भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 876

५१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]

तस्योपशमनं कुर्याल्लङ्घनैर्लघुभोजनैः । सात्म्यकालोपपन्नैश्च योगैः शमनपाचनैः ॥२१॥

वमन कराने के बाद यदि कोई अनुबन्ध्ररूप दोष बच जाता है तो उसकी शान्ति लङ्घन, लघुभोजन तथा सात्म्य एवं कालोचित शमन-पाचन योगों के द्वारा करनी चाहिये। अर्थात् इसमें पहले वमन कराने के बाद लङ्घन कराना चाहिये तथा लघु आहार देने चाहिये। तदनन्तर शमन-पाचन योगों का सेवन कराना चाहिये ॥२०-२१॥

दोषोत्क्लेशे न सहसा द्रवमौषधमाचरेत् । वमनीयादृते तद्धि न सम्यक् परिपच्यते ॥२२॥

दोषों का उत्क्लेश (प्रवृत्त्युन्मुख) होने के बाद वमन के अतिरिक्त और कोई द्रव औषध तुरन्त नहीं देनी चाहिये। क्योंकि उसका ठीक प्रकार से पाक नहीं हो पाता है ॥२२॥

चेष्टाहारविशेषेण किञ्चित् परिणते ततः । पीतं तु कुरुते यस्माच्छमपाचनभेदनम् ॥२३॥

कुछ समय के बाद चेष्टा एवं आहार आदि के कारण शारीरिक अवस्थाओं के परिणत हो जाने पर सेवन की हुई द्रव औषध दोषों का शमन-पाचन एवं भेदन कर सकती है ॥

नागरातिविषे मुस्ता नागरातिविषेऽभया । त्रायमाणा पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥२४॥ त्रयस्त्रिकार्षिका होते पातव्या दोषदर्शनात् । किरातातिक्तक्वाथो वा रोहिण्या वाऽथ केवलः ॥२५॥

जब तक शरीर में दोष दिखाई दें तब तक सोंठ, अतीस तथा नागरमोथा अथवा सोंठ, अतीस और हरड़ अथवा त्रायमाणा, पटोलपत्र और कुटकी तीनों का तीन २ कर्ष क्वाथ अथवा अकेले चिरायते या रोहिणी का क्वाथ पिलाना चाहिये।

संसर्गहतदोषस्य विशुद्धामाशयस्य च । यत्नेनाग्निसमाधाने प्रयतेत विचक्षणः ॥२६॥

संसर्ग से दोषों के नष्ट हो जाने पर तथा आमाशय के शुद्ध हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक जाठराग्नि को बढ़ाने का यत्न करना चाहिये ॥२६॥

यथा गोमयचूर्णाद्यैः सूक्ष्मैः सन्धुक्षितोऽनलः । क्रमेणाप्यायितबलो दहत्यार्द्रमपीन्धनम् ॥२७॥ तथा विशुद्धदेहानां कायाग्निः समुदीरितः । पाचयत्यन्नपानानि सारवन्त्यपि देहिनाम् ॥२८॥

जिस प्रकार सूक्ष्म गोबर आदि के चूर्ण से जलाई हुई अग्नि क्रमशः अधिक प्रज्वलित होकर पीछे गीले हुए ईधन (लकड़ी आदि) को भी जला देती है उसी प्रकार शरीर के शुद्ध हो जाने पर प्रदीप्त हुई जाठराग्नि पीछे से सारयुक्त (अर्थात् गुरु) अन्न-पान को भी पचा देती है। अर्थात् प्रारम्भ में लघु अन्नपान के द्वारा जाठराग्नि को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये। बाद में प्रवृद्ध हुई अग्नि गुरु भोजन आदि को भी पचा देती है ॥२७-२८॥

सम्यक्परिणतेष्वेसु न स्युरामान्वया गदाः । जायते च तदोत्साहस्तुष्टिः पुष्टिर्वपुर्बलम् ॥२९॥

इन दोषों अथवा आहार रसों का सम्यक् परिपाक हो जाने के बाद आमयुक्त रोग नहीं हो सकते हैं तथा उस समय शरीर में उत्साह, तुष्टि (संतोष), पुष्टि (पोषण) तथा शारीरिक बल की प्राप्ति होती है ॥२९॥

ततः क्रमविशेषेण जातप्राणस्य देहिनः । पक्वाशयगतान् दोषान् स्त्रंसनेन विनिर्हरेत् ॥३०॥

उसके बाद उस व्यक्ति के प्राणों में क्रमशः बल आजाने पर स्त्रंसन (विरेचन) के द्वारा उसके पक्वाशयगत दोषों का निर्हरण करना चाहिये ॥३०॥