काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६] खिलस्थानम् ५१५
अव्यापन्ने त्वधिष्ठाने जाग्रतः स्वपतोऽपि वा। प्रेर्यमाणः समानेन प्रश्वासोच्छ्वासयोगतः ॥१२॥
इससे विपरीत शारीरिक अधिष्ठान के दूषित न होने पर जागृत तथा स्वप्नावस्था में श्वास-प्रश्वास के योग से समानवायु के द्वारा प्रेरित हुआ तथा उदान वायु के द्वारा धमन किया जाता हुआ पाचकाग्नि भोजन को सम्यक् प्रकार से पचा देती है। इस प्रकार इसकी उत्पत्ति का वर्णन किया गया है ॥१२॥
धम्यमान उदानेन सम्यक् पचति पाचकः। इत्युद्दिष्टं समुत्थानं, लिङ्गं वक्ष्याम्यतः परम् ॥१३॥ विड्भेदो गुरुकोष्ठत्वमम्लोत्क्लेशः शिरोरुजा। हृच्छूलमुदराध्मानमङ्गसादोऽन्त्रकूजनम् ॥१४॥ कण्ठोरसी विदह्येते रोमहर्षश्च जायते। सामान्यलक्षणं त्वेतद्विशेषश्चोपदेक्ष्यते ॥१५॥
अब मैं इसके लक्षणों का वर्णन करूंगा। अम्ल पित्त के सामान्य लक्षण—विड्भेद (अतिसार), कोष्ठ का भारी होना, अम्ल के कारण उत्क्लेश, शिरःशूल, हृच्छूल, पेट में आध्मान (अफारा), अङ्गसाद (शरीर का सुस्त होना) तथा आन्त्रकूजन (आंतों में वायु के कारण गड़गड़ाहट) होते हैं। रोगी के कण्ठ एवं छाती में जलन होती है तथा उसे रोमहर्ष होता है। ये अम्लपित्त के सामान्य लक्षण कहे गये हैं। आगे उसके विशेष लक्षणों का वर्णन किया जायगा ॥१३-१५॥
वाताच्छूलाङ्गसादौ च जृम्भा स्निग्धोपशायिता। पित्ताद्भ्रमो विदाहश्च स्वादुशीतोपशायिता ॥१६॥ कफाद् गुरुत्वं छर्दिश्च स्याद्रूक्षोष्णोपशायिता ॥१७॥
वातिक अम्लपित्त के लक्षण—वायु के कारण शूल, अङ्गसाद, जृम्भा (जंभाई) आती है तथा स्निग्ध पदार्थ उपशय होते हैं अर्थात् स्निग्ध पदार्थ शरीर के लिये सात्म्य होते हैं (वायु से विपरीत गुण होने के कारण)। पैत्तिक अम्लपित्त के लक्षण—पित्त के कारण शरीर में भ्रम एवं विदाह होता है तथा स्वादु और शीत पदार्थ शरीर के लिये उपशय होते हैं (पित्त से विपरीत गुणों के कारण)। श्लैष्मिक अम्लपित्त के लक्षण—कफ के कारण शरीर में भारीपन तथा वमन होती है और रूक्ष एवं उष्ण पदार्थ शरीर के लिये उपशय होते हैं (श्लेष्मा से विपरीत गुणों के कारण)।
वक्तव्य—उपशय जो आहार विहार शरीर के लिये सुख कर अथवा अनुकूल हो उसे उपशय कहते हैं। इसे ही सात्म्य भी कहते हैं। चरक वि. अ. १ में कहा है—सात्म्यं नाम तत्द्यदात्मन्युपशेते, सात्वार्थो ह्युपशयार्थः ॥१६-१७॥
व्याधिरामाशयोत्थोऽयं कफपित्ते तदाश्रये। तस्मादादित एवास्य मूलच्छेदाय बुद्धिमान् ॥१८॥ अक्षीणबलमांसस्य वमनं संप्रकल्पयेत्। नान्यो मान्यः क्र(मो) ह्यस्य शान्तये वमनादृते ॥१९॥ मूलच्छेदादिव तरोःस्कन्धशाखाविपर्यये।
यह रोग आमाशय से उत्पन्न होता है तथा कफ और पित्त उसके आश्रित होते हैं। इसलिये इसके मूल छेदन के लिये जिस रोगी का शारीरिक बल तथा मांस क्षीण नहीं हुए हैं उसे प्रारम्भ में ही वमन कराना चाहिये। स्कन्ध एवं शाखा के दूषित होने पर वृक्ष के मूल के काटने के समान इस रोग की शान्ति के लिये वमन के अतिरिक्त और कोई चिकित्सा क्रम नहीं है अर्थात् जिस प्रकार वृक्ष के मूल के काट दिये जाने पर वृक्ष का तना एवं शाखायें स्वयं सूख कर नष्ट हो जाती हैं उसी प्रकार यह रोग क्योंकि आमाशय से उत्पन्न होता है अतः आमाशय स्थित कफ की शान्ति के लिये वमन कराया जाता है इससे उसके अनुबन्धभूत अन्य दोष स्वयं शान्त हो जाते हैं ॥१८-१९॥
दोषशेषश्च वान्तस्य यः स्यात्तदनुबन्धकृत् ॥१२०॥ (इति ताडपत्रपुस्तके २३९ तमं पत्रम्।)