भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 874

५१४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]

अथाम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः षोडशः ।

अथातोऽम्लपित्तचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥ २ ॥

अब हम अम्लपित्त चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। जब कोई व्यक्ति पित्त के प्रकोपक अन्नपान का अधिक सेवन करता है तब उसके पित्त का सम्यक् पाक नहीं होता है। अपितु वह विदग्ध (Fermented) होकर अम्लभाव को प्राप्त हो जाता है उसे अम्लपित्त (Hyperacidity) कहते हैं ॥ १-२ ॥

विरुद्धमध्यशनाजीर्णादामे चामे च पूरणात् । पिष्टान्नानामपक्वानां मद्यानां गोरसस्य च ॥ ३ ॥
गुर्वाविष्यन्दिभोज्यानां वेगानां धारणस्य च । अत्युष्णस्निग्धरूक्षाम्लद्रवाणामतिसेवनात् ॥ ४ ॥
फाणितेक्षुविकाराणां कुलत्थानां च शीलनात् । भृष्टधान्यपुलाकानां पृथुकानां तथैव च ॥ ५ ॥
भुक्त्वा भुक्त्वा दिवास्वप्नादतिस्नानावगाहनात् । अन्तरोदकपानाच्च भुक्तपर्युषिताशनात् ॥ ६ ॥
वातादयः प्रकुप्यन्ति तेषामन्यतमो यदा । मन्दीकरोति कायाग्निमग्नौ मार्दवमागते ॥ ७ ॥
एतान्येव तथा भूयः सेवमानस्य दुर्मतेः । यत्किञ्चिदशितं पीतं देहिनस्तद्धि दह्यति ॥ ८ ॥
विदग्धं शुक्ततां याति शुक्तमामाशये स्थितम् । तदम्लपित्तमित्याहुर्भूयिष्ठं पित्तदूषणात् ॥ ९ ॥
जन्तौर्यदनुबध्नाति लौल्यादनियतात्मनः ।

निदान तथा सम्प्राप्ति—विरुद्ध भोजन (मानविरुद्ध तथा संयोग विरुद्ध), अध्यशन (अजीर्ण पर भोजन–अजीर्णे भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते), अजीर्ण तथा शरीर में आम रस अथवा आम आहार के उपस्थित होने पर पुनः भोजन करने से, पिष्टान्न (उड़द की पिट्ठी आदि से बने द्रव्य) तथा अपक्व मद्य एवं गोरस (दूध) से, गुरु तथा अभिष्यन्दि भोजन से, वेगों के धारण करने से, अत्यन्त उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष एवं अम्ल भोजन से तथा द्रव पदार्थों के अधिक प्रयोग करने से, फाणित (राब) तथा गुड़ आदि अन्य इक्षु विकारों, कुलत्थ, भूने हुए धान्य, पुलाक (तुष अथवा तुच्छ धान्य) एवं पृथुक (चिउड़े) के अधिक सेवन से, भोजन करने के बाद तुरन्त दिन में सोने से, अत्यधिक स्नान एवं अवगाहन से, भोजन के बीच में पानी पीने से, पर्युषित (बासी) भोजन के करने से–वात आदि दोष प्रकुपित हो जाते हैं। इनमें से जब कोई दोष जाठराग्नि को मन्द कर देता है उस समय अग्नि के मन्द हो जाने पर उपर्युक्त विरुद्धाशन आदि अथवा अन्य कारणों का सेवन करने पर मूर्ख व्यक्ति जो कुछ भी अन्न आदि खाता पीता है वह विदग्ध हो जाता है। वह विदग्ध हुआ अन्न शुक्त (अम्ल) बन जाता है। तथा वह शुक्त (अम्लत्व को प्राप्त हुआ अन्न रस) आमाशय में स्थित होता है। इस अवस्था में असंयमी मनुष्य जिह्वालोल्य के कारण जो कुछ भी खाता है वह विदग्ध हुए पित्त के कारण दूषित हो जाता है इसलिये इसे अम्लपित्त कहते हैं। माधवनिदान में इसके हेतु एवं सम्प्राप्ति के विषय में कहा है कि अपने कारणों से पहले से ही वृद्धि को प्राप्त हुआ पित्त, पित्तप्रकोपक आहार-विहार आदि के सेवन से प्रकुपित होकर अम्लभाव को प्राप्त हो जाता है–उसे अम्लपित्त कहते हैं।

अविशुष्के यथा क्षीरं प्रक्षिप्तं दधिभाजने ॥ १० ॥
क्षिप्रमेवाम्लतामेति कूर्चीभावं च गच्छति । रसधातौ तथा व्यम्ले भुक्तं मुक्तं विदह्यते ॥ ११ ॥

जिस प्रकार अच्छी तरह बिना सूखे हुए दही के वर्तन में यदि दूध डाल दिया जाय तो वह तुरन्त खट्टा हो जाता है तथा उसकी फुट्टियां (Curd) बन जाती हैं उसी प्रकार रस धातु के अम्लयुक्त होने पर (विदग्ध पित्त की उपस्थिति के कारण) जो कुछ भी भोजन किया जाता है वह विदग्ध हो जाता है ॥ १०-११ ॥