भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 877

अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६] खिलस्थानम् ५१७

लवणाम्बुना सुखोष्णेन क्षीरेणेक्षुरसेन वा । मधूदकेन तिक्तैर्वा वमनं संप्रकल्पयेत् ॥३१॥

वमन योग—लवणाम्बु (नमक के पानी), सुखोष्ण दूध, इक्षुरस, मधूदक (मधु में पानी मिलाकर) अथवा तिक्तद्रव्यों के द्वारा वमन कराना चाहिये ॥३१॥

त्रिफलां त्रायमाणां च कटुका रोहिणीं त्रिवृत् । पञ्चैषामर्धपलिकास्त्रिवृता त्वर्धभागिका ॥३२॥
पीत्वा विरेचनं ह्येतदम्लपित्ताद्विमुच्यते ।

विरेचन योग—त्रिफला, त्रायमाणा, कटुकी; रोहिणी तथा त्रिवृत्—ये पांचों आधापल तथा त्रिवृत् इनसे आधा लेवे । इस विरेचन को पीकर मनुष्य अम्लपित्त से मुक्त हो जाता है ॥

पटोलपत्रं त्रिफलात्वचश्चार्धपलोन्मिताः ॥३३॥
त्रायन्तीरोहिणीनिम्बयष्टिकाः कर्षसंमिताः । पलद्वयं मसूराणां चैकध्यं तद्विपाचयेत् ॥३४॥
जलाढकेऽष्टभागं तु पूतशेषं पुनः पचेत् । सर्पिषः कुडवं दत्त्वा प्रस्थार्धमवशेषितम् ॥३५॥
तत् पीत्वा नातिशीतोष्णं सुखेनाशु विरिच्यते । चिरप्रसक्तमप्येतदम्लपित्तं व्यपोहति ॥३६॥
वातपित्तं ज्वरं कुष्ठं विसर्पं वातशोणितम् । विद्रधि रक्तगुल्मं च विस्फोटांश्चाशु नाशयेत् ॥३७॥

पटोल पत्र एवं त्रिफला की छाल—आधा पल, त्रायमाणा, रोहिणी, नीम तथा मुलहठी—एक कर्ष तथा मसूर दो पल इन सबको एकत्र करके एक आढक जल में पकाये । अष्टमांश शेष रहने पर उसे छान कर एक कुडव घृत डालकर पुनः पकाये । आधा प्रस्थ शेष रहने पर उतार ले । इस घृत का न बहुत शीत तथा न बहुत उष्णरूप में सेवन करने से सुखपूर्वक विरेचन हो जाता है तथा यह अत्यन्त पुराने अम्लपित को भी नष्ट कर देता है । तथा इसके प्रयोग से वात, पित्त, ज्वर, कुष्ठ, विसर्प, वातरक्त, विद्रधि, रक्तगुल्म तथा विस्फोट शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ॥३३-३७॥

पुराणाः शालयो मुद्गा मसूराः सहरेणवः । गव्यं सर्पिः पयो वाऽपि जाङ्गलाश्च मृगद्विजाः ॥३८॥
कलायशाकं पौतीकं वासापुष्पं सवास्तुकम् ।
यानि चान्यानि शाकानि तिक्तानि च लघूनि च ॥३९॥
भोजनेनाऽतिशस्यन्ते यच्चान्यदविदाहि च । तत्सात्म्यानां प्रयोगाणां यथोक्तानां च शीलनम् ॥४०॥

अम्लपित्त में पथ्य—पुराने शालि चावल, मूंग, मसूर, हरेणु, गोघृत, गोदुग्ध, जांगल पशुपक्षियों का मांस, मटर का शाक, पौतीक (करंज), बांसे के फूल, बथुआ तथा अन्य भी तिक्त एवं लघु शाक और जो भी अविदाही (जो विदाह उत्पन्न न करते हों) आहार आदि द्रव्य हैं—उनका भोजन में प्रयोग करना चाहिये । इसके अतिरिक्त यथोक्त सात्म्य प्रयोगों का सेवन करना चाहिये ॥३८-४०॥

लशुनस्य हरीतक्याः पिप्पल्याः सर्पिषस्तथा । मदिरायाश्च जीर्णायाः कालाग्निबलवृद्धये ॥४१॥
व्याघेरस्य यथोक्तानां निदानानां च वर्जनम् ।

इसके अतिरिक्त रोगी के काल, अग्नि एवं बल की वृद्धि के लिये लहसुन, हरड़, पिप्पली, घृत तथा पुरानी मदिरा का सेवन करना चाहिये तथा इस रोग के यथोक्त निदान को छोड़ देना चाहिये अर्थात् इस रोग के उत्पन्न करने वाले कारणों का सेवन नहीं करना चाहिये ॥४१॥

युक्ताहारविहारस्य युक्तव्यायामसेविनः ॥४२॥