भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 878

५१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अम्लपित्तचिकित्सिताध्यायः १६]

शुक्त१कोऽयमलोलस्य शाम्यत्यात्मवतः सतः ।

समुचित आहार-विहार का सेवन करने वाले, समुचित व्यायाम करने वाले, जिह्वालौल्य से रहित अर्थात् संयमी, आत्मवान् (जितेन्द्रिय) तथा सज्जन पुरुष का शुक्तक (अम्लपित्त) रोग शान्त हो जाता है ॥४२॥

यश्च यस्यानुबन्धः(द्धः) स्याद्दोषस्तस्योपशान्तये ।।४३।।
प्रयतेत भिषङ् नित्यं तच्छान्तौ स प्रशाम्यति ।

जो दोष जिसका अनुबन्ध हो, चिकित्सक को उसकी शान्ति का प्रयत्न करना चाहिये । उस दोष के शान्त होने पर वह अनुबन्ध दोष तो स्वयं शान्त हो जायेगा ॥४३॥

आनूपदेशे प्रायेण संभवत्येष देहिनाम् ।।४४।।
तस्माज्जाङ्गलजैरेनमौषधैः समुपक्रमेत् । अप्रशाम्यति चैतस्मिन्नपि देशान्तरं व्रजेत् ।।४५।।

यह रोग प्रायः आनूप देश में रहने वाले प्राणियों को होता है इसलिये उस मनुष्य का जांगल ओषधियों के द्वारा उपचार करना चाहिये । तथा तब भी उसके शान्त न होने पर रोगी को दूसरे देश में चले जाना चाहिये अर्थात् अपना Change of climate कर लेना चाहिये । जलवायु परिवर्तन से रोग पर अवश्य प्रभाव होता है । जो रोग हठी (Obstinate) हो गये हों उनपर जलवायु के परिवर्तन का ही कुछ प्रभाव पड़ सकता है उस पर ओषधियों का बहुत कम प्रभाव होता है । अनुभवी लोगों का कथन है कि एक चिरकालीन रोगी को यदि एक कमरे से दूसरे कमरे में ही बदल दिया जाय तो भी उसके रोग में थोड़ा बहुत अवश्य अन्तर हो जाता है परन्तु परिवर्तन स्वच्छ तथा शुद्ध वायु वाले स्थान पर ही होना चाहिये ॥

स एव देशो यत्र स्यादारोग्यं ते च बान्धवाः ।
गच्छन्ति ये न गच्छन्ति ये चास्य हितकारिणः ।।४६।।

वही देश (स्थान) उत्तम माना जाता है जहां मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक रहता हो । तथा वे ही बन्धु माने जाते हैं जो उससे दूर नहीं जाते हैं तथा जो उसके हितकारी हों ॥४६॥

नित्यालोलस्य दीनस्य परिदूनस्य देहिनः । क्रियाः सर्वाः प्रहीयन्ते स्वजनो विजनीभवेत् ।।४७।।

जो व्यक्ति नित्य अस्वस्थ (निष्क्रिय-बोदा) रहता हो, जो दीन हो तथा जिसका शरीर कष्टमय हो उसके सब कार्य नष्ट हो जाते हैं तथा स्वजन (अपने संबन्धी) भी सब उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥४७॥

तस्मात् सततमारोग्ये प्रयतेत विचक्षणः । अरोगो जीवितफलं सुखं समधिगच्छति ।।४८।।

इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति को सदा आरोग्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना चाहिये । स्वस्थ व्यक्ति जीवन के फल (धर्मार्थ काम मोक्ष) को सुखपूर्वक प्राप्त कर लेता है । चरक सू. अ. १ में कहा है—धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥

ज्वरातीसारपाण्डुत्वशूलशोथारुचिभ्रमैः । उपद्रवैरिमैर्जुष्टः क्षीणधातुर्न सिद्ध्यति ।।४९।।

यदि अम्लपित्त रोग में ज्वर, अतिसार, पाण्डु, शूल, शोथ, अरुचि तथा भ्रम आदि उपद्रव हो जायें तथा रोगी की


१. अलोलस्य जिह्वालौल्यादिरहितस्याऽयं शुक्तकोऽम्लपित्तामयः शाम्यतीत्यर्थः ।

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