काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 873, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंचर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५] खिल्स्थानम् ५१३
लोध्रगुडूचीमूर्वेत्यक्षमात्राणि यथालाभं सुखोष्णोदकेनानुपिबेत्, पाठाशृङ्गबेरकल्कं वा, कुटजफलपाठाकल्कं वा, किराततिक्तकमुस्ताचूर्णं वा मधुना लिहेत्। भद्रमुस्तारिष्टपटोलमूर्वादारुहरिद्रात्रिफलासप्तपर्णत्वगित्येतैः कषायमासुतं मधुना पाकव्यपदेशतश्चोपयोजयेत्, मुस्तकमालतीपत्रकल्केन स्तनावालेपयेत्। अथ विरेचनं त्रिवृत्त्रिफलोष्णोदकलवणसंयुक्तमुपयोज्य यूषश्चाहारविधिः। कुटजारिष्टारग्वधमदनस्वादुकण्टकमुस्त-कनक्तमालयुतः प्रदेहः, कुष्ठशुकनासारोहिणीमुस्तकिराततिक्तातिविषायुतो वा, सुरसशिग्रुमुस्ताकाल-मालकविडङ्गहिङ्गुपर्णीति वा, त्रिफलादारुहरिद्राकल्को वा हरिद्रारसाञ्जनकल्को वेति। भद्रमुस्तोशीरा-स्फोटाटरूषकहरिद्राकरञ्जसुमनारिष्टसिद्धं तैलमभ्यञ्जनीयमिति ।।१७।।
इसके बाद अब हम श्लैष्मिक चर्मदल की चिकित्सा कहेंगे—धात्री का पूर्वोक्त विधि से उपचार करके उसे वमन के विधान के अनुसार यवागू पिलाये जो नीम के कषाय तथा मैनफल के द्वारा सिद्ध की हुई हो तथा जिसमें पर्याप्त मात्रा में लवण डला हुआ हो अथवा जो मैनफल, तिलपिष्ट (तिलकुट) और चावलों के द्वारा सिद्ध की गई हो। सुखपूर्वक लवणयुक्त द्रव्यों के द्वारा स्नेहन हो जाने के बाद कफ को निकालने के लिये पिप्पली तथा गरम पानी पिलाकर वमन करादे। वमन कराने के बाद उसका शिरोविरेचन कराये। तदनन्तर मूंग, सतीन (मटर भेद—कलायस्त्रिपुटः प्रोक्तः सतीनो वर्त्तलो मतः), वेत्राग्र, पटोल, नीम तथा नागरमोथे में से किसी एक के यूष के साथ मृदु ओदन (भात) का भोजन कराये। इन्द्रजौ, नागरमोथा, प्रियङ्गु, शाङ्गिष्ठा (काकजंघा अथवा काकमाची), पाठा, लोध्र, गिलोय तथा मूर्वा (मोरवेल) में से जो २ ओषधि मिल जाये उन सबका एक २ अक्ष (तोला) चूर्ण अथवा पाठा और आर्द्रक का कल्क अथवा इन्द्रजौ और पाठा का कल्क सुखोष्ण जल से पीये। अथवा चिरायते और नागरमोथे का चूर्ण मधु से सेवन करे। नागरमोथा, नीम, पटोल, मूर्वा, दारुहल्दी, त्रिफला तथा सप्तपर्ण छाल के क्वाथ का संधान करके मधु के साथ पाक के रूप में प्रयोग करे तथा नागरमोथा और चमेली के पत्तों के कल्क का स्तनों पर लेप करे। तथा त्रिवृत्, त्रिफला एवं उष्णजल में नमक मिलाकर उसका विरेचन देवे तथा आहार के रूप में यूष का सेवन करना चाहिये। कुटज, नीम, अमलतास, मैनफल, गोखरू, नागरमोथा तथा करंज अथवा कुष्ठ, शुकनासा (शुकशिम्बी), रोहिणी, नागरमोथा, चिरायता तथा अतीस अथवा तुलसी, सहिजना, नागरमोथा, कालमालक (काली तुलसी), विडङ्ग तथा हिङ्गुपर्णी (इसी नाम का तृण विशेष) अथवा त्रिफला और दारुहल्दी के कल्क अथवा हल्दी और रसौंत के कल्क का लेप करना चाहिये। तथा नागरमोथा, खस, आस्फोट (आक), बांसा, हल्दी, करञ्ज, पूतिकरञ्ज तथा नीम से सिद्ध तैल का अभ्यङ्ग करना चाहिये ।।१७।।
भवति चात्र श्लोकः—
एषा चर्मदलोत्पत्तिर्व्याख्याता वर्णरूपतः। साध्यासाध्यविधानेश्च (प्रतीकार्यो) यथाक्रमम् ।।१८।।
इस प्रकार वर्ण (रंग) तथा रूप (आकृति आदि) के अनुसार चर्मदल की उत्पत्ति का वर्णन कर दिया गया है। साध्य एवं असाध्य के अनुसार यथाक्रम इनकी चिकित्सा करनी चाहिये ।।१८।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। (ह ८५)।
(इति) खिलेषु चर्मदलचिकित्सा (ध्यायः पञ्चदशः) ।।१५।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। ह (८५)।
(इति) खिलेषु चर्मदलचिकित्सा (ध्यायः पञ्चदशः) ।।१५।।