उपद्रवाः ।।९८।।
यह दोषज (निज) शोथ की चिकित्सा कही गई है । आगन्तु शोथ की विसर्प के समान चिकित्सा करनी चाहिये । शोथ के उपद्रव-अग्निमान्द्य, ज्वर, तृष्णा, कृशता, अरुचि, तमोगुण की प्रधानता, भ्रम (शिरोभ्रम), श्वास, व्रण, अतिसार, ये शोथ के उपद्रव होते हैं। इन उपद्रवों की अपनी २ चिकित्सा करनी चाहिये ।।९७-९८।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्साध्यायः सप्तदशः ।।१७।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। अभ्र (१०६) (इति) खिलेषु श्वयथुचिकित्सिताध्यायः सप्तदशः ।।१७।।
५३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | शूलचिकित्साध्यायः १८]
अथ शूलचिकित्साध्यायोऽष्टादशः।
अथातः शूलचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम शूल चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
क्षोभात्रासाध्ययनातिप्रसङ्गात् क्षुत्काले चात्यम्भसः पानदोषात्।
वेगानां वा निग्रहाद्यानयानादामाद्भ्रंशाद्रूक्षधान्याशनाद्वा ॥३॥
क्रुद्धो वायुः कर्तनायामतौदैः कम्पाध्मानैराविशन् कुक्षिदेशे।
शूलं पित्तेनान्वितः श्लेष्मणा वा द्वाभ्यां वाऽपि प्रेर्यमाणः करोति ॥४॥
शूल का निदान तथा संप्राप्ति—क्षोभ, त्रास (डर) तथा अध्ययन के अतिप्रसङ्ग (अत्यन्त प्रयोग करने) से, भूख के समय अत्यधिक पानी पीने से, वेगों के निग्रह से, सवारियों में बैठकर चलने से, आमदोष से, भ्रंश (गिरने) से अथवा रूक्ष धान्य के सेवन आदि के प्रकुपित हुआ वायु कर्तन (काटने के समान पीड़ा), आयाम (थकावट), तोद (वेदना), कम्पन तथा आध्मान सहित कुक्षिप्रदेश में प्रविष्ट होकर पित्त, कफ अथवा दोनों से युक्त एवं प्रेरित होता हुआ शूल को उत्पन्न कर देता है ॥३-४॥
वाताच्छूलं क्षुधितस्योग्ररूपं घोरैर्वेगैर्यन्निरुच्छ्वासकर्तृ।
विद्याद्भुक्ते जीर्यति स्वेददाहतृष्णार्तस्य प्रततं पित्तशूलम् ॥५॥
मन्दाबाधं स्तिमितं भुक्तमात्रे कफोद्रेकात् स्तम्भहृल्लासकर्तृ।
विद्याच्छूलं सन्निपाताच्चतुर्थं सर्वैर्लिङ्गैर्दुःसहं तत्त्वसाध्यम् ॥६॥
वातिकशूल—यह भूखे अथवा खाली पेट बढ़ जाती है तथा शूल के तीव्र वेग के समय श्वास रुक जाता है। पैत्तिक शूल—यह शूल भोजन के जीर्ण होने के बाद होती है। इसमें रोगी अत्यधिक स्वेद, दाह तथा तृष्णा से पीड़ित रहता है। श्लैष्मिक शूल—इस शूल में रोगी को कष्ट अधिक नहीं होता है, रोगी स्तिमित सा रहता है, भोजन करने के तुरन्त बाद यह शूल प्रारम्भ होती है तथा इसमें स्तम्भ एवं हृल्लास (जी मचलाना) आदि लक्षण होते हैं। सान्निपातिकशूल—चौथी सान्निपातिक शूल होती है जिसमें उपर्युक्त सब दोषों के लक्षण विद्यमान होते हैं। यह दुःसह एवं असाध्य होती है ॥५-६॥
वायुः प्रोक्तो बलवानुग्रवेगः (सोऽयं)क्रुद्धो देहमाश्रेव हन्ति।
तस्मादादावर्द्दितं वातशूलेनऽभ्यक्ताङ्गं स्वेदयेदाशु वैद्यः ॥७॥
वातघ्नोश्चावगाहोपनाहैः पिण्डस्वेदैरुष्णकैः पायसैर्वा।
वायु अत्यन्त बलवान् तथा उग्रवेग वाला होता है। यह क्रुद्ध (प्रकुपित) होने पर शरीर को शीघ्र ही नष्ट कर देता है। इसलिये वातशूल से पीडित रोगी का सर्वप्रथम स्नेहन कराकर वैद्य को वातनाशक तथा उष्ण अवगाह, उपनाह, पिण्डस्वेद तथा उष्ण पायस (पायसोदन-खीर) आदि के द्वारा स्वेदन करना चाहिये ॥७॥
एणादीनां जाङ्गलानां रसांश्च लावादीनां चान्वितान् सैन्धवेन ॥८॥
स्निग्धोष्णाम्लान् शीलयेद्वातशूली वातघ्नैर्वा साधितं क्षीरमुष्णम् ॥९॥