काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चर्मदलचिकित्सिताध्यायः १५]
पयस्यासारिवामृतामधूकमृद्वीकानां कषायं शर्करायुतं चेति । प्रपौण्डरीकसारिवोशीरचन्दनकल्कः स्तनालेपः, मधुकक्षीरशुक्लाचन्दनरसाञ्जनतुङ्गयुतः प्रदेहः, यष्टीमधुकचन्दनकल्को वा, मधुकचन्दनभद्रमुस्तामञ्जिष्ठार-साञ्जनकल्को वा, रसाञ्जनसारिवामधुकचन्दनोशीरकल्को वा, ककुभोदुम्बराश्वत्थवटनलमूलशालूक-वञ्जुलकल्को वा घृतयुतः, विशमृणालपद्मकमञ्जिष्ठापद्मरसाञ्जनकल्को वेति । मधुकमधुपर्णीवेडवेत-सशतावरीनलमूलकदलीकुशकाशपद्मोत्पलेक्षुविदारीवटोदुम्बरत्वग्जम्बुकुम्भिका मधुरा चेत्येतानि जलाढके पक्त्वा चतुर्थांशावशेषे घृतप्रस्थं पाचयेत् कषायद्विगुणक्षीरेण सगर्भः स्यान्मञ्जिष्ठावितूर्णकपयस्याधातक्युशीर चन्दनक्षीरकाकोलीप्रपौण्डरीकक्षीरशुक्लातालीसमृद्वीकेति सुपिष्टं विदध्यादेतेन सिद्धेनाभ्यज्य ततोऽव-चूर्णयेल्लोध्रमधुकदारुहरिद्रामलकीत्वक्पत्रचूर्णैनेतेनेत्येवम्, अस्माज्ज्वरदाहरागपाकव्रणादयश्चोपशाम्यन्तीति-पित्तचर्मदलचिकित्सितमुत्तमम् ।। १६ ।।
अब पैत्तिक चर्मदल की चिकित्सा कही जायगी—जैसे-धात्री को स्नेह का अभ्यङ्ग कराकर वमन तथा विरेचन कराये। दोषों का निर्हरण करने के लिये नीम के पानी (क्वाथ) में पिप्पली का कल्क मिलाकर उससे अथवा पिप्पली और लवण के द्वारा वमन कराये। तथा रोगी के बल के अनुसार मुनक्का, इक्षुरस तथा अभया (हरड़) अथवा मुनक्का और आंवला अथवा दूध में अमलतास के फल के गूदे का कषाय मिलाकर विरेचन कराये। उसके बाद रोगी को यवागू, कृतयूष तथा अकृतयूष के क्रम से संसर्जन कराये। अर्थात् यवागू आदि के क्रम से धीरे २ साधारण भोजन पर पहुंचे। स्तन्यशोधन के लिये उसे गंभारी, मुलहठी, फालसा तथा शीतपाकय (बलाफल) का क्वाथ बनाकर उसे ठण्डा करके शर्करा एवं मधु मिलाकर देना चाहिये अथवा पयस्या (क्षीरकाकोली), सारिवा, गिलोय, महुए का फल तथा मुनक्के के कषाय में शर्करा मिलाकर देना चाहिये। फिर पुण्डरीक, सारिवा, खस तथा चन्दन के कल्क का स्तनों पर लेप करना चाहिये। तथा मुलहठी, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी), रक्तचन्दन, रसौंत तथा तुङ्ग (नागकेसर या पद्माकेसर) अथवा मुलहठी और चन्दन का कल्क अथवा मुलहठी, रक्तचन्दन, नागरमोथा, मंजीठ तथा रसौंत के कल्क अथवा रसौंत, सारिवा, मुलहठी, रक्तचन्दन एवं खस के कल्क अथवा अर्जुन की छाल, गूलर, पीपल, बड़, नल की मूल, शालूक (कमलकन्द) तथा वञ्जुल (वेतस् अथवा जलवेतस) के कल्क में घी मिलाकर अथवा विसमृणाल, पद्माख, मंजीठ, कमल तथा रसाञ्जन के कल्क का लेप करना चाहिये। उसके बाद मुलहठी, मधुपर्णी (गिलोय), वेड (वेट्ट या वेल्ल-गीला चन्दन), वेतस्, शतावरी, नल (नड) की मूल, कदली (केला), कुश, काश, पद्म, उत्पल (नील कमल), इक्षु, विदारी (अथवा इक्षुविदारी शब्द एक ही हो तो भूमिकूष्माण्ड अर्थ होगा), बड़, गूलर की छाल, जामुन, कुम्भीका (जलपर्णी या रक्तपाढल) तथा मधुरा (शतपुष्पा सौंफ अथवा मेदा)-इन सबको एक आढक जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रहने पर उसमें एक प्रस्थ घृत तथा कषाय से दुगुना दूध डाले और मंजीठ, वितूर्णक (केवटीमाथा), काकोली, धाय के फूल, खस, रक्तचन्दन, क्षीरकाकोली, पुण्डरीक, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी), तालीशपत्र तथा मुनक्के को अच्छी प्रकार पीसकर इस कल्क के द्वारा घृत सिद्ध करें। इस घृत का अभ्यङ्ग करके शरीर पर लोध्र, मुलहठी, दारुहल्दी, आंवला, दालचीनी तथा तेजपत्र का चूर्ण छिड़क दे (Dusting) उपर्युक्त विधि से ज्वर, दाह, रंग (लालिमा) पाक तथा व्रण आदि शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार यह पैत्तिक चर्मदल की श्रेष्ठ चिकित्सा कही गई है ॥ १६॥
अत ऊर्ध्वं श्लैष्मिके वक्ष्यामः-अथ धात्रीं पूर्वेण विधिनोपचार्य निम्बकषायमदनफलसिद्धां व्यक्तलवणां यवागूं पाययेन्मदनफलतिलपिष्टतण्डुलसिद्धां वा वमनविधानेन सुखसलवणस्निग्धायाः श्लेष्मोद्धरणार्थं च पिप्पलीयुष्णोदकं पीत्वा च्छर्दयेत्, कृतवमनायाः शिरोविरेचनं विदध्यान्मुद्गसकतीनवेत्राग्रपटोल-निम्बमुस्तकानामन्यतमपरिगृहीतेन यूषेण मृदुमोदनं भोजयेत्। कुटजफलमुस्ताप्रियङ्गशार्ङ्गिष्ठापाठा-